The good, the bad and the way forward: Raghav Chadha's "objective review" of the Budget
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देश का मिडिल क्लास डिसपॉइंट हुआ। जिस
स्तर पे महंगाई बढ़ी उस स्तर पे वेजेस
नहीं बढ़ी। सर हर साल देश का आम आदमी जब
वित्त मंत्री जी की बजट की स्पीच सुनता है
तो वो इसलिए नहीं सुनता कि पीएलआई की क्या
इन्वेस्टमेंट होगी? कौन सा कॉरिडोर बन रहा
है? देश का आम आदमी सैलरीड क्लास इसलिए
बजट की स्पीच सुनता है कि उसके अंदर स्लैब
में कोई रिवीजन होगा। क्या हमारी
स्टैंडर्ड डिडक्शन की जो हमें डिडक्शन
मिलती है वो बढ़ेगी। दैट देयर वास नो
रिलीफ फॉर द मिडिल क्लास। मिडिल क्लास को
पैंपर करें। नहीं तो मिडिल क्लास एक
सैंडविच की तरह रिच क्लास और पुअर क्लास
में दबता चला जा रहा है। जहां यूएस में
18% ऑफ़ जीडीपी हेल्थ केयर पे खर्च होता
है। यूके में 12% जर्मनी में 13% क्योंकि
वो देश जानते हैं कि जान है तो जहान है।
सरकारी अस्पताल में अगर आप चले जाइए और
आपको पुरानी जरजर बिल्डिंग मिलेंगी।
मैसिवली अंडर अंडरस्टार हॉस्पिटल मिलेगा।
ओवरवर्क डॉक्टर मिलेंगे। इंडिया इज़ वन ऑफ़
द ओनली कंट्रीज इन मेजर इकॉनमीज़ वेयर 85%
ऑफ़ आवर फॉर्मल वर्क फोर्स हैज़ ज़ीरो स्टचरी
इनफ्लेशन प्रोटेक्शन। साथ-साथ मुझे लगता
है कि एक मिनिमम इनक्रीस बेस्ड ऑन
इनफ्लेशन होना चाहिए।
सर अक्सर देखा जाता है जब वित्त मंत्री
बजट पेश करती हैं तो रूलिंग कोइलेशन के जो
एमपीज हैं जो ट्रेजरी बेंचेस पर बैठते हैं
वो सरकार की तारीफ करते हैं और कहते हैं
कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रांति
आ जाएगी इस बजट से। और विपक्ष में जो बैठे
हैं वो अक्सर निंदा करते हैं। कहते हैं
किसान की कमर तोड़ दी। बहुत महंगाई हो गई।
अमीर और अमीर हो रहा है। गरीब और गरीब हो
रहा है। लेकिन मैं आज प्रयास करूंगा कि एक
ऑब्जेक्टिव एनालिसिस इस बजट का करूं और
कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म अपना आपके
माध्यम से वित्त मंत्री को दूं। सर, द
टाइटल ऑफ़ माई स्पीच इज़ द गुड, द बैड एंड द
वे फॉरवर्ड। फोर गुड थिंग्स दैट आइ फाउंड
इन दिस बजट, फोर बैड थिंग्स दैट आई फाउंड
इन दिस बजट एंड फोर इनोवेटिव सजेशंस टू दी
ऑनरेबल फाइनेंस मिनिस्टर। सो द फर्स्ट गुड
थिंग दैट आई फाउंड इन द बजट इज दैट देयर
वाज़ एन इंक्रीस इन द एसटीटी फॉर डेरिवेटिव
ट्रेडिंग। यूजुअली सरकार की निंदा हुई इस
विषय को लेकर मार्केट्स भी गिरी। लेकिन
मेरा यह मानना है कि इस कदम से
स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग यानी कि सट्टा
ट्रेडिंग समाप्त होगी या कम होगी और रिटेल
इन्वेस्टर जो 90% रिटेल इन्वेस्टर एफएनओ
सेक्टर में नुकसान भुगतता है फ्यूचर्स एंड
ऑप्शंस के चलते जुआ खेलता है उसमें आपको
रिटेल इन्वेस्टर की प्रोटेक्शन का एक
माध्यम बन सकता है। लेकिन मैं इसी के
साथ-साथ वित्त मंत्री जी को याद दिलाना
चाहूंगा कि एसटीटी का जेनेसिस क्या है?
एसटीटी का जन्म कब हुआ? एसटीटी हमारे
सीनियर कॉलीग मिस्टर पी चिदंबरम जब
फाइनेंस मिनिस्टर थे तो उन्होंने
इंट्रोड्यूस किया एंड इट वाज इंट्रोड्यूस
टू रिप्लेस लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स
ऑन इक्विटीज जब लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन ऑन
इक्विटी जीरो था तब एसटीटी को लाया गया कि
वे एक सिंपल अप फ्रंट लेवी होगी ट्रेड्स
पर रिगार्डलेस ऑफ प्रॉफिट एंड लॉस लेकिन
अब सरकार ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स
भी लगा दिया एसटीटी भी लगा दिया और रिटेल
इन्वेस्टर को और तमाम इन्वेस्टर्स को एक
प्रकार से डिसइेंटिवाइज किया। मैं एक
सुझाव लाया हूं सरकार के लिए जिससे लॉन्ग
टर्म हाउसहोल्ड अर्निंग्स बढ़ेंगी। वेल्थ
क्रिएशन होगा और वेल्थ पार्किंग रियलस्टेट
और गोल्ड के सेक्टर से निकल कर इक्विटीज
में आएगी और स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग और कम
होगी और लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट बिहेवियर
इन्वेस्टर्स का बढ़ेगा। वो की है कि लॉन्ग
टर्म कैपिटल गेन टैक्स ऑन इक्विटीज शुड बी
मेड निल इन दिस कंट्री फॉर इंडिविजुअल
इन्वेस्टर्स। दुनिया की कई ऐसे देश हैं
जिसके अंदर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स
इक्विटीज पे खासतौर पे शून्य है। जैसे कि
स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, यूएई,
न्यूजीलैंड, हांगकांग, कतर, मलेशिया। मैं
चाहूंगा कि जब एसटीटी बढ़ाया जा रहा है तो
इसी बजट में ही लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन
टैक्स को जीरो किया जाए। सर मेरा दूसरा जो
मैं सरकार के बजट को एक्नॉलेज करना
चाहूंगा वो ये है कि कैपेक्स के जो
एक्सपेंडिचर एलोकेशन होता है उसमें एक
बढ़ोतरी देके गई। जहां वित्तीय वर्ष 18-19
में मात्र 3 लाख करोड़ कैप अपेक्स था वो
इस वित्तीय वर्ष में 12 लाख करोड़ तक
पहुंचा है। व्हिच इज 4.4% ऑफ द जीडीपी
व्हिच इज अ गुड स्टेप इट विल हैव अ
मल्टीप्लायर इफेक्ट एंड इट विल
प्रायोरिटाइज एसेट क्रिएशन। लेकिन इसके
साथ-साथ सरकार को 5 साल में क्या कैपेक्स
वो कौन-कौन से क्षेत्रों में खर्चा करने
जा रही है उसका एक ब्यौरा देना चाहिए ताकि
प्राइवेट सेक्टर भी इस कैपेक्स के खर्चे
को मैच कर सके। सर थर्ड थिंग व्हिच वी
फाउंड इन द स्पीच ऑफ द फाइनेंस मिनिस्टर
इज दैट देयर वाज़ अ रिलेटिव रिस्ट्रेंट इन
मेकिंग बजेटरी अनाउंसमेंट्स फॉर इलेक्शन
बाउंड स्टेट्स। अक्सर वित्त मंत्री का
भाषण सुन के आप बता सकते हैं कि कौन से
राज्यों में चुनाव होने जा रहा है। इस
स्पीच में उन्होंने थोड़ा सा रिस्ट्रेंट
एक्सरसाइज किया जिसे मैं एकनॉलेज करता हूं
और आखिरी अच्छी चीज जो इस बजट में नजर आई
वो ये था कि एनआरआई की इन्वेस्टमेंट लिमिट
में एनहांसमेंट हुई। लेकिन मैं बता दूं कि
जब एफआईआई ने फॉरेन इन्वेस्टर्स ने फॉरेन
पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स ने इस देश के
बाजार से पैसा निकाल लिया और पिछले एक
वित्तीय वर्ष में 23 बिलियन निकाला तब
जाकर सरकार जागी और सरकार ने एनआरआई के
लिए इक्विटी मार्केट का दरवाजा खोलकर उनकी
इन्वेस्टमेंट लिमिट को 5% से बढ़ा दिया।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे
इन्वेस्टर्स 32 मिलियन एनआरआई इन्वेस्टर्स
को अब भारतीय बाजार में पैसा डालने का
मौका मिलेगा। लेकिन इसी के साथ-साथ सरकार
को इस पर भी गौर फरमाना चाहिए कि क्यों
फॉरेन इन्वेस्टर्स भारत से पैसा निकाल
निकाल कर बाजार को छोड़कर जा रहे हैं। सर
नाउ आई कम टू द बैड पार्ट ऑफ द बजट।
फर्स्ट थिंग इज द डे टू जीडीपी क्राइसिस।
सरकार ने और डेप्ट लेने के लिए कर्जा लेने
के लिए इस बजट में फार्मूला ही बदल दिया।
पहले सरकार डेप्ट जब लेती थी तो ओल्ड
एफआरबीएम रूल्स के तहत 3% ऑफ जीडीपी तक का
फ्रेश डेप्ट लेती थी। इस बजट में सरकार ने
उस फार्मूले को बदलकर कहा कि टोटल सरकार
का डेप्ट जीडीपी का 50% होगा और उस सीमा
में हम डेप्ट लेंगे। यानी कि दे वांट टू
प्ले ऑन द डिनोमिनेटर इफेक्ट। फॉर
एग्जांपल एक साल बजट अगर 12 हमारा जीडीपी
12% से ग्रो करता है तो उस साल सरकार खूब
सारा डेप्ट लेके सरकार पे कर्जा लाद सकती
है जो कि फिस्कल डेफिस 4 6 5% तक भी पहुंच
सकता है। सर इसी के साथ-साथ मैं बताना
चाहूंगा कि आज सरकार कहती है कि हमारा डे
टू जीडीपी रेशियो 56% है। लेकिन ये गलत है
क्योंकि बहुत सारे ऑफ बैलेंस शीट आइटम्स
हैं जिसे सरकार डेप्ट में दिखाती ही नहीं
है। जिस जैसे कि एफसीआई बॉन्ड्स, ओएमसी
बोंड्स, फर्टिलाइजर, एनएचआई, एनएफएसएस
यानी कि तमाम तरीके के ऐसे कर्जे हैं
सरकार के ऊपर जो सरकार अपनी बैलेंस शीट
में नहीं दिखाती है। सर मैं सरकार को आपके
माध्यम से ये रिक्वेस्ट करना चाहूंगा कि
देश का कर्जा और कैसे ना बढ़े इस पर काम
करें ना कि और कर्जा लेने के लिए हम
जीडीपी और डेप्ट टू जीडीपी के फार्मूले के
रेशियोज़ बदलकर और पैसा कर्जे पे ब्याज पर
लेने का प्रयास करें। सर दूसरी दिक्कत जो
इस बजट में नजर आई वो ये थी कि इनकम टैक्स
स्लैब में चेंज नहीं हुआ। सर हर साल देश
का आम आदमी जब वित्त मंत्री जी की बजट की
स्पीच सुनता है तो वो इसलिए नहीं सुनता कि
पीएलआई की क्या इन्वेस्टमेंट होगी? कौन सा
कॉरिडोर बन रहा है? देश का आम आदमी सैलरीड
क्लास इसलिए बजट की स्पीच सुनता है कि
उसके अंदर स्लैब में कोई रिवीजन होगा।
क्या हमारी स्टैंडर्ड डिडक्शन की जो हमें
डिडक्शन मिलती है वो बढ़ेगी। लेकिन इस बार
बजट में देश का आम आदमी और खासतौर पे देश
का मिडिल क्लास डिसपॉइंट हुआ। पहले ही
देयर हैज़ बीन अ स्टैग्नेशन इन द सैलरीज।
इनफ्लेशन 6.8% पे खड़ा है। लेकिन उसके
बावजूद हमने इस बार कोई स्लैब में या
स्टैंडर्ड डिडक्शन में चेंज नहीं देखा।
मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी को
रिक्वेस्ट करना चाहूंगा कि आप इसी बजट में
अनाउंसमेंट करें कि स्टैंडर्ड डिडक्शन जो
₹75,000 है उसे बढ़ाकर सैलरीड क्लास के लिए
₹1.5 लाख किया जाए। सर थर्ड प्रॉब्लम दैट
वाज़ देयर वि द बजट इज़ दैट देयर वाज़ नो
रिलीफ फॉर द मिडिल क्लास। सर आफ्टर अ वेरी
लॉन्ग टाइम इन इंडियास हिस्ट्री द पर्सनल
इनकम टैक्स कलेक्शन वास मोर देन द
कॉर्पोरेट इनकम टैक्स कलेक्शन। यानी कि
इंडिविजुअल्स ने जो इनकम टैक्स भरा वो
लगभग 11 लाख करोड़ के आसपास भरा और
कंपनियों ने कॉर्पोरेट ने जो इनकम टैक्स
भरा वो लगभग 9.8 लाख करोड़। यानी कि
मैक्सिमम टैक्स आपको इंडिविजुअल्स के इनकम
टैक्स से मिल रहा है। अब मिडिल क्लास वो
टैक्स भर रहा है। आज वो दौर आ गया है कि
हम मिडिल क्लास को अपलिफ्ट करें। मिडिल
क्लास को पैंपर करें। नहीं तो मिडिल क्लास
एक सैंडविच की तरह रिच क्लास और पुअर
क्लास में दबता चला जा रहा है। सर राइजिंग
कॉस्ट प्रेशर्स के चलते पिछले वित्तीय
वर्ष में मिडिल क्लास ने देखा कि उसके
एजुकेशन के खर्चे में 8% की बढ़ोतरी हुई।
हेल्थ केयर 9% से महंगा हुआ। रेंट 7% से
फूड 6% से ट्रांसपोर्ट 5% से। मेरा
रिक्वेस्ट यह है माननीय फाइनेंस मिनिस्टर
से कि वो इनकम टैक्स में रियायत देकर या
तो मिडिल क्लास को कोई रिलीफ दें और अगर
इनकम टैक्स में रियायत नहीं दे सकती हैं
तो उसकी सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट्स पे
उसको बेनिफिट दें उसे इंसेंटिव्स दें कि
वो ज्यादा बचत करे ज्यादा वेल्थ क्रिएशन
कर पाए। सर फोर्थ प्रॉब्लम इन दिस बजट दैट
आई फाउंड वाज़ दी बजटरी एलोकेशन टू हेल्थ
व्हिच इज लो एंड व्हिच सर्टेनली नीड्स अ
रीलुक। सर आज हमने अपने टोटल गवर्नमेंट
एक्सपेंडिचर का 2% हेल्थ को एलोकेट किया
है लगभग 1 लाख करोड़ के आसपास। नेशनल
हेल्थ पॉलिसी 2017 बताती है सर और सरकार
का ये अपना ऑब्जेक्टिव रहा है, गोल रहा है
दैट स्पेंडिंग ऑन पब्लिक हेल्थ शुड बी
2.5%
ऑफ जीडीपी।
आज हम 2026 में खड़े हैं। हमारी पब्लिक
हेल्थ पे स्पेंडिंग मात्र 5% ऑफ जीडीपी
है। हम अपने लक्ष्य से कोसों मील्स दूर
हैं। जहां यूएस में 18% ऑफ जीडीपी हेल्थ
केयर पे खर्च होता है। यूके में 12%
जर्मनी में 13% स्वीडन में, नीदरलैंड में,
डेनमार्क में, जापान में, स्पेन में 10%
ऑफ जीडीपी खर्च होता है। क्योंकि वो देश
जानते हैं कि जान है तो जहान है। लेकिन
हमारे देश में मात्र 5% ऑफ जीडीपी हम अपने
हेल्थ पे खर्च करते हैं। और इसके चलते आलम
ये है कि सरकारी अस्पताल में अगर आप चले
जाइए व्हिच इज द बोन व्हिच इज कॉल्ड द
बैकबोन ऑफ इंडियास हेल्थ केयर वहां पर
आपको पुरानी जरजर बिल्डिंग मिलेंगी।
मैसिवली अंडर अंडरस्ट हॉस्पिटल मिलेगा।
ओवरवर्क डॉक्टर मिलेंगे। पपुलेशन के हिसाब
से बेड नहीं मिलेगा। जांच के लिए मशीनें
नहीं है, दवाइयों की कमी है। और अगर इलाज
की ऑपरेशन की डेट मिल भी जाए तो वो डेट
इतनी दूर होती है तब तक मरीज चल बसता है।
सर द रियलिटी इज दैट कोविड मेड अस रियलाइज
एंड इट वाज़ अ वेक अप कॉल फॉर इंडियास
पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर एंड आई वांट
टू आस्क द हाउस टुडे। आर वी प्रिपयर्ड गॉड
फॉरबेट इफ दे वर टू बी अनदर पेंडेमिक और
अनदर बिग सॉर्ट ऑफ़ रेजिंग पेंडेमिक इन दिस
कंट्री एंड द आंसर टू दैट इज़ नो। और
प्राइवेट अस्पतालों की सर हालात यह हैं कि
अगर आज आपको प्राइवेट अस्पताल में इलाज
करना पड़े तो आपको लोन लेना पड़ता है।
अपने घर के गहने अपना रियलस्टेट एसेट
बेचकर पता नहीं कितने हजारों लाखों लोग हर
साल भारत में गरीबी रेखा के नीचे चले जाते
हैं क्योंकि उन्हें एक हेल्थ इमरजेंसी के
चलते प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराना
पड़ता है। सर जैसे वन नेशन वन इलेक्शन इस
देश में लागू किया जा रहा है। वन नेशन वन
टैक्स की ओर हम बढ़ रहे हैं। वैसे ही वन
नेशन वन मेडिकल ट्रीटमेंट की ओर बढ़ना
चाहिए। सबको नंबर वन मेडिकल ट्रीटमेंट देश
में मिले। ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए। सर
मेरे चार सुझाव जो आपके माध्यम से मैं
वित्त मंत्री को देना चाहूंगा। पहला सुझाव
है पुट ऑल लैंड एंड प्रॉपर्टी रिकॉर्ड्स
ऑफ इंडिया ऑन ब्लॉकचेन। एक ब्लॉकचेन बेस्ड
लैंड रजिस्ट्री लेजर बनाइए। पहले 10 मेजर
राज्यों शहरों से शुरू करिए महानगरों से
और टिए टू सिटीज से। जिस लेजर में जिस
ब्लॉकचेन लेजर में हर रिकॉर्ड हर सेल हर
म्यूटेशन हर इन्हहेरिटेंस को एक डिजिटल
रिकॉर्ड बुक में डाला जाएगा जो एक
ब्लॉकचेन लेजर होगा जो टाइम स्टैंप्ड होगा
टपर प्रूफ होगा 100% ट्रांसपेरेंट होगा और
रियल टाइम प्रॉपर्टी ट्रैकिंग आप उसे कर
सकेंगे जिसके चलते इंस्टेंट टाइटल
वेरिफिकेशन होगा। आज सर हमारा जो
रियलस्टेट का लैंड एंड प्रॉपर्टी रिकॉर्ड
का जो बाजार है उसमें अटर केओस है। केओस
इसलिए है कि लोगों को रजिस्ट्रार के दफ्तर
के बाहर धक्के लग रहे हैं। दलालों ने उन
अफसरों पे पूरी तरीके से कब्जा किया हुआ
है। प्रॉपर्टी टैक्स में चोरी होती है।
सर्कल रेट को एक्सप्लइट करके कैश में
प्रॉपर्टीियां खरीदी जाती है। फर्जी कागज,
कब्जे, टाइटल डिस्प्यूट न जाने क्या-क्या
चल रहा है। जिसके चलते आज 66% ऑफ इंडिया
सिविल डिस्प्यूट्स आर लैंड डिस्प्यूट्स।
45% ऑफ प्रॉपर्टी इज लैक क्लियर टाइटल इन
इंडिया। इंडिया रैंक्स 133 आउट ऑफ 190 इन
प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन एफिशिएंसी। 48% ऑफ
आवर प्रॉपर्टीज आर अंडर डिस्प्यूट एंड दी
एवरेज टाइम टेकन बाय सिविल कोर्ट्स टू
रिसॉल्व दीज़ डिस्प्यूट्स इज़ सेवन इयर्स
एंड 6.2 करोड़ प्रॉपर्टी डॉक्यूमेंट्स आर
पेंडिंग डिजिटाइजेशन। वो तहसीलदार के
दफ्तर में पड़े हैं या रजिस्ट्रार के दफ्तर
में उनका डिजिटाइजेशन अभी तक नहीं हुआ। इन
सारी बीमारियों का एक ही दवा है दैट इज
नेशनल ब्लॉकचेन रजिस्ट्री जिसके चलते
प्रॉपर्टी डिस्प्यूट समाप्त होंगे। मिडिल
क्लास की वेल्थ अनलॉक होगी क्योंकि वह और
ब्याज पे पैसा ले पाएंगे। प्रॉपर्टी टैक्स
की कंप्लायंस बढ़ेगी और रीट्स जैसे
इन्वेस्टमेंट व्हीकल्स को ब्लॉकचेन
वेरीिफाइड टाइटल मिलेंगे। उसमें भी
बढ़ोतरी देखी जाएगी। इसी के साथ-साथ सर
देश दुनिया के कई देशों ने इसे लागू कर
दिया है। स्वीडन में ये लागू है। जहां पर
एक दिन में आप प्रॉपर्टी का ट्रांजैक्शन
कंप्लीट कर सकते हैं। वहां डिस्प्यूट रेट
2% है। जॉर्जिया में है जहां 3 दिन में
प्रॉपर्टी का ट्रांजैक्शन खत्म हो जाता
है। डिस्प्यूट रेट 1% है। और यूएई में है।
जहां 10 मिनट में आप अपनी प्रॉपर्टी खरीद
बेच सकते हैं। वहां डिस्प्यूट रेट 1% से
भी नीचे और वहां हिंदुस्तान में प्रॉपर्टी
बेचनी हो तो 2 से छ महीने लगते हैं और 48%
डिस्प्यूट रेट है। सर मेरा दूसरा सुझाव है
इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट। भारत
में वेजेस को इंडेक्सेशन इंडेक्स करिए
महंगाई से। वित्तीय वर्ष 18 से लेकर
वित्तीय वर्ष 26 में आप हमने देखा कि रियल
वेजेस फॉर द सैलरी क्लास में 16% की
गिरावट आई। ये गिरावट का मतलब इन सालों
में जितनी महंगाई थी जिस स्तर पे महंगाई
बढ़ी उस स्तर पे वेजेस नहीं बढ़ी। जिसके
चलते 16% की गिरावट रियल वेजेस में देखी
गई। इसीलिए मैंडेटरी वेज इंडेक्सेशन
फार्मूला इज द नीड ऑफ द आवर एंड द
गवर्नमेंट मस्ट लुक एट इट। इसके चलते तमाम
फॉर्मल सेक्टर्स में कॉर्पोरेट शॉप्स,
फैक्ट्रीज, गिग वर्कर्स सबको इनफ्लेशन
इंडेक्स वेज ह मिलेगा और सरकार के मुलाजिम
को तो मिलता ही है। हर साल डियर डियरनेस
अलाउंस मिलता है। उसके बाद आप हर कुछ
सालों में पे कमीशन लागू होता है। इस इससे
आप 20 करोड़ आबादी व्हिच इज 45% ऑफ
इंडियास टोटल वर्क फोर्स। आप उसे एड्रेस
कर पाएंगे। सर इसी के साथ-साथ मैं बताना
चाहता हूं कि दुनिया के कई देशों में यह
पहले से ही लागू है। यूएस के अंदर सीओएलए
कॉस्ट ऑफ लिविंग एडजस्टमेंट सिस्टम लागू
है जिसके अंदर एनुअल और ऑटोमेटिक रिवीजन
होता है। जर्मनी के अंदर हर 18 से 24
महीने के अंदर महंगाई के अनुसार सैलरी
बढ़ा दी जाती है। जापान के अंदर शंटो मेथड
यूज़ होता है जिसमें एनुअल इनफ इनफ्लेशन
इंडेक्स वेज ह दी जाती है। और बेल्जियम
में ऑटोमेटिक इंडेक्सेशन लॉ है जिसमें
क्वार्टरली बेसिस पर एंप्लाइजस की सैलरी
बढ़ाई जाती है। सर इंडिया इज़ वन ऑफ द ओनली
कंट्रीज इन मेजर इकॉनमीज़ वेयर 85% ऑफ़ आवर
फॉर्मल वर्क फोर्स हैज़ जीरो स्टचरी
इनफ्लेशन प्रोटेक्शन। वी आर एट दी मर्सी
ऑफ़ द एंप्लयर डिस्क्रीशन एंड आवर ओन
नेगोशिएशन पावर टू रेज आवर सैलरीज। इसके
साथ-साथ मुझे लगता है कि एक मिनिमम
इनक्रीस बेस्ड ऑन इनफ्लेशन होना चाहिए।
मेरा थर्ड सुझाव माननीय वित्त मंत्री जी
को रहेगा कि स्टेट कैपिटल एक्सपेंडिचर की
मैचिंग ग्रांट मैचिंग फंडिंग सेंटर दें।
यानी कि हर एक जो राज्य की सरकार कैपेक्स
पे कैपिटल एक्सपेंडिचर पे एसेट क्रिएशन पे
खर्च करती है। उसकी मैचिंग ग्रांट ₹1
केंद्र द्वारा राज्यों को दिया जाना चाहती
चाहिए। नॉट एज लोन बट एज अ ग्रांट। आज
स्टेट कैपेक्स में दो बॉटल नेक्स है। पहला
बॉटल नेक है बोरोइंग कैप। यानी कि कोई भी
राज्य अपने स्टेट जीडीपी से 3% से ज्यादा
ब्याज पर पैसा नहीं ले सकता। वो कैपेक्स
पे नहीं खर्च करता। वो तमाम तरीके के
ऑपरेशनल खर्चे करता है। और सेकंड प्रॉब्लम
है कि अगर केंद्र सरकार पैसा देती भी है
राज्यों को कैपेक्स के लिए वो लोन की सूरत
में देती है और कंडीशनल लोन कि किस एसेट
पे कितना खर्च होगा। एक कंडीशनल लोन दिया
जाता है। मेरा सुझाव है दैट रिप्लेस दिस
लोन विद कंडीशंस बाय गिवन बाय द सेंटर टू
ग्रांट विद ट्रस्ट ग्रांट बेस्ड ऑन ट्रस्ट
बाय द सेंटर। सर सेंटर को आने वाले 5
वर्षों के लिए डेढ़ लाख करोड़ आवंटित करना
चाहिए नॉट एज लोन बट एज दी कैपेक्स
ग्रांट्स ताकि राज्यों में सड़कें बने,
इरीगेशन नेटवर्क बने, लोकल पावर
इंफ्रास्ट्रक्चर बने, ड्रिंकिंग वाटर
सैनिटेशन हो और अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर में
एसेट क्रिएशन एसेट फॉर्मेशन किया जाए। एज
नॉट एज लोन, नॉट ऑन इंटरेस्ट, नॉट विद
प्रिंसिपल एंड विद नो कंडीशनलिटी। अगर ऐसा
होता है तो सबसे पहले तो स्टेट की बैलेंस
शीट में दिस ग्रांट विल नॉट सीट एज डे।
स्टेट की बैलेंस शीट सुंदर होगी, बेहतर
होगी। दूसरा खुलकर राज्य कैपेक्स पर खर्च
कर पाएंगे। थर्ड इट विल बी अ हाई ग्रोथ
एंड अ हाई जॉब क्रिएटर। ये ग्रोथ
मल्टीप्लायर और जॉब क्रिएटर के तौर पे इस
इसे इसका इस्तेमाल होगा। क्योंकि हर एक
रुपया जो आप कैपेक्स पे खर्च करते हैं
उससे भारत का जीडीपी 2 से ₹ बढ़ता है इन अ
स्पैन ऑफ़ थ्री टू फाइव इयर्स। कोपरेटिव
फेडरलिज्म मजबूत होगा और साथ ही साथ
स्टेट्स विल बिकम बिल्डर्स एंड नॉट
बोरोअर्स इन द आईज ऑफ़ द सेंटर। सर मेरा
चौथा सुझाव जो माननीय वित्त मंत्री जी के
लिए है वो वो ये है कि लीगलाइज वर्चुअल
डिजिटल एसेट्स एज एन एसेट क्लास। इंडिया
में अभी सर वैसे ही डीफैक्टो लीगलाइज
टैक्सेशन है वर्चुअल डिजिटल एसेट्स यानी
कि क्रिप्टो करेंसी स्टेबल कॉइन एटसेट्रा
क्योंकि अगर उनकी खरीद बेच पर कोई मुनाफा
होता है तो 30% फ्लैट इनकम टैक्स लगता है
और 1% ट्रांजैक्शन टैक्स जो अपनी वस्तु
बेच रहा है उसे सरकार को जमा कराना पड़ता
है। बट दे आर सम हाउ नॉट रिकॉग्नाइज्ड एज
एन एसेट क्लास। वीडीएस जो वर्चुअल डिजिटल
एसेट्स हैं इन्हें एसेट क्लास का दर्जा
नहीं दिया गया। जिसके चलते कोई डेडिकेटेड
लाइसेंसिंग लॉ नहीं है। कोई क्लियर
कंज्यूमर या इन्वेस्टर प्रोटेक्शन कानून
नहीं है। एएमएल कानून यानी कि एंटी मनी
लॉन्ड्रिंग गाइडलाइंस और डायरेक्शंस इस
एसेट क्लास के लिए नहीं है। एंड देयर देयर
इज़ ऑफ कोर्स नो एक्सप्लसिट लीगल
क्लासिफिकेशन। एज अ रिजल्ट व्हाट हैज़
हैपेंड इज़ दैट 4.8
लाख करोड़ ट्रेड इन दिस वर्चुअल डिजिटल
एसेट्स हैज़ मूव्ड ऑफ शोर। भारत के बाहर
निकलकर वो अन्य देशों में दुबई, सिंगापुर,
मलेशिया और अन्य देशों में इसका ट्रेड हो
रहा है जो भारतीय कर रहे हैं। सेकंड थिंग
दैट हैज़ हैपेंड इज़ दैट 73% ऑफ इंडियास
क्रिप्टो ट्रेडिंग वॉल्यूम इन फाइनेंसियल
ईयर 25 हैज़ मूव्ड टू ऑफशोर एक्सचेंजेस।
व्हाट हैज़ फर्दर हैपेंड इज़ दैट 180
वर्चुअल डिजिटल एसेट स्टार्टअप्स हैव
मूव्ड टू कंट्रीज लाइक दुबई एंड सिंगापुर।
एंड एज अ रिजल्ट जो देश भारत देश के 12
करोड़ ऐसे लोग हैं जो इन वर्चुअल डिजिटल
एसेट्स में क्रिप्टो में आरडब्ल्यूए यानी
कि रियल वर्ल्ड एसेट में स्टेबल कॉइन में
इन्वेस्ट करना चाहते हैं वो ऑफशोर जाकर
इन्वेस्ट कर रहे हैं। जरूरत है कि हम
कंप्लायंस हिंदुस्तान में लागू करें। उसे
हैवली रेगुलेट करें लेकिन उसे ऑनशोर लाएं।
इसके चलते अगर ऐसा होता है तो सरकार के
खजाने में 15 से 2000 करोड़ का इजाफा
होगा। उन्हें उतना टैक्स मिलेगा। और इसी
के साथ-साथ मैं सरकार को कहना चाहता दैट
वी करली टैक्स दी वर्चुअल डिजिटल एसेट्स
एज इफ दे आर लीगल बट वी रेगुलेट देम एज इफ
दे आर इललीगल। मेरा सुझाव है कि इसे हेवली
रेगुलेट करिए। रिंग फेंस करिए इस
इकोसिस्टम को। एएमएल गाइडलाइंस यानी कि
एंटी मनी लॉन्ड्रिंग कानून और मजबूत करिए।
लेकिन प्रोहिबिशन इज नॉट प्रोटेक्शन।
रेगुलेशन इज प्रोटेक्शन।
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