Koton Mein Koi, Koi Mein Bhi Koi, Mujhe Jaanenge, Pehchanenge ...kaise...??( Part 1)- BK Rini USA
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ओम
शांति। आज हम बहुत
इंपॉर्टेंट टॉपिक लेंगे। और बाबा कई बार
मुरली में कहते हैं कोटों में कोई मुझे
जानते हैं। और कोई में से भी कोई मैं जैसा
हूं वैसे मुझे पहचानते हैं। राइट? तो हम
देखेंगे कि बाबा को जानने के लिए सबसे
पहले
एक चीज बाबा कहते हैं जितना तुम अपने आप
को
जानोगे उतना तुम मुझे
पहचानोगे और या फिर जितना तुम मुझे
पहचानोगे उतना अपने आप को
जानोगे। तो पहले स्टेप में हम यह देखते
हैं कि बाबा अगर बोल रहे हैं कि जितना
तुम अपने आप को जानोगे उतना मुझे
पहचानोगे।
क्यों? क्योंकि अगर आज मैं अपने आप को एक
बॉडी माइंड मानकर जानती
हूं तो उसी आईडिया के थ्रू मैं परमात्मा
को पहचानने की कोशिश
करूंगी। राइट? और
इसीलिए अपने आप को जानना बहुत जरूरी है।
तो अपने आप को जानने के लिए बाबा हमें
कहते हैं अपने अनादि स्वरूप को जानो सबसे
पहले। और यह भी पहचानो कि अभी तुम अपने आप
को कैसे जानते हो। तो दोनों चीजें बोलते
हैं। राइट? तो अभी हमारा जो करंट अनुभव है
अपने लिए अपने प्रति वो क्या है? अगर हम
अपना करंट अनुभव देखें अपने
प्रति तो जब अगर हम देखते हैं ज्ञान में
आते हैं तो हम बहुत डिवोशनल भक्ति के
संस्कारों को लेकर आते हैं। भक्ति बहुत
ब्यूटीफुल चीज है। भक्ति का जो प्यार होता
है वो बहुत ब्यूटीफुल चीज है। है ना? पर
उसमें एज अ पर्सन एज अ एज अ बॉडी एंड अ
माइंड मैं परमात्मा को अपने आप से एक दूर
ऑब्जेक्ट के रूप में पूजती हूं। राइट? और
परमात्मा मुझसे बहुत दूर है। मुझसे बहुत
ऊंचा है और मैं नीची हूं। इस भाव से हम
परमात्मा
को पूजते हैं भक्ति में। राइट? और वो
डिवोशनल संस्कार जो होते हैं भक्ति के
संस्कार एक चीज भक्त के लिए भक्ति के
संस्कार के
लिए बहुत मुश्किल होती है और वो क्या
है पता है
आपको वो है अपने भक्ति के ऑब्जेक्ट को
छोड़ना राइट तो आज जो भक्ति का
ऑब्जेक्ट पहले कोई मूर्ति हुआ करती थी।
ज्ञान में आने के बाद एक इमेज हो जाती है
भक्ति का ऑब्जेक्ट। है ना? तो अभी भी जैसे
हम ज्ञान लेना शुरू करते हैं
तो कुछ माइंड्स हैं जो एक झाटू
में
अपने जैसे कि वो माइंड जो पुराना
संस्कारों का पैकेज
है वो एक झाटू में खत्म हो जाता है।
मर्जीवा जैसे ब्रह्मा बाबा वह माइंड जिसको
हम ब्रह्मा बाबा बोलते हैं वह माइंड एक
झाटू में सरेंडर टू गॉड राइट जिसमें अब
परमात्मा ही करण करावनहार रहा उस माइंड का
कोई ओनर ही नहीं रहा राइट अब परमात्मा ही
ओनर उस माइंड का चलाने वाला ऐसे मेजॉरिटी
में नहीं होता है
क्योंकि मेजॉरिटी माइंड्स को अभी भी आज
चलाने आने वाला एक सेपरेट माइंड बॉडी का
थॉट है। राइट? एक जैसे मैं एक थिंकर और
डअर हूं। तो वो चलाने वाला एक जो
आइडेंटिटी है थिंकर और डअर की वो माइंड को
चलाती है। राइट? और वो भी एक बहुत
स्ट्रांग भक्ति का संस्कार है। पर
परमात्मा कहते हैं अच्छा ठीक है। तुम
डिसाइड करो दोनों में से तुम अपने आप को
कहां देखते हो? एक झाटू में सरेंडर
परमात्मा रिस्पांसिबल है अब माइंड के लिए।
अच्छे और बुरे संस्कारों का जो पैकेज
है जो भी है परमात्मा का बोझ है। अब मैं
कुछ भी नहीं परमात्मा ही चला रहा है तो
फिर परमात्मा के संस्कार उस माइंड को
चलाएंगे। राइट? दैट इज वन थिंग। और एक और
यह भी है कि अगर मान लीजिए अभी भी यह लगता
है कि नहीं मुझे मैं तो हूं कुछ मैं अलग
हूं तो और परमात्मा मुझसे थोड़ा दूरी पर
है डिस्टेंस पर है। अगर यह फीलिंग भी है
दैट्स ओके मैं तुमको वहां मिलूंगा जहां पर
तुम अपने आप को समझते हो। हे मन है ना? तो
बाबा जैसे कि मन से बोलते हैं कि तुम अपने
आप को समझते हो तुम मुझसे दूरी पर है। तो
मैं भी तुमको बोलता हूं मैं बहुत दूर से
आता हूं।
राइट? क्यों बोलते हैं बाबा इस मन को कि
मैं बहुत दूर से आता हूं। क्योंकि बाबा उस
माइंड को
वहां मीट करना चाहते हैं। वहां मिलना
चाहते हैं जहां पर वह आज है। क्योंकि नहीं
तो उसके लिए परमात्मा सदैव दूरी पर ही
रहेगा। तो वह जो डिस्टेंस है, दूरी है
परमात्मा और मन के बीच में उस दूरी को
खत्म करने के लिए बाबा जहां पर भी मन अपने
आप को समझता है, उस आधार पर उस मन से
मिलते हैं।
राइट? तो कोई मन समझ कर चल रहा है। मैं
अभी सेपरेट पर्सन हूं। बहुत दूर हूं
परमात्मा
से। इस दुनिया में रहता हूं। तो बाबा
बोलते हैं अच्छा ठीक है। मैं भी बहुत दूर
देश से आया हूं। हम अब यह पोएटिक वे है
बोलने का। इसको लिटरली नहीं लेना है। कई
बार क्या होता है हम जो पोएटिक वे होता है
लेने का उसको लिटरली ले लेते हैं और जो
लिटरल लेना चाहिए उसको पोएटिकली ले लेते
हैं। वो भी हम देखेंगे। है ना? तो जैसे कि
तो बाबा हमें बोलते हैं कि
[संगीत]
तुम अब मैं तुम्हारे पास आ गया हूं। हे मन
है ना। तो अब तुम जितना
मेरी नजर से अपने आप को
देखोगे तो तुम्हारा अपना सेंस ऑफ सेपरेशन
डिॉल्व होता जाएगा। राइट? तो यह एक बहुत
ब्यूटीफुल मुरली का पैसेज है जो मैं पढ़ना
चाहूंगी क्योंकि इसमें बाबा हमें यह बताते
हैं माइंड को
कि तुम कैसे अपने उस निराकार सत्य को जान
सकते हो। यह है फर्स्ट जनवरी 23 की मुरली।
इसमें बाबा ने कहा है अहंकार आने का
दरवाजा एक शब्द है। वह कौन सा? मैं। तो यह
अभ्यास करो। जब भी मैं शब्द आता है तो
ओरिजिनल स्वरूप सामने लाओ। मैं कौन? मैं
आत्मा या फलाना फलानी। औरों को ज्ञान देते
हो ना? मैं शब्द उड़ाने वाला है। मैं शब्द
नीचे लाने वाला
है। तो मैं कहने से ओरिजिनल निराकार
स्वरूप याद आ जाए। यह नेचुरल हो जाए।
राइट? तो अनेक बार मैं शब्द यूज़ करते हो।
सारे दिन में 25 बार तो जरूर करते हो।
बोलते नहीं तो सोचते तो होंगे। मैं यह
करूंगी, मुझे यह करना है। है ना? तो जितनी
बार मैं शब्द यूज करते हो सोचते हो तो
उतनी बार यह ध्यान रखो कि आत्मा स्वरूप की
स्मृति
निराकारी निराकारी
ओरिजिनल निराकार स्वरूप याद आ जाए। है ना?
तो इसलिए अपने आप को जानना बहुत जरूरी है।
तो जब हम बोलते हैं मैं मैं कौन?
तो मुझे यह याद है
कि जब बाबा के
साथ पहली बार बाबा का जब यह बहुत गहरा
इंट्रोडक्शन और साथ महसूस हुआ तो सबसे
पहले बाबा ने जैसे यही एक इंट्रोडक्शन
दिया जो मैं तुम हो वो मैं निराकारी मैं
है और निराकारी मतलब
क्या जिसका कोई आकार आकार
नहीं है ना तो जब कोई आकार नहीं तो
बिगिनिंग और एंड भी नहीं मतलब आदि और अंत
भी
नहीं अगर आदि और अंत नहीं तो फिर कोई हद
भी
नहीं क्योंकि हद है मतलब कोई तो शुरुआत और
अंत होगी तब हद होगी राइट जब शुरुआत और
अंत ही नहीं तुम्हारा तुम अपने अनादि
स्वरूप निराकार सत्य को जानो तो आदि और
अंत नहीं हम इसको प्रैक्टिकली भी देखेंगे
अभी और लिमिट नहीं हद
नहीं तो
फिर तुम किस में आओगे और
जाओगे हद होगी तो यहां से वहां तक भी आओगे
और जाओगे कमिंग एंड गोइंग होगा राइट पर जब
कोई हद ही नहीं
सीमा ही नहीं बेहद की हद और बेहद से भी
पार इनफ तो तुम्हारा अपना वह सत्य जब
तुमने जाना तो तुम किस स्पेस भी नहीं है
तो स्पेस में तो जैसे ये ऑब्जेक्ट है है
ना इसकी एक हद है। ये यहां शुरू होती है।
यहां खत्म होती है या यहां शुरू होती है।
यहां खत्म होती है। राइट? इसकी डेप्थ है,
इसकी विड्थ है। इसकी लेंथ है। तो इसकी हद
है। इसकी एक बाउंड्री है। तो ये यहां से
यहां जा सकती है। राइट? पर जिस चीज की कोई
आकार ही नहीं है। इसका तो आकार भी है।
राइट? चीज है। आकार है। हम रिलेटिवली
समझने की कोशिश कर रहे हैं। पर जिस चीज का
कोई आकार ही नहीं।
तो अब जिसका कोई आकार ही नहीं है। अब हम
उसका मिसाल देते हैं स्पेस का। है ना? अब
स्पेस का कोई आकार नहीं है। तो हम कहां
बोलेंगे स्पेस कहां खत्म होती है, कहां
शुरू होती है? हम बोल ही नहीं सकते। है
ना? क्योंकि वो बे हद और बेहद से पार। ये
मिसाल है। हम ये नहीं बोल रहे हैं कि हम
स्पेस हैं। हम मिसाल दे रहे हैं। है ना?
तो मिसाल के तौर पर कोई शुरुआत और अंत
नहीं क्योंकि कोई आकार नहीं। तो बाबा हमें
बोल रहे हैं तुम निराकार हो। तो जब कोई
आकार नहीं तो जितनी बार मैं शब्द बोलते हो
वो मैं शब्द पॉइंट कर रहा है निराकार की
तरफ। पॉइंटर है मैं शब्द। तो जितनी बार
तुम सोचते हो और बोलते हो मैं शब्द। तो
याद है जैसे अभी भी कभी भी कोई बुलाता है
ना री आप प्लीज इधर आएंगे आपका यह कुछ काम
है तो जैसे ही वो नाम बोलते हैं
ऋणी मन क्या करता है सीधा बाबा की तरफ
देखता है क्योंकि मन तो नाम और रूप का
आकार है अगर उस भाव में मैंने सुना मैं
ऋणी और फिर हां मैंने उस सुनकर उसको जवाब
भी दे
दिया तो फिर सीधा मैं आकारी बन बन गई और
टाइम स्पेस में आ गई। राइट? और सामने वाले
को भी आकार देखा और टाइम स्पेस बॉडी माइंड
का आकार देखा और टाइम स्पेस में एक
ऑब्जेक्ट की तरह जैसे ये बॉटल एक आकार
टाइम स्पेस में ऑब्जेक्ट की तरह देखा। पर
जैसे ही उन्होंने बुलाया री आप प्लीज इधर
आएंगे। किसी ने भी
बुलाया तो अंदर निराकारी हूं। यह मैं कौन
जिसको
कोई बुला भी रहा है। मान लीजिए भाषा में
हम बोलते हैं जो बुला रहा है वह भी
निराकारी। जो जो जिसको बुलाया जा रहा है
वो भी
निराकारी। है ना? ऑफिस में भी हो सकता है।
बॉस बुला रहा है। फोन पर कुछ कह रहा है।
फोन उठाने से पहले भी किसी से बात करने से
पहले भी। मैं कौन? एकदम निराकारी। तो जैसे
ही निराकारी शब्द आता है
इस माइंड के लिए देखा है इसने एकदम
डिजॉल्व हो जाता है परमात्मा
में है ना सारी कहानियां डिॉल्व हो जाती
है टाइम स्पेस डिॉल्व हो जाता है और यह
बॉडी माइंड की जो हदें हैं यह भी डिॉल्व
हो जाती है क्योंकि एकदम स्पेस लाइक मिसाल
है यह मैं स्पेस नहीं हूं पर स्पेस लाइक
बीइंग की भावना जागृत होती है तो मान
लीजिए बुलाया उन्होंने
और मन में फीलिंग्स आई, थॉट्स आई है ना?
क्योंकि आकारी थॉट्स हदें आएंगी। थॉट्स
हैं जिनकी हद होती है। थॉट्स की बिगिनिंग
और एंड होती है। फीलिंग्स की बिगिनिंग और
एंड होती है। इसीलिए वो आकार
हैं। कर्मेंद्रियों का अनुभव साइट, साउंड,
टेस्ट, टच, स्मेल इनका आकार होता है।
आंखें बंद
की तो साइट का अनुभव खत्म। आंखें खोली तो
साइट का अनुभव शुरू। राइट? तो इनका आकार
है। बिगिनिंग और एंड है। आदि और अंत है।
तो यह सब आकार है। राइट? तो हम जब देखते
हैं कि बाबा ने कहा निराकार सत्य को जानो।
तो निराकार सत्य तो फिर एवर प्रेजेंट है
क्योंकि वो जाएगा आएगा कहां? वो कोई स्पेस
में तो चीज नहीं है जो कहीं स्पेस में
यहां से वहां जाएगी। है ना? तो पता चला
कि एवर प्रेजेंट हूं मैं। वह मैं कहीं आती
जाती नहीं। और यह जो मैं है
यह अनादि मैं
है। अनादि मतलब इस अनादि में कोई सेंस ऑफ
सेपरेशन नहीं है। इसीलिए अपने आप को जितना
मैं जानूंगी अनादि स्वरूप में उतना मैं
परमात्मा को भी अनादि स्वरूप में जानूंगी।
तो पता चलेगा कितने अनादि हो सकते हैं। दो
या एक ही अनादि हो सकता है। एक परमात्मा
ही अनादि है। और जो मैं अनादि हूं वो मैं
अनादि मतलब उसकी एक्टिविटी हूं। परमात्मा
की एक्टिविटी हूं। शिव की शक्ति हूं। शिव
का मूवमेंट हूं। शिव स्टिलनेस है, शिव
साइलेंस है। इसीलिए वह पावर हाउस है। और
यह जो माइंड और आत्मा एक ही तरीके से हम
यूज़ कर रहे हैं दोनों शब्दों को क्योंकि
आत्मा जब हम बोलते हैं उसका मीनिंग क्लियर
होना जरूरी है। आत्मा मतलब निराकारी,
आकारी और साकारी मन तीनों मनों को
मिलाकर आत्मा शब्द यूज़ किया जाता है।
इसलिए आत्मा रूपी
बैटरी आत्मा एक बैटरी की तरह है। है ना?
आत्मा परमात्मा की मूवमेंट है। आत्मा
परमात्मा की शक्ति शिव की शक्ति है। बैटरी
की तरह। राइट? उसका अपना कोई अलग अस्तित्व
नहीं है। राइट? तो परमात्मा ही इस आत्मा
रूपी बैटरी को चलाता
है। यह बहुत इंपॉर्टेंट है इस चीज को
समझना। और यह समझना क्यों जरूरी है?
क्योंकि जब बाबा से पहचान मिलती है ना तो
जैसे हमने कहा निराकारी आकारी और साकारी
माइंड। राइट? मिलाकर आत्मा बनता है। राइट?
गुड और बैड संस्कार सुख और दुख के संस्कार
मिलकर उसको शब्द आत्मा दिया है। आत्मा
शब्द में नहीं फंसना है। जैसे गॉड शब्द
में भी नहीं फंसना है। आईडिया में नहीं
जाना है। ना आत्मा के आईडिया में जाना है
ना गॉड के आईडिया में जाना है। राइट? तो
जैसे ही बाबा की
पहचान जैसे ही इस माइंड को मिली तो ऐसी
फीलिंग आई कि मैं इंप्योर हो ही नहीं
सकती। क्यों? क्योंकि जो प्योरिटी ऑफ़
माइंड है वो पहले बाबा ने जैसे माइंड को
निराकारी माइंड को साकारी माइंड से डिटच
किया। तब पता चला कि निराकारी माइंड
साकारी माइंड संस्कार साकारी संस्कार
स्थूल संस्कारों
से
बिल्कुल एकदम अलग अगर खड़ा होकर देखे बाबा
के साथ निराकारी
माइंड निराकारी माइंड जैसे बाबा में
डिजोल्व हो गया तो अब बाबा ही जैसे उन
साकारी संस्कारों को देखकर बिल्कुल अपने
अंदर समा लेता है। अब उस उन साकारी
संस्कारों का उन मनुष्यता के संस्कारों का
कोई ओनर नहीं है। पर यह मनुष्यता के
संस्कार सामने आएंगे। और सबसे पहले
मनुष्यता के संस्कार क्या होते हैं? मुझे
लोग चाहिए आसपास मेरी खुशी के लिए।
लोग मुझे पसंद नहीं करेंगे तो मैं अपने आप
को कैसे पसंद करूंगी? है ना? लोक लाज का
भय। तो बाबा यह कहते हैं कि हे मन हे
आत्मा मतलब हे मन हम सिनोनिमसली यूज़ कर
रहे हैं दोनों शब्द कि हे
मन सब कुछ तुम मुझे दे दो।
तो यह मन साकारी मन जो थॉट्स है ना यह
थॉट्स आते हैं। साकारी थॉट्स आते हैं। यह
साकारी थॉट्स ही साकारी मन है। साकारी
संस्कार के आधार पर साकारी थॉट्स और
साकारी फीलिंग्स आती हैं। और यही साकारी
दुनिया मन में क्रिएट भी करते हैं। राइट?
तो बाबा कहते हैं ये तीसरे तरह का परवाना
है। तीन तरह के परवाने भी होते हैं। राइट?
तो बाबा बोलते हैं तीसरी तरह के परवाना जो
सुनता भी है। पहला परवाना तो बिल्कुल
क्षमा ही बन जाता है। क्षमा में जल जाता
है और क्षमा ही बन जाता है। दूसरा परवाना
क्षमा के आसपास घूमता है। और तीसरा परवाना
बाबा बोलते हैं इस मुरली में बाबा ने कहा
है क्षमा को देख आकर्षित भी होते हैं,
सोचते भी हैं लेकिन दुविधा के चक्कर में
रहते हैं। दोप नाम में पांव रखते हैं।
राइट। अब दो नाम में पांव रखते हैं। मतलब
क्या कि
उनको यह साकारी संकल्पों की दुनिया भी
नहीं छोड़नी। क्योंकि वो बना हुआ ही
साकारी संकल्पों से है तो वो मरना नहीं
चाहता। पर उसको पता है सुख उससे मिलना
नहीं है। सुख मिल भी नहीं सकता इन साकारी
संकल्पों की दुनिया से और ना ही
साकारी मन की दुनिया से। सुख मिल नहीं
सकता। इसलिए परमात्मा भी चाहिए पर साकारी
मन की दुनिया को भी नहीं छोड़ना। वो दोनों
पांव में नाव रखना चाहता है ना। है ना? तो
बाबा उसको धीरे-धीरे अपनी तरफ जैसे
अट्रैक्ट करते हैं। है ना? क्योंकि उसको
लगता है अरे कहीं मेरा एंबिशन खत्म नहीं
हो
जाए। कहीं मेरे फ्रेंड्स मुझे डिसअ्रूव
मेरा मुझे फ्रेंड्स छोड़ नहीं दें।
सन्यासी बोलेंगे मुझे। मुझे सोचेंगे कि
मैं तो बिल्कुल अलग हो गई हूं। मुझे मेरी
फैमिली का अप्रूवल नहीं मिलेगा। तो मैं
गुड गर्ल या बैड बॉय बैड गर्ल बैड बॉय की
इमेज ना मिल जाए गुड बॉय या गुड गर्ल की
जगह पर। है ना? तो बाबा कहते हैं कि जितने
भी थॉट्स आ रहे हैं, जितने भी फीलिंग्स आ
रही हैं, जितनी भी इमोशंस आ रहे हैं, आने
दो, आने दो। कोई प्रॉब्लम नहीं। ये बाबा
जज नहीं कर रहा है तुमको आने दो ये थॉट्स
हे मन आने दो ये
थॉट्स तो हम जैसे ये मन का अभी तक ओनर जो
होता है सेपरेट आइडेंटिटी वो इंटरेक्शंस
में आता है वो ये सोचता मैं क्या बोलूं
सामने वाला कुछ बोल रहा है कंफ्यूजन में
होता है बहुत कुछ होता है यह सारा कुछ
आएगा हां तो उसमें अगर दोनों नाम में पांव
नहीं रखकर
सिर्फ इस एक निराकारी मैं को याद रखा उस
वक्त और यह याद नहीं है। मेमोरी वाली याद
नहीं है। ये वो ये वो समझ है कि आकारी
संकल्प आ रहे हैं। अरे अब मैं क्या बोलूं?
वो क्या
सोचेंगे?
और इस तरह के भी बहुत तरह के ये भी थॉट्स
आते हैं। बाबा मेरा बच्चा है। पर यह अभी
तक मेरी बेटी है। बाबा मेरा पति है। पर
हां, यह भी अभी मेरा पति है। यह सब
फीलिंग्स, थॉट्स, इमोशंस आएंगे। बाबा कहते
हैं मन को आने दे। सब मेरे पास आने दे। सब
मुझे मुझे दे दे सारा बोझ। हे मन तू मुझ
में डूब जा। तू समा जा मुझ में। मैं तेरे
लिए सोचूंगा। तू अपना सोच बंद कर। तू थिंक
कर मर
जा। बाबा इस तरीके से बोलता है मन को। मैं
के आगे जो भी फीलिंग्स, थॉट्स, इमोशंस आ
रही है उन आकारों को हे निराकारी मैं हे
निराकारी मन, निराकारी मैं इन आकारों से,
संकल्पों के आकारों से, फीलिंग्स के
आकारों से मत जुड़। देख जैसे यह क्रिस्टल
है। क्रिस्टल में कैसे वह सारे आसपास के
रंगों को अपने अंदर दिखाता भी है। ऐसे
लगता है कि यह रंग जैसे मेरे ही रंग हैं।
पर क्रिस्टल पे कोई रंग चढ़ता नहीं
है। तो तू अपने आप को हे निराकारी
मैं ये संकल्पों की कहानियों से मिक्स मत
कर। फीलिंग्स की और कर्मेंद्रियों की
कहानियों से मिक्स मत कर। अपने उस सत्य को
देख जो इन संकल्पों की फीलिंग्स की
कहानियों से पहले का सत्य है। परे का नहीं
पहले का सत्य है। राइट? तो संकल्प आता है
मैं दुखी हूं। या मैं बोल रहा हूं या मैं
क्या बोलूं? मैं कैसे सोचूं? मैं
कंफ्यूज्ड हूं। मैं डाउट में हूं।
ठीक है। यह जो निराकारी में है, इन आकारों
के रंगों को अपने अंदर अपना रंग मत समझ।
लग रहा है कि हां मैं ये रंग मेरे ही लग
रहे हैं। क्रिस्टल के अंदर वो रंग कितने
ऐसे लगते हैं कि क्रिस्टल का ही रंग है
जैसे कोई। पर ये क्रिस्टल को कुछ रंग लगा
नहीं है। फिर बाबा जैसे उस वक्त अंदर ही
अंदर बाबा के साथ रिश्ता जोड़ हे मन। और
बाबा से बातें शुरू कर। यह चिंता मत कर
मैं क्या बोलूंगा तू यह देख बाबा बोलेगा
और तू बस बाबा के साथ अगर विजुअल भी हेल्प
करता है शुरू शुरू में तो बाबा के साथ
बिल्कुल दो सितारे के रूप में देख ये
फर्स्ट बिगिनिंग स्टेज में नो प्रॉब्लम टू
स्टार्स बिगिनिंग में देख कहां पे ऊपर
नीचे नहीं जस्ट राइट बिफोर थॉट्स राइट
बिफोर फीलिंग्स राइट बिफोर
कर्मेंद्र्रियों के अनुभव जैसे कि
टाइम स्पेस से परे राइट
हियर यह टाइम स्पेस की दुनिया है। माइंड
की बनी हुई दुनिया है। ये संकल्पों की बनी
हुई दुनिया है ये। तो संकल्प से पहले अपने
आप को पॉइंट के रूप में देख और यह देख कि
क्या तू जो एक पॉइंट है क्या तेरी और मेरे
साथ है तू मन मेरे अंदर डूबा हुआ है। मैं
ही बस एक पॉइंट हूं। तो दूसरा पॉइंट भी
जैसे कि धीरे-धीरे खत्म। मैं ही एक पॉइंट
हूं। अब मुझे बता कोई भी संकल्प की हद अगर
दुखी मैं दुखी हुई। दुखी हूं का रंग तूने
अपने अंदर नहीं
भरा। संकल्पों के अलग-अलग वेदर
आएंगे। पर वेदर को कंट्रोल करने की कोशिश
नहीं कर। अपने आप को
आसमान समझ नीला आसमान। अपने आप को वो
क्लियर क्लीन क्रिस्टल के रूप में जान।
तो उसके लिए बाबा ने कहा
कि मन को कहते हैं बाबा कि सबसे पहले एक
चीज जान
ले। तीन फार्मूला देते हैं जैसे बाबा।
पहला
फार्मूला हे मन ब्लेम गेम खेलना बंद करो।
ड्रामा निर्दोष है। किसी भी संकल्प का कोई
दोष नहीं। किसी भी फीलिंग का कोई दोष
नहीं। किसी भी कर्मेंद्रियों का, इमेज का,
मेमोरी का कोई दोष नहीं। कोई संस्कारों का
कोई दोष नहीं। तुम अपने संस्कारों से पहले
हे मन तुम ये संस्कारों से बने हुए हो।
साक्षी बिल्कुल परमात्मा के साथ समा जाओ।
तो जैसे परमात्मा ही देख रहा है संस्कारों
को और कोई देखने वाला नहीं है। तो
इंटरेक्शंस आपके लिए एक दुआ बन बनते जाते
हैं क्योंकि ब्लेम गेम नहीं है। सिर्फ
अपनी चेकिंग के
लिए माइंड किस हद तक मरा है। पुराने
संस्कारों से उस चेकिंग के लिए हर एक
इंटरेक्शन में आते हैं कि बाबा किस हद तक
माइंड को यूज कर पा रहा है। बाबा ही चला
रहा है। बाबा ही सोच रहा है। उस उस भाव से
हर इंटरेक्शन में हर
एक सिचुएशन में एंटर करते हैं। जैसे एंटर
और एग्जिट माइंड की भाषा में। पर जैसे कि
एवर प्रेजेंट बाबा जो है वो माइंड को चला
रहे हैं। है ना? तो परमात्मा का लव
ऑटोमेटिकली माइंड को हील करने लगता है।
राइट? परमात्मा का प्यार ऑटोमेटिकली माइंड
को भी निराकारी साकारी माइंड से निराकारी
माइंड की तरफ ले जाता
है। राइट? तो यह बहुत ब्यूटीफुल है।
इसीलिए एक ही चीज है लोकलाज का जो डर है
सरेंडर। है ना? ये जो दूसरों की अप्रूवल
मांगने वाला संस्कार है ये भी है ना? जैसे
कि परमात्मा से मिल रही है ना अप्रूवल
माइंड को हाईएस्ट अप्रूवल परमात्मा ही
बेस्ट फ्रेंड
है माइंड का है ना क्योंकि आज माइंड को
चलाने वाला इमेजिनरी थिंकर और इमेजिनरी
डअर
है। और वह इमेजिनरी थिंकर और इमेजिनरी डअर
जैसे-जैसे परमात्मा मन को चलाता है, वह
डिॉल्व होता जाता है। है ना? तो शिव की
शक्ति रियलाइज होने लगता है कि मैं अपना
अलग अस्तित्व नहीं है। मैं सिर्फ शिव जो
कि पावर हाउस है। कास्टेंट स्टिलनेस और
कॉन्सेंट साइलेंस शिव खुद है। और वो चला
रहा है। है ना? और उसकी यह जो बैटरी है
आत्मा रूपी बैटरी या मन रूपी बैटरी जो भी
आपको शब्द यूज करना है हम एक ही तरीके से
यूज कर रहे हैं वो मूवमेंट है वो
एक्टिविटी है शिव
की राइट और वो बाबा के पावर से चलती है
परमात्मा का पावर चलाता है उसको परमात्मा
का प्यार चलाता है कैसे
थिंकर और डअर को खत्म करके अभी हम नेक्स्ट
सेशन में देखेंगे
कैसे होता है यह? है ना? तो आज हमने हमने
यह देखा कि आपके पास दो तरीके हैं। एक
होता है अपने निराकार मैं को जानकर माइंड
और बॉडी को अपने सत्य से रिअलाइन करना।
निराकार सत्य मतलब
संकल्पों
सेंसेशंस और कर्मेंद्रियों से पहले का
सत्य। जिससे मुझे यह पता चलता है कि मैं
किसी संकल्प से नहीं बांधी जा सकती। ना
मेरा संकल्प कोई मुझे मेरी पहचान बना सकता
है। तो कैसा भी संकल्प आ जाए वो मेरी
पहचान नहीं बना सकता मेरी। वो मुझे रंग
नहीं भर सकता है मुझ में। है ना? क्योंकि
मैं मैं ही
नहीं। है ना? परमात्मा ही सब कुछ है मेरे
लिए। राइट? तो एवर प्रेजेंट बाबा प्योर
बीइंग जो बाबा है बस वही ओनर है इस माइंड
का है ना तो हमें पता चलता है कि वाकई
में जब एक ही चलाने वाला
है तो फिर
धीरे-धीरे यह जो हम एक और छोटा सा एक
एग्जांपल देखेंगे बहुत ब्यूटीफुल एग्जांपल
है यह जैसे अगर आप देखेंगे यह सागर है।
सागर में यह जो अलग बूंद दिख रही है आपको
वह जैसे अपना अलग अस्तित्व बनाकर खड़ी हो
गई है। राइट? और जैसे कि यह बूंद अपना एक
नाम रूप लेकर खड़ी हो गई है। और और ऐसे कई
बूंदे आपस में मिलकर जैसे अपनी ही एक
दुनिया बना ली है उन्होंने। अलग-अलग भंवर
बना लिए हैं और सोचते हैं कि नहीं नहीं हम
तो अपने समंदर से अलग हैं। हमारी अलग
पहचान है और इस तरीके से वह सफर करती हैं।
राइट? हर भवर की अपनी एक कहानी होती
है। पैटर्न होती है। फिक्स्ड पैटर्न होती
है। तो यह फिक्स्ड बैटरी की पैटर्न है। यह
फिक्स्ड बैटरी है।
यह लिटरली हर भवर जैसे एक आत्म रूपी बैटरी
है सागर
में। राइट? और
जैसे-जैसे
भवर समुद्र में वापस खुलने लगता है और
समुद्र में मिलने लगता है, प्यार में उसके
डिॉल्व होने लगता है तो ड्रॉप जैसे-जैसे
वापस सागर
के लहर सागर के
उसमें स्टिलनेस में और साइलेंस में
क्योंकि इतनी सफर कर रही है अपने को अलग
समझकर वो ड्रॉप तो वापस वो खींचती है जैसे
कि सागर के साइलेंस से और सागर में जैसे
डूब जाती है वापस है ना अब सागर
चलाएगा उस बूंद को भी सागर चलाएगा नहीं तो
जब बूंद अपने आप को अलग समझ रही थी तो सफर
कर रही थी है ना पर जैसे ही बूंद सागर में
समा जाती है तब सागर बूंद को चलाता है
बूंद का अपना अलग अस्तित्व खत्म हो जाता
है। तब बाबा बोलते हैं तुम निराकार सत्य
को जानो। अब जो भी संकल्प आए तो यह देखो
उससे पहले मैं
कौन? असंतुष्टता का संकल्प आया। ओके। उससे
पहले मैं कौन हूं। अ उदासीपन की फीलिंग
आई। बहुत घबराहट की सेंसेशंस आई। बोर्डम
की सेंसेशंस आई। अलगपन की सेंसेशंस आई।
क्योंकि बूंद अलग समझती है ना अपने आप को
उससे पहले यहीं पर मैं
कौन? तो जैसे-जैसे आप
देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि
धीरे-धीरे एक ही चलाने वाला बाबा सागर है।
बूंद धीरे-धीरे समाती जाएगी सागर में। है
ना? और उसे पता चलेगा कि जितना मैंने अपने
आप को जाना एज निराकार अगर मैं निराकार
हूं तो ना मैं प्रकट हो सकती हूं और ना ही
मैं गायब हो सकती हूं। क्योंकि गायब और
प्रकट होने के लिए आकार
चाहिए। तो अगर मैं प्रकट नहीं हो सकती,
मैं गायब नहीं हो सकती।
मेरी कोई डायमेंशंस नहीं है। मतलब मेरी
कोई लेंथ, विड्थ, हाइट नहीं है। मेरा कोई
वेट नहीं है। मेरी कोई एज नहीं है। मेरा
कोई नाम नहीं है। मेरा कोई रूप नहीं
है। तो फिर मेरा जो अलगपन का भाव है वो
डिॉल्व हो जाता है परमात्मा में।
और फिर
परमात्मा इस मन और बॉडी को चलाता है। है
ना? और हम देखते हैं
धीरे-धीरे छोटा सा एक एग्जांपल देकर हम
फिनिश करते हैं कि कैसे यह ट्रांजिशन होता
है। तो जैसे एक मदर को पूछा गया अ कि आप
बाबा को अपना सब कुछ पार्टनर मानकर चलते
हैं। राइट? तो उन्होंने अपना अनुभव शेयर
किया कि हां पहले जब मैं बाबा को अपना
पार्टनर मानकर चलती थी तो एक बूंद मानकर
चलती थी। राइट? एज अ बूंद अपने आप को
सोचती थी कि मैं सागर का सागर मेरा
पार्टनर है। वो भी बहुत अच्छा था। क्योंकि
पहले मैं सोचती थी कि हां अगर मुझे बेटी
को स्कूल लेने जाना है। तो बाबा के बच्चे
को स्कूल लेने जा रही हूं मैं। है ना? और
वो भी बाबा का बच्चा। पर अंदर यह भी लगता
था मैं यह मैटर की बनी हुई बॉडी माइंड
हूं। वो भी मैटर की बनी हुई बॉडी माइंड
है। पूरी फुल डुअलिटी थी। द्वैधता थी। पर
फिर भी धीरे-धीरे बाबा का बच्चा है तो उस
पे गुस्सा कम आता था। उससे धीरे-धीरे
एक्सपेक्टेशंस कम होने लगी। और धीरे-धीरे
जैसे-जैसे एक्सपेक्टेशंस कम होने लगी
क्योंकि वो बाबा का बच्चा है। तो मैं उसके
ऊपर कैसे चिल्लाऊंगी? तो मैं कैसे उम्मीद
रख सकती हूं? वो मेरा बच्चा थोड़े ना है।
वो बाबा का बच्चा है। तो धीरे-धीरे जैसे
उनसे उससे मेरी एक्सपेक्टेशंस जैसे-जैसे
कम होने लगी तो डुअलिटी के बजाय पहले तो
मुझे लगता था कि मैं लेने जा रही हूं उसको
स्कूल। धीरे-धीरे ऐसे फील होने लगा बाबा
लेने जा रहा है उसको स्कूल। तो धीरे-धीरे
उसने देखा कि
डअर खत्म होने
लगा। और वो थॉट्स जो डअर क्रिएट कर रहे
थे, जो आकार क्रिएट कर रहे थे डअर का बॉडी
माइंड टाइम स्पेस उसके साथ वह डिॉल्व होने
लगे तो बूंद जैसे सागर में वापस समाने लगी
फिर उन्होंने कहा कि ऐसा फील होने लगा कि
वाकई में अब तो लगता है मैं हूं ही
नहीं बाबा ही सोचता है मेरे लिए और बाबा
ही चलाता है सब कुछ मैं डअर और थिंकरी
जैसे खत्म हो
गई ऐसा नहीं कि टाइम स्पेस के कांसेप्ट को
यूज नहीं करती
और पर यह जो मैंपन है कि मैं टाइम स्पेस
के यह निराकारी हो गया। आकारी से निराकारी
हो
गया। है ना? तो कर्म तो अभी भी ऐसे ही चल
रहा है। पर ऐसा लगता है जैसे कि
रिकॉर्डिंग चल रही है। एक और चलाने वाला
चला रहा है उस रिकॉर्डिंग
को। है ना? और करण करावनहार करा रहा है।
तो यह फीलिंग आई है उनको। तो यह बहुत
ब्यूटीफुल है कि कैसे शुरुआत में भले ही
हम डलिटी में स्टार्ट करते हैं और डलिटी
सिर्फ मैं बॉडी तुम बॉडी
नहीं यह दुनिया मैटर की बनी हुई और मैं
इसमें माइंड की बनी हुई एक पर्सन थॉट्स और
फीलिंग्स की बनी हुई ये पुतली मैटर की
दुनिया मेरे बाहर माइंड और मैटर की भी
डुअलिटी राइट धीरे-धीरे उन्होंने कहा कि
जैसे-जैसे संकल्पों से साक्षी जी संकल्प
से पहले मैं कौन? फीलिंग से पहले मैं
कौन? मैं जा रही हूं लेने इस थॉट से भी
पहले मैं
कौन? यह बाबा का बच्चा है उस थॉट से पहले
भी मैं कौन? एक्सपेक्टेशन की फीलिंग आ रही
है उसके प्रति। उससे भी पहले मैं
कौन? तो जैसे-जैसे यह देखने लगी तो जैसे
कि ये फीलिंग ऑफ़ टाइम और स्पेस भी खत्म
होने लगा।
प्रैक्टिकल पर्पस के लिए तो अभी भी यूज
करते हैं। इनफैक्ट पहले से जल्दी मैं टाइम
पर पहुंचती हूं। पहले तो फिर भी एज अ
पर्सन मैं लेजी होकर धीरे से केयरलेसनेस
में भी आ जाती थी और और लेट भी पहुंचती
थी। अब तो लिटरली क्योंकि वेस्ट थिंकिंग
वेस्ट ज्यादा चलता ही नहीं है। अब तो
ऑटोमेटिकली सब टाइम पे ही होता
है। है ना? क्योंकि वो वेस्ट वेस्ट जब
चलाते थे वो वेस्ट से ही पर्सन बना हुआ था
ना। अब क्योंकि जैसे-जैसे पर्सन मरता गया
तो वेस्ट थिंकिंग भी अपने आप कम कम कम कम
होती
गई। तो ऑटोमेटिकली बाबा चला रहा है। ऐसा
नहीं कि वेस्ट थॉट्स अभी भी नहीं आते हैं।
आते हैं। पर उससे पहले मैं कौन? तो मैं
निराकारी में निराकारी में आते ही बाबा
टेकओवर कर लेता है। राइट? क्योंकि उसमें
निराकारी में दो नहीं हो सकते। एक ही हो
सकता है। तो फिर जैसे बाबा टेकओवर कर लेता
है और बाबा बाबा जैसे रिकॉर्डिंग को चलते
रहने देता है। फिर कोई भी बीच में डअर
नहीं है। अभी भी कर्म सब हो रहे हैं पर
बीच में डअर नहीं है। पहले से बेटर हो रहे
हैं। सफरिंग नहीं है क्योंकि डअर और थिंकर
नहीं है। है ना? तो यह है निराकारी मैं का
राज समझ लेना। तो जैसे जैसे निराकारी मैं
का पता चलता है ना तो मृत्यु का भय मृत्यु
का भी भय एक मान्यता थी। वह मान्यता यह
भंवर जो आप देख रहे हैं ना लास्ट वाला
भंवर जैसे आपको एक लाइट दिख रही है यहां
पे जैसे वो बाबा की लाइट उस भंवर को अनडू
कर रही है। खोल रही है और उसको जैसे एक
स्टिल
साइलेंट सागर की तरह उसमें समा लिया है
प्यार में जैसे अपने यहां लास्ट में
देखेंगे कोई भवर ही नहीं है जैसे। जब अलग
था तो जैसे कि डेथ वर्ल्ड पूल ऑफ डेथ
बोलते हैं इसको। एक्चुअली कैलिफोर्निया
में यह एक वर्ल्ड पूल है। इसको वर्ल्ड पूल
ऑफ़ डेथ बोलते हैं। वो ब्लैक होल की तरह
जैसे बोलते हैं उसको वो जैसे सब शक कर
लेता है अपने अंदर। है ना? तो वो अपने आप
को अलगपन की भावना समझकर चलना होता है।
उसमें ऐसे ये संकल्प फीलिंग से बना हुआ
कर्मेंद्रियों से बना हुआ। पर जब बाबा
उसको टच करता है माइंड को तो वह माइंड
खुलने लगता है लाइट से बाबा की और खुलकर
जैसे सागर के प्यार में समा जाता है और
परमात्मा ही फिर उसको चलाता है। है ना? तो
यह है गॉड इज द पावर हाउस स्टिल साइलेंट
शिव एवर प्रेजेंट शिव जो कि निराकारी
मैं साकारी से साकारी संकल्पों से जब बाहर
निकलते हैं तो साकारी दुनिया मतलब साकारी
संकल्प साकारी फीलिंग्स साकारी इमोशंस
साकारी थॉट्स और साकारी देखने का तरीका
राइट राइट और बाबा जैसेजैसे मन को वर्ल्ड
पूल को इस भवर को खोलता है अपनी लाइट से
अपनी अपनी शाइन से हम धीरे-धीरे खोलते
हैं। बाबा खोलता है उसको धीरे-धीरे मन
खुलता है। बिल्कुल जैसे बाबा ही चला रहा
है। वैसे चलता है। सब कुछ अभी भी अपीयरेंस
ही है चाय पर हो रहा है।
पर अब एकदम सागर की
शांति सब कुछ चल रहा है पर एकदम शांति से
ऐसा नहीं कि तूफान नहीं भी आते तूफान आते
भी हैं पर सागर टेक ओवर कर लिया ना तो
सागर हिलता नहीं है तूफानों से तो सागर
संभालता है तूफानों को भी सागर संभालता है
सागर परमात्मा ही संभालता है सारे मूवमेंट
को सारी एक्टिविटी को राइट एंड दैट इज
ट्रू निराकारी मैं। और जब मैं निराकारी
मैं अपने आप को जान गई तो फिर परमात्मा को
भी उस नजर से देखेंगे हम। फिर परमात्मा का
निराकारी सत्य पता चलता है। इसीलिए वो
माइंड जिसको हम ब्रह्मा बोलते हैं। तीन
लास्ट शब्द थे निराकारी, निर्विकारी,
निरहंकारी।
जब तक निराकारी सत्य नहीं जाना तो
निरहंकारी और निर्विकारी पॉसिबल नहीं।
क्योंकि जब तक फॉर्म है डलिटी है। जब तक
डलिटी है मैं और तुम मैटर और
माइंड तब
तक सफरिंग
है। इसीलिए जब मैं निराकारी साकारी मैं से
निराकारी मैं की
तरफ आत्मा आती है माइंड आता है और फिर
परमात्मा टेक ओवर कर लेता है। उस माइंड को
अब दो नहीं है। अब एक परमात्मा ही है जो
चला रहा है उस माइंड को। एंड दैट इज ट्रू
जीवन मुक्ति निराकारी में। फिर परमात्मा
को जान लिया हमने। ठीक है? अभी हम थोड़ा
और डिटेल में लेंगे नेक्स्ट सेशन में। इसी
का पार्ट टू जिसमें हम देखेंगे पहले तरह
का
अ परवाना कैसा होता है। है ना? फर्स्ट
काइंड ऑफ परवाना और उसको हम लाइफ में और
कैसे जीते हैं। ठीक है जी। तो अभी हम समरी
में देखते हैं कि बूंद नहीं रहना है। सागर
में समा जाना
है। बूंद बनी हुई तो सागर से ही है। बूंद
को अगर देखेंगे तो उसमें सिर्फ सागर की ही
प्रॉपर्टीज दिखेंगी। पर क्योंकि इसने अपने
आप को अलग ऊपर समझ लिया है सागर से अलग
समझ लिया है। है ना? मैं पर्सन मैं ये
बॉडी माइंड मैं ये थॉट्स फीलिंग्स
इमोशंस तो वो सफरिंग क्रिएट करता है। पर
जैसे ही वो बूंद वापस सागर में समा जाती
है तो सफरिंग डिॉल्व हो जाती है। फिर सागर
चलाता है। है ना? तो निराकार साकार से
निराकार सत्य को जानना। तो साकारी संकल्प
साकारी फीलिंग्स सब आएंगे खत्म नहीं होंगे
एकदम से पर अपने अपने
उस मैं कौन नहीं हूं यह जानना बहुत जरूरी
है ताकि मैं कौन हूं उस सत्य को और अच्छी
तरह से जान पाऊं और उसको हम नेक्स्ट सेशन
में देखेंगे और भी गहराई में ओके जी थैंक
यू ओम शांति
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