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Does God Exist? Understanding Swami Vivekananda’s Scientific & Spiritual Approach | UPSC GS

33m 24s5,379 words710 segmentsHindi

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एक पल के लिए कल्पना कीजिए 19वीं सदी का

0:04

भारत चारों तरफ गुलामी की जंजीरें समाज

0:07

जातियों में बटा हुआ लोग खुद को कमजोर मान

0:10

चुके हैं और दुनिया भारत को सिर्फ एक

0:13

पिछड़ा देश समझ रही है। ऐसे समय में एक

0:17

युवा खड़ा होता है जिसके पास ना सेना है

0:20

ना सत्ता ना धन। उसके पास सिर्फ शब्द हैं।

0:24

लेकिन ऐसे शब्द जो सामने बैठे लोगों की

0:27

रीड सीधी कर दे। वो समुद्र पार जाता है एक

0:30

अजनबी जमीन पर जहां ना उसे कोई जानता है

0:34

ना उसकी भाषा समझता है। मंच पर उसका नाम

0:37

पुकारा जाता है और वह खड़ा हो जाता है और

0:40

बस एक वाक्य बोलता है। इतना ही काफी होता

0:44

है कि हजारों लोग उसके सामने खड़े होकर

0:48

तालियां बजाने लगते हैं। उस एक वाक्य के

0:51

बाद भारत को देखने का नजरिया जैसे बदल

0:54

जाता है। धर्म को देखने की सोच बदल जाती

0:57

है। और एक गुलाम देश की आत्मा पहली बार

1:00

पूरी दुनिया के सामने गर्व से खड़ी होती

1:03

है। लेकिन यह कहानी सिर्फ उस मंच की नहीं

1:06

है। यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जो कभी

1:09

ईश्वर पर सवाल उठाता था। उसने भूख देखी,

1:12

गरीबी देखी और जो अपने पिता की मौत के बाद

1:16

एकदम टूट चुका था। यह कहानी है एक ऐसे

1:19

व्यक्ति की जिसको एक समय पर नौकरी के लिए

1:22

धक्के खाने पड़े थे। लेकिन बाद में उसके

1:25

एक-एक शब्द को सुनने के लिए पूरी दुनिया

1:29

एक पैर पर खड़ी रहती थी। यहां तक कि जमशेद

1:32

जी टाटा भी इस युवा व्यक्ति के मुरीद थे।

1:35

इस व्यक्ति ने दुनिया को बताया कि हर

1:37

इंसान के भीतर ईश्वर बसता है। दोस्तों, यह

1:41

कहानी है त्याग की, संघर्ष की और उस साग

1:45

की जिसने एक पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया।

1:48

यह कहानी है नरेंद्रनाथ दत्त की जो कहलाए

1:52

स्वामी विवेकानंद।

2:14

नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म 12th जनवरी 1863

2:18

को मकर संक्रांति के दिन ब्रिटिश सरकार की

2:21

राजधानी कोलकाता में उनके पैतृक घर पर

2:24

थ्री गौर मोहन मुखर्जी स्ट्रीट में हुआ

2:27

था। वे एक प्रतिष्ठित बंगाली कायस्त

2:29

परिवार से थे और नौ भाई बहनों में एक थे।

2:32

उनके पिता विश्वासनाथ दत्त कोलकाता

2:35

हाईकोर्ट के जाने-माने वकील थे जो

2:37

अंग्रेजी शिक्षा, तर्क और आधुनिक सोच के

2:40

पक्षधर थे। जबकि मां भुवनेश्वरी देवी गहरी

2:43

आस्था रखने वाली रामकृष्ण भक्ति में रमी

2:46

हुई गणी थी। यही कारण था कि नरेंद्र के

2:49

भीतर बचपन से ही तर्क और भक्ति दोनों

2:52

साथ-साथ पनपते रहे। उनके दादा दुर्गाचरण

2:55

दत्त संस्कृत और फारसी के विद्वान थे और

2:58

मात्र 25 वर्ष की उम्र में परिवार को

3:00

छोड़कर सन्यासी बन गए। त्याग की यह कहानी

3:03

भी कहीं ना कहीं नरेंद्र के अवचेतन में

3:05

बैठ गई थी। बहरहाल बचपन में नरेंद्र

3:08

मिसवियस, एनर्जेटिक और फियरलेस थे। उनकी

3:11

मां मजाक में कहती थी कि उन्होंने शिव से

3:14

बेटा मांगा था और शिव ने अपने गणों को भेज

3:17

दिया। वहीं एकेडमिक्स में नरेंद्र शुरू से

3:19

ही एक्सेप्शनल थे। 8 साल की उम्र में

3:22

उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के

3:24

मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में दाखिला

3:26

लिया और आगे चलकर प्रेसिडेंसी कॉलेज की

3:28

परीक्षा में प्रवेश किया और फर्स्ट क्लास

3:31

में उसे पास करा। यह ऐसा करने वाले पहले

3:34

और एकमात्र छात्र थे। फिलॉसफी, रिलीजन,

3:38

हिस्ट्री, सोशलॉजी, लिटरेचर यह सब कुछ

3:41

उनकी रुचि के दायरे में था। एक तरफ वेद,

3:44

उपनिषद, गीता, रामायण और महाभारत पढ़ते थे

3:47

तो दूसरी तरफ कांट, हेगल, स्प्नोजा,

3:50

ह्यूम, जॉन स्टवरर्ट मिल, डार्विन और

3:53

हारबर्ट स्पेंसर जैसे वेस्टर्न फिलॉसोफर्स

3:56

को भी गहराई से समझते थे। स्पेंसर के

3:58

विकासवाद से वे इतने प्रभावित हुए कि उनसे

4:01

उन्होंने पत्राचार किया और उनकी किताब

4:03

एजुकेशन का बंगाली अनुवाद तक किया।

4:06

म्यूजिक, योगा, रेसलिंग और स्पोर्ट्स सब

4:10

में वे इक्वली एक्टिव थे। उनकी मेमोरी

4:12

बेहद शार्प थी और इसी एक्स्ट्राऑर्डिनरी

4:14

रिटेंटिव मेमोरी के कारण लोग उन्हें

4:16

श्रुतिधर कहने लगे थे। युवा अवस्था में वे

4:19

ब्रह्म समाज, नवविधान और फ्रीमेशनरी जैसी

4:22

संगठनों से जुड़े थे। जहां मूर्ति पूजा की

4:25

आलोचना, मोनसिज्म और लॉजिकल एंड साइंटिफिक

4:28

टपर पर जोर दिया जाता था। इन आंदोलनों ने

4:31

उन्हें वेस्टर्न आइडियाज और मिस्टिसिज्म

4:34

से परिचित कराया था। लेकिन फिर भी उनका मन

4:36

पूरी तरह शांत नहीं हुआ। जितना वे पढ़ते

4:39

उतना ही भीतर एक सवाल गहराता गया। क्या

4:42

ईश्वर सिर्फ किताबों और बहसों की चीज है

4:45

या किसी ने उसे सचमुच देखा है? क्या ईश्वर

4:49

सच में है? डस गॉड एकिस्ट्स? वे कोलकाता

4:53

के बड़े-बड़े विद्वानों से सवाल पूछते

4:55

रहे। यहां तक कि ब्रह्म समाज के नेता

4:58

देवेंद्र नाथ टैगोर से भी। लेकिन कोई

5:01

संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। यही बेचैनी

5:04

उन्हें उस मोड़ पर ले आई जहां एक व्यक्ति

5:06

ने बिना सिर घुमाए बिना इधर-उधर की बात

5:10

किए हुए सीधा जवाब दिया। हां, मैंने ईश्वर

5:13

को वैसे ही देखा है जैसे तुम्हें देखा

5:15

हूं। यही पल नरेंद्र के जीवन की असली

5:18

शुरुआत बन गया। लेकिन जानते हैं यह

5:20

सीधा-साधा जवाब किसने दिया था? यह जवाब

5:23

दिया था श्री रामकृष्ण परमहंस ने।

5:27

आगे बढ़ते हैं। लेकिन उससे पहले श्री

5:29

रामकृष्ण परमहंस और नरेंद्र नाथ दत्त के

5:31

बीच की मुलाकात को जानते हैं। यह मुलाकात

5:34

की कहानी किसी मंदिर या आश्रम से नहीं

5:36

बल्कि एक क्लासरूम से शुरू होती है।

5:39

कोलकाता के जनरल असेंबलीज इंस्टीट्यूशन

5:41

में साहित्य की क्लास चल रही थी। प्रोफेसर

5:43

विलियम हेस्टी अंग्रेजी के मशहूर कवि

5:46

विलियम वडवर्ड्स की कविता द एक्सरशन पढ़ा

5:49

रहे थे। कविता में ट्रांस यानी समाधि जैसे

5:53

शब्द का जिक्र आया। प्रोफेसर ने किताब बंद

5:55

की और छात्रों की तरफ देखा और कहा अगर

5:58

तुम्हें सच में ट्रांस का अर्थ समझना है

6:00

तो दक्षिणेश्वर जाकर रामकृष्ण परमहंस को

6:03

देखा आओ। यह वाक्य आम छात्रों के लिए शायद

6:06

एक सुझाव था लेकिन नरेंद्र के भीतर कुछ यह

6:09

हिला देने वाला जवाब था। वहीं जिज्ञासा

6:12

वही बेचैनी जो हमेशा सच को तर्क से परखना

6:16

चाहती थी। नवंबर 1881 के आसपास पहली बार

6:19

नरेंद्र का रामकृष्ण परमहंस के साथ

6:22

आमनासामना हुआ। हालांकि नरेंद्र खुद इस

6:25

मुलाकात को पहली मुलाकात नहीं मानते। उस

6:28

समय वे अपने एफए की परीक्षा की तैयारी कर

6:31

रहे थे। एक मित्र रामचंद्र दत्त उन्हें

6:33

सुरेंद्रनाथ मित्र के घर ले आया। जहां

6:36

रामकृष्ण को प्रवचन देने के लिए बुलाया

6:38

गया था। उसी बैठक में रामकृष्ण की नजर

6:41

नरेंद्र पर पड़ी और उन्होंने उनसे गाना

6:43

गाने के लिए कहा। नरेंद्र ने गाना गाया और

6:45

उस गाने में कुछ ऐसा था कि रामकृष्ण

6:48

मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने तुरंत कहा कि

6:51

दक्षिणेश्वर आना तुमसे फिर मिलना है। कुछ

6:54

समय के बाद सन 1881 में या फिर उसके अंत

6:59

में शायद 1882 की शुरुआत में नरेंद्र

7:01

दक्षिणेश्वर पहुंचे। यही वह क्षण था जिसने

7:04

उनके जीवन की दिशा बदल दी। लेकिन यह बदलाव

7:07

एक झटके में नहीं आया था। शुरुआत में

7:10

नरेंद्र ने रामकृष्ण को तुरंत अपना गुरु

7:13

नहीं माना था। वे उनके विचारों से बहस

7:15

करते थे, सवाल उठाते थे और यहां तक कि

7:17

विरोध भी करते थे। रामकृष्ण की समाधि की

7:20

अवस्थाओं और दिव्य अनुभूतियों को नरेंद्र

7:22

कल्पना और हेलुजिनेशन मानते थे। वे ब्रह्म

7:25

समाज से जुड़े थे। मूर्ति पूजा के विरोधी

7:28

थे। बहुदेववाद को नहीं मानते थे। और काली

7:31

की उपासना उन्हें अस्वीकार्य लगती थी।

7:34

अद्वैत वेदांत का ब्रह्म से एकात्म वाला

7:37

विचार उन्हें पागलपन और ईष्ट निंदा जैसा

7:40

लगता था। वे इन बातों का मजाक भी उड़ाते

7:42

थे। लेकिन रामकृष्ण विचलित नहीं होते थे।

7:44

वे बस मुस्कुराकर कहते थे कि सच को हर एक

7:47

एंगल से देखने की कोशिश किया कीजिए। यही

7:50

बात धीरे-धीरे नरेंद्र को बांधने लगी। वे

7:52

बार-बार दक्षिणेश्वर जाने लगे। बहस करते

7:54

सवाल पूछते लेकिन भीतर कहीं खिंचाव बढ़ता

7:58

चला गया। इसी बीच सन 1884 में नरेंद्र के

8:02

जीवन में एक और भूचाल आया। उनके पिता की

8:05

अचानक मृत्यु हो गई। परिवार पर कर्ज का

8:08

पहाड़ टूट पड़ा। लेनदार पैसे मांगने लगे।

8:11

रिश्तेदारों ने पैतृक घर से उन्हें

8:12

निकालने की धमकी दे दी। हालात इतने खराब

8:15

हो गए कि कई बार घर में खाने तक के लिए

8:18

पैसे नहीं होते थे। उस समय विवेकानंद अपनी

8:20

मां से कहते थे कि उन्हें कहीं दोपहर में

8:22

खाना का न्योता मिला है तो वे बाहर जा रहे

8:25

हैं ताकि घर में मौजूद बाकी लोगों को

8:28

थोड़ा ज्यादा खाना मिल सके। सच्चाई यह थी

8:30

कि ऐसे कोई निमंत्रण उनके पास आते ही नहीं

8:33

थे और वह खुद या तो बहुत कम खाते थे या कई

8:36

बार भूखे ही सो जाते थे। जो नरेंद्र कभी

8:39

एक संपन्न परिवार का बेटा था वही कॉलेज का

8:42

सबसे गरीब छात्र बन गया। बीए की डिग्री

8:44

लेने के बाद भी नरेंद्र नाथ दत्त को लंबे

8:47

समय तक कोई नौकरी नहीं मिली। नौकरी की

8:49

तलाश में उन्होंने हर दरवाजा खटखटाया

8:52

लेकिन हर जगह निराशा हाथ लगी। इस अंधेरे

8:55

दौर में उनके मन में ईश्वर के अस्तित्व को

8:58

लेकर गहरा संदेह पैदा हुआ। लेकिन उसी समय

9:01

रामकृष्ण उनके लिए सहारा बन गए। एक दिन की

9:03

बात है जब वे हताश होकर रामकृष्ण के पास

9:06

गए और उनसे कहा कि मेरे परिवार की हालत

9:08

बहुत खराब है। मां काली से प्रार्थना

9:11

कीजिए। रामकृष्ण ने जवाब दिया मैं क्यों

9:13

करूं? तुम खुद मंदिर जाओ और प्रार्थना

9:15

करो। नरेंद्र मंदिर गए एक बार नहीं तीन

9:19

बार। हर बार वे काली के सामने खड़े हुए

9:21

लेकिन उनसे धन, नौकरी या सुख की मांग नहीं

9:25

कर पाए। अंत में उन्होंने सिर्फ इतना

9:27

मांगा सच्चा ज्ञान और सिर्फ सच्ची भक्ति।

9:31

यहीं से उनके भीतर त्याग की भावना जन्म

9:33

लेने लगी। धीरे-धीरे वह सब कुछ छोड़कर

9:35

ईश्वर को जानने के लिए तैयार हो गए और

9:37

रामकृष्ण को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।

9:40

आगे चलकर सन 1885 में रामकृष्ण को गले का

9:44

कैंसर हो गया। उनके अंतिम दिनों में

9:46

नरेंद्र और अन्य शिष्य उनकी सेवा में जुटे

9:48

रहे। बीमारी के बीच भी नरेंद्र की

9:50

आध्यात्मिक शिक्षा चलती रही। वहीं

9:52

रामकृष्ण ने नरेंद्र और कुछ अन्य शिष्यों

9:55

को गिरवे वस्त्र भी दे दिए जिससे उनके

9:57

पहले सन्यासी संघ की नीव पड़ सकी।

9:59

रामकृष्ण ने नरेंद्र को एक गहरा संदेश

10:02

दिया। मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सबसे

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सच्ची सेवा है। उन्होंने नरेंद्र से कहा

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कि यह बाकी सन्यासियों का ध्यान रखें और

10:10

बाकी शिष्यों से कहा कि वह नरेंद्र को

10:12

अपना नेता माने। यह कोई औपचारिक घोषणा

10:14

नहीं थी बल्कि यह आध्यात्मिक उत्तराधिकार

10:17

था।

10:18

16th ऑफ अगस्त 1886

10:22

सुबह काशीपुर में रामकृष्ण परमहंस का

10:25

देहांत हो गया। रामकृष्ण परमहंस के देहांत

10:28

के बाद अचानक हालात बदल गए। जो भक्त और

10:31

प्रशंसक पहले आश्रम के साथ खड़े रहते थे

10:33

उनका सहारा धीरे-धीरे कम होने लगा। आर्थिक

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मदद रुक गई। किराया चुकाया नहीं जा सका और

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बकाया बढ़ता चला गया। ऐसी स्थिति आ गई कि

10:41

नरेंद्र और उनके साथ बचे शिष्यों को रहने

10:44

के लिए नई जगह तलाशनी पड़ी। यह वही समय था

10:47

जब कई शिष्य टूट गए। कुछ लोग घर लौट आए और

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गृहस्थ जीवन अपना लिया। क्योंकि सन्यास का

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रास्ता उस दौर में बेहद कठिन और अनिश्चित

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लगने लगा था। लेकिन नरेंद्र ने पीछे हटने

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से इंकार कर दिया था। उन्होंने तय किया कि

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चाहे परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों ना

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हो रामकृष्ण के दिए हुए मार्ग को छोड़कर

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नहीं जाएगा। इसी संकल्प के साथ उन्होंने

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बरान नगर में एक जजर और लगभग उजड़े हुए

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मकान को चुना और उसे मठ में बदलने का

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फैसला किया। यह जगह भले ही खंडहर जैसी थी,

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लेकिन किराया कम था। जो थोड़ा बहुत किराया

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देना होता था, वह माधुकरी से जुटाया जा

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सकता था। यानी सन्यासी की तरह भिक्षा

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मांगकर सिर्फ जीवन चलाने भर के लिए। यही

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बर नगर मठ आगे चलकर रामकृष्ण मठ की पहली

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स्थाई पहचान बन गया। उस मठ का जीवन बेहद

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कठोर था लेकिन भीतर से अत्यंत जीवंत।

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अनुशासन के मामले में वे बेहद सख्त थे। मठ

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के नियमों को लेकर वे किसी तरीके का

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समझौता पसंद नहीं करते थे। इस संदर्भ में

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मैं आपको इंडिया टुडे के रेफरेंस से एक

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घटना से अवगत कराता हूं। कहते हैं कि

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उन्होंने महिलाओं को मठ में प्रवेश से रोक

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लगा दी थी। एक बार जब वे तेज बुखार में थे

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तो उनके शिष्यों ने उनकी मां को बुला

11:54

लिया। जैसे ही विवेकानंद अपनी मां को

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देखते हैं वे नाराज हो गए और बोले कि एक

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महिला को अंदर आने की अनुमति क्यों दी गई?

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उनका कहना था कि जब नियम मैंने बनाया है

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तो उसे तोड़ने का अधिकार भी मुझे नहीं है।

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इसी कठिन दौर के बीच नरेंद्र का रचनात्मक

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पक्ष भी जीवित रहा। 1887 में उन्होंने एक

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बंगाली गीत संग्रह तैयार करना शुरू किया

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जिसका नाम रखा गया संगीत कल्पतरु। इस

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संकलन में उन्होंने वैष्णव चरण बसाख के

12:21

साथ मिलकर भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं से

12:23

भरे गीतों को एकत्र किया और व्यवस्थित

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किया। बहरहाल रामकृष्ण परमहंस के देहांत

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के बाद जो जीवन नरेंद्र और उनके साथियों

12:32

ने चुना था वो अब धीरे-धीरे एक ठोस आकार

12:34

लेने लगा था। दिसंबर 1886 की बात है।

12:37

बाबूराम नाम के एक सन्यासी की मां ने

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नरेंद्र को बाकी भाइयों के साथ अंतरपुर

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गांव में बुलाया। यह कोई साधारण निमंत्रण

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नहीं था बल्कि एक ऐसे निर्णय की शुरुआत थी

12:47

और ऐसी भूमिका थी जो जीवन भर के लिए दिशा

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तय करने वाली थी। क्रिसमस ईव की रात 24

12:54

सितंबर 1886 स्थान था अंतपुर का राधा

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गोविंद देव मंदिर। उसी मंदिर में 23 वर्ष

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के नरेंद्र और उनके आठ सन्यासियों ने

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औपचारिक रूप से सन्यास की दीक्षा ली थी।

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यह सिर्फ वस्त्र बदलने की रस्म नहीं थी

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बल्कि एक प्रण था कि वे वही जीवन जिएंगे

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जो उनके गुरु रामकृष्ण ने जिया है। पूर्ण

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त्याग, पूर्ण समर्पण और सत्य की खोज में

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बिना किसी समझौते के। लेकिन सन्यास लेने

13:20

के बाद भी नरेंद्र एक जगह टिके नहीं। 1888

13:24

में उन्होंने मठ छोड़ दिया और एक परिवज्रक

13:27

के रूप में वे निकल पड़े। इसका अर्थ था कि

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ना कोई स्थाई ठिकाना, ना कोई संबंध, ना

13:32

किसी जगह से कोई जुड़ाव। उनके पास कुल

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मिलाकर बस कुछ ही चीजें थी। एक कमंडल, एक

13:38

लाठी, दो किताबें, भगवत गीता और इमिटेशन

13:42

ऑफ क्राइस्ट। ये किताबें बताती हैं कि

13:45

उनकी सोच सिर्फ भारतीय परंपरा तक सीमित

13:47

नहीं थी बल्कि वह एक सत्य को हर दिशा से

13:50

समझना चाहते थे। अगले 5 वर्षों तक नरेंद्र

13:53

पूरे भारत में घूमते रहे। विज्ञान के

13:55

केंद्रों में गए, साधुओं से मिले, अलग-अलग

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धार्मिक परंपराओं को समझा और समाज की असल

14:01

तस्वीर को बहुत करीब से देखा। उन्होंने

14:03

भारत की गरीबी को सिर्फ सुना नहीं बल्कि

14:06

जिया भी। भूखे पेट फटे कपड़ों में, कभी

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पैदल तो कभी रेलगाड़ी से। वे भिक्षा पर

14:11

जीवन चलाते हुए देश के कोने-कोने में

14:14

पहुंच गए। यही यात्राएं थी जिन्होंने उनके

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भीतर एक गहरी करुणा और आक्रोश दोनों भर

14:20

दिया था। उन्होंने साफ-साफ देख लिया था कि

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भारत की आत्मा पीड़ा में है और अगर ईश्वर

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की पूजा सच में करनी है तो वह उस पीड़ित

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मानवता की सेवा के बिना बिल्कुल अधूरी है।

14:31

इन्हीं वर्षों में उनके जीवन में खेतड़ी

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या फिर खेतड़ी के रियासत के राजा अजीत

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सिंह आ गए। एक मित्र, एक संरक्षक और शिष्य

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के रूप में उन्हीं के सुझाव पर नरेंद्र ने

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अपना एक नया नाम चुना विवेकानंद।

14:45

यह नाम सिर्फ पहचान नहीं था बल्कि उनके

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जीवन दर्शन का एक सार था। 1893 के आते-आते

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विवेकानंद के भीतर भारत के लिए कुछ बड़ा

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करने का संकल्प पूरी तरीके से आकार ले

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चुका था। वे समझ चुके थे कि भारत की

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आध्यात्मिक शक्ति को दुनिया के सामने रखना

15:02

बेहद जरूरी है। और इसी उद्देश्य से 31 ऑफ

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मई 1893 को वे बॉम्बे से शिकागो के लिए

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रवाना हुए। जहां वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ

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रिलीजन होने वाला था। वर्ल्ड्स

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पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में क्या हुआ? यह

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जानने से पहले हम आपको यह समझाना चाहते

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हैं कि विवेकानंद के विचार क्या थे? आखिर

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ऐसा क्या था उनके शिक्षाओं में? देखिए

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स्वामी विवेकानंद जब धर्म कहते थे तो उसका

15:28

मतलब पूजा पाठ मंदिर या किताबों से नहीं

15:32

होता था। वे सीधी सी बात कहते थे। मान लो

15:35

तुम्हारे सामने एक गरीब मजदूर बैठा है।

15:37

भूखा है, कमजोर है और तुम मंदिर में जाकर

15:40

घंटी बजा रहे हो। तो उस वक्त भगवान कहां

15:43

ज्यादा खुश होंगे? मंदिर में या उस भूखे

15:45

इंसान को खाना खिलाने में? जवाब साफ था।

15:48

ईश्वर हर इंसान के भीतर है। इसलिए इंसान

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की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। और इसी को

15:53

वे कहते थे शिव ज्ञान में जीव सेवा। इसे

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ऐसे समझिए कि अगर बिजली हर घर में है तो

16:00

सिर्फ स्विच ऑन करना बाकी है और बिजली आ

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जाएगी। वैसे ही ईश्वर हर आत्मा में है। बस

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उसे जागृत करना होता है। अब वेदांत और योग

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को वे कैसे समझते थे? आइए इसको भी समझते

16:13

हैं। विवेकानंद का विचार था कि ईश्वर तक

16:17

पहुंचने का रास्ता भी ऐसा ही है। कोई कर्म

16:19

योग से पहुंचता है यानी निस्वार्थ काम

16:22

करके, कोई भक्ति योग से, कोई प्रेम और

16:24

श्रद्धा से और कोई ज्ञान योग से। सोच

16:27

समझकर कोई राज योग से ध्यान और आत्म संयम

16:31

से भी पहुंच सकता है। रास्ते अलग-अलग हैं

16:34

लेकिन मंजिल एक है। इसलिए वे कहते थे एक

16:37

रास्ता पकड़ो या चारों मिलकर चलो लेकिन

16:40

चलते रहो। अब उनका सबसे मशहूर वाक्य याद

16:43

रखिए। ईच सोल इज पोटेंशियली डिवाइन। जैसे

16:47

बीच के अंदर पूरा का पूरा पेड़ छुपा होता

16:49

है। लेकिन जब तक पानी, धूप और समय नहीं

16:52

मिलता तब तक वो दिखता नहीं है। वैसे ही हर

16:55

इंसान के अंदर शक्ति, आत्मविश्वास और

16:58

महानता छुपी हुई है। धर्म का काम यह नहीं

17:01

कि डर वो पैदा करें बल्कि यह बताना है कि

17:04

तुम कमजोर नहीं हो। विवेकानंद इसीलिए कहते

17:06

हैं डर छोड़ो उठो खुद पर भरोसा रखो।

17:11

बहरहाल विवेकानंद को वर्ल्ड्स

17:13

पार्लियामेंट ऑफ रिलीजंस में पहुंचना था।

17:15

मद्रास के शिष्यों, मैसूर, रामनाड और

17:18

खेतरी के राजाओं, दीवानों और कुछ

17:20

निष्ठावान अनुयायियों की मदद से वे 31 ऑफ

17:24

मई 1893 को बॉम्बे के शिकागो के लिए निकल

17:27

पड़े। वे जहाज से अमेरिका के लिए रवाना

17:30

हुए। रास्ता सीधा नहीं था। सबसे पहले वे

17:33

चीन के कैंटन यानी ग्वांगझाऊ पहुंचे। जहां

17:36

उन्होंने पहली बार कई बौद्ध मठों को बाहर

17:39

देश के बाहर देखा था। इसके बाद वे जापान

17:42

गए। नागासाकी, ओसाका, टोक्यो और टोक्यो से

17:45

होते हुए वे अंत में योकोहामा पहुंचे।

17:48

जापान की अनुशासन प्रियता, आधुनिकता और

17:51

सांस्कृतिक संतुलन उन्हें भीतर तक

17:54

प्रभावित कर देती है। योकोहामा से

17:56

उन्होंने आरएमएस एप्रेस ऑफ इंडिया जहाज

17:59

पकड़ा जो उन्हें कनाडा ले जा रहा था। इसी

18:01

जहाज पर नियति ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति

18:03

से मिलाया जिसने आगे चलकर भारत के

18:05

औद्योगिक भविष्य की नींव रखी। जमशेद जी

18:08

टाटा। टाटा उस समय शिकागो जा रहे थे। एक

18:12

नए बिजनेस आईडिया तलाश में। जहाज की इस

18:15

आकस्मिक मुलाकात में विवेकानंद ने टाटा को

18:18

भारत में एक रिसर्च और एजुकेशनल

18:20

इंस्टीट्यूशन बनाने के लिए प्रेरित कर

18:23

दिया। दोनों के बीच भारत में स्टील

18:25

फैक्ट्री स्थापित करने की योजना पर भी

18:27

चर्चा हुई। 25th जुलाई 1893 को विवेकानंद

18:30

कनाडा से बैंकवर पहुंचे। वहां से ट्रेन के

18:33

द्वारा 30th जुलाई रविवार यानी संडे के

18:36

दिन वे शिकागो पहुंचे। लेकिन वहां जाकर

18:39

कहानी का सबसे कठिन अध्याय शुरू होने वाला

18:41

था। शिकागो पहुंचते ही विवेकानंद को करारा

18:44

झटका लगा और उन्हें पता चला कि वर्ल्ड्स

18:47

पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में कोई भी

18:49

व्यक्ति बिना आधिकारिक क्रेडेंशियल्स के

18:51

प्रतिनिधि के रूप में भाग नहीं ले सकता

18:53

था। हालांकि ब्रह्म समाज और थियोसोफिकल

18:56

सोसाइटी को हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के

18:58

रूप में आमंत्रित किया गया था। लेकिन उनके

19:00

पास ना कोई सिफारिश पत्र था ना कोई

19:02

आधिकारिक मान्यता। ऊपर से यह भी मालूम हुआ

19:05

कि संसद का आयोजन सितंबर से पहले हफ्ते

19:08

में होना था। यानी अभी इंतजार लंबा करना

19:11

था। एक विदेशी शहर सीमित पैसे और सामने

19:15

अनिश्चित भविष्य। कोई और उनकी जगह होता तो

19:18

शायद यहीं हार मान लेता। लेकिन विवेकानंद

19:21

टूटे नहीं। खर्च कम करने के लिए उन्होंने

19:23

शिकागो छोड़कर बोस्टन जाने का फैसला कर

19:26

लिया। यही फैसला उनके जीवन का टर्निंग

19:28

पॉइंट बन गया। बोस्टन में उनकी मुलाकात

19:31

हुई हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन

19:34

हेनरी से। जॉन हेनरी राइट। विवेकानंद की

19:37

बातचीत उनके ज्ञान, वेदांत की समझ और

19:40

विचारों की गहराई ने राइट को स्तब्ध कर

19:42

दिया। प्रोफेसर ने ना सिर्फ उन्हें हावर्ड

19:45

में लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया

19:47

बल्कि जोर देकर के कहा कि उन्हें हिंदू

19:50

धर्म का प्रतिनिधित्व वर्ल्ड पार्लियामेंट

19:52

में करना चाहिए। जब राइट को पता चला कि

19:55

विवेकानंद के पास संसद में शामिल होने के

19:57

लिए कोई आधिकारिक दस्तावेज ही नहीं है तो

19:59

उन्होंने यह एक ऐतिहासिक वाक्य कहा। आपसे

20:02

क्रेडेंशियल्स मांगना ऐसा है जैसे सूरज से

20:05

यह पूछना कि उसे आसमान में चमकने का

20:07

अधिकार किसने दिया? यहीं से विवेकानंद को

20:10

वो नैतिक बौद्धिक समर्थन मिला जिसकी

20:13

उन्हें सख्त जरूरत थी। अब वे फिर से

20:15

शिकागो लौटे। बाद में विवेकानंद ने आवेदन

20:18

लिखा और आवेदन का समर्थन ब्रह्म समाज के

20:20

प्रतिनिधि प्रताप चंद्र मजूमदार ने किया

20:23

जो संसद की चयन समिति के सदस्य भी थे। अब

20:26

आगे की कहानी को जरा दिल थाम के सुनिएगा।

20:29

11th सितंबर 1893

20:32

प्लेस पार्लियामेंट मेमोरियल आर्ट पैलेस

20:35

जिसे आज आर्ट इंस्टट्यूट ऑफ शिकागो के नाम

20:38

से जाना जाता है। वर्ल्ड्स कोलंबियन

20:40

एक्सपोजिशन के तहत वर्ल्ड्स पार्लियामेंट

20:43

ऑफ रिलीजन की शुरुआत हो चुकी थी।

20:45

विवेकानंद का नंबर दोपहर में आया वो भी

20:47

काफी देर से। मंच पर जाने से पहले

20:50

उन्होंने मन ही मन सरस्वती को नमन किया और

20:53

फिर बोले माय डियर सिस्टर्स एंड ब्रदर्स

20:56

ऑफ अमेरिका। इतने से शब्दों पर पूरा

20:59

सभागार तालियों से गूंज उठा। वो सिर्फ

21:03

भाषण की शुरुआत नहीं थी। वो पश्चिम और

21:06

भारत के बीच पहली सच्ची भावनात्मक बातचीत

21:10

थी। 15 सितंबर को दिए गए भाषण व्हाई वी

21:13

डिसएग्री में उन्होंने मशहूर कूप मंडूप की

21:16

कहानी सुनाई। कुएं में रहने वाला मेंढक जो

21:19

अपने छोटे से कुएं को पूरी दुनिया समझता

21:22

है और समुद्र की विशालता को मानने से

21:24

इंकार कर देता है। विवेकानंद ने साफ कहा

21:26

कि यही समस्या धर्मों के बीच भी है। हर

21:28

कोई अपने कुएं को पूरी सच्चाई मान बैठा

21:31

है। 20th सितंबर के भाषण रीजन नॉट द

21:35

क्राइम नीड ऑफ इंडिया में उन्होंने पश्चिम

21:38

को झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की

21:40

सबसे बड़ी समस्या धर्म नहीं बल्कि गरीबी

21:43

है। उन्होंने मिशनरियों की आलोचना करते

21:45

हुए कहा कि भूखे इंसान को पहले रोटी चाहिए

21:48

उपदेश नहीं। 26 सितंबर को बुद्धिज्म द

21:52

फुलफिलमेंट ऑफ हिंदूइज़्म भाषण में

21:54

उन्होंने हिंदू धर्म और बुद्धिज्म के

21:57

रिश्ते को समझाया। ऐतिहासिक वाक्य कहा कि

22:01

हिंदू धर्म बौद्ध धर्म के बिना जीवित नहीं

22:03

रह सकता और बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के बिना

22:06

नहीं। शिकागो का मंच अब सिर्फ एक सभागार

22:09

नहीं रह गया था। वह इतिहास बन चुका था।

22:12

जिस सन्यासी को कुछ हफ्ते तक पहले पहचानने

22:15

से इंकार कर दिया जा रहा था, वही अब पूरे

22:17

वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन का

22:19

केंद्र बन चुका था। संसद के अध्यक्ष जॉन

22:22

हेनरी बैरोस ने खुले मंच से कहा भारत जो

22:25

धर्मों की जननी है उसका प्रतिनिधित्व

22:28

स्वामी विवेकानंद ने किया है। यह गेरुवे

22:30

वस्त्र वालावा सन्यासी अपने श्रोताओं पर

22:33

अद्भुत प्रभाव डालने के लिए पूरी तरह सफल

22:35

रहा है। अमेरिकी प्रेस विवेकानंद के पीछे

22:38

पड़ चुका था। अखबारों को जैसे नया नायक

22:41

मिल चुका था। उन्हें नाम दिया गया इंडिया

22:43

से आया साइक्लोनिक मक यानी ऐसा सन्यासी जो

22:47

तूफान की तरह आया और सब कुछ बदल कर चला

22:50

गया। न्यूयार्क हिराल्ड ने तो और भी

22:52

जबरदस्त टिप्पणी की। उसने लिखा विवेकानंद

22:55

निसंदेह इस पार्लियामेंट की सबसे महान

22:57

हस्ती हैं। उन्हें सुनने के बाद यह एहसास

23:00

होता है कि इस विद्वान राष्ट्र में

23:03

मिशनरियों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता

23:05

है। बोस्टन इवनिंग ट्रांसक्रिप्ट ने लिखा

23:08

कि अगर वे सिर्फ मंच पार भी कर जाएं तो

23:10

तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो जाती है।

23:12

जल्द ही अमेरिकी समाज में उन्हें एक नए

23:14

नाम से जाना जाने लगा। हैंडसम ओरिएंटल।

23:18

लेकिन यह सुंदरता चेहरे की नहीं थी। यह

23:20

सुंदरता थी विचारों की। उस क्षण के बाद

23:23

विवेकानंद सिर्फ भारत के ही नहीं रहे।

23:25

शिकागो की ऐतिहासिक सफलता के बाद स्वामी

23:28

विवेकानंद अब सिर्फ एक मंच के वक्ता नहीं

23:31

रहे थे। पार्लियामेंट ऑफ रिलीजंस के बाद

23:33

अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में उन्हें

23:35

निमंत्रण मिलने लगा था। लोग उन्हें सुनना

23:38

चाहते थे, समझना चाहते थे। वो पहली बार था

23:41

जब किसी भारतीय सन्यासी को पश्चिम में

23:43

इतनी बड़ी संख्या में अपनी बात कहने का

23:46

अवसर मिला था। अमेरिका में एक सवाल जवाब

23:49

के सत्र के दौरान ब्रोकलिन एथिकल सोसाइटी

23:52

में विवेकानंद ने एक वाक्य कहा जिसने उनके

23:55

पूरे मिशन को समेट दिया। उन्होंने कहा कि

23:57

मेरे पास पश्चिम के लिए वही संदेश है जो

24:00

बुद्ध के पास पूर्व के लिए था। लेकिन वे

24:02

किसी को धर्म बदलने के लिए नहीं कह रहे

24:05

थे। सोचिए अगर कोई मिशनरी भारत आकर बोले

24:08

कि तुम गलत हो तो कैसा लगेगा? विवेकानंद

24:11

ने उल्टा किया। उन्होंने कहा कि तुम जैसे

24:13

हो वैसे ही अच्छे हो। मैथोिस्ट हो तो

24:16

अच्छे मैथोिस्ट बनो। क्रिश्चियन हो तो

24:18

अच्छे क्रिश्चियन बनो। मतलब धर्म बदलो मत।

24:22

इंसान बेहतर बनो। यही वजह थी कि अमेरिका

24:25

और यूरोप में लोग उन्हें सुनकर खड़े होकर

24:27

तालियां बजाते थे। दोस्तों लगभग दो वर्षों

24:30

तक विवेकानंद ने अमेरिका के पूर्वी और

24:32

मध्य हिस्सों में लगातार व्याख्यान दी।

24:34

खासकर शिकागो, डेट्रॉयट, बोस्टन और

24:37

न्यूयॉर्क में। और इसी दौरान 1894 में

24:39

उन्हें वेदांत सोसाइटी ऑफ न्यूयॉर्क की

24:42

स्थापना की जो पश्चिम में वेदांत की पहली

24:44

संगठित संस्था थी और इसी समय उन्हें

24:46

हावर्ड यूनिवर्सिटी में ईस्टर्न फिलॉसफी

24:49

की चेयर और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भी

24:52

एकदम पद का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन

24:54

विवेकानंद ने दोनों अस्वीकार कर दिया।

24:57

उनका स्पष्ट उत्तर था सन्यास का कर्तव्य

25:00

किसी विश्वविद्यालय के पद से बड़ा है।

25:02

इसके बाद 1895 में विवेकानंद पहली बार

25:04

यूनाइटेड किंगडम गए। नवंबर 1895 में उनकी

25:08

मुलाकात एक आरिश महिला मार्गेट एलिजाबेथ

25:11

नोबेल से हुई। यही महिला आगे चलकर सिस्टर

25:14

निवेदिता बनी। विवेकानंद की सबसे निकट

25:17

शिष्यों में से एक बन गई थी। 1896 की

25:20

दूसरी इंग्लैंड यात्रा में विवेकानंद की

25:22

भेंट ऑक्सफोर्ड के विद्वान मैक्स मूलर से

25:25

हुई। जिन्होंने पश्चिम में रामकृष्ण

25:26

परमहंस की पहली जीवनी लिखी। पश्चिम में

25:29

मिली इस असाधारण सफलता ने विवेकानंद को

25:32

मिशन को नई दिशा दे दी थी। यहीं से उनका

25:35

प्रसिद्ध चार योगों का सिद्धांत सामने

25:37

आया। राजयोग, कर्म योग, भक्ति योग और

25:41

ज्ञान योग। खासकर राजयोग जो ईश्वर को भीतर

25:44

अनुभव करने का व्यवहारिक मार्ग बताता था।

25:47

पश्चिमी समाज में बेहद लोकप्रिय हुआ था।

25:50

1896 में उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई।

25:52

पतंजलि के योग सूत्रों की उनकी व्याख्या।

25:55

यह किताब तुरंत सफल हुई और पश्चिम में योग

25:58

की आधुनिक समझ की नींव यहीं पर डल गई। यही

26:02

वह क्षण था जब आधुनिक योग आंदोलन की

26:05

शुरुआत मानी जाता था। धीरे-धीरे अमेरिका

26:06

और यूरोप में विवेकानंद के अनुयायियों की

26:08

सूची लंबी होती चली गई। जोसफेन मैक्लॉइड,

26:12

विलियम जेम्स, निकोला टेसला, लॉर्ड

26:15

केल्विन, सेरा बर्नहेड, एला व्हीलर

26:18

विलकक्स जैसे महान नाम उनके विचारों से

26:21

प्रभावित हुए। उन्होंने कुछ और शिष्यों को

26:23

औपचारिक सन्यास भी दिया। जैसे फ्रांस की

26:26

मैरी लुईस जो बनी स्वामी अभियनानंद और लन

26:30

लैं्सबर्ग जो बने स्वामी कृपानंद डेट्रॉइड

26:34

की क्रिस्टीना ग्रेनस्टाइड को उन्होंने

26:37

सिस्टर क्रिस्टीन का नाम दिया। इसी समय

26:39

अमेरिका में ही उन्हें कैलिफोर्निया के

26:40

सेंट जोस के पास पहाड़ों में जमीन दी गई।

26:43

जहां उन्होंने एक आध्यात्मिक आश्रम

26:45

स्थापित किया। नाम दिया शांति आश्रम। बाद

26:49

में अमेरिका में कुल 12 वेदांत सेंटर्स

26:51

बने। जिनमें सबसे बड़ा वेदांत सोसाइटी ऑफ

26:54

सदर्न कैलिफोर्निया हॉलीवुड रहा। वहीं

26:56

वेदांत प्रेस की स्थापना भी हुई जो वेदांत

26:59

और हिंदू ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद

27:01

प्रकाशित करने लगी थी। 1895 में उन्होंने

27:04

पत्रिका ब्रह्मवादिन की शुरुआत की। 1899

27:07

में इसी पत्रिका में उन्होंने द लिमिटेशन

27:10

ऑफ क्राइस्ट के पहले छह अध्यायों का

27:12

अनुवाद प्रकाशित किया। यह दिखाने के लिए

27:15

कि सत्य किसी एक धर्म की बपौती नहीं है।

27:18

आखिरकार 16th ऑफ दिसंबर 1896 को विवेकानंद

27:22

इंग्लैंड से भारत के लिए रवाना हुए। उनके

27:24

पीछे सिस्टर निवेदिता भी भारत आई और अपना

27:27

पूरा जीवन भारतीय महिलाओं की शिक्षा और

27:30

भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य को

27:32

समर्पित कर दिया। जब 15th ऑफ जनवरी 1897

27:35

को स्वामी विवेकानंद कोलंबो पहुंचे तो यह

27:38

सिर्फ एक यात्री का आगमन नहीं था। यह

27:40

पूर्व की धरती पर लौटे हुए एक ऐसे योद्धा

27:43

का प्रवेश था जो पश्चिम को झकझोर कर आया

27:46

था। कोलंबो से विवेकानंद का सफर पंबन,

27:49

रामेश्वरम, रामनाथ, मदुरई, कुंभकोनम और

27:53

मद्रास तक फैला। हर जगह जनसैलाब, उत्साह

27:57

और आंखों की उम्मीद भरी हुई थी। कई बार तो

28:00

ट्रेन को लोगों ने पटरियों पर बैठकर रुकवा

28:03

दिया। सिर्फ इसलिए कि हम उस आदमी को सुनना

28:06

चाहते हैं जिसने दुनिया को भारत का परिचय

28:08

कराया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। यह

28:11

उस भरोसे की वापसी थी जो सदियों की गुलामी

28:14

में कहीं खो गया था। पश्चिम में विवेकानंद

28:17

भारत की आध्यात्मिक महानता की बात करते

28:20

थे। लेकिन भारत की धरती पर खड़े होकर उनका

28:23

स्वर बदल जाता था। वहां वे धर्म से ज्यादा

28:26

समाज की बात करते थे। वे गरीबी हटाने की,

28:28

जाति प्रथा तोड़ने की, विभाजन और

28:31

औद्योगीकरण अपनाने की और सबसे जरूरी

28:34

मानसिक गुलामी से आजादी की बात करते थे।

28:38

उनका संदेश साफ था। आध्यात्मिकता तब तक

28:41

अधूरी है जब तक भूखा इंसान मौजूद है। और

28:44

फिर आया फर्स्ट ऑफ मई 1897 का दिन। जगह थी

28:49

कोलकाता।

28:50

यह वही दिन था जब विवेकानंद ने अपने

28:52

विचारों को संस्था का रूप दिया और

28:55

रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मठ

28:58

आध्यात्मिक कार्यों का केंद्र बना और

29:00

रामकृष्ण मिशन समाज सेवा का। दोनों का

29:03

हृदय बना बेलूर मठ जहां साधना और सेवा एक

29:07

साथ सांस लेती थी। हालांकि यहीं नहीं रुके

29:10

विवेकानंद। हिमालय की गोद में मायावती में

29:13

उन्होंने अद्वैत आश्रम की स्थापना भी की।

29:15

मद्रास में एक और मठ खड़ा हुआ। विचारों को

29:18

जनजन तक पहुंचाने के लिए दो पत्रिकाएं

29:21

शुरू की गई। प्रबुद्ध भारत इंग्लिश में और

29:24

उद्बोधन बंगाली में। इसी वर्ष मुर्शिदाबाद

29:28

में अकाल राहत कार्य भी शुरू किया गया।

29:30

विवेकानंद का प्रभाव इतना गहरा था कि

29:32

उद्योगपति जमशेद जी टाटा तक उनसे प्रेरित

29:35

हुए थे। जापान से अमेरिका की समुद्री

29:37

यात्रा के दौरान विवेकानंद ने भारत में एक

29:40

उच्च स्तरीय रिसर्च और एजुकेशनल संस्था का

29:43

सपना साझा किया था। वर्षों बाद टाटा उसी

29:46

सपने को लेकर उनके पास आए और संस्थान का

29:49

नेतृत्व सौंपना चाहा। विवेकानंद ने

29:51

विनम्रता से मना कर दिया यह कहते हुए कि

29:54

उनका रास्ता आध्यात्मिक सेवा का है।

29:56

प्रशासन का नहीं। इसके बाद पंजाब में

29:58

उन्होंने आर्य समाज और सनातन हिंदुओं के

30:00

बीच वैचारिक टकराव को सुलझाने की कोशिश

30:03

की। लेकिन अब अस्थमा, डायबिटीज और क्रॉनिक

30:07

इंसमिया ने विवेकानंद की गति सीमित कर दी

30:10

थी। इसी कारण वे 1901 में जापान के

30:14

कांग्रेस ऑफ रिलीजन में नहीं जा सके थे और

30:17

फिर आया फोर्थ ऑफ जुलाई 1902

30:21

एक ऐसा दिन जो इतिहास में शांति के साथ

30:24

दर्ज हुआ वो सुबह विवेकानंद बहुत जल्दी

30:27

उठे बेलूर मठ गए और 3 घंटे तक ध्यान में

30:30

लीन रहे। शिष्यों को शुक्ल, यजुर्वेद,

30:33

संस्कृत व्याकरण और योग दर्शन पढ़ाया।

30:36

सहकर्मियों के साथ बैठकर रामकृष्ण मठ में

30:39

एक वैदिक कॉलेज की योजना पर चर्चा की। शाम

30:43

के 7:00 बजे वे अपने कमरे में गए और कहा

30:46

मुझे डिस्टर्ब मत करना। रात 9:20 पे ध्यान

30:51

की अवस्था में ही उनका शरीर शांत हो गया।

30:55

डॉक्टरों ने मस्तिष्क की रक्त नली फटने को

30:57

कारण बताया। लेकिन शिष्यों को विश्वास था

31:00

कि यह महासमाधि थी। हालांकि विवेकानंद ने

31:04

पहले ही कह दिया था मैं 40 साल से ज्यादा

31:06

नहीं जिऊंगा। वे 39 वर्ष की आयु में चले

31:09

गए। विवेकानंद चले गए पर भारत को खड़ा

31:13

करने की जो आग उन्होंने जलाई थी वो आज भी

31:16

जल रही है।

31:19

आज के एपिसोड में फिलहाल इतना ही। जल्दी

31:21

मुलाकात करेंगे किसी नई शख्सियत के साथ और

31:24

कमेंट सेक्शन में आप जरूर बताइएगा कि अगली

31:26

शख्सियत में आप किसे जानना चाहेंगे।

31:30

नमस्कार।

31:31

अगर आप देश सेवा आईएएस, आईपीएस बनकर करना

31:34

चाहते हैं, तो यह वक्त है उठ खड़े होने

31:36

का, खुद को साबित करने का और अपनी

31:39

यूपीएससी सीएससी की तैयारी को एक नए मुकाम

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पर पहुंचाने का। क्योंकि अब स्टडी आईक्यू

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आईएस हिंदी लेकर आया है यूपीएससी आईएएस की

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संपूर्ण तैयारी के लिए पीटूआई यानी

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प्रीलिम्स टू इंटरव्यू बैच जो आपके लिए

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साबित होगा प्रीलिम्स से लेकर इंटरव्यू तक

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का वन स्टॉप स्यूशन। मगर ध्यान से सुनिए।

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यह सिर्फ एक कोर्स नहीं है। यह है एक गेम

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चेंजर क्योंकि इस प्रोग्राम को तैयार किया

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गया है हर स्तर के उम्मीदवारों के लिए।

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चाहे आप शुरुआत कर रहे हो या एडवांस लेवल

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पर हो। फाउंडेशन से लेकर आंसर राइटिंग और

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इंटरव्यू तक हर मोड़ पर आपको मिलेगा

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कंप्लीट कवरेज। स्टडी आईक्यू का यह लाइव

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फाउंडेशन कोर्स आपको देता है 1000 से अधिक

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घंटे की लाइव और रिकॉर्डेड क्लासेस। वो भी

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अपने भरोसेमंद एजुकेटर्स के साथ। जीएस

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फाउंडेशन, सीसेट, करंट अफेयर्स, आंसर

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राइटिंग ये सब कुछ एक ही प्लेटफार्म पर और

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सबसे खास बात वन टू वन पर्सनलाइज्ड

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मेंटरशिप। मतलब हर कैंडिडेट को मिलेगा

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अपना खुद का मेंटोर जो आपको प्लानिंग से

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लेकर एग्जीक्यूशन तक हर मोड़ पर आपकी मदद

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करेगा। इन सबके अलावा तैयारी को परखने के

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लिए मिलेगा प्रीलिम्स और मेंस दोनों का

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फुल फ्लेजेड टेस्ट सीरीज, 75 प्लस

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प्रीलिम्स टेस्ट और 12 मेंस टेस्ट सीरीज।

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वो भी टाइम बाउंड इवैल्यूएशन के साथ। इस

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कोर्स में फाइनल स्टेज यानी इंटरव्यू की

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तैयारी है फुल ऑन। इंटरव्यू गाइडेंस

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प्रोग्राम यानी आईजीपी जिसमें शामिल है

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डेफ डिस्कशन, मॉक इंटरव्यूज और

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ब्यूरोक्रेट्स व सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स से

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सीधा इंटरेक्शन। अब अगर आप अभी ज्वाइन

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करते हैं तो चेक आउट पर इस्तेमाल कीजिए

33:10

कूपन कोड virद लाइव और पाइए कुछ खास

33:13

डिस्काउंट। तो इंतजार किस बात का? अभी लॉग

33:15

इन कीजिए www.stiq.com

33:18

पर या डाउनलोड करें स्टडी आईक्यू ऐप।

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