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Did Trump Miscalculate Iran? Is the Conflict Spiraling Out of Control? | Khamenei | America | ISRAEL

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क्या अमेरिका एक ऐसे युद्ध में उतर चुका

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है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं है?

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आज पूरी दुनिया की नजरें इसी सवाल पर टिकी

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है। चलिए इस पूरे मामले को समझते हैं और

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देखते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी सुपर

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पावर इस चक्रव्यूह में आखिर फंसी कैसे?

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देखिए जंग शुरू करना तो आसान होता है।

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लेकिन उसे खत्म कब और कैसे करना है? यह

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किसी के हाथ में नहीं होता। और आज सबसे

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बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका ने ईरान

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को कम आंकने की वही ऐतिहासिक गलती कर दी

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जो कुछ साल पहले रूस ने यूक्रेन के साथ की

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थी। एक ऐसी गलती जिसकी कीमत रूस आज भी

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चुका रहा है और संकट के जो संकेत हैं वो

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अब साफ दिखाई दे रहे हैं। हालात यह हैं कि

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अमेरिका को सऊदी अरब और कुवैत जैसे अपने

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ही सबसे पक्के दोस्तों के यहां दूतावास

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बंद करने पड़ रहे हैं। देश के अंदर से ही

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विरोध की आवाजें तेज हो रही हैं। और सबसे

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खतरनाक बात यह है कि इस लड़ाई से बाहर

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निकलने का कोई एग्जिट प्लान नजर ही नहीं आ

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रहा। तो सवाल यह उठता है कि अमेरिका इस

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सिचुएशन तक पहुंचा कैसे? क्या यह लड़ाई सच

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में अमेरिका की अपनी है या फिर उसे किसी

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और की जंग में सिर्फ एक मोहरे की तरह धकेल

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दिया गया है? अमेरिका में ही कई बड़े

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डिफेंस एक्सपर्ट्स इसे नेतन याू ट्रैप का

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नाम दे रहे हैं। इस थ्योरी के मुताबिक ऐसा

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माना जा रहा है कि इजराइल ने बड़ी चालाकी

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से अपने राजनीतिक मकसद पूरे करने के लिए

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अमेरिका को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर

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लिया और सच तो यही है कि अमेरिका की फौजी

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ताकत के बिना इजराइल शायद यह जंग लड़ने की

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सोच भी नहीं सकता था। और यह बातें अब

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सिर्फ एक्सपर्ट्स के बीच नहीं हो रही। यह

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आवाजें अब अमेरिका के अंदर से उठ रही हैं।

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बर्नी सैंडर्स और एलिजाबेथ वारेन जैसे

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बड़े-बड़े नेता इस जंग को गैर संवैधानिक

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बता रहे हैं। और जैसा कि भारतीय मूल के

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सांसद रो खन्ना ने साफ-साफ कहा, अमेरिका

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के लोग अब इन कभी ना खत्म होने वाली

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विदेशी लड़ाइयों से पूरी तरह थक चुके हैं।

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और यह सिर्फ नेताओं की राय नहीं है। जरा

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आंकड़ों पर गौर कीजिए। यह चौंकाने वाले

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हैं। करीब-करीब 60% अमेरिकी लोग इस युद्ध

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के खिलाफ हैं। वाइट हाउस के बाहर से लेकर

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न्यूयॉर्क के टाइम स्क्वायर तक हजारों लोग

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सड़कों पर उतर आए हैं। और यह सिर्फ एक

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प्रोटेस्ट नहीं यह एक सीधा संदेश है। यह

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हमारी जंग नहीं है। लेकिन इस पूरी कहानी

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में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ पलट कर

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रख दिया। एक ऐसी घटना जिसने दुनिया को

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हिला कर रख दिया। हम बात कर रहे हैं ईरान

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के मिनाब शहर पर हुई बमबारी की। उस हमले

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का निशाना बना एक प्राइमरी स्कूल और उस

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स्कूल में मौजूद थी 160 मासूम बच्चियां।

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इस एक दिल दहला देने वाली घटना ने इस

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युद्ध का रुख ही बदल दिया। इसका असर बहुत

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गहरा पड़ा। जब ईरान के विदेश मंत्री ने उन

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बच्चों की तस्वीरें दुनिया के सामने रखी

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तो अमेरिका और इजराइल की इमेज एक क्रूर

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हमलावर की बन गई। इस एक घटना ने ग्लोबल

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स्टेज पर अमेरिका की मोरल अथॉरिटी को लगभग

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खत्म कर दिया। और तो और ईरान के वो लोग जो

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अपनी ही सरकार से नाराज थे वह भी इस हमले

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के बाद एकजुट हो गए। और एक तरफ जब अमेरिका

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इस दलदल में फंस रहा था तो दूसरी तरफ

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हजारों मील दूर बैठी दो और बड़ी ताकतें इस

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खेल को बहुत ध्यान से देख रही थी। बीजिंग

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और मॉस्को दोनों को इसमें अपने लिए एक

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बहुत बड़ा मौका नजर आ रहा था। हैरानी की

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बात तो यह है कि इस मुश्किल घड़ी में

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अमेरिका के अरब दोस्त भी खामोश हैं। सऊदी

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अरब, यूएई सब चुप हैं। क्यों? क्योंकि

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उन्हें डर है। डर इस बात का है कि अगर

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उन्होंने अमेरिका का साथ दिया तो ईरान की

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मिसाइलें, उनके तेल के कुओं और आलीशान

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इमारतों को मलबे में बदलने में देर नहीं

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लगाएंगी। और इसी सिचुएशन ने चीन और रूस को

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एक सुनहरा मौका दे दिया है। चीन को लगता

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है कि यह ताइवान पर अपनी मर्जी थोपने का

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सही वक्त है क्योंकि वह जानता है कि

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अमेरिका एक साथ तीन-तीन लड़ाईयां नहीं लड़

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सकता। वहीं यूक्रेन में उलझा हुआ रूस इसे

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एक लाइफ लाइन की तरह देख रहा है। उसे लगता

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है कि जैसे ही अमेरिका का फोकस हटेगा उसे

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यूक्रेन में वह बढ़त मिल जाएगी जिसकी उसे

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सख्त जरूरत है। तो इन सभी वजहों ने मिलकर

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अमेरिका को एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा

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दिया है जहां से निकलना नामुमकिन सा लग

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रहा है। एक ऐसा जाल जहां से ना निगलते बन

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रहा है ना उगलते। इस चक्रव्यूह की एक बहुत

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बड़ी वजह है लड़ाई के दो अलग-अलग मॉडल। एक

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तरफ है ईरान जो सस्ते घर में बने ड्रोन और

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मिसाइलों से लड़ रहा है और दूसरी तरफ है

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अमेरिका का अरबों खरबों डॉलर का हाईटेक

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डिफेंस सिस्टम। यह बिल्कुल वैसी लड़ाई है

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जैसे कोई छोटी सी चींटी एक बड़े से हाथी

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को थका थका कर मार रही हो। तो अब अमेरिका

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के सामने दो ही रास्ते हैं और दोनों ही

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खराब हैं। अगर वह यह लड़ाई जारी रखता है

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तो उसकी साख और खजाना दोनों खत्म हो

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जाएंगे। और अगर वह पीछे हटता है तो दुनिया

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की सबसे बड़ी सुपर पावर वाली उसकी इमेज पर

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बहुत बड़ा धक्का लगेगा। शायद इतिहास में

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इस जंग को अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक

4:49

गलतियों में से एक गिना जाएगा। एक ऐसा

4:52

चक्रव्यूह जिसे उसने खुद बनाया और अब वह

4:55

खुद ही उसमें कैद होकर रह गया है। असली

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सवाल तो यह है कि क्या इस चक्रव्यूह से

5:00

बाहर निकलने का कोई रास्ता बचा भी है या

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