Indian National Movement | Modern History | L1 | Shubham Gupta
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हेलो
हेलो
हेलो
हेलो
हेलो
हेलो
हेलो
नमस्कार दोस्तों दोस्तों, कैसे हैं आप
लोग? आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है हमारे
ब्रांड न्यू चैनल अनअकडमी अभियान में जहां
पर हम शुरू करने जा रहे हैं वापस से अपनी
आधुनिक भारत की सीरीज मॉडर्न हिस्ट्री की
सीरीज को हम यहां वापस से कंटिन्यू
करेंगे। सबसे पहले आप मुझे बताइए आप लोग
कैसे हैं? और क्या आप मेरी आवाज सुन पा
रहे हैं? दोस्तों, क्या मेरी वॉइस क्लियर
है? ऑडियो वीडियो क्लियर है? इसके बाद फिर
मैं कमेंट को आगे रखता हूं और फिर हम शुरू
करते हैं हमारा आज का सेशन। जल्दी बताइए।
इज एवरीथिंग गुड? ऑडियो एंड वीडियो सही
है? बहुत दिनों के बाद हम स्मार्ट बोर्ड
से पढ़ाई कर रहे हैं और अब आदत डाल दीजिए
क्योंकि लगातार यह क्लास चलने वाली है
दोस्तों। बढ़िया है सब बढ़िया।
ओके ऑल गुड। चलिए ठीक है तो शुरू करते
हैं।
सबसे पहले आप सभी लोगों को महात्मा गांधी
जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। शास्त्री
जी की जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आज
इस दिन को दोस्तों हम लोगों ने इसीलिए
चुना है क्योंकि दो महान लोगों का आज
जन्मदिन है। उनकी जयंती है और इसी उपलक्ष
में हमने भी अपने चैनल को आज स्टार्ट किया
है। जैसा आप जान रहे हैं कि हमारे चैनल पर
चार लोगों की टीम है और ये अक्रॉस द स्टेट
सबसे अच्छे टीचर्स की टीम है दोस्तों और
यहां पर सनमती सर हैं जो आपको डेली करंट
अफेयर्स का सेशन ले रहे हैं सुबह 8:00
बजे। मेरा सेशन होगा रोज 2:45 पर मॉडर्न
हिस्ट्री का सेशन होगा। मुकेश सैनी सर
आएंगे और मुकेश सैनी सर आपको इंडियन पिटी
पढ़ाएंगे। 4:15 पर इंडियन पिटी का उनका
सेशन होगा और इंडियन ज्योग्राफी लेकर के आ
रहे हैं नूर आलम सर। तो दोस्तों सारी
तैयारी आपको इस प्लेटफार्म पर कराई जाएगी।
आप किसी भी स्टेट पीएससी की तैयारी कर रहे
हो या वन डे एग्जामिनेशन की तैयारी कर रहे
हो यह सबसे अच्छा प्लेटफार्म रहेगा जहां
पर आप बहुत अच्छे तरीके से प्रिपरेशन कर
सकते हैं। ना सिर्फ यहां पर आपके लेक्चर
होंगे बल्कि इनका रिवीजन भी होगा। एक मिनट
मैं आपको प्लानिंग समझा दे रहा हूं।
सोमवार से शुक्रवार तक हमारी लगातार
कक्षाएं होंगी। शनिवार का जो दिन रहेगा उस
दिन रिवीजन होगा। संडे को स्पेशल संडे
रहेगा और संडे को हम करंट अफेयर्स की
बातें कर रहे होंगे। मैं एमपी से हूं तो
मैं मध्य प्रदेश के करंट अफेयर्स लेकर के
आऊंगा। नूर आलम सर यूपी के करंट अफेयर्स
लेकर के आएंगे और मुकेश सैनी सर आपके लिए
राजस्थान के करंट अफेयर्स लेकर के आएंगे।
जल्द ही दोस्तों बिहार और झारखंड से भी दो
टीचर हमारे साथ जुड़ने वाले हैं। तो वो
आपको बिहार और झारखंड का करंट अफेयर्स
लेकर भी आएंगे। ये एक जीएस स्पेशल का बैच
है जो लगभग दो से तीन महीने में पूरा
होगा। मैं हिस्ट्री जैसे ही मॉडर्न
हिस्ट्री खत्म होगी इसके बाद हम एंशिएंट
हिस्ट्री स्टार्ट करेंगे और फिर मिडिवल
हिस्ट्री स्टार्ट करेंगे। तो पूरी इतिहास
को मैं यहां पर कवर कराऊंगा। उसी प्रकार
से पिटी मुकेश सैनी सर कवर कराएंगे और नूर
आलम सर आपको इंडियन और वर्ल्ड ज्योग्राफी
इसी प्लेटफार्म पर विदाउट एनी कॉस्ट आपको
कवर कराएंगे। दोस्तों बस आपसे एक छोटी सी
रिक्वेस्ट है। हमारा नया चैनल है। इसे
सब्सक्राइब कीजिए, शेयर कीजिए अपने
दोस्तों के साथ। वीडियोस को लाइक कीजिए और
हमारा हौसला बढ़ाइए। अच्छा कंटेंट लाने की
जिम्मेदारी हमारी है। बहुत सारा कंटेंट
मैंने YouTube पर और स्पेशल क्लासेस पर
दिया हुआ है। इसी को हम और आगे बढ़ाएंगे
आप सब लोगों के सपोर्ट के साथ। चलिए
दोस्तों शुरू करते हैं अभियान को। चलिए
शुरू करते हैं हमारे इस पहले वीडियो को।
वीडियो शुरू करने से पहले मैं आपको बता
दूं कि यह हमारा ऑफिशियल टेलीग्राम चैनल
है। अभियान tme
अभियान academy अभियान आप लिखेंगे। ये
हमारा ऑफिशियल टेलीग्राम चैनल है जहां पर
एक दिन पहले आपको बता दिया जाएगा कि कल
कौन सा टीचर कौन सा टॉपिक पढ़ा रहा है और
अगर कल क्लास नहीं है तो उसकी जानकारी भी
आपको इस चैनल पर मिल जाएगी। साथ ही साथ
पीडीएफ जो सबसे बड़ी दिक्कत आपको पीडीएफ
की होती है तो आप हमारे चैनल को खोलिएगा।
चैनल पर यहां पर एक आइकन बना हुआ है। वहां
पर Google ड्राइव की लिंक दी गई है।
दोस्तों एक क्लिक में वन क्लिक में आपको
सभी टीचर्स की सारी पीडीएफ मिल जाएंगी। आज
से एक साल के बाद या 5 साल के बाद भी आप
ये लेक्चर देखोगे तो यहां आपको एक पीडीएफ
लिंक मिलेगी। तो पीडीएफ की सारी समस्याएं
हमने खत्म कर दी हैं। कई बार ये होता है
कि आप लोग लेक्चर बाद में देखते हैं।
पीडीएफ आपको नहीं मिलता है। हमारे
टेलीग्राम चैनल से जुड़िए। वहां पर तो
आपको पीडीएफ प्रोवाइड कराई ही जाएगी।
लेकिन आप हमारे चैनल आइकन पर भी जा सकते
हैं। वहां पर टेलीग्राम और पीडीएफ दोनों
की लिंक दी गई है। उसको जरूर आप ज्वाइन कर
लीजिए और प्लीज हमारे चैनल को सब्सक्राइब
कीजिए। एक और बात बता दूं ये मेरा पूरा एक
शेड्यूल है। दोस्तों एक तो मैं मॉडर्न
हिस्ट्री की क्लास लेकर के आ रहा हूं जो
हमारी YouTube पर होगी रोज 2:45 पर। दूसरा
जो एक क्लास मैं स्टार्ट किया हूं वो
11:00 बजे सुबह एक टेस्ट सीरीज है। ये
क्लास नहीं है। ये एक टेस्ट सीरीज है और
इसमें डेली टॉपिक वाइज टेस्ट हम कर रहे
हैं और आज पहला टेस्ट था। इसकी जानकारी भी
मैंने अपने टेलीग्राम चैनल पर डाल दी थी।
दोनों टेलीग्राम चैनल पर मैंने आपको बता
दिया था। अब जो कल का टॉपिक है वो मैं
आपको बता दूं दोस्तों कि कल जो हमारा
टेस्ट होगा वो कैबिनेट मिशन से संविधान
सभा तक का टेस्ट होगा। कैबिनेट मिशन से
कॉन्स्टिटुएंट असेंबली तक का टेस्ट होगा।
स्पेशल क्लास सुबह 11:00 बजे हो रही है।
स्पेशल क्लास के लिए आप अनअकडमी पर मुझे
फॉलो कर सकते हैं। लिंक आपके डिस्क्रिप्शन
बॉक्स में दी गई है। तो यहां पर आप दोपहर
आइए सुबह 11:00 बजे और मेरे साथ एक
टारगेटेड तैयारी आप कीजिए। हर दिन मैं
आपको टास्क दूंगा। वो टास्क आपको खुद पढ़
करके आना है। आप लुसेंट और घटनाचक्र से
उसको पढ़िए। अभी सैनी सर भी स्टार्ट कर
रहे हैं। उनके साथ भी आप पढ़ सकते हैं और
रोज 11:00 बजे वहां पर टेस्ट होगा। अगेन
ये सोमवार से शनिवार तक होगा। संडे को
इसमें कोई टेस्ट नहीं लिया जाएगा दोस्तों।
ठीक है? और एक और बात बता दूं दोस्तों कि
दोस्तों ये हम यहां से स्टार्ट कर रहे हैं
और ये टॉपिक है भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन।
इंडियन नेशनल मूवमेंट और ये हमारी इकाई आठ
होगी। ये हमारी यूनिट एट होगी। आप में से
बहुत से लोग जो नए जुड़े हैं, कह रहे
होंगे सर यह यूनिट एट क्यों लिखा हुआ है?
इकाई आठ क्यों लिखा हुआ है? यहां पर इकाई
वन क्यों नहीं लिखा हुआ है? इसका कारण
समझिए। इससे पहले की जो कक्षाएं हैं, इससे
पहले की जो लेक्चर हैं, वो मैंने स्पेशल
क्लास में कवर कराएं। देखिए दोस्तों, क्या
है? जो हमारा आधुनिक भारत का इतिहास है जो
मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री है तो उसके दो
पार्ट हैं। आधुनिक भारतीय इतिहास को हम दो
हिस्सों में बांट करके देखते हैं। एक वो
इतिहास जो कि 1885 के पहले का है बिफोर
1885 के पहले की हिस्ट्री है। ओके? 1885
के पहले की हिस्ट्री है। और एक वो इतिहास
जो कि 1885 के बाद का है। ओके? और जो
इतिहास 1885 के बाद स्टार्ट हुआ है जो
हिस्ट्री 1885 के बाद हमको पढ़नी है
दोस्तों तो उसी इतिहास को हम कहते हैं
इंडियन नेशनल मूवमेंट उसी इतिहास को हम
कहते हैं भारतीय
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ठीक है उसी को हम
क्या बोलते हैं भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
का नाम हम इसको देते हैं और ये जो इतिहास
है ये 1885 के पहले का इतिहास है इसमें हम
पढ़ पढ़ते हैं कि किस प्रकार से यूरोपीय
कंपनियां भारत में आई। किस प्रकार से
उत्तरवर्ती मुगल शासकों का अंत हुआ।
अराइवल ऑफ यूरोपियन कंपनी। ठीक है? इसमें
हम मुगल रूलर्स के बारे में पढ़ते हैं।
फिर हम ये भी पढ़ते हैं कि भारत में किस
प्रकार से सांस्कृतिक, धार्मिक सुधार
आंदोलन शुरू किए गए। कल्चरल और रिलीजियस
रिफॉर्म मूवमेंट स्टार्ट किए गए। तो ये
सारी चीजें मैं अपनी स्पेशल क्लास में कवर
करा चुका हूं। प्लीज वहां जाकर के आप
देखिए और बहुत से लोग होंगे जो वहां पर
जुड़े हुए थे। बहुत डिटेल में मैंने हर हर
एक चीज को पढ़ाया है। टेस्ट भी कंडक्ट
कराए हैं। तो वहां जा करके आप इनको देख
सकते हैं। यहां पर जो हम मॉडर्न हिस्ट्री
पढ़ने वाले हैं वो हम स्टार्ट करेंगे
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से इंडियन नेशनल
मूवमेंट से यहां पर हम हिस्ट्री स्टार्ट
करेंगे। सर इसमें हम क्या-क्या पढ़ेंगे?
तो इसमें सबसे पहले हम पढ़ेंगे भारतीय
राष्ट्रवाद का उदय राइज ऑफ इंडियन
नेशनलिज्म कि आखिरकार राष्ट्रवाद क्या
होता है? इसका उदय क्यों हुआ? कैसे
कांग्रेस के पहले की संस्थाओं ने प्री
कांग्रेस इंस्टीट्यूशन ने इंडिया में
चीजों को आगे बढ़ाया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी
की इंडिया एसोसिएशन
ओके दादा भाई नौरोजी की लंदन एसोसिएशन
इन्होंने किस प्रकार से काम किया उसके
बारे में हम पढ़ रहे होंगे। दूसरा जो
हमारा चैप्टर इसमें निकल कर के आएगा वो
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बारे में
निकल कर के आएगा। इंडियन नेशनल कांग्रेस
के बारे में निकल कर के आएगा। हम पढ़ेंगे
कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का निर्माण
किस प्रकार से हुआ और उसकी गतिविधियां किस
प्रकार से आगे बढ़ती चली गई। फिर हम बात
करेंगे भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलनों के
चरणों की। हम डिस्कस करेंगे स्टेजेस ऑफ
इंडियन नेशनल मूवमेंट। अब आपने पढ़ा होगा
कई बार किताबों में कि एक उदारवादी चरण है
जिसको हम लिबरल फेज बोलते हैं। एक
क्रांतिकारी चरण है जिसको हम रेवोल्यूशनरी
फेज बोलते हैं और फिर एक गांधीवादी चरण है
जिसको हम गांधीयन स्टेज या गांधियन इरा
बोलते फेज बोलते हैं। तो इन तीनों चरणों
को हम डिस्कस करेंगे। सभी क्रांतिकारियों
की बात करेंगे। सभी उदारवादियों की बात
करेंगे और गांधी जी और उनके साथ जो
गतिविधियां हुई, उन सबको हम इस फेज में
डिस्कस करेंगे। और आखिरी पार्ट हमारा होगा
वो होगा स्वतंत्रता और विभाजन इंडिपेंडेंस
एंड डिवीजन भारत को स्वतंत्रता किस प्रकार
से मिली और भारत का विभाजन किस प्रकार से
हुआ इस बारे में हम बात करेंगे। पूरी
कोशिश रहेगी कि आने वाली 20 से 25 कक्षाओं
में 25 घंटे के अंदर आपके ये सारे टॉपिक
खत्म करवा दिए जाएं विद एमसीक्यू।
एमसीक्यू इस बार डेली बेसिस पर होंगे। आज
जो क्लास होगी कल की क्लास स्टार्ट होने
से पहले पांच एमसीक्यू आपको दिए जाएंगे।
तो विद एमसीक्यू हम इन चीजों को कंडक्ट
करेंगे। चलिए शुरू करते हैं। आई विश आप
सभी लोग तैयार होंगे और एक छोटा सा आपके
दिमाग में आईडिया बन गया होगा कि हम क्या
पढ़ने वाले हैं और किस प्रकार हम चीजों को
पढ़ने वाले हैं। शुरू करते हैं दोस्तों और
सबसे पहले हम बात करते हैं भारतीय
राष्ट्रवाद का उदय राइज ऑफ इंडियन
नेशनलिज्म। ठीक है? अब यहां पर एक शब्द
निकल कर के आ गया और शब्द है राष्ट्रवाद।
शब्द है राष्ट्रवाद। शब्द है नेशनलिज्म।
ओके? ये शब्द यहां पर निकल कर के आया। सर
आखिरकार इसका मतलब क्या होता है?
राष्ट्रवाद का मतलब क्या होता है? तो
दोस्तों राष्ट्रवाद का मतलब ये होता है कि
जैसे मान लीजिए ये एक क्षेत्र है। ये एक
पूरा का पूरा इलाका है और इस इलाके में
बहुत सारे लोग रह रहे हैं। हमने ये मान
लिया कि ये चार पांच लोग यहां पर रह रहे
हैं। ठीक है? इस एरिया के अंदर ये लोग रह
रहे हैं। जब ये लोग आपस में एक दूसरे से
जब ये लोग आपस में एक दूसरे से सांस्कृतिक
रूप में जुड़ जाते हैं। जब ये एक दूसरे से
आपस में कल्चरली जुड़ जाते हैं और इस पूरे
क्षेत्र को एक इकाई मानने लगते हैं। एक
यूनिट मानने लगते हैं दोस्तों। तो इसी को
कहा जाता है राष्ट्रवाद। इसी को कहा जाता
है नेशनलिज्म। जैसे कि हम बहुत से लोग
मध्य प्रदेश में रहते हैं। बहुत से लोग
दिल्ली में रहते हैं। बहुत से लोग
तमिलनाडु में रहते हैं। कुछ लोग मिजोरम
अरुणाचल में रहते हैं। जम्मू कश्मीर में
रहते हैं। लेकिन हमारी भाषा भी अलग-अलग
है। हमारे रहने का तरीका भी अलग-अलग है।
लेकिन एक चीज जो हमको जोड़े रखती है वो ये
है कि हम सब भारतीय हैं। हम सब इंडियन
हैं। हमारे कल्चर अलग हो सकते हैं। हमारी
भाषा अलग हो सकती है। लेकिन अगर हमारे देश
के लिए जब बारी कुछ भी करने की बारी आएगी
तो सबसे पहले हम इंडियन हैं। सबसे पहले हम
भारतीय हैं। देखो तो राष्ट्रवाद की
परिभाषा कुछ इस प्रकार आप दे सकते हैं। जब
एक व्यक्ति, जब एक व्यक्ति अपनी संस्कृति,
अपनी भाषा, अपने क्षेत्र से ज्यादा महत्व
राष्ट्र को देता है तो उसे राष्ट्रवाद कहा
जाता है। व्हेन अ पर्सन गिव्स मोरेंट टू अ
नेशन इंस्टेड ऑफ़ इट्स लैंग्वेज,
रीजन एंड द कल्चर देन दिस इज़ नोन एज द
नेशनलिज्म। इसे ही राष्ट्रवाद कहा जाता
है। ठीक है? तो अब ये भारतीय राष्ट्रवाद
क्या है? इंडियन नेशनलिज्म क्या है? देखिए
भारतीय राष्ट्रवाद से हमारा मतलब ये है
दोस्तों कि देखिए हमारे यहां पर शुरू से
ही शुरू से ही भारत एक यूनाइटेड कंट्री
था। लेकिन भारत में अलग-अलग छोटे-छोटे
राज्य हुआ करते थे। ये पूरी कहानी हम लोग
जानते हैं। एक समय आया जब प्राचीन इतिहास
हम पढ़ते हैं तो हम मौर्य के बारे में
पढ़ते हैं। जब मौर्य थे तो पूरा भारत
इंटीग्रेटेड हो गया। जब मौर्य गए तो फिर
भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बट गया। फिर
वापस से गुप्त साम्राज्य आया फिर भारत
यूनाइट हो गया। फिर भारत टूट गया। फिर
दिल्ली सल्तनत आई। फिर भारत यूनाइट हुआ
फिर टूट गया। मुगलों के समय भी ऐसा ही
हुआ। तो भारत में क्या था? भारत शुरू से
एक राष्ट्र तो था। लेकिन भारत के लोगों के
अंदर ये भावना पैदा करना कि मैं बंगाल से
नहीं हूं। मैं मध्य प्रांत से नहीं हूं।
मैं भारतीय हूं। इसी को कहा जा रहा है
राष्ट्रवाद। इसी को कहा जा रहा है
नेशनलिज्म। तो क्या हुआ? जब अंग्रेज भारत
में आए। जब ब्रिटिशर्स इंडिया में आए तो
ब्रिटिशर्स ने क्या किया? इंडिया का
पॉलिटिकल इंटीग्रेशन किया। भारत का क्या
किया? भारत का राजनीतिक एकीकरण कर दिया।
भारत के कई रियासतों को खत्म करके उन्हें
राज्यों में बदला, उन्हें प्रोविंस में
बदला और इंडिया का पॉलिटिकल इंटीग्रेशन कर
दिया। ठीक है? और इस पॉलिटिकल इंटीग्रेशन
के अलावा क्या हुआ? जब ब्रिटेन के लोग
भारत में आए तो उन्होंने भारत में एक और
काम किया वो था हमारा ट्रांसपोर्टेशन
सिस्टम। वो था हमारा परिवहन। इन्होंने
परिवहन को सुचारू रूप से आगे बढ़ा दिया।
ठीक है? तो इसकी वजह से क्या हुआ दोस्तों?
तो इसकी वजह से भारत के अलग-अलग क्षेत्रों
के लोग एक साथ आपस में जुड़ने लगे और उनके
बीच में विचारों का आदान-प्रदान होने लगा।
उनके बीच में थॉट का एक्सचेंज होने लगा।
ये तो एक कारण था जो कि ब्रिटिश का
पॉजिटिव रीजन आया। दूसरी दिक्कत ये थी कि
जो हमारे यहां पर ब्रिटिश रूल हुआ जो
हमारे यहां पर ब्रिटेन का शासन हुआ तो उन
उन्होंने कॉलोनियल पॉलिसीज को अपनाया।
उन्होंने औपनिवेशिक नीतियों को अपनाया।
कहोगे सर सर ये उपनिवेश का मतलब क्या होता
है? कॉलोनी का मतलब क्या होता है? तो मेरे
दोस्त जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर
सिर्फ इसलिए कब्जा कर सिर्फ उसके आर्थिक
संसाधनों का दोहन करने के लिए कब्जा करता
है, तो इसे उपनिवेशवाद कहा जाता है। इसे
कॉलोनियलिज्म कहा जाता है। फिर से रिपीट
करता हूं। जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर
सिर्फ आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के
लिए शासन करता है तो उसे कॉलोनियलिज्म कहा
जाता है। उसे ही उपनिवेशवाद कहा जाता है।
तो ये चीज आपको याद रखनी है। तो ब्रिटेन
के लोग भारत क्यों आए थे? तो ब्रिटेन के
लोगों का भारत आने का सिर्फ एक पर्पस था
कि भैया हमें कैसे भी करके यहां पर
मैक्सिमम प्रॉफिट अर्न करना है। जितना लूट
सकते हो भारत को लूटो और यहां से अधिकतम
धनराशि को लेकर के यहां से बाहर निकल जाओ।
तो इसके लिए उन्होंने कॉलोनियल पॉलिसीज को
अपनाया। इसके लिए उन्होंने औपनिवेशिक
नीतियों को अपनाया। इसमें क्या-क्या शामिल
था? तो इसमें उनकी लैंड रेवेन्यू पॉलिसी
शामिल थी। इसमें उनकी भू-राजस्व नीति
शामिल थी। और भू-राजस्व नीतियों में हम
डिस्कस किए हैं पुरानी क्लासों में कि
भू-राजस्व नीतियों में स्थाई बंदोबस्त,
परमानेंट सेटलमेंट, रयतवारी और महलवाड़ी।
इन तीनों की तीनों नीतियों में किसानों का
बहुत ज्यादा शोषण हुआ। फार्मर्स का इन
तीनों में बहुत ज्यादा एक्सप्लॉयटेशन किया
गया। एक तरफ किसानों का शोषण हुआ, दूसरी
ओर जमींदार वर्ग तैयार हुआ। दूसरी ओर एक
जमींदार सेक्शन तैयार हुआ। और ये वही
जमींदार वर्ग है जो हमेशा अंग्रेजों से
वफादार रहेगा। जो हमेशा अंग्रेजों का क्या
रहेगा? लॉयल रहेगा। और जब-जब भारत में
क्रांति की बात होगी तो ये जमींदारी वर्ग
हमेशा ब्रिटेन का साथ देगा।
क्रांतिकारियों के साथ भी धोखा करेगा।
राष्ट्रवादी
और जितने भी आंदोलन होंगे सबके साथ ये
धोखा करेगा। ये पॉइंट आपको याद रखना है।
दूसरी चीज यहां पर आपको याद रखना है इनकी
एडमिनिस्ट्रेशन पॉलिसी। जो इनकी प्रशासनिक
नीतियां थी उन्होंने भी भारत को बहुत
ज्यादा प्रभावित किया। जो इनका
एडमिनिस्ट्रेशन पॉलिसीज थी उससे भी इंडिया
को बहुत दिक्कत हुई। अगर इसके बाद हम कुछ
और कारणों की बात करें तो एक इनकी सोशियो
रिलीजियस पॉलिसी थी। सामाजिक और धार्मिक
नीतियां थी। कई प्रकार से जबरन धर्मांतरण
की बात कही गई। ईसाई मिशनरियों को बढ़ावा
दिया गया। ये सारे काम किए गए। जिसकी वजह
से भी भारत में बहुत ज्यादा असंतोष था। और
याद रखना कि रिलीजन को लेकर के हमेशा से
ही भारत में सेंटीमेंट आगे रहते हैं। तो
ये चीज बहुत ज्यादा अफेक्ट कर गई। तो जब
ब्रिटेन के लोग जब ब्रिटेन के लोगों ने
इतने सारे काम किए उन्होंने अपनी
औपनिवेशिक नीतियां चलाई। उन्होंने
पाश्चात्य शिक्षा और चिंतन इसको हम डिस्कस
करेंगे। सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन
भारत में हो गए। प्रेस और समाचार पत्र
भारत में चलने लगे। राजनीतिक संस्थाएं
भारत में बनने लगी। इतने सारे काम जब
इंडिया में हुए तो भारत के लोग जो कि
सांस्कृतिक रूप से अलग-अलग हैं। कल्चरली
लोग अलग-अलग हैं। लेकिन उनके बीच में एक
जुड़ाव होने लगा। उनके बीच में ये भावना
आने लगी कि हम भारतीय हैं और ये चीजें
यहीं से निकल कर के आई और इसी को कहा जा
रहा है भारतीय राष्ट्रवाद का उदय। इसी को
कहा जा रहा है राइज ऑफ इंडियन नेशनलिज्म।
ओके? इसमें एक पॉइंट आपको याद रखना है
दोस्तों। कि इसमें सबसे बड़ा योगदान
निभाएगी पाश्चात्य शिक्षा और चिंतन। इसमें
सबसे बड़ा रोल प्ले करेगी वेस्टर्न
एजुकेशन एंड थिंकिंग। क्योंकि भारत के लोग
जब ब्रिटेन यहां पर आया ब्रिटेन ने
अंग्रेजी शिक्षा स्टार्ट कर दी। आपको पता
ही होगा मैकले एक मैले मिनट करके आया था।
तो मैकोले मिनट के बाद भारत में अंग्रेजी
शिक्षा शुरू हो गई। इंग्लिश एजुकेशन
स्टार्ट हो गई। अब जैसे ही इंडिया में
इंग्लिश एजुकेशन को स्टार्ट किया गया तो
भारत के लोग बाहर भी जाने लगे पढ़ाई करने
के लिए। ये अमेरिका जाने लगे, यूरोप जाने
लगे। वहां पर ये पढ़ाई करने के लिए जाने
लगे। और जब ये वहां पढ़ाई करने के लिए गए
तो वहां पर इन्होंने स्वतंत्रता को देखा।
लिबर्टी को देखा, समानता को देखा,
इक्वलिटी को देखा। इन सभी चीजों को
इन्होंने वहां पर देखा और जब ये चीजें
उन्होंने वहां पर देखी और भारत के साथ
इसका कंपेयर किया। इंडिया के साथ जब इसका
कंपैरिजन किया तो इन्होंने पाया कि भारत
में ये चीजें नहीं हो रही हैं। तो
पाश्चात्य शिक्षा का इसमें बहुत बड़ा
योगदान होगा क्योंकि वही लोग भारत आएंगे
और यही लोग भारत में सुधार आंदोलनों को
शुरू करेंगे। रिफॉर्मिस्ट मूवमेंट की बात
करेंगे। आप जितने भी सुधार आंदोलन उठा
लीजिए। चाहे राजा राममोहन राय की आप बात
कर लें। जिन्होंने आत्मीय सभा और ब्रह्म
समाज की स्थापना की। एजुकेटेड थे। हाइली
एजुकेटेड थे। आप ईश्वर चंद्र विद्यासागर
की बात कर लीजिए। जिन्होंने विधवा
पुनर्विवाह को शुरू करवाया था। विडो
रीमैरिज के लिए एक्ट पास कराया था। इसके
अलावा चाहे आप सर सैयद अहमद खान की बात कर
लीजिए। आप सुरेंद्रनाथ बनर्जी की बात कर
लीजिए जिन्होंने इंडिया एसोसिएशन की
स्थापना की। और ये वही इंडिया एसोसिएशन है
दोस्तों जिस इंडिया एसोसिएशन ने सिविल
सेवा के रिफॉर्म की बात की थी। सिविल सेवा
के सुधारों की बात की थी। जितने भी लोग
आपको मिलेंगे हाइली एजुकेटेड थे और जो
वेस्टर्न थिंकिंग से बहुत ज्यादा प्रभावित
थे और इंडिया में उन चीजों को इन्फ्लुएंस
करना चाहते थे और आखिरी में सबसे बड़ा जो
योगदान यहां पर दिया है वो योगदान दिया है
राजनीतिक संस्थाओं ने पॉलिटिकल
इंस्टीट्यूशन ने क्या हुआ भारत में
अलग-अलग लोगों ने राजनीतिक संगठनों की
स्थापना करना शुरू कर दिया पॉलिटिकल
इंस्टीट्यूशन बनाना स्टार्ट कर दिया और ये
राजनीतिक संगठन दो प्रकार के थे दोस्तों।
एक तो था इंडियन नेशनल कांग्रेस भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस और आपको पता ही है कि
1885 में 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस
को बनाया गया था। इसका एस्टैब्लिशमेंट
किया गया था। और इंडियन नेशनल कांग्रेस वो
आधार बनती है जिस आधार पर भारतीय
राष्ट्रीय आंदोलन को खड़ा किया जाता है।
जिस बेस पर या जिस फाउंडेशन पर इंडियन
नेशनल मूवमेंट को स्टार्ट किया जा रहा है।
कांग्रेस के इर्द-गिर्द बहुत सारी
कहानियां होंगी जो हम आगे की कक्षाओं में
पढ़ रहे होंगे। लेकिन क्या सिर्फ कांग्रेस
ही थी? क्या सिर्फ कांग्रेस ही अवेलेबल
थी? नहीं। कांग्रेस के पहले भी कुछ
राजनीतिक संस्थाएं थी। उन्होंने भी इसमें
बहुत बड़ा योगदान दिया है। जिनको कहा जाता
है कांग्रेस पूर्व राजनीतिक संस्थाएं
जिनको कहा जाता है प्री कांग्रेस
इंस्टीट्यूशन और आज की क्लास में हमें
इन्हीं कांग्रेस पूर्व राजनीतिक संस्थाओं
को पढ़ना है। हमें इन्हीं प्री कांग्रेस
इंस्टीट्यूशन की बात करनी है। तो ये बताइए
क्या यहां तक आपको टॉपिक क्लियर हुआ?
भारतीय राष्ट्रवाद क्या है? भारतीय
राष्ट्रवाद के उदय के कारण और तीसरा अब हम
पढ़ने के लिए जा रहे हैं कांग्रेस पूर्व
संस्थाओं की बात करने जा रहे हैं। प्री
कांग्रेस इंस्टीट्यूशन की बात करने के लिए
जा रहे हैं। बताइए दोस्तों क्लियर है यहां
तक? जल्दी बताइए। फिर अपन आगे बढ़ते हैं।
ऑल गुड।
ठीक है। चलो बहुत अच्छी बात है। बढ़िया।
तो आगे बढ़ा जाए। अगले पार्ट पर चलें।
स्पेक्ट्रम बुक यूज़ कीजिए। स्पेक्ट्रम और
घटनाचक्र ऑब्जेक्टिव के लिए। चलिए
दोस्तों, तो आगे बढ़ते हैं। अगले पार्ट पर
आ जाते हैं। ओके? इसके बाद अब हम आगे बढ़े
तो हमें यह देखना होगा कि ये जो कांग्रेस
पूर्व की संस्थाएं हैं, इनका उद्देश्य
क्या था? तो देखिए दोस्तों, कांग्रेस
पूर्व बहुत सारी संस्थाओं का गठन किया
गया। कांग्रेस से पहले भी भारत में
अलग-अलग पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशन हुआ करते
थे। जैसे आपने नाम सुना होगा इंडिया
एसोसिएशन का। आपने लैंड होडेड सोसाइटी के
बारे में सुना होगा। आपने बंग भाषा
प्रकाशक समिति के बारे में भी सुना होगा।
एक दो इंस्टिट्यूशन और थे जिसको बॉम्बे
कमेटी और मद्रास कमेटी कहा जाता था। बहुत
सारे इंस्टिट्यूशन बनाए गए। 20, 50 से
ज्यादा आपको राजनीतिक संस्थाएं देखने के
लिए मिलती है। लेकिन यहां पर पांच या छह
राजनीतिक संगठन ऐसे हैं जिनसे अक्सर
एग्जाम में सवाल आते हैं। तो उनको हमें ना
सिर्फ पढ़ना है बल्कि आज की इसी क्लास में
उनको याद भी कर लेना है। पर ये समझना
जरूरी है कि कांग्रेस और कांग्रेस से पहले
जो संस्थान आए, उन दोनों के बीच में अंतर
क्या है? उन दोनों के बीच में बेसिक
डिफरेंस क्या है? देखिए सबसे बड़ा बेसिक
डिफरेंस यही है कि कांग्रेस से पहले जो
संगठन थे वो एक क्षेत्र विशेष में हुआ
करते थे। बंगाल उनका इलाका हो गया या फिर
बिहार उनका इलाका हो गया। तो एक पर्टिकुलर
रीजन में ही वो क्या होते थे? उनका
लिमिटेशन थी कि वो एक क्षेत्रीय संगठन है।
वो एक रीजनल इंस्टीट्यूशन है। लेकिन जब
कांग्रेस का गठन किया गया और जब कांग्रेस
पिक्चर में आई दोस्तों तो कांग्रेस एक ऐसा
संगठन थी जो किसी एक क्षेत्र का संगठन
नहीं थी बल्कि उसका विस्तार पूरे के पूरे
भारत में था बल्कि उसका विस्तार पूरे के
पूरे इंडिया में था। इसीलिए कहा जाता है
कि कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी थी
क्योंकि पूरे इंडिया में वो फैल गई
धीरे-धीरे। लेकिन कांग्रेस से पहले जितनी
भी संस्थाएं बनेंगी वो सारी संस्थाएं एक
क्षेत्र में सीमित रहेंगी। दूसरी बात ये
है मेरे दोस्त कि इनका तरीका क्या था? तो
इन्होंने कभी भी बड़ा आंदोलन नहीं किया या
कोई बड़े स्तर पर सरकार का विरोध नहीं
किया। ये सरकार से रिक्वेस्ट किया करते
थे। ये क्या करते थे? ये इनको पत्र लिखा
करते थे। ये जाकर के दरख्वास्त किया करते
थे। ये मुलाकातें किया करते थे कि देखिए
साहब ये चीज अच्छी नहीं हो रही है। ये हम
आपसे रिक्वेस्ट कर रहे हैं। इसको ठीक कर
दीजिए। तो ये बेसिक फेज है। कहते हैं ना
ये स्टार्टिंग का फेज है। ये इन्फेंट फेज
कहलाता है। ये सबसे पहला चरण है जो आपको
यहां देखने के लिए मिल रहा है। तो अगर आप
इनके क्रियाकलापों की बात करें तो इनके
कुछ उद्देश्य थे। पहला उद्देश्य इनका ये
था कि भारतीयों प्रशासन में भारतीयों की
भागीदारी को बढ़ाना। इंक्रीस पार्टिसिपेशन
ऑफ इंडियंस इन द एडमिनिस्ट्रेशन। इसका
मतलब ये था मेरे दोस्त कि जो सिविल सर्विज
के एग्जामिनेशन थे या फिर जो इंडियन
एडमिनिस्ट्रेशन की पोस्ट थी उसमें
भारतीयों की संख्या बहुत कम थी। अब दो
प्रकार से प्रशासन होता है। एक तो होता है
विधायिका जो कि लेजिसलेशन पावर हुआ करती
थी। ठीक है? और दूसरा यहां पर होता है
एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी जिसमें आपके पूरे
अधिकारी आते हैं जिसमें आपके पूरे ऑफिसर
आते हैं। तो पहली डिमांड इन्होंने यही रखी
कि ना सिर्फ भारतीयों को विधायिका में जगह
दी जाए ना सिर्फ इंडियंस को लेजिसलेशन में
जगह दी जाए बल्कि भारतीयों को इन पोस्ट पर
भी जगह दी जाए। इन नौकरियों पर भी
भारतीयों को जगह दी जाए। ये पहली डिमांड
इन्होंने यहां पर रखी। दूसरी इनकी डिमांड
ये रही दोस्तों कि प्रशासनिक व्यय में कमी
की जाए। यहां पर जो एडमिनिस्ट्रेटिव
एक्सपेंडिचर है उसको रिड्यूस किया जाए
क्योंकि आप लगातार ब्रिटेन से अधिकारियों
की नियुक्ति कर रहे हैं भारत में। उनकी
सैलरी भी ज्यादा होती थी। उनके अलाउसेस भी
ज्यादा होते थे। तो इसको रिड्यूस किया
जाए। क्योंकि ये सारा पैसा अल्टीमेटली जा
कहां से रहा था? ये सारा पैसा अल्टीमेटली
भारत के खजाने से निकल कर के जा रहा था।
जिसे दादा भाई नौरोजी ने क्या कहा था? धन
निष्कासन सिद्धांत कहा था। ड्रेन ऑफ वेल्थ
थ्योरी कही थी। याद रखिएगा 1867 के आसपास
दादा भाई नौरोजी इस बात का प्रतिपादन कर
चुके हैं कि देखिए भारत से पैसा किस तरह
से इंग्लैंड भेजा जा रहा है। जिसे धन
निष्कासन सिद्धांत कहा गया था। ड्रेन ऑफ
वेल्थ थ्योरी कहा गया था। बाद में
उन्होंने एक किताब लिखी पॉवर्टी एंड द
अनब्रिटिश रूल ऑफ इंडिया जिसमें इन सभी
बातों को विस्तार से बता दिया गया। तीसरा
रीजन था कि भारत में आधुनिक शिक्षा का
प्रसार किया जाए। मॉडर्न एजुकेशन को
इंडिया में स्प्रेड किया जाए। अंग्रेजों
ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा शुरू कर दी।
1833 के अधिनियम के द्वारा आपको पता पड़
रहा होगा। सॉरी 1813 के अधिनियम के द्वारा
एजुकेशन पर एक्सपेंडिचर स्टार्ट किया गया।
33 के बाद और चीजों को आगे बढ़ाया गया।
लेकिन एक बड़ी प्रॉब्लम यहां पर यही नजर आ
रही थी कि बड़े स्तर पर इसका विकास नहीं
हो पा रहा था। बहुत सीमित स्तर पर शिक्षा
का विकास था और इसको बड़े लेवल पर
एक्सपैंड नहीं किया गया था। तो ये अगली
डिमांड थी कि भारत में शिक्षा का प्रचार
प्रसार किया जाए। इन संस्थाओं का आधार
क्षेत्रीय अथवा स्थानीय था। तो ये आपकी
कांग्रेस पूर्व संस्थाओं के उद्देश्य
होंगे। ठीक है? तो हमने क्या-क्या पढ़
लिया साहब? हमने सबसे पहले डिस्कस कर लिया
राष्ट्रवाद क्या होता है? जब एक व्यक्ति
अपने क्षेत्र, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा
से ज्यादा अपने राष्ट्र को महत्व देता है
तो उसे राष्ट्रवाद कहा जाता है। जब एक
इंडिविजुअल, अपनी लैंग्वेज, अपने कल्चर,
अपने रीजन की जगह पर प्रायोरिटी किसको
देता है? नेशन को देता है तो उसे
नेशनलिज्म कहा जाता है। हमने ये भी देख
लिया कि भारत में राष्ट्रवाद के उदय के
कारण क्या थे? आखिरकार भारत में
राष्ट्रवाद के राइज़ के कारण क्या थे?
व्हाट वाज़ द रीज़न बिहाइंड दी राइज़ ऑफ
इंडियन नेशनलिज्म। फिर तीसरे नंबर पर हमने
ये देखा कि प्री कांग्रेस इंस्टीट्यूशन के
ऑब्जेक्टिव क्या थे? जो कांग्रेस से पहले
राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना की गई। उनकी
प्रकृति, उनका नेचर और उनका ऑब्जेक्टिव,
उनका उद्देश्य क्या था? प्रकृति क्या थी?
तो नेचर में दोस्तों आप बता देंगे कि इनका
नेचर स्थानीय था। इनकी प्रकृति कैसी थी?
लोकल थी या रीजनल थी? बेहतर वर्ड होगा।
रीजनल वर्ड का इस्तेमाल करें। दूसरा आपने
यहां पर क्या बता दिया कि इसके ऑब्जेक्टिव
क्या थे? तो ऑब्जेक्टिव यही थे कि जो
हमारा ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन है तो उसमें
इंडियंस को जगह दी जाए। जो हमारा
एडमिनिस्ट्रेशन एक्सपेंस है उसको कम किया
जाए। एक और ऑब्जेक्टिव क्या था कि यार जो
इंडियंस हैं इंडियंस हैं तो उनको मॉडर्न
एजुकेशन प्रोवाइड कराई जाए। उनको आधुनिक
शिक्षा दी जाए। तो इतने टॉपिक हमने कवर कर
लिए। तो ये तो हो गया साहब हमारा आज का
कंसेप्ट वाला पार्ट। ये हो गया हमारा
कंसेप्चुअल एलिमेंट। सारी चीजें डिस्कस हो
गई। अब हमें ये डिस्कस करना है कि प्रमुख
राजनीतिक संस्थाएं कौन-कौन सी थी? मेजर
पॉलिटिकल पार्टीज कौन सी थी? जो कांग्रेस
के पहले एस्टैब्लिश थी। अब थोड़ा फ़क्चुअल
इंफॉर्मेशन है। धैर्य बनाए रखेंगे और
चीजों को पढ़ते रहेंगे। कहानी के रूप में
पढ़ेंगे। कोशिश करना है यहीं पर याद हो
जाए। तो साथ में दोहराते रहिएगा मेरे
दोस्त। ओके? तो सबसे पहली संस्था जो आपको
देखने मिलेगी और ये टेबल बना के दे दिया
है मैंने आपको। पीडीएफ में आपको मिल जाएगा
टेबल मिल जाएगी। हमेशा की तरह ऐसा कर
दिया। ठीक है? सबसे पहली संस्था थी जिसका
नाम था कोलकाता यूनिटेरियन कमेटी। क्या
नाम था? कोलकाता यूनिटेरियन कमेटी थी।
इसको
1823 में इसकी स्थापना की गई थी। 1823 में
इसे एस्टैब्लिश किया गया था। और इसकी
स्थापना कोलकाता वाले इलाके में की गई थी।
और इसके संस्थापक सदस्यों में इसके
फाउंडिंग मेंबर्स में राजा राममोहन राय
थे, द्वारकानाथ टैगोर थे और विलियम एडमम
थे। तो ये आप ये कह सकते हैं बहुत ही
प्रोटोो इसको तो पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशन बस
कहा जाता है। ऐसे कुछ बड़े काम इसने किए
नहीं। पर चूंकि हमें पढ़ना है। एग्जाम में
पूछा गया है। तो याद रखिएगा कोलकाता
यूनिटेरियन कमेटी इसकी स्थापना 1823 में
की गई थी। ईयर उतना इंपॉर्टेंट नहीं है।
1823 में इसकी स्थापना की गई थी राजा
राममोहन राय द्वारकानाथ टैगोर और विलियम
एडमम के द्वारा। अब यहां पर दो बातें
समझिए कि ये पार्टी ने उतना ज्यादा काम
क्यों नहीं किया? इसके दो स्पेसिफिक रीज़न
थे। पहला रीजन इसका ये था कि जो राजा
राममोहन राय हैं उनका ज्यादा ध्यान
राजनीतिक सुधारों पर नहीं था। ज्यादा फोकस
उनका पॉलिटिकल रिफॉर्म पर नहीं था। उनका
ज्यादा फोकस था सामाजिक सुधार पर। ज्यादा
उनका फोकस था सोशल और रिलीजियस रिफॉर्म
मूवमेंट पर। वो सभी के लिए आंदोलन कर रहे
थे। और जो दूसरी कुप्रथाएं चल रही थी,
उसके लिए वो लगातार आंदोलन कर रहे थे। ये
इसका एक रीज़न हो गया। दूसरा रीजन ये हो
जाएगा कि इस समय
भारत में कहते हैं ना कि एक राष्ट्रीय
चेतना नहीं थी। इंडिया में एक नेशनलिज्म
की फीलिंग नहीं थी कि वो राष्ट्रीय
मुद्दों को समझ सके। वो नेशनल इश्यूज को
समझ सके। तो यहां पर याद रखेंगे कोलकाता
यूनिटेरियन कमेटी कोलकाता में ही इसकी
स्थापना राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ
टैगोर और विलियम एडमम के द्वारा की गई थी।
आगे बढ़ते हैं, अगले पार्ट पर आते हैं। जो
अगली कमिटी है, उसका नाम है बंग भाषा
प्रकाशक सभा। वेरी मच इंपॉर्टेंट। इसको
याद रखेंगे। अगली कमेटी है बंग भाषा
प्रकाशक सभा और इसे 1836 में 1836 में
कोलकाता में ही इसे इस्टैब्लिश किया गया
था। अच्छा एक बात आप और समझिएगा। देखिए
भारत में अगर आप पूरे-पूरे भारत की बात
करें तो इंडिया में ज्यादातर इस कोलकाता
वाले इलाके में ही आंदोलनों की शुरुआत
होगी। इवन जब कांग्रेस की भी स्टार्टिंग
होगी तो ज्यादातर यहीं के लोग पार्टिसिपेट
करेंगे। इसका एक बहुत बेसिक रीजन है। एक
तो ब्रिटिश भारत का 1911 से पहले 1911 से
पहले ये ब्रिटिश भारत का एडमिनिस्ट्रेटिव
हेड क्वार्टर था। प्रशासनिक केंद्र था। ये
इसका पहला कारण है और दूसरा कारण यहीं पर
ये अबकि ये एडमिनिस्ट्रेटिव रीजन था तो
जितने भी एजुकेशन रिफॉर्म हुए या जितने भी
आप कहें ट्रेडिंग अपॉर्चुनिटी आई वो इसी
इलाके में सबसे ज्यादा आएंगे तो इसी इलाके
में कुछ जमींदार वर्ग निकले और यहीं से
कुछ स्कॉलर भी निकल कर के आएंगे और यही
स्कॉलर जब बाहर गए इन्होंने चीजों को पढ़ा
फिर ये भारत वापस आए और भारत में वापस आने
के बाद इन्होंने अलग अलग-अलग संस्थाओं का
निर्माण किया। अलग-अलग इंस्टीट्यूशन को
इन्होंने इस्टैब्लिश किया। फिर दूसरा रीजन
आपको ये देखने मिलेगा। बम बॉम्बे वाला
इलाका देखने मिलेगा और तीसरा आपको मद्रास।
क्योंकि ये तीन वो इनिशियल जगह हैं। ठीक
है? बॉम्बे में उस समय गुजरात का रीजन भी
आएगा। तो बंगाल, बॉम्बे और मद्रास। ये तीन
वो इनिशियल इलाके थे जहां पर ब्रिटेन ने
ज्यादातर अपना एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल
रीजन रखा और ज्यादातर एक्टिविटी ब्रिटेन
की यहीं पर की गई। तो आपने देखा कोलकाता
यूनिटेरियन कमेटी भी कोलकाता में बनाई गई
थी और दूसरा जो है बंग भाषा प्रकाशक सभा
इसको भी कोलकाता वाले रीजन में इस्टैब्लिश
किया गया। इसको राजा राममोहन राय के
अनुयायियों ने सम्मिलित रूप से बनाया था
और इसके बारे में एक ही बात इंपॉर्टेंट है
कि ये बंगाल में स्थापित प्रथम राजनीतिक
संगठन है। इट इज दी फर्स्ट पॉलिटिकल
ऑर्गेनाइजेशन एस्टैब्लिश्ड इन द बंगाल। ये
प्लीज याद रखिएगा। यह प्रश्न एक बार आ
चुका है कि बंगाल में स्थापित पहली
राजनीतिक संस्था कौन सी थी? व्हिच वाज़ दी
फर्स्ट पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशन
एस्टैब्लिश्ड इन द बंगाल। डू रिमेंबर इट
वाज़ दी बंग भाषा प्रकाशक सभा एस्टैब्लिश्ड
बाय दी फॉलोअर्स ऑफ राजा राममोहन राय एंड
इट वाज़ क्रिएटेड इन द 1836 इन द कोलकाता
इटसेल्फ। ठीक है? कार्य वही रहेगा कि क्या
करना है कि सुधार के लिए क्या करना है? तो
सुधार के लिए रिक्वेस्ट करना है। वही
कार्य है कि अलग से मूवमेंट नहीं करेंगे
पर ब्रिटिश गवर्नमेंट के पास जाना है और
रिफॉर्म के लिए हमें रिक्वेस्ट करना है।
ठीक है? और साथ ही साथ क्या करना है? देश
में पॉलिटिकल अवेयरनेस फैलाना है। देश में
राजनीतिक जागरूकता को हमें फैलाना है।
चलिए अगली सभा की हम बात करते हैं। याद
रखते जाइएगा। कोलकाता यूनिटेरियन सभा पहली
राजा राममोहन राय द्वारकानाथ टैगोर। दूसरा
बंग भाषा प्रकाशक सभा 1836 और इसको बनाया
गया बनाया था राजा राममोहन राय और उनके
अनुयाई ने। यहीं पर याद हो जाएगा। बस फोकस
रखे रहना मेरे दोस्त सारी चीजें आपको यहीं
पर याद हो जाएंगी। आगे बढ़ते हैं अगले
क्वेश्चन पे चलते हैं। ये बड़ी इंपॉर्टेंट
सोसाइटी है और इसका नाम है लैंड होल्डर
सोसाइटी। बहुत इंपॉर्टेंट है। अगेन इट इज़
वेरी मच इंपॉर्टेंट। लैंड होल्डर सोसाइटी
या कई बार इसको जमींदारी एसोसिएशन भी कहा
जाता है। लैंड होल्डर सोसाइटी या जमींदारी
एसोसिएशन इसको कहा जाता है। इसकी स्थापना
भी कोलकाता वाले इलाके में की गई थी।
द्वारकानाथ टैगोर और दूसरे लोगों ने मिलकर
के इसकी स्थापना की थी। अब यहां पर आप
देखें तो यहां पर लिखा गया है जमींदारी
एसोसिएशन। अब जो चीज जमींदारों के लिए
बनाई जा रही है मेरे दोस्त तो उसका काम भी
क्या होगा? वो किसके हितों की रक्षा
करेगी? तो निश्चित सी बात है वो जमींदारों
के हितों के लिए ही काम करेगी। वो
जमींदारों के लिए ही वर्क कर रही होगी। तो
आप कहोगे सर जमींदारों को क्या दिक्कत आ
रही थी? तो जमींदारों को क्या हुआ था? जो
लैंड रेवेन्यू सिस्टम बनाए गए थे तो उसमें
आपको याद होगा एक सूर्यस्त कानून पढ़ा था
हम लोगों ने। ठीक है? सनसेट लॉ हमने उसमें
पढ़ा था। तो कई बार जमींदारों से जमीनों
को छीना जा रहा था। उनके भी अधिकारों को
दबाया जा रहा था। तो जमींदारों ने यूनाइट
होकर के जितने भी जमींदार थे उन्होंने
एकत्रित हो के एक संगठन बनाया था और इस
संगठन का नाम था जमींदारी एसोसिएशन या
लैंड होल्डर सोसाइटी। याद रखिएगा जमींदारी
संगठन का हेड क्वार्टर या इसको बनाया
कोलकाता वाले इलाके में गया था। द्वारकाना
टैगोर ने यहां पर प्रमुख भूमिका निभाई थी
और ये जमींदारों के हितों की रक्षा करता
था। उससे भी बड़ी बात यह है कि ये भारत
में पहली बार संगठित रूप से राजनीतिक
क्रियाकलाप इसने आरंभ किया था। अब यहां पर
एक शब्द आया संगठित रूप से। यहां पर एक
शब्द आया ऑर्गेनाइज्ड। अब इससे पहले क्या
था? तो इससे पहले जो हमने बंग भंग बंग
भाषा प्रकाशक सभा की बात की और उससे भी
पहले हमने कोलकाता यूनिटेरियन सोसाइटी की
बात की। तो इन्होंने क्या नहीं किया?
इन्होंने संगठन नहीं बनाया। इन्होंने
ऑर्गेनाइजेशन नहीं बनाया। सर संगठन का
मतलब क्या होता है? संगठन का मतलब ये होता
है लोगों को जोड़ना उस संगठन से। आप एक
बहुत बड़ा ऑर्गेनाइजेशन बना लिए। जैसे आज
भारत में पॉलिटिकल पार्टियां हैं तो इनके
बड़े-बड़े संगठन है। इनका बड़ा-बड़ा
ऑर्गेनाइजेशन है। पर ऐसा काम उन दोनों ने
नहीं किया। ऐसा काम करेगी लैंड होल्डर
सोसाइटी जमींदारी एसोसिएशन। और जमींदारी
एसोसिएशन भारत में पहली बार संगठित रूप से
राजनीतिक क्रियाकलापों को आरंभ करेगी।
ऑर्गेनाइज्ड होकर इंडिया में पॉलिटिकल
एक्टिविटी को स्टार्ट करेगी जिसको
द्वारकानाथ टैगोर और दूसरे लोगों के
द्वारा स्थापित किया गया था। अगली जो सभा
है वो ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन है।
कंफ्यूज नहीं होना है मेरे दोस्त। देखो ये
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन है। इंडियन
एसोसिएशन अलग है। इट इज ब्रिटिश इंडियन
एसोसिएशन। ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन इसे
1851 में कोलकाता में इसे भी स्थापित किया
गया था। चार संस्थाएं चारों कोलकाता में
देखो एक चीज यहीं पर याद हो जाएगी कोलकाता
यूनिटेरियन राजा राममोहन राय वाली कोलकाता
में है बंग भाषा प्रकाशक सभा कोलकाता में
राजा राममोहन राय लैंड होल्डर सोसाइटी
कोलकाता में है द्वारकानाथ टैगोर और इसके
बाद ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन ये भी
कोलकाता में है और बेसिकली होगा ये कि
लैंड होल्डर सोसाइटी को ही आगे जाकर के
ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन के नाम से जाना
जाएगा। कैसे बनेगी? तो दोस्तों दो अलग-अलग
सोसाइटी थी। एक का नाम था लैंड होल्डर
सोसाइटी। हमने यहां पर देख लिया और दूसरा
था बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी। इन
दोनों का मर्जर हो गया। लैंड होल्डर
सोसाइटी और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी
का मर्जर हो गया। और इन दोनों के मर्जर से
जो नई सोसाइटी बनी या जो नया पॉलिटिकल
ऑर्गेनाइजेशन बना उसका नाम रखा गया
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन 1851 में। और
इसमें दो लोगों की भूमिका सबसे ज्यादा थी।
एक द्वारिकाना टैगोर और दूसरे थे राधाकांत
देव। द्वारकानाथ टैगोर और राधाकांत देव।
राधाकांत देव के बारे में आपको याद आ रहा
होगा। राधाकांत देव ने धर्म सभा की
स्थापना की थी और ये वही व्यक्ति हैं
जिन्होंने सती प्रथा का समर्थन किया था।
और उन्होंने जो सती के अबवॉलिशन के लिए जो
कानून आया था, सती प्रथा को समाप्त करने
के लिए जो कानून आया था, उसका इन्होंने
विरोध किया था। तो याद रखेंगे दोस्तों
लैंड होल्डर सोसाइटी लैंड होल्डर सोसाइटी
और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी मिलकर के
ही क्या बनाएंगी ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन
बनाएंगी याद रखिएगा इंडियन एसोसिएशन अलग
है ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन अलग है कितने
संस्थान हो गए टोटल चार हो गए भैया एक दो
तीन और चार संस्थान हो गए आओ आगे बढ़ते
हैं खत्म करते हैं क्लास को दो-तीन पॉइंट
और इसके बाद अगला है लंदन इंडियन एसोसिएशन
सोसाइटी और एक है ईस्ट इंडिया एसोसिएशन।
तो ये दोनों याद रखिएगा प्रीलिम्स में
पूछे गए हैं। लंदन इंडियन सोसाइटी और ईस्ट
इंडिया एसोसिएशन इन दोनों को ही लंदन में
एस्टैब्लिश किया गया था भारत के बाहर और
दोनों को ही दादा भाई नौरोजी के द्वारा
स्थापित किया गया था। तो दादा भाई नौरोजी
ने भारत में संस्थानों की स्थापना की थी।
कांग्रेस के फाउंडिंग मेंबर में से एक रहे
हैं। लेकिन भारत से बाहर जाकर के भी
इन्होंने कई संस्थानों की स्थापना की थी।
और यह भी आपको याद रखना है। दादा भाई
नौरोजी ब्रिटिश पार्लियामेंट में चुनाव
जीते थे। और ये फिसबेरी से चुनाव जीत के
ब्रिटिश पार्लियामेंट गए थे। ये भी हम
लोगों ने पहले पढ़ा हुआ है। जब हम दादा
भाई नौरोजी के बारे में बात कर रहे थे। तो
दादा भाई नौरोजी ने लंदन में दो संस्थान
बनाए थे। दोनों का नाम आपको याद रखना है।
लंदन में दो इंस्टीट्यूशन इन्होंने बनाए
थे। एक है लंदन इंडियन एसोसिएशन, लंदन
इंडियन एसोसिएशन और दूसरा आपका है ईस्ट
इंडिया एसोसिएशन। तो देखिए कंफ्यूज नहीं
होंगे। ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन कोलकाता
है जो जमींदारों के हितों के लिए काम कर
रही है। लंदन इंडियन एसोसिएशन और ईस्ट
इंडिया एसोसिएशन ये दोनों लंदन में
स्थापित की गई हैं और ये दोनों दादा भाई
नौरोजी के द्वारा स्थापित की गई है।
छोटा-छोटा कंफ्यूजन नाम को लेकर के हो
जाता है। इस कंफ्यूजन से हमें यहां पर
बचना है। चलिए आगे बढ़ते हैं अगले पार्ट
पर। अगला यहां पर दिया गया है इंडियन
एसोसिएशन। इसको तो यह हम बोलते हैं ना
अपनी भाषा में। ये महा इंपॉर्टेंट है मेरे
दोस्त। यह बहुत बहुत ज्यादा जरूरी है।
इसको मत भूलिएगा। इसका नाम है इंडियन
एसोसिएशन। इंडियन एसोसिएशन को भी कोलकाता
में स्थापित किया गया था। सुरेंद्रनाथ
बनर्जी और आनंद मोहन बोस के द्वारा। दो
मिनट कहानी सुनिए। सारी चीजें आपको समझ
में आएंगी। देखिए एक शिशिर कुमार घोष थे
और उन्होंने 1875 में एक इंडियन लीग की
स्थापना की थी। दो मिनट मैं आपको अच्छे से
समझा देता हूं। इस तरीके से आप समझिए।
देखिए 1875 में 1875 में शिशिर कुमार घोष
इन्होंने किसकी स्थापना की? इन्होंने
इंडिया लीग की स्थापना की। इंडिया लीग की
स्थापना की। आगे जाकर के 1876 में एक दो
व्यक्ति यहां पर आते हैं और एक का नाम था
सुरेंद्रनाथ बनर्जी और दूसरे व्यक्ति का
नाम था आनंद मोहन बोस। अब आपको दोस्तों एक
बात बता दूं कि जो सुरेंद्रनाथ बनर्जी हैं
वो एक आईसीएस ऑफिसर थे। वो एक इंडियन
सिविल सर्वेंट के ऑफिसर थे। जिन पर झूठे
आरोप लगाकर इनको बर्खास्त कर दिया गया था।
इनको डिसमिस कर दिया गया था। ओके। तो ये
सुरेंद्रनाथ बनर्जी जो है वो एक एक्स आईएस
आईआईसीएस ऑफिसर थे। इंडियन सिविल सर्वेंट
के ऑफिसर थे। जिन पर झूठे आरोप लगा के
उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। तो
सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस
इन्होंने मिलाकर के एक सभा बनाई जिस सभा
का नाम था इंडिया एसोसिएशन। क्या नाम था?
इंडिया एसोसिएशन इसका नाम था। और इन्होंने
तीन बातों के लिए कार्य किया। इंडिया
एसोसिएशन तीन चीजों पर केंद्रित थी। सबसे
पहला जो इनका आंदोलन था वो था सिविल सेवा
में आयु को लेकर के। सिविल सेवा में आयु
को लेकर के एज को लेकर के। आपको याद होगा
दोस्तों कि एक समय ऐसा आया था। जब सिविल
सेवा का परीक्षा देने का न्यूनतम आयु
मिनिमम ऐज 19 ईयर कर दिया गया था। तो
सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इंडिया एसोसिएशन के
द्वारा इसी डिमांड को बार-बार रखा, इसी
मांग को बार-बार रखा कि सिविल सेवा की
न्यूनतम आयु को बढ़ाया जाए। इसको मैक्सिमम
आगे बढ़ाया जाए। इसको आगे कर दिया जाए।
ठीक है? क्योंकि सॉरी अधिकतम आयु माफ़
कीजिए मैक्सिमम एज मैक्सिमम। मैक्सिमम एज
19 मतलब 19 के बाद आप पेपर नहीं दे सकते।
तो इस आयु को बढ़ाया जाए। इसके अलावा आपको
याद होगा एक एक्ट आया था
18 अह 1878 के आसपास एक एक्ट आया था जिसका
नाम था वर्नाकुलर प्रेस एक्ट। ठीक है? और
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के द्वारा जो भारतीय
अखबार थे जो इंडियन न्यूज़पेपर थे उनको
बैन कर दिया गया था। उन पर कई प्रकार के
प्रतिबंध लगा दिए गए थे। तो इसका विरोध भी
वो कर रहे थे। तो जो इंडिया एसोसिएशन है
ये बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट ऑर्गेनाइजेशन
है जो कि सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन
बोस के द्वारा बनाई गई थी। इसने सिविल
सेवा की आयु को बढ़ाने के लिए बहुत बड़ा
आंदोलन चलाया था और बाद में दोस्तों यही
इंडिया एसोसिएशन 1886 में 1886 में ये
मर्ज हो जाती है। किसके साथ? याद रखिएगा
ये मर्ज हो जाती है इंडियन नेशनल कांग्रेस
के साथ। ये मर्ज हो जाती है भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ। तो शिशिर
कुमार घोष ने इंडिया लीग बनाई थी। इंडिया
लीग आगे जाकर के इंडिया एसोसिएशन में
तब्दील होती है और इंडिया एसोसिएशन 1886
में 1886 में कांग्रेस के साथ मर्ज हो
जाती है और आगे कांग्रेस पर आप जानते हैं
कि एक बड़ा संगठन बनता है और बहुत सारे
आंदोलनों को ये आगे बढ़ाता है। यहां पर
कुछ जानकारी लिखी हुई है। वो ध्यान से आप
पढ़ें। इंडिया लीग के बारे में यहां लिखा
हुआ है। तो इंडियन एसोसिएशन ले लिया अनेक
ने तो सिविल सेवा परीक्षा की आयु बढ़ा आयु
सीमा ठीक है वर्नाकुलर प्रेस एक्ट
कांग्रेस में इसका विलय हो जाता है 1886
में तो दोस्तों इस प्रकार हमारी प्रमुख
संस्थान थे एक बार रिवीजन करेंगे फिर
चीजों को खत्म करेंगे सबसे पहले हमने क्या
पढ़ा तो सबसे पहले हमने कोलकाता
यूनिटेरियन सोसाइटी के बारे में पढ़ा इसको
कोलकाता में ही बनाया गया था ठीक है इसको
कोलकाता में ही बनाया गया था ठीक है?
कोलकाता वाले रीजन में ही इसको बनाया गया
था। राजा राममोहन राय साथ में रिवीजन
कीजिएगा। राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ
टैगोर और दूसरे लोगों के द्वारा इसे बनाया
गया था। दूसरा हमने डिस्कस किया बंग भाषा
प्रकाशक सभा। ठीक है? इसे भी कोलकाता वाले
रीजन में बनाया गया था। और इसे राजा
राममोहन राय के फॉलोअर्स के द्वारा बनाया
गया था। इनके नेतृत्वकर्ताओं के रूप में
इनको बनाया था। और इसमें आपको याद रखना है
कि ये बंगाल का फर्स्ट पॉलिटिकल
ऑर्गेनाइजेशन था। बंगाल की पहली राजनीतिक
संस्था का नाम इसको दिया जाता है। फिर
इसके बाद हम लोगों ने क्या डिस्कस किया?
तो आप लोगों को याद आ रहा होगा हमने लैंड
होल्डर्स सोसाइटी के बारे में बात की
जिसको जमींदारी एसोसिएशन भी कहा जाता है।
जमींदारी एसोसिएशन भी कोलकाता वाले इलाके
में बनाया गया था। ठीक है? द्वारकानाथ
टैगोर की इसमें बहुत बड़ी भूमिका थी।
द्वारकानाथ टैगोर की और इसने क्या किया
था? इसे कहा जाता है कि यह इंडिया का ये
इंडिया का फर्स्ट ऑर्गेनाइज्ड पॉलिटिकल
पार्टी इसको कहा गया था कि इसमें संगठन
किया गया था लोगों का। तो पहला संगठित
प्रयास किया गया था। बाद में आपको याद
रखना है कि एक ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन
बनाया गया। अगेन ये भी कोलकाता में ही
बनाया गया था। ठीक है? और इसमें दो लोगों
का योगदान था। एक तो राधाकांत जी का
योगदान था और दूसरा इसमें द्वारकानाथ
टैगोर का योगदान था और इन दोनों का एक ही
काम था वो काम था जमींदारों के इंटरेस्ट
को प्रोटेक्ट करना जमींदारों के हितों की
रक्षा करना ये इन दोनों का काम था और यहां
पर याद रखेंगे कि जो ब्रिटिश इंडिया
एसोसिएशन है वो बंगाल एसोसिएशन और लैंड
होल्डर सोसाइटी इन दोनों का मर्जर हो के
ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की गई
थी। फिर हमने दादा भाई नौरोजी के बारे में
बात की और दादा भाई नौरोजी ने दो संस्थान
बनाए और दोनों ही संस्थान उन्होंने लंदन
में बनाए। एक संस्थान का नाम था लंदन
इंडिया सोसाइटी और दूसरे संस्थान का नाम
क्या था दोस्तों? तो दूसरे इंस्टिट्यूशन
का नाम था ईस्ट इंडिया एसोसिएशन। ये दोनों
ही संस्थान उन्होंने लंदन में बनाए थे
अवेयरनेस को बढ़ाने के लिए। फिर हमने एक
और संस्थान की बात की। इंडिया एसोसिएशन की
हमने बात की जो कि 1876 में सुरेंद्रनाथ
बनर्जी और आनंद मोहन बोस के द्वारा बनाया
गया और ये सबसे इंपॉर्टेंट ऑर्गेनाइजेशन
रहेगा। इसे भी कोलकाता में बनाया गया था
और आगे जाकर के 1886 में कांग्रेस में
इसका विलय हो जाएगा। तो दोस्तों ये हमारे
कांग्रेस के पहले स्थापित सभी महत्वपूर्ण
संस्थान थे। एक पीपीटी आप देख सकते हैं।
इस प्रकार से मैंने पूरी एक पीपीटी तैयार
कर दी है। अब इसकी पीपीटी आपको कहां पर
मिलेगी? तो इसके लिए हमारे टेलीग्राम चैनल
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पीडीएफ। वहां भी आपको मिल जाएगी। तो दोनों
जगह आपको ये पीपीटी मिल जाएगी। एक बात और
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बताइए। कोई डाउट है दोस्तों आप लोगों के?
एनी प्रॉब्लम? ऑल गुड। सारी चीजें क्लियर
हो गई?
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10थ क्लास की एनसीईआरटी भी आने वाली है।
वो भी रेगुलर हो जाएगी। डोंट वरी यार।
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मैं यहां पर ऐड कर दूंगा। ओके ठीक है
वो हम डिस्कस कर लेंगे। ओके थैंक यू सो मच
गाइस। कल आप लोगों से फिर मिलते हैं। कल
फिर आप लोगों से मिलते हैं। प्लीज हमारे
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4:15 पर क्लास होगी। बहुत अच्छे तरीके से
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साथ दोस्तों और शाम को 6:00 बजे इंडियन
ज्योग्राफी लेकर के आ रहे हैं नूर आलम सर।
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थैंक यू सो मच गाइस। टेक केयर।
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