Bharat| A patriotic Poem by Shubham Shyam
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1885 में जब स्वामी
विवेकानंद शिकागो के धर्म संसद में भारत
की पैरवी कर रहे थे तब उन्होंने बताया था
जब आप उनका स्पीच पढ़ेंगे तो आपको उनकी
स्पीच से सारांश यह समझ में आएगा कि व यह
कहना चाह रहे हैं कि हजारों साल के विदेशी
हुकूमत के बावजूद कई सालों तक मुगलों के
अधीन रहने के बाद और कई सालों तक
अंग्रेजों के अधीन रहने के बावजूद
हिंदुस्तान ने भारत ने अपनी भारतीयता बचा
के रखी है भारत के कुछ सिद्धांत थे जैसे
हम संत में हमेशा बचपन में नैतिक शिक्षा
वगैरे में पढ़ते थे सर्वे भवंति सुखना
सर्वे संतु निरामया अतिथि देवो भय तमसो मा
ज्योतिर्गमय सर्वे भवन सर्वधर्म संभा
वासुदेव कुटुंब कम ये सारे मतलब आठ 10 वो
विचार उसमें प्रेजेंट करते हैं और फिर वो
कहते हैं कि दुनिया की कोई ताकत नहीं है
जो हिंदुस्तान से उसके यह स्वभाव छीन ले
और जब तक यह स्वभाव जिंदा है तब तक आगे
चलकर उस पर बहुत बहुत प्यारा शेर लिखा
बड़े शायर ने यूनानो मिसर रोमा सब मिट गए
जहां से कुछ तो है कि हस्ती मिटती नहीं
हमारी आज जब हम आजाद हैं आजादी के 75 साल
बाद खड़े हैं और अपने देश में हर रोज हो
रहे विभाजन को देखते हैं तो सवाल उठता है
कि हमारी व वैल्यूज हमारे वो मूल्य कहां
है कविता वहीं से शुरू होती है संभालिए कि
किन मूल्यों के केंद्र में थे हम किन
मूल्यों पर आकर ठहरे किन मलयो के केंद्र
में थे हम किन मूलियो पर आकर ठहरे किन
मूलियो की छिनी आजादी किस पर डाले कितने
पहरे यह सारी बातें हमको करनी होगी
सिंहासन से यह सारी बातें हमको करनी होगी
सिंहासन से कहना होगा देश नहीं चलता है
केवल भाषण से महाराज के करनी में कथनी में
अंतर नहीं चलेगा महाराज के करनी में एंड
दिस इज नॉट प्रोजेक्टेड टू वन पर्सन एनी
वन हु हैव अ डिक्टेटोरियल बिहेवियर महाराज
के करनी में कथनी में अंतर नहीं चलेगा
मंदिर मस्जिद गिरजा घर के धर्म का मंत्र
नहीं चलेगा न्याय की देवी आंख खोलकर खड़ी
रहेगी सं
न्याय की देवी आंख खोलकर खड़ी रहेगी संसद
में धृतराष्ट्र की चुप्पी पर वो चीख
पड़ेगी संसद में कि अंधे हो जाने से
दुर्योधन के शासन बढ़ते हैं अंधे हो जाने
से दुर्योधन के शासन बढ़ते हैं उसके शह पर
पंचाली के तरफ दुशासन बढ़ते हैं राजा
अंग्रेजों की तरह आग लगाए नहीं चलेगा राजा
अंग्रेजों की तरह आग लगाए नहीं चलेगा जले
देश और नीरो जैसा राग लगाए नहीं चलेगा
राजा अंग्रेज की तरह आग लगाए नहीं चलेगा
जले देश और नीरो जैसा राग लगाए नहीं चलेगा
वो कैसा राजा जो देश की थाली में ही छेद
करे वो कैसा राजा जो देश की जनता में ही
भेद करे वो कैसा राजा जो देश की थाली में
ही छेद करे वो कैसा राजा जो देश की जनता
में ही भेद करे वो कैसा राजा जो चुप्पी
साधे देश के दंगों पर कैसा राजा वो जो
फर्क करे कब्रों के रंगों
[संगीत]
पर राजा जैसे छत्रपति राजा जैसे छत्रपति
सब धर्मों का सम्मान करें राजा जैसे
अंगराज जो भिक्षु को सब दान करें राजा हो
तो हरिश्चंद्र सा सत्य बसाओ मन में राजा
हो तो हरिश्चंद्र सा सत्य बसाओ मन में
राजा हो तो हरिश्चंद्र सा सत्य बसाओ मन
में राजा हो तो धर्मराज सा अटल रहो जीवन
में वोट के खातिर जनता को वादों से ना
भरमा है वो राजा हो तो रामचंद्र साह अपना
वचन निभाए
[प्रशंसा]
मुल्क तरक्की करके सोने की लंका हो जाए पर
मुल्क तरक्की करके सोने की लंका हो जाए पर
पाप करे रावण तो उसका अंत मेरे श्रीराम
करेंगे मुल्क तरक्की करके सोने की लंका हो
जाए पर पाप करे रावण तो उसका अंत मेरे
श्रीराम करेंगे ताकत पर इतरा करर सबको कैद
करेगा कंस मगर उसी जेल से आकर उसका अंत
मेरे घनश्याम करेंगे भारत की भूमि ने देखा
न्याय सतत इतिहास में भारत की भूमि ने
देखा न्याय सतत इतिहास में भारत की भूमि
ने पाया प्रेम गुजरती सांसों में भारत आने
वाला भारत का होकर रह जाता है सबको गले
लगा ले ऐसी प्यारी भारत माता
है जिस भूमि के जख्मों पर मरहम रखा हो
पीरों ने जिस भूमि के जख्मों पर मरहम रखा
हो पीरों ने जिस भूमि पर जुल्म से डटकर
युद्ध लड़ हो वीरों ने जिस भूमि को समरसता
का पाठ पढ़ाया मीरा ने जिस भूमि को प्रेम
दिया रसखान रहीम कबीरा ने हमने दर से
लौटाया है युद्धों के आप सिकंदर याद
कीजिएगा हमने दर से लौटाया है युद्धों के
उन मादी को हमने कलिंग में बुद्ध चुना जब
देख लिया बर्बादी को वा हमने दर से लौटाया
है युद्धों के उन मादी को हमने कलिंग में
बुद्ध चुना जब देख लिया बर्बादी को
सिंहासन मगरूर हो तो चाणक्य गूंजता है
घर-घर और परमाणु के दौर में भी गांधी को
पूजता है घर-घर वाह आंगन तुक को देव कहा
उन लोगों का स्वभाव क्या हो आंगन तुक को
देव कहा उन लोगों का स्वभाव क्या हो हमने
दुनिया को सिखलाया सर्व धर्म संभाव क्या
हो भारत भूमि के कंकर कंकर में शंकर नाम
रहे भारत भूमि के कंकर कंकर में शंकर नाम
रहे नानक रहे महावीर रहे ईशा पैगंबर राम
रहे भारत को भारत करते हैं भारत के ये
मूल्य सभी भारत को भारत करते हैं भारत के
ये मूल्य सभी सदी लगाकर अर्जित की है इतने
हैं बहुमूल्य सभी चंद वर्षों की राजनीति
पर क्यों इसको कुर्बान करें चंद वर्षों की
राजनीति पर क्यों इसको कुर्बान करें जिसके
खातिर जान दिया हो सबने उसका मान रखें इन
मूल्यों के केंद्र में थे हम इन तक वापस
आना है इन मूल्यों के केंद्र में थे हम इन
तक वापस आना है जिन मूल्यों की छिनी आजादी
उनको वापस पाना है इन मूल्यों के खातिर एक
प्रतिरोध तो बनता है अपना इन मूल्यों के
खातिर एक प्रतिरोध तो बनता है अपना इन
मूल्यों के खातिर सकल विरोध तो बनता है
अपना ये सब मूल्य मिलाकर ही तो भारत की
परिभाषा है यह सब मूल्य मिलाकर ही तो भारत
की परिभाषा है यह कविता उस भारत खातिर एक
उम्मीद की आशा है थैंक यू
[संगीत]
[प्रशंसा]
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