Does God Exist? Understanding Swami Vivekananda’s Scientific & Spiritual Approach | UPSC GS
FULL TRANSCRIPT
एक पल के लिए कल्पना कीजिए 19वीं सदी का
भारत चारों तरफ गुलामी की जंजीरें समाज
जातियों में बटा हुआ लोग खुद को कमजोर मान
चुके हैं और दुनिया भारत को सिर्फ एक
पिछड़ा देश समझ रही है। ऐसे समय में एक
युवा खड़ा होता है जिसके पास ना सेना है
ना सत्ता ना धन। उसके पास सिर्फ शब्द हैं।
लेकिन ऐसे शब्द जो सामने बैठे लोगों की
रीड सीधी कर दे। वो समुद्र पार जाता है एक
अजनबी जमीन पर जहां ना उसे कोई जानता है
ना उसकी भाषा समझता है। मंच पर उसका नाम
पुकारा जाता है और वह खड़ा हो जाता है और
बस एक वाक्य बोलता है। इतना ही काफी होता
है कि हजारों लोग उसके सामने खड़े होकर
तालियां बजाने लगते हैं। उस एक वाक्य के
बाद भारत को देखने का नजरिया जैसे बदल
जाता है। धर्म को देखने की सोच बदल जाती
है। और एक गुलाम देश की आत्मा पहली बार
पूरी दुनिया के सामने गर्व से खड़ी होती
है। लेकिन यह कहानी सिर्फ उस मंच की नहीं
है। यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जो कभी
ईश्वर पर सवाल उठाता था। उसने भूख देखी,
गरीबी देखी और जो अपने पिता की मौत के बाद
एकदम टूट चुका था। यह कहानी है एक ऐसे
व्यक्ति की जिसको एक समय पर नौकरी के लिए
धक्के खाने पड़े थे। लेकिन बाद में उसके
एक-एक शब्द को सुनने के लिए पूरी दुनिया
एक पैर पर खड़ी रहती थी। यहां तक कि जमशेद
जी टाटा भी इस युवा व्यक्ति के मुरीद थे।
इस व्यक्ति ने दुनिया को बताया कि हर
इंसान के भीतर ईश्वर बसता है। दोस्तों, यह
कहानी है त्याग की, संघर्ष की और उस साग
की जिसने एक पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया।
यह कहानी है नरेंद्रनाथ दत्त की जो कहलाए
स्वामी विवेकानंद।
नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म 12th जनवरी 1863
को मकर संक्रांति के दिन ब्रिटिश सरकार की
राजधानी कोलकाता में उनके पैतृक घर पर
थ्री गौर मोहन मुखर्जी स्ट्रीट में हुआ
था। वे एक प्रतिष्ठित बंगाली कायस्त
परिवार से थे और नौ भाई बहनों में एक थे।
उनके पिता विश्वासनाथ दत्त कोलकाता
हाईकोर्ट के जाने-माने वकील थे जो
अंग्रेजी शिक्षा, तर्क और आधुनिक सोच के
पक्षधर थे। जबकि मां भुवनेश्वरी देवी गहरी
आस्था रखने वाली रामकृष्ण भक्ति में रमी
हुई गणी थी। यही कारण था कि नरेंद्र के
भीतर बचपन से ही तर्क और भक्ति दोनों
साथ-साथ पनपते रहे। उनके दादा दुर्गाचरण
दत्त संस्कृत और फारसी के विद्वान थे और
मात्र 25 वर्ष की उम्र में परिवार को
छोड़कर सन्यासी बन गए। त्याग की यह कहानी
भी कहीं ना कहीं नरेंद्र के अवचेतन में
बैठ गई थी। बहरहाल बचपन में नरेंद्र
मिसवियस, एनर्जेटिक और फियरलेस थे। उनकी
मां मजाक में कहती थी कि उन्होंने शिव से
बेटा मांगा था और शिव ने अपने गणों को भेज
दिया। वहीं एकेडमिक्स में नरेंद्र शुरू से
ही एक्सेप्शनल थे। 8 साल की उम्र में
उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के
मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में दाखिला
लिया और आगे चलकर प्रेसिडेंसी कॉलेज की
परीक्षा में प्रवेश किया और फर्स्ट क्लास
में उसे पास करा। यह ऐसा करने वाले पहले
और एकमात्र छात्र थे। फिलॉसफी, रिलीजन,
हिस्ट्री, सोशलॉजी, लिटरेचर यह सब कुछ
उनकी रुचि के दायरे में था। एक तरफ वेद,
उपनिषद, गीता, रामायण और महाभारत पढ़ते थे
तो दूसरी तरफ कांट, हेगल, स्प्नोजा,
ह्यूम, जॉन स्टवरर्ट मिल, डार्विन और
हारबर्ट स्पेंसर जैसे वेस्टर्न फिलॉसोफर्स
को भी गहराई से समझते थे। स्पेंसर के
विकासवाद से वे इतने प्रभावित हुए कि उनसे
उन्होंने पत्राचार किया और उनकी किताब
एजुकेशन का बंगाली अनुवाद तक किया।
म्यूजिक, योगा, रेसलिंग और स्पोर्ट्स सब
में वे इक्वली एक्टिव थे। उनकी मेमोरी
बेहद शार्प थी और इसी एक्स्ट्राऑर्डिनरी
रिटेंटिव मेमोरी के कारण लोग उन्हें
श्रुतिधर कहने लगे थे। युवा अवस्था में वे
ब्रह्म समाज, नवविधान और फ्रीमेशनरी जैसी
संगठनों से जुड़े थे। जहां मूर्ति पूजा की
आलोचना, मोनसिज्म और लॉजिकल एंड साइंटिफिक
टपर पर जोर दिया जाता था। इन आंदोलनों ने
उन्हें वेस्टर्न आइडियाज और मिस्टिसिज्म
से परिचित कराया था। लेकिन फिर भी उनका मन
पूरी तरह शांत नहीं हुआ। जितना वे पढ़ते
उतना ही भीतर एक सवाल गहराता गया। क्या
ईश्वर सिर्फ किताबों और बहसों की चीज है
या किसी ने उसे सचमुच देखा है? क्या ईश्वर
सच में है? डस गॉड एकिस्ट्स? वे कोलकाता
के बड़े-बड़े विद्वानों से सवाल पूछते
रहे। यहां तक कि ब्रह्म समाज के नेता
देवेंद्र नाथ टैगोर से भी। लेकिन कोई
संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। यही बेचैनी
उन्हें उस मोड़ पर ले आई जहां एक व्यक्ति
ने बिना सिर घुमाए बिना इधर-उधर की बात
किए हुए सीधा जवाब दिया। हां, मैंने ईश्वर
को वैसे ही देखा है जैसे तुम्हें देखा
हूं। यही पल नरेंद्र के जीवन की असली
शुरुआत बन गया। लेकिन जानते हैं यह
सीधा-साधा जवाब किसने दिया था? यह जवाब
दिया था श्री रामकृष्ण परमहंस ने।
आगे बढ़ते हैं। लेकिन उससे पहले श्री
रामकृष्ण परमहंस और नरेंद्र नाथ दत्त के
बीच की मुलाकात को जानते हैं। यह मुलाकात
की कहानी किसी मंदिर या आश्रम से नहीं
बल्कि एक क्लासरूम से शुरू होती है।
कोलकाता के जनरल असेंबलीज इंस्टीट्यूशन
में साहित्य की क्लास चल रही थी। प्रोफेसर
विलियम हेस्टी अंग्रेजी के मशहूर कवि
विलियम वडवर्ड्स की कविता द एक्सरशन पढ़ा
रहे थे। कविता में ट्रांस यानी समाधि जैसे
शब्द का जिक्र आया। प्रोफेसर ने किताब बंद
की और छात्रों की तरफ देखा और कहा अगर
तुम्हें सच में ट्रांस का अर्थ समझना है
तो दक्षिणेश्वर जाकर रामकृष्ण परमहंस को
देखा आओ। यह वाक्य आम छात्रों के लिए शायद
एक सुझाव था लेकिन नरेंद्र के भीतर कुछ यह
हिला देने वाला जवाब था। वहीं जिज्ञासा
वही बेचैनी जो हमेशा सच को तर्क से परखना
चाहती थी। नवंबर 1881 के आसपास पहली बार
नरेंद्र का रामकृष्ण परमहंस के साथ
आमनासामना हुआ। हालांकि नरेंद्र खुद इस
मुलाकात को पहली मुलाकात नहीं मानते। उस
समय वे अपने एफए की परीक्षा की तैयारी कर
रहे थे। एक मित्र रामचंद्र दत्त उन्हें
सुरेंद्रनाथ मित्र के घर ले आया। जहां
रामकृष्ण को प्रवचन देने के लिए बुलाया
गया था। उसी बैठक में रामकृष्ण की नजर
नरेंद्र पर पड़ी और उन्होंने उनसे गाना
गाने के लिए कहा। नरेंद्र ने गाना गाया और
उस गाने में कुछ ऐसा था कि रामकृष्ण
मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने तुरंत कहा कि
दक्षिणेश्वर आना तुमसे फिर मिलना है। कुछ
समय के बाद सन 1881 में या फिर उसके अंत
में शायद 1882 की शुरुआत में नरेंद्र
दक्षिणेश्वर पहुंचे। यही वह क्षण था जिसने
उनके जीवन की दिशा बदल दी। लेकिन यह बदलाव
एक झटके में नहीं आया था। शुरुआत में
नरेंद्र ने रामकृष्ण को तुरंत अपना गुरु
नहीं माना था। वे उनके विचारों से बहस
करते थे, सवाल उठाते थे और यहां तक कि
विरोध भी करते थे। रामकृष्ण की समाधि की
अवस्थाओं और दिव्य अनुभूतियों को नरेंद्र
कल्पना और हेलुजिनेशन मानते थे। वे ब्रह्म
समाज से जुड़े थे। मूर्ति पूजा के विरोधी
थे। बहुदेववाद को नहीं मानते थे। और काली
की उपासना उन्हें अस्वीकार्य लगती थी।
अद्वैत वेदांत का ब्रह्म से एकात्म वाला
विचार उन्हें पागलपन और ईष्ट निंदा जैसा
लगता था। वे इन बातों का मजाक भी उड़ाते
थे। लेकिन रामकृष्ण विचलित नहीं होते थे।
वे बस मुस्कुराकर कहते थे कि सच को हर एक
एंगल से देखने की कोशिश किया कीजिए। यही
बात धीरे-धीरे नरेंद्र को बांधने लगी। वे
बार-बार दक्षिणेश्वर जाने लगे। बहस करते
सवाल पूछते लेकिन भीतर कहीं खिंचाव बढ़ता
चला गया। इसी बीच सन 1884 में नरेंद्र के
जीवन में एक और भूचाल आया। उनके पिता की
अचानक मृत्यु हो गई। परिवार पर कर्ज का
पहाड़ टूट पड़ा। लेनदार पैसे मांगने लगे।
रिश्तेदारों ने पैतृक घर से उन्हें
निकालने की धमकी दे दी। हालात इतने खराब
हो गए कि कई बार घर में खाने तक के लिए
पैसे नहीं होते थे। उस समय विवेकानंद अपनी
मां से कहते थे कि उन्हें कहीं दोपहर में
खाना का न्योता मिला है तो वे बाहर जा रहे
हैं ताकि घर में मौजूद बाकी लोगों को
थोड़ा ज्यादा खाना मिल सके। सच्चाई यह थी
कि ऐसे कोई निमंत्रण उनके पास आते ही नहीं
थे और वह खुद या तो बहुत कम खाते थे या कई
बार भूखे ही सो जाते थे। जो नरेंद्र कभी
एक संपन्न परिवार का बेटा था वही कॉलेज का
सबसे गरीब छात्र बन गया। बीए की डिग्री
लेने के बाद भी नरेंद्र नाथ दत्त को लंबे
समय तक कोई नौकरी नहीं मिली। नौकरी की
तलाश में उन्होंने हर दरवाजा खटखटाया
लेकिन हर जगह निराशा हाथ लगी। इस अंधेरे
दौर में उनके मन में ईश्वर के अस्तित्व को
लेकर गहरा संदेह पैदा हुआ। लेकिन उसी समय
रामकृष्ण उनके लिए सहारा बन गए। एक दिन की
बात है जब वे हताश होकर रामकृष्ण के पास
गए और उनसे कहा कि मेरे परिवार की हालत
बहुत खराब है। मां काली से प्रार्थना
कीजिए। रामकृष्ण ने जवाब दिया मैं क्यों
करूं? तुम खुद मंदिर जाओ और प्रार्थना
करो। नरेंद्र मंदिर गए एक बार नहीं तीन
बार। हर बार वे काली के सामने खड़े हुए
लेकिन उनसे धन, नौकरी या सुख की मांग नहीं
कर पाए। अंत में उन्होंने सिर्फ इतना
मांगा सच्चा ज्ञान और सिर्फ सच्ची भक्ति।
यहीं से उनके भीतर त्याग की भावना जन्म
लेने लगी। धीरे-धीरे वह सब कुछ छोड़कर
ईश्वर को जानने के लिए तैयार हो गए और
रामकृष्ण को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।
आगे चलकर सन 1885 में रामकृष्ण को गले का
कैंसर हो गया। उनके अंतिम दिनों में
नरेंद्र और अन्य शिष्य उनकी सेवा में जुटे
रहे। बीमारी के बीच भी नरेंद्र की
आध्यात्मिक शिक्षा चलती रही। वहीं
रामकृष्ण ने नरेंद्र और कुछ अन्य शिष्यों
को गिरवे वस्त्र भी दे दिए जिससे उनके
पहले सन्यासी संघ की नीव पड़ सकी।
रामकृष्ण ने नरेंद्र को एक गहरा संदेश
दिया। मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सबसे
सच्ची सेवा है। उन्होंने नरेंद्र से कहा
कि यह बाकी सन्यासियों का ध्यान रखें और
बाकी शिष्यों से कहा कि वह नरेंद्र को
अपना नेता माने। यह कोई औपचारिक घोषणा
नहीं थी बल्कि यह आध्यात्मिक उत्तराधिकार
था।
16th ऑफ अगस्त 1886
सुबह काशीपुर में रामकृष्ण परमहंस का
देहांत हो गया। रामकृष्ण परमहंस के देहांत
के बाद अचानक हालात बदल गए। जो भक्त और
प्रशंसक पहले आश्रम के साथ खड़े रहते थे
उनका सहारा धीरे-धीरे कम होने लगा। आर्थिक
मदद रुक गई। किराया चुकाया नहीं जा सका और
बकाया बढ़ता चला गया। ऐसी स्थिति आ गई कि
नरेंद्र और उनके साथ बचे शिष्यों को रहने
के लिए नई जगह तलाशनी पड़ी। यह वही समय था
जब कई शिष्य टूट गए। कुछ लोग घर लौट आए और
गृहस्थ जीवन अपना लिया। क्योंकि सन्यास का
रास्ता उस दौर में बेहद कठिन और अनिश्चित
लगने लगा था। लेकिन नरेंद्र ने पीछे हटने
से इंकार कर दिया था। उन्होंने तय किया कि
चाहे परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों ना
हो रामकृष्ण के दिए हुए मार्ग को छोड़कर
नहीं जाएगा। इसी संकल्प के साथ उन्होंने
बरान नगर में एक जजर और लगभग उजड़े हुए
मकान को चुना और उसे मठ में बदलने का
फैसला किया। यह जगह भले ही खंडहर जैसी थी,
लेकिन किराया कम था। जो थोड़ा बहुत किराया
देना होता था, वह माधुकरी से जुटाया जा
सकता था। यानी सन्यासी की तरह भिक्षा
मांगकर सिर्फ जीवन चलाने भर के लिए। यही
बर नगर मठ आगे चलकर रामकृष्ण मठ की पहली
स्थाई पहचान बन गया। उस मठ का जीवन बेहद
कठोर था लेकिन भीतर से अत्यंत जीवंत।
अनुशासन के मामले में वे बेहद सख्त थे। मठ
के नियमों को लेकर वे किसी तरीके का
समझौता पसंद नहीं करते थे। इस संदर्भ में
मैं आपको इंडिया टुडे के रेफरेंस से एक
घटना से अवगत कराता हूं। कहते हैं कि
उन्होंने महिलाओं को मठ में प्रवेश से रोक
लगा दी थी। एक बार जब वे तेज बुखार में थे
तो उनके शिष्यों ने उनकी मां को बुला
लिया। जैसे ही विवेकानंद अपनी मां को
देखते हैं वे नाराज हो गए और बोले कि एक
महिला को अंदर आने की अनुमति क्यों दी गई?
उनका कहना था कि जब नियम मैंने बनाया है
तो उसे तोड़ने का अधिकार भी मुझे नहीं है।
इसी कठिन दौर के बीच नरेंद्र का रचनात्मक
पक्ष भी जीवित रहा। 1887 में उन्होंने एक
बंगाली गीत संग्रह तैयार करना शुरू किया
जिसका नाम रखा गया संगीत कल्पतरु। इस
संकलन में उन्होंने वैष्णव चरण बसाख के
साथ मिलकर भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं से
भरे गीतों को एकत्र किया और व्यवस्थित
किया। बहरहाल रामकृष्ण परमहंस के देहांत
के बाद जो जीवन नरेंद्र और उनके साथियों
ने चुना था वो अब धीरे-धीरे एक ठोस आकार
लेने लगा था। दिसंबर 1886 की बात है।
बाबूराम नाम के एक सन्यासी की मां ने
नरेंद्र को बाकी भाइयों के साथ अंतरपुर
गांव में बुलाया। यह कोई साधारण निमंत्रण
नहीं था बल्कि एक ऐसे निर्णय की शुरुआत थी
और ऐसी भूमिका थी जो जीवन भर के लिए दिशा
तय करने वाली थी। क्रिसमस ईव की रात 24
सितंबर 1886 स्थान था अंतपुर का राधा
गोविंद देव मंदिर। उसी मंदिर में 23 वर्ष
के नरेंद्र और उनके आठ सन्यासियों ने
औपचारिक रूप से सन्यास की दीक्षा ली थी।
यह सिर्फ वस्त्र बदलने की रस्म नहीं थी
बल्कि एक प्रण था कि वे वही जीवन जिएंगे
जो उनके गुरु रामकृष्ण ने जिया है। पूर्ण
त्याग, पूर्ण समर्पण और सत्य की खोज में
बिना किसी समझौते के। लेकिन सन्यास लेने
के बाद भी नरेंद्र एक जगह टिके नहीं। 1888
में उन्होंने मठ छोड़ दिया और एक परिवज्रक
के रूप में वे निकल पड़े। इसका अर्थ था कि
ना कोई स्थाई ठिकाना, ना कोई संबंध, ना
किसी जगह से कोई जुड़ाव। उनके पास कुल
मिलाकर बस कुछ ही चीजें थी। एक कमंडल, एक
लाठी, दो किताबें, भगवत गीता और इमिटेशन
ऑफ क्राइस्ट। ये किताबें बताती हैं कि
उनकी सोच सिर्फ भारतीय परंपरा तक सीमित
नहीं थी बल्कि वह एक सत्य को हर दिशा से
समझना चाहते थे। अगले 5 वर्षों तक नरेंद्र
पूरे भारत में घूमते रहे। विज्ञान के
केंद्रों में गए, साधुओं से मिले, अलग-अलग
धार्मिक परंपराओं को समझा और समाज की असल
तस्वीर को बहुत करीब से देखा। उन्होंने
भारत की गरीबी को सिर्फ सुना नहीं बल्कि
जिया भी। भूखे पेट फटे कपड़ों में, कभी
पैदल तो कभी रेलगाड़ी से। वे भिक्षा पर
जीवन चलाते हुए देश के कोने-कोने में
पहुंच गए। यही यात्राएं थी जिन्होंने उनके
भीतर एक गहरी करुणा और आक्रोश दोनों भर
दिया था। उन्होंने साफ-साफ देख लिया था कि
भारत की आत्मा पीड़ा में है और अगर ईश्वर
की पूजा सच में करनी है तो वह उस पीड़ित
मानवता की सेवा के बिना बिल्कुल अधूरी है।
इन्हीं वर्षों में उनके जीवन में खेतड़ी
या फिर खेतड़ी के रियासत के राजा अजीत
सिंह आ गए। एक मित्र, एक संरक्षक और शिष्य
के रूप में उन्हीं के सुझाव पर नरेंद्र ने
अपना एक नया नाम चुना विवेकानंद।
यह नाम सिर्फ पहचान नहीं था बल्कि उनके
जीवन दर्शन का एक सार था। 1893 के आते-आते
विवेकानंद के भीतर भारत के लिए कुछ बड़ा
करने का संकल्प पूरी तरीके से आकार ले
चुका था। वे समझ चुके थे कि भारत की
आध्यात्मिक शक्ति को दुनिया के सामने रखना
बेहद जरूरी है। और इसी उद्देश्य से 31 ऑफ
मई 1893 को वे बॉम्बे से शिकागो के लिए
रवाना हुए। जहां वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ
रिलीजन होने वाला था। वर्ल्ड्स
पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में क्या हुआ? यह
जानने से पहले हम आपको यह समझाना चाहते
हैं कि विवेकानंद के विचार क्या थे? आखिर
ऐसा क्या था उनके शिक्षाओं में? देखिए
स्वामी विवेकानंद जब धर्म कहते थे तो उसका
मतलब पूजा पाठ मंदिर या किताबों से नहीं
होता था। वे सीधी सी बात कहते थे। मान लो
तुम्हारे सामने एक गरीब मजदूर बैठा है।
भूखा है, कमजोर है और तुम मंदिर में जाकर
घंटी बजा रहे हो। तो उस वक्त भगवान कहां
ज्यादा खुश होंगे? मंदिर में या उस भूखे
इंसान को खाना खिलाने में? जवाब साफ था।
ईश्वर हर इंसान के भीतर है। इसलिए इंसान
की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। और इसी को
वे कहते थे शिव ज्ञान में जीव सेवा। इसे
ऐसे समझिए कि अगर बिजली हर घर में है तो
सिर्फ स्विच ऑन करना बाकी है और बिजली आ
जाएगी। वैसे ही ईश्वर हर आत्मा में है। बस
उसे जागृत करना होता है। अब वेदांत और योग
को वे कैसे समझते थे? आइए इसको भी समझते
हैं। विवेकानंद का विचार था कि ईश्वर तक
पहुंचने का रास्ता भी ऐसा ही है। कोई कर्म
योग से पहुंचता है यानी निस्वार्थ काम
करके, कोई भक्ति योग से, कोई प्रेम और
श्रद्धा से और कोई ज्ञान योग से। सोच
समझकर कोई राज योग से ध्यान और आत्म संयम
से भी पहुंच सकता है। रास्ते अलग-अलग हैं
लेकिन मंजिल एक है। इसलिए वे कहते थे एक
रास्ता पकड़ो या चारों मिलकर चलो लेकिन
चलते रहो। अब उनका सबसे मशहूर वाक्य याद
रखिए। ईच सोल इज पोटेंशियली डिवाइन। जैसे
बीच के अंदर पूरा का पूरा पेड़ छुपा होता
है। लेकिन जब तक पानी, धूप और समय नहीं
मिलता तब तक वो दिखता नहीं है। वैसे ही हर
इंसान के अंदर शक्ति, आत्मविश्वास और
महानता छुपी हुई है। धर्म का काम यह नहीं
कि डर वो पैदा करें बल्कि यह बताना है कि
तुम कमजोर नहीं हो। विवेकानंद इसीलिए कहते
हैं डर छोड़ो उठो खुद पर भरोसा रखो।
बहरहाल विवेकानंद को वर्ल्ड्स
पार्लियामेंट ऑफ रिलीजंस में पहुंचना था।
मद्रास के शिष्यों, मैसूर, रामनाड और
खेतरी के राजाओं, दीवानों और कुछ
निष्ठावान अनुयायियों की मदद से वे 31 ऑफ
मई 1893 को बॉम्बे के शिकागो के लिए निकल
पड़े। वे जहाज से अमेरिका के लिए रवाना
हुए। रास्ता सीधा नहीं था। सबसे पहले वे
चीन के कैंटन यानी ग्वांगझाऊ पहुंचे। जहां
उन्होंने पहली बार कई बौद्ध मठों को बाहर
देश के बाहर देखा था। इसके बाद वे जापान
गए। नागासाकी, ओसाका, टोक्यो और टोक्यो से
होते हुए वे अंत में योकोहामा पहुंचे।
जापान की अनुशासन प्रियता, आधुनिकता और
सांस्कृतिक संतुलन उन्हें भीतर तक
प्रभावित कर देती है। योकोहामा से
उन्होंने आरएमएस एप्रेस ऑफ इंडिया जहाज
पकड़ा जो उन्हें कनाडा ले जा रहा था। इसी
जहाज पर नियति ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति
से मिलाया जिसने आगे चलकर भारत के
औद्योगिक भविष्य की नींव रखी। जमशेद जी
टाटा। टाटा उस समय शिकागो जा रहे थे। एक
नए बिजनेस आईडिया तलाश में। जहाज की इस
आकस्मिक मुलाकात में विवेकानंद ने टाटा को
भारत में एक रिसर्च और एजुकेशनल
इंस्टीट्यूशन बनाने के लिए प्रेरित कर
दिया। दोनों के बीच भारत में स्टील
फैक्ट्री स्थापित करने की योजना पर भी
चर्चा हुई। 25th जुलाई 1893 को विवेकानंद
कनाडा से बैंकवर पहुंचे। वहां से ट्रेन के
द्वारा 30th जुलाई रविवार यानी संडे के
दिन वे शिकागो पहुंचे। लेकिन वहां जाकर
कहानी का सबसे कठिन अध्याय शुरू होने वाला
था। शिकागो पहुंचते ही विवेकानंद को करारा
झटका लगा और उन्हें पता चला कि वर्ल्ड्स
पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में कोई भी
व्यक्ति बिना आधिकारिक क्रेडेंशियल्स के
प्रतिनिधि के रूप में भाग नहीं ले सकता
था। हालांकि ब्रह्म समाज और थियोसोफिकल
सोसाइटी को हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के
रूप में आमंत्रित किया गया था। लेकिन उनके
पास ना कोई सिफारिश पत्र था ना कोई
आधिकारिक मान्यता। ऊपर से यह भी मालूम हुआ
कि संसद का आयोजन सितंबर से पहले हफ्ते
में होना था। यानी अभी इंतजार लंबा करना
था। एक विदेशी शहर सीमित पैसे और सामने
अनिश्चित भविष्य। कोई और उनकी जगह होता तो
शायद यहीं हार मान लेता। लेकिन विवेकानंद
टूटे नहीं। खर्च कम करने के लिए उन्होंने
शिकागो छोड़कर बोस्टन जाने का फैसला कर
लिया। यही फैसला उनके जीवन का टर्निंग
पॉइंट बन गया। बोस्टन में उनकी मुलाकात
हुई हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन
हेनरी से। जॉन हेनरी राइट। विवेकानंद की
बातचीत उनके ज्ञान, वेदांत की समझ और
विचारों की गहराई ने राइट को स्तब्ध कर
दिया। प्रोफेसर ने ना सिर्फ उन्हें हावर्ड
में लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया
बल्कि जोर देकर के कहा कि उन्हें हिंदू
धर्म का प्रतिनिधित्व वर्ल्ड पार्लियामेंट
में करना चाहिए। जब राइट को पता चला कि
विवेकानंद के पास संसद में शामिल होने के
लिए कोई आधिकारिक दस्तावेज ही नहीं है तो
उन्होंने यह एक ऐतिहासिक वाक्य कहा। आपसे
क्रेडेंशियल्स मांगना ऐसा है जैसे सूरज से
यह पूछना कि उसे आसमान में चमकने का
अधिकार किसने दिया? यहीं से विवेकानंद को
वो नैतिक बौद्धिक समर्थन मिला जिसकी
उन्हें सख्त जरूरत थी। अब वे फिर से
शिकागो लौटे। बाद में विवेकानंद ने आवेदन
लिखा और आवेदन का समर्थन ब्रह्म समाज के
प्रतिनिधि प्रताप चंद्र मजूमदार ने किया
जो संसद की चयन समिति के सदस्य भी थे। अब
आगे की कहानी को जरा दिल थाम के सुनिएगा।
11th सितंबर 1893
प्लेस पार्लियामेंट मेमोरियल आर्ट पैलेस
जिसे आज आर्ट इंस्टट्यूट ऑफ शिकागो के नाम
से जाना जाता है। वर्ल्ड्स कोलंबियन
एक्सपोजिशन के तहत वर्ल्ड्स पार्लियामेंट
ऑफ रिलीजन की शुरुआत हो चुकी थी।
विवेकानंद का नंबर दोपहर में आया वो भी
काफी देर से। मंच पर जाने से पहले
उन्होंने मन ही मन सरस्वती को नमन किया और
फिर बोले माय डियर सिस्टर्स एंड ब्रदर्स
ऑफ अमेरिका। इतने से शब्दों पर पूरा
सभागार तालियों से गूंज उठा। वो सिर्फ
भाषण की शुरुआत नहीं थी। वो पश्चिम और
भारत के बीच पहली सच्ची भावनात्मक बातचीत
थी। 15 सितंबर को दिए गए भाषण व्हाई वी
डिसएग्री में उन्होंने मशहूर कूप मंडूप की
कहानी सुनाई। कुएं में रहने वाला मेंढक जो
अपने छोटे से कुएं को पूरी दुनिया समझता
है और समुद्र की विशालता को मानने से
इंकार कर देता है। विवेकानंद ने साफ कहा
कि यही समस्या धर्मों के बीच भी है। हर
कोई अपने कुएं को पूरी सच्चाई मान बैठा
है। 20th सितंबर के भाषण रीजन नॉट द
क्राइम नीड ऑफ इंडिया में उन्होंने पश्चिम
को झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की
सबसे बड़ी समस्या धर्म नहीं बल्कि गरीबी
है। उन्होंने मिशनरियों की आलोचना करते
हुए कहा कि भूखे इंसान को पहले रोटी चाहिए
उपदेश नहीं। 26 सितंबर को बुद्धिज्म द
फुलफिलमेंट ऑफ हिंदूइज़्म भाषण में
उन्होंने हिंदू धर्म और बुद्धिज्म के
रिश्ते को समझाया। ऐतिहासिक वाक्य कहा कि
हिंदू धर्म बौद्ध धर्म के बिना जीवित नहीं
रह सकता और बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के बिना
नहीं। शिकागो का मंच अब सिर्फ एक सभागार
नहीं रह गया था। वह इतिहास बन चुका था।
जिस सन्यासी को कुछ हफ्ते तक पहले पहचानने
से इंकार कर दिया जा रहा था, वही अब पूरे
वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन का
केंद्र बन चुका था। संसद के अध्यक्ष जॉन
हेनरी बैरोस ने खुले मंच से कहा भारत जो
धर्मों की जननी है उसका प्रतिनिधित्व
स्वामी विवेकानंद ने किया है। यह गेरुवे
वस्त्र वालावा सन्यासी अपने श्रोताओं पर
अद्भुत प्रभाव डालने के लिए पूरी तरह सफल
रहा है। अमेरिकी प्रेस विवेकानंद के पीछे
पड़ चुका था। अखबारों को जैसे नया नायक
मिल चुका था। उन्हें नाम दिया गया इंडिया
से आया साइक्लोनिक मक यानी ऐसा सन्यासी जो
तूफान की तरह आया और सब कुछ बदल कर चला
गया। न्यूयार्क हिराल्ड ने तो और भी
जबरदस्त टिप्पणी की। उसने लिखा विवेकानंद
निसंदेह इस पार्लियामेंट की सबसे महान
हस्ती हैं। उन्हें सुनने के बाद यह एहसास
होता है कि इस विद्वान राष्ट्र में
मिशनरियों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता
है। बोस्टन इवनिंग ट्रांसक्रिप्ट ने लिखा
कि अगर वे सिर्फ मंच पार भी कर जाएं तो
तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो जाती है।
जल्द ही अमेरिकी समाज में उन्हें एक नए
नाम से जाना जाने लगा। हैंडसम ओरिएंटल।
लेकिन यह सुंदरता चेहरे की नहीं थी। यह
सुंदरता थी विचारों की। उस क्षण के बाद
विवेकानंद सिर्फ भारत के ही नहीं रहे।
शिकागो की ऐतिहासिक सफलता के बाद स्वामी
विवेकानंद अब सिर्फ एक मंच के वक्ता नहीं
रहे थे। पार्लियामेंट ऑफ रिलीजंस के बाद
अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में उन्हें
निमंत्रण मिलने लगा था। लोग उन्हें सुनना
चाहते थे, समझना चाहते थे। वो पहली बार था
जब किसी भारतीय सन्यासी को पश्चिम में
इतनी बड़ी संख्या में अपनी बात कहने का
अवसर मिला था। अमेरिका में एक सवाल जवाब
के सत्र के दौरान ब्रोकलिन एथिकल सोसाइटी
में विवेकानंद ने एक वाक्य कहा जिसने उनके
पूरे मिशन को समेट दिया। उन्होंने कहा कि
मेरे पास पश्चिम के लिए वही संदेश है जो
बुद्ध के पास पूर्व के लिए था। लेकिन वे
किसी को धर्म बदलने के लिए नहीं कह रहे
थे। सोचिए अगर कोई मिशनरी भारत आकर बोले
कि तुम गलत हो तो कैसा लगेगा? विवेकानंद
ने उल्टा किया। उन्होंने कहा कि तुम जैसे
हो वैसे ही अच्छे हो। मैथोिस्ट हो तो
अच्छे मैथोिस्ट बनो। क्रिश्चियन हो तो
अच्छे क्रिश्चियन बनो। मतलब धर्म बदलो मत।
इंसान बेहतर बनो। यही वजह थी कि अमेरिका
और यूरोप में लोग उन्हें सुनकर खड़े होकर
तालियां बजाते थे। दोस्तों लगभग दो वर्षों
तक विवेकानंद ने अमेरिका के पूर्वी और
मध्य हिस्सों में लगातार व्याख्यान दी।
खासकर शिकागो, डेट्रॉयट, बोस्टन और
न्यूयॉर्क में। और इसी दौरान 1894 में
उन्हें वेदांत सोसाइटी ऑफ न्यूयॉर्क की
स्थापना की जो पश्चिम में वेदांत की पहली
संगठित संस्था थी और इसी समय उन्हें
हावर्ड यूनिवर्सिटी में ईस्टर्न फिलॉसफी
की चेयर और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भी
एकदम पद का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन
विवेकानंद ने दोनों अस्वीकार कर दिया।
उनका स्पष्ट उत्तर था सन्यास का कर्तव्य
किसी विश्वविद्यालय के पद से बड़ा है।
इसके बाद 1895 में विवेकानंद पहली बार
यूनाइटेड किंगडम गए। नवंबर 1895 में उनकी
मुलाकात एक आरिश महिला मार्गेट एलिजाबेथ
नोबेल से हुई। यही महिला आगे चलकर सिस्टर
निवेदिता बनी। विवेकानंद की सबसे निकट
शिष्यों में से एक बन गई थी। 1896 की
दूसरी इंग्लैंड यात्रा में विवेकानंद की
भेंट ऑक्सफोर्ड के विद्वान मैक्स मूलर से
हुई। जिन्होंने पश्चिम में रामकृष्ण
परमहंस की पहली जीवनी लिखी। पश्चिम में
मिली इस असाधारण सफलता ने विवेकानंद को
मिशन को नई दिशा दे दी थी। यहीं से उनका
प्रसिद्ध चार योगों का सिद्धांत सामने
आया। राजयोग, कर्म योग, भक्ति योग और
ज्ञान योग। खासकर राजयोग जो ईश्वर को भीतर
अनुभव करने का व्यवहारिक मार्ग बताता था।
पश्चिमी समाज में बेहद लोकप्रिय हुआ था।
1896 में उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई।
पतंजलि के योग सूत्रों की उनकी व्याख्या।
यह किताब तुरंत सफल हुई और पश्चिम में योग
की आधुनिक समझ की नींव यहीं पर डल गई। यही
वह क्षण था जब आधुनिक योग आंदोलन की
शुरुआत मानी जाता था। धीरे-धीरे अमेरिका
और यूरोप में विवेकानंद के अनुयायियों की
सूची लंबी होती चली गई। जोसफेन मैक्लॉइड,
विलियम जेम्स, निकोला टेसला, लॉर्ड
केल्विन, सेरा बर्नहेड, एला व्हीलर
विलकक्स जैसे महान नाम उनके विचारों से
प्रभावित हुए। उन्होंने कुछ और शिष्यों को
औपचारिक सन्यास भी दिया। जैसे फ्रांस की
मैरी लुईस जो बनी स्वामी अभियनानंद और लन
लैं्सबर्ग जो बने स्वामी कृपानंद डेट्रॉइड
की क्रिस्टीना ग्रेनस्टाइड को उन्होंने
सिस्टर क्रिस्टीन का नाम दिया। इसी समय
अमेरिका में ही उन्हें कैलिफोर्निया के
सेंट जोस के पास पहाड़ों में जमीन दी गई।
जहां उन्होंने एक आध्यात्मिक आश्रम
स्थापित किया। नाम दिया शांति आश्रम। बाद
में अमेरिका में कुल 12 वेदांत सेंटर्स
बने। जिनमें सबसे बड़ा वेदांत सोसाइटी ऑफ
सदर्न कैलिफोर्निया हॉलीवुड रहा। वहीं
वेदांत प्रेस की स्थापना भी हुई जो वेदांत
और हिंदू ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद
प्रकाशित करने लगी थी। 1895 में उन्होंने
पत्रिका ब्रह्मवादिन की शुरुआत की। 1899
में इसी पत्रिका में उन्होंने द लिमिटेशन
ऑफ क्राइस्ट के पहले छह अध्यायों का
अनुवाद प्रकाशित किया। यह दिखाने के लिए
कि सत्य किसी एक धर्म की बपौती नहीं है।
आखिरकार 16th ऑफ दिसंबर 1896 को विवेकानंद
इंग्लैंड से भारत के लिए रवाना हुए। उनके
पीछे सिस्टर निवेदिता भी भारत आई और अपना
पूरा जीवन भारतीय महिलाओं की शिक्षा और
भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य को
समर्पित कर दिया। जब 15th ऑफ जनवरी 1897
को स्वामी विवेकानंद कोलंबो पहुंचे तो यह
सिर्फ एक यात्री का आगमन नहीं था। यह
पूर्व की धरती पर लौटे हुए एक ऐसे योद्धा
का प्रवेश था जो पश्चिम को झकझोर कर आया
था। कोलंबो से विवेकानंद का सफर पंबन,
रामेश्वरम, रामनाथ, मदुरई, कुंभकोनम और
मद्रास तक फैला। हर जगह जनसैलाब, उत्साह
और आंखों की उम्मीद भरी हुई थी। कई बार तो
ट्रेन को लोगों ने पटरियों पर बैठकर रुकवा
दिया। सिर्फ इसलिए कि हम उस आदमी को सुनना
चाहते हैं जिसने दुनिया को भारत का परिचय
कराया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। यह
उस भरोसे की वापसी थी जो सदियों की गुलामी
में कहीं खो गया था। पश्चिम में विवेकानंद
भारत की आध्यात्मिक महानता की बात करते
थे। लेकिन भारत की धरती पर खड़े होकर उनका
स्वर बदल जाता था। वहां वे धर्म से ज्यादा
समाज की बात करते थे। वे गरीबी हटाने की,
जाति प्रथा तोड़ने की, विभाजन और
औद्योगीकरण अपनाने की और सबसे जरूरी
मानसिक गुलामी से आजादी की बात करते थे।
उनका संदेश साफ था। आध्यात्मिकता तब तक
अधूरी है जब तक भूखा इंसान मौजूद है। और
फिर आया फर्स्ट ऑफ मई 1897 का दिन। जगह थी
कोलकाता।
यह वही दिन था जब विवेकानंद ने अपने
विचारों को संस्था का रूप दिया और
रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मठ
आध्यात्मिक कार्यों का केंद्र बना और
रामकृष्ण मिशन समाज सेवा का। दोनों का
हृदय बना बेलूर मठ जहां साधना और सेवा एक
साथ सांस लेती थी। हालांकि यहीं नहीं रुके
विवेकानंद। हिमालय की गोद में मायावती में
उन्होंने अद्वैत आश्रम की स्थापना भी की।
मद्रास में एक और मठ खड़ा हुआ। विचारों को
जनजन तक पहुंचाने के लिए दो पत्रिकाएं
शुरू की गई। प्रबुद्ध भारत इंग्लिश में और
उद्बोधन बंगाली में। इसी वर्ष मुर्शिदाबाद
में अकाल राहत कार्य भी शुरू किया गया।
विवेकानंद का प्रभाव इतना गहरा था कि
उद्योगपति जमशेद जी टाटा तक उनसे प्रेरित
हुए थे। जापान से अमेरिका की समुद्री
यात्रा के दौरान विवेकानंद ने भारत में एक
उच्च स्तरीय रिसर्च और एजुकेशनल संस्था का
सपना साझा किया था। वर्षों बाद टाटा उसी
सपने को लेकर उनके पास आए और संस्थान का
नेतृत्व सौंपना चाहा। विवेकानंद ने
विनम्रता से मना कर दिया यह कहते हुए कि
उनका रास्ता आध्यात्मिक सेवा का है।
प्रशासन का नहीं। इसके बाद पंजाब में
उन्होंने आर्य समाज और सनातन हिंदुओं के
बीच वैचारिक टकराव को सुलझाने की कोशिश
की। लेकिन अब अस्थमा, डायबिटीज और क्रॉनिक
इंसमिया ने विवेकानंद की गति सीमित कर दी
थी। इसी कारण वे 1901 में जापान के
कांग्रेस ऑफ रिलीजन में नहीं जा सके थे और
फिर आया फोर्थ ऑफ जुलाई 1902
एक ऐसा दिन जो इतिहास में शांति के साथ
दर्ज हुआ वो सुबह विवेकानंद बहुत जल्दी
उठे बेलूर मठ गए और 3 घंटे तक ध्यान में
लीन रहे। शिष्यों को शुक्ल, यजुर्वेद,
संस्कृत व्याकरण और योग दर्शन पढ़ाया।
सहकर्मियों के साथ बैठकर रामकृष्ण मठ में
एक वैदिक कॉलेज की योजना पर चर्चा की। शाम
के 7:00 बजे वे अपने कमरे में गए और कहा
मुझे डिस्टर्ब मत करना। रात 9:20 पे ध्यान
की अवस्था में ही उनका शरीर शांत हो गया।
डॉक्टरों ने मस्तिष्क की रक्त नली फटने को
कारण बताया। लेकिन शिष्यों को विश्वास था
कि यह महासमाधि थी। हालांकि विवेकानंद ने
पहले ही कह दिया था मैं 40 साल से ज्यादा
नहीं जिऊंगा। वे 39 वर्ष की आयु में चले
गए। विवेकानंद चले गए पर भारत को खड़ा
करने की जो आग उन्होंने जलाई थी वो आज भी
जल रही है।
आज के एपिसोड में फिलहाल इतना ही। जल्दी
मुलाकात करेंगे किसी नई शख्सियत के साथ और
कमेंट सेक्शन में आप जरूर बताइएगा कि अगली
शख्सियत में आप किसे जानना चाहेंगे।
नमस्कार।
अगर आप देश सेवा आईएएस, आईपीएस बनकर करना
चाहते हैं, तो यह वक्त है उठ खड़े होने
का, खुद को साबित करने का और अपनी
यूपीएससी सीएससी की तैयारी को एक नए मुकाम
पर पहुंचाने का। क्योंकि अब स्टडी आईक्यू
आईएस हिंदी लेकर आया है यूपीएससी आईएएस की
संपूर्ण तैयारी के लिए पीटूआई यानी
प्रीलिम्स टू इंटरव्यू बैच जो आपके लिए
साबित होगा प्रीलिम्स से लेकर इंटरव्यू तक
का वन स्टॉप स्यूशन। मगर ध्यान से सुनिए।
यह सिर्फ एक कोर्स नहीं है। यह है एक गेम
चेंजर क्योंकि इस प्रोग्राम को तैयार किया
गया है हर स्तर के उम्मीदवारों के लिए।
चाहे आप शुरुआत कर रहे हो या एडवांस लेवल
पर हो। फाउंडेशन से लेकर आंसर राइटिंग और
इंटरव्यू तक हर मोड़ पर आपको मिलेगा
कंप्लीट कवरेज। स्टडी आईक्यू का यह लाइव
फाउंडेशन कोर्स आपको देता है 1000 से अधिक
घंटे की लाइव और रिकॉर्डेड क्लासेस। वो भी
अपने भरोसेमंद एजुकेटर्स के साथ। जीएस
फाउंडेशन, सीसेट, करंट अफेयर्स, आंसर
राइटिंग ये सब कुछ एक ही प्लेटफार्म पर और
सबसे खास बात वन टू वन पर्सनलाइज्ड
मेंटरशिप। मतलब हर कैंडिडेट को मिलेगा
अपना खुद का मेंटोर जो आपको प्लानिंग से
लेकर एग्जीक्यूशन तक हर मोड़ पर आपकी मदद
करेगा। इन सबके अलावा तैयारी को परखने के
लिए मिलेगा प्रीलिम्स और मेंस दोनों का
फुल फ्लेजेड टेस्ट सीरीज, 75 प्लस
प्रीलिम्स टेस्ट और 12 मेंस टेस्ट सीरीज।
वो भी टाइम बाउंड इवैल्यूएशन के साथ। इस
कोर्स में फाइनल स्टेज यानी इंटरव्यू की
तैयारी है फुल ऑन। इंटरव्यू गाइडेंस
प्रोग्राम यानी आईजीपी जिसमें शामिल है
डेफ डिस्कशन, मॉक इंटरव्यूज और
ब्यूरोक्रेट्स व सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स से
सीधा इंटरेक्शन। अब अगर आप अभी ज्वाइन
करते हैं तो चेक आउट पर इस्तेमाल कीजिए
कूपन कोड virद लाइव और पाइए कुछ खास
डिस्काउंट। तो इंतजार किस बात का? अभी लॉग
इन कीजिए www.stiq.com
पर या डाउनलोड करें स्टडी आईक्यू ऐप।
UNLOCK MORE
Sign up free to access premium features
INTERACTIVE VIEWER
Watch the video with synced subtitles, adjustable overlay, and full playback control.
AI SUMMARY
Get an instant AI-generated summary of the video content, key points, and takeaways.
TRANSLATE
Translate the transcript to 100+ languages with one click. Download in any format.
MIND MAP
Visualize the transcript as an interactive mind map. Understand structure at a glance.
CHAT WITH TRANSCRIPT
Ask questions about the video content. Get answers powered by AI directly from the transcript.
GET MORE FROM YOUR TRANSCRIPTS
Sign up for free and unlock interactive viewer, AI summaries, translations, mind maps, and more. No credit card required.