Re-Charge Full Theory | Accounts 12
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व्हाट्स अप एवरीवन वेलकम बैक टू द चैनल
गाइस अब बारी आ गई है पूरे के पूरे
अकाउंट्स का थरिटिकल पोर्शन देखने की और
आज काफी मेहनत करनी है बहुत सारी चीजें हम
लोग करने वाले हैं बट स्टार्टिंग विद द
थ्योरी पोर्शन ताकि ये एक बार हो जाए
चीजें खत्म है तो चलिए जल्दी से थ्योरी
पोर्शन शुरू करते हैं क्योंकि बैकग्राउंड
पूरा वाइट है तो मुझे थोड़ा सा डार्क रखना
पड़ेगा तो थोड़ा सा डार्क आ रहा होगा बट
काम चलाओ क्योंकि ये क्लियर दिखना चाहिए
मैं क्लियर दिखूं ना दिखूं वो मैटर नहीं
करता तो चलिए चलिए जल्दी से शुरू करते हैं
और सारा थ्योरी पोर्शन फटाफट से कंप्लीट
कर देते हैं। लेट्स
[संगीत]
[संगीत]
बिगेन। चलो बेटा शुरू करते हैं बच्चों।
फटाफट से सबसे पहले हमारे पास पार्टनरशिप
का मीनिंग आ रहा है। ठीक है? पार्टनरशिप
के मीनिंग की अगर हम बात करें तो यहां पे
कुछ बेसिक-बेसिक सी चीजें दी हुई है। जैसे
सबसे पहले बेसिक डेफिनेशन है कि
पार्टनरशिप इज़ अ रिलेशन ऑफ म्यूचुअल
ट्रस्ट एंड फेथ। है ना? तो पार्टनर्स में
क्या होता है कि म्यूचुअल ट्रस्ट एंड फेथ
का रिलेशन शो करने के लिए ही हमारे पास
पार्टनरशिप बनाई जाती है। पार्टनरशिप
हमेशा म्यूचुअल ट्रस्ट के ऊपर, म्यूचुअल
एजेंसी के ऊपर बेस्ड होती है। जिसके अंदर
एक पार्टनर दूसरे पार्टनर पे भरोसा करके
ही बिज़नेस शुरू करता है। राइट? अच्छा। अब
हमारे पास ये सवाल आता है क्या सर
पार्टनर्स और पार्टनरशिप सेपरेट लीगल
एंटिटी है या नहीं है? तो ये क्या बोलता
है? देखो अगर आप अकाउंटिंग की बात करो तो
ऑफ़ कोर्स एक सेपरेट बिज़नेस है। लेकिन अगर
आप लीगल पॉइंट ऑफ़ व्यू से बात करो अगर आप
लीगल पॉइंट ऑफ़ व्यू से बात करो तो
पार्टनरशिप और पार्टनरशिप फर्म लीगल
सेपरेट एंटिटी नहीं है। एक ही है। मतलब जब
अगर कोई डिस्प्यूट होगा ना तो कोर्ट तो ये
बोलेगा भाई साहब फर्म और पार्टनर एक ही
है। अलग-अलग नहीं है। लेकिन जब हम
अकाउंट्स बनाते हैं तो फिर हम अलग-अलग
उसको कंसीडर करते हैं। ठीक हो गया बेटा?
इसके बाद सर एग्जैक्ट डेफिनेशन ऑफ
पार्टनरशिप क्या है? ये सेक्शन याद करना
है। सेक्शन फोर ऑफ द इंडियन पार्टनरशिप
एक्ट डिफाइन क्या डिफाइन करती है
पार्टनरशिप? ये बोलती है पार्टनरशिप इज़ द
रिलेशन बिटवीन पर्संस। पार्टनरशिप क्या
है? ये एक रिलेशन है बिटवीन पर्संस हु हैव
एग्रीड टू शेयर द प्रॉफिट्स। जिन्होंने
प्रॉफिट शेयर करने को एग्री करा है। ऑफ अ
बिज़नेस। बिज़नेस होना बहुत इंपॉर्टेंट है
बच्चों। अगर हमने मिलजुल के कोई संपत्ति
खरीद ली चार लोगों ने तो क्या वो
पार्टनरशिप हो गई? द आंसर इज नो। संपत्ति
खरीदना को ओनरशिप होती है। पार्टनरशिप
नहीं होती। ठीक है? तो बिनेस होना बहुतेंट
है। अब या तो वो बिज़नेस सारे चलाएं। सपोज़
तीन पार्टनर हैं। चिंटू, चिंटी, बंटी। या
तो ये बिज़नेस सारे चलाएं। ये तीनों मिलके
चलाएं या फिर कोई एक भी चलाएगा तो सबके
लिए एक्ट करेगा। एनी ऑफ़ देम एक्टिंग फॉर
ऑल। ठीक हो गया बेटा?
इसके बाद बच्चों कुछ मेन फीचर्स हैं। जैसे
पार्टनरशिप में दो या दो से ज्यादा लोग हो
सकते हैं। कम से कम दो लोग होने चाहिए।
एटलीस्ट टू पर्संस होने चाहिए। अब जो
पर्संस हैं वो पर्संस कौन नहीं हो सकते?
माइनर नहीं हो सकते। यानी 18 साल से कम
पार्टनर नहीं हो सकता। अनसाउंड माइंड नहीं
हो सकते। यानी वो बिल्कुल फिट होने चाहिए।
माइंड में कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए।
डिसक्वालिफाइड बाय लॉ नहीं होने चाहिए।
डिसक्वालिफाइड बाय लॉ कौन-कौन है? जैसे
हमारे क्रिमिनल्स हो गए जो अभी जेल में
हैं। राइट? तो इस तरीके के लोग नहीं हो
सकते या एलियन एनिमीज़ हो गए। एलियन एनिमी
का क्या मतलब होता है? कोई ऐसा कंट्री
जिससे हमारा वॉर चल रहा है। तो उसके
सिटीजन को अभी हम अपना पार्टनर नहीं बना
सकते। तो एलियन एनिमीज़ हो गए। ल्यूनेटिक
पर्संस हो गए जो पागल हैं, इनसॉल्वेंट हो
गए वो नहीं हो सकते। तो ये ध्यान रखना
माइनर नहीं होना चाहिए। अनसाउंड माइंड
नहीं होना चाहिए। और पर्सन डिसक्वालिफाइड
बाय लॉ नहीं होना चाहिए। उसके बाद बच्चों
पार्टनरशिप में कम से कम दो पार्टनर्स
होने चाहिए। ये तो बता दिया गया। मैक्सिमम
कितने होने चाहिए? तो देखो यहां पे ध्यान
रखना है कि पार्टनरशिप एक्ट डिफाइन ही
नहीं करता कि मैक्सिमम नंबर ऑफ पार्टनर्स
कितने होने चाहिए। पार्टनरशिप एक्ट ये
बोलता है कि सेंट्रल गवर्नमेंट प्रिस्राइब
करे। तो सेंट्रल गवर्नमेंट ने कंपनी रूल्स
में यानी कंपनीज़ एक्ट में ये बताया है कि
मैक्सिमम पार्टनर्स फिलहाल कितने होने
चाहिए? 50। ठीक है? तो रूल 10 ऑफ द कंपनीज़
रूल्स गवर्नमेंट ने बताया। सेंट्रल
गवर्नमेंट ने बताया कि मैक्सिमम पार्टनर्स
50 हो सकते हैं। तो एक्ट प्रिस्राइब नहीं
कर रहा लेकिन गवर्नमेंट ने प्रिस्राइब करा
है कि मिनिमम टू मैक्सिमम 50 हो सकते हैं।
डन सर। आगे आसान है। पहला फीचर टू और मोर
पर्संस हो गए। क्या माइनर कभी भी पार्टनर
नहीं हो सकता? बेटा नॉर्मली नहीं हो सकता।
माइनर कैन नॉट बी एडमिटेड एज अ पार्टनर।
लेकिन हां वो प्रॉफिट्स में पार्टिसिपेट
कर सकता है। अगर आप उसको प्रॉफिट देना
चाहो तो वो दे सकते हो। उसके बाद बेटा
एग्रीमेंट होना जरूरी है। पार्टनरशिप बिना
एग्रीमेंट के नहीं बनेगा। इट मस्ट कम इंटू
एकिस्टेंस बाय एन एग्रीमेंट। तीसरा बिनेस
होना चाहिए। प्रॉफिट मोटिव होना चाहिए।
तभी वो पार्टनरशिप कहलाएगा। फिर प्रॉफिट्स
का शेयरिंग होना चाहिए। सही है या नहीं
है? कि पार्टनर्स जो हैं प्रॉफिट शेयर कर
रहे हो। लेकिन एक बात ध्यान रखना बच्चों।
इसमें एक बात बहुत इंपॉर्टेंट है। वो क्या
है?
द
एग्रीमेंट मस्ट बी एम्ड एट शेयरिंग द
प्रॉफिट्स ऑफ द बिजनेस। कि आपको प्रॉफिट
शेयर करने हैं। ठीक है? लेकिन एक चीज लिखी
हुई है। इट इज़ नॉट नेसेसरी दैट ऑल
पार्टनर्स शुड शेयर द लॉसेस आल्सो। जरूरी
नहीं है। सारे पार्टनर्स प्रॉफिट बांटें।
ये तो जरूरी है। लेकिन सारे पार्टनर लॉस
बांटें ये जरूरी नहीं है। आप एक आधे
पार्टनर को गारंटी कर सकते हो कि आपको
प्रॉफिट ही प्रॉफिट होगा। लॉस नहीं होगा।
वो चलेगा। तो ध्यान रखना सारे पार्टनर
प्रॉफिट बांटें ये तो जरूरी है लेकिन लॉस
बांटें ऐसा जरूरी नहीं है। उसके बाद बेटा
रिलेशनशिप कैसा होता है? प्रिंसिपल ऑफ
एजेंट का। हर पार्टनर एक दूसरे का
प्रिंसिपल भी है और हर पार्टनर एक दूसरे
का एजेंट भी है। प्रिंसिपल ने जो कहा वो
एजेंट को मानना पड़ेगा। एजेंट ने जो किया
उसके लिए प्रिंसिपल जिम्मेदार है। यानी एक
दूसरे को रिप्रेजेंट भी करते हैं। ठीक हो
गया जी? परफेक्ट। उसके बाद बिज़नेस कैरिड
ऑन बाय ऑल और एनीवन ऑफ़ देम एक्टिंग फॉर
ऑल। सब भी कर सकते हैं बिनेस मिलके या कोई
एक भी कर सकता है जो सबके लिए एक्ट करेगा।
नो सेपरेट एग्ज़िस्टेंस। ये मैंने आपको
पीछे बता दिया। पार्टनरशिप फर्म का कोई भी
ऐसा सेपरेट एग्ज़िस्टेंस नहीं होता है। वो
एक ही है। ठीक है जी?
परफेक्ट। राइट्स ऑफ़ अ पार्टनर। पार्टनर को
क्या-क्या राइट्स हैं? तो बच्चों, बहुत
सारे राइट्स हैं। लेकिन आप एक बार सारे के
सारे रीड करके चलना कि एमसीक्यू में आ
जाता है कि कौन सा राइट नहीं है। जैसे
सबसे पहला प्रॉफिट्स और लॉसेस बांटने का
राइट है। दूसरा बिनेस को चलाने का अधिकार
है। तीसरा राइट है कि वो कंसल्ट कर सकता
है पार्टनरशिप बिज़नेस के रिलेटेड। कुछ भी
उसको कंसल्टेशन चाहिए वो पूछ सकता है,
डिस्कस कर सकता है, इंस्पेक्शन कर सकता है
बुक्स ऑफ अकाउंट्स का कि सही से बन रहे
हैं या नहीं बन रहे हैं। हर पार्टनर को
राइट है कि वो डिसअ कर दे एडमिशन। यानी
अगर एक भी पार्टनर ने बोला ना कि नए
पार्टनर का एडमिशन नहीं होना तो नहीं होगा
भाई। डिसअ कर सकता है। ठीक है? हर पार्टनर
जॉइंट ओनर है पार्टनरशिप प्रॉपर्टी का।
जितनी भी पार्टनरशिप प्रॉपर्टी है उसका
ओनर हर पार्टनर है। अगर किसी पार्टनर ने
लोन दिया है फ़र्म को तो उसको इंटरेस्ट ऑन
लोन मिलने का अधिकार है। या तो स्पेसिफाई
कर लो। स्पेसिफाई नहीं है तो 6% पर एनम के
हिसाब से। अगर कोई पार्टनर फर्म के बिहाफ
पे कोई खर्चा करता है तो उसको इंडेमनीिफाई
किया जाए। यह उसका अधिकार है। इंडेमनिफाई
का मतलब पैसा वापस दिया जाए उसका। और हर
पार्टनर जब चाहे तब एक नोटिस देके रिटायर
हो सकता है। यह उसका अधिकार है। ठीक है
बेटा?
इसके बाद आता है बच्चों लिमिटेड लायबिलिटी
पार्टनरशिप। ध्यान रखना लिमिटेड लायबिलिटी
पार्टनरशिप के लिए सेपरेट एक्ट बना एलएलपी
एक्ट। अब सर ये एलएलपी है क्या? बच्चों
एलएलपी जो है ये एक ऐसी पार्टनरशिप है
जिसके अंदर बहुत सारे फीचर्स कंपनी के
हैं। ठीक है सर? बहुत सारे फीचर्स कंपनी
के हैं। कैसे? जैसे लिमिटेड लायबिलिटी
पार्टनरशिप जो है उसका अंदर एक तो सेपरेट
लीगल एंटिटी है। इसका मतलब बिनेस अलग और
ओनर्स अलग। लोग कंपनी क्यों बनाते हैं?
सेपरेट लीगल एंटिटी की वजह से। सोल
प्रोपराइटरशिप हो गया, पार्टनरशिप हो गया।
इसके अंदर आपके पर्सनल एसेट्स रिस्क पे
होते हैं कि बिजनेस ने लोन लिया, नहीं
चुका पाया तो आपके पर्सनल एसेट्स तक
बिकेंगे। कंपनीज़ में ऐसा नहीं होता। आपकी
जितनी लायबिलिटी है, जितना कैपिटल आपने
लगाया है, बस उतने के लिए ही आप लायबल हो।
उससे ज्यादा के लिए आप लायबल नहीं हो। तो
लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप में भी ऐसा
ही होता है कि ये सेपरेट लीगल एंटिटी है।
तो जितना आप कैपिटल कंट्रीब्यूट करोगे, बस
उतने के लिए ही लायबल हो। तो सर फिर कंपनी
क्यों नहीं बनाई? बेटा कंपनी में पेपर
वर्क बहुत है। कंप्लायंसेस बहुत है। इसमें
कंपैरेटिवली कम है। तो कंप्लायंसेस पेपर
वर्क पार्टनरशिप जैसा बेनिफिट्स कंपनी
जैसे तो क्यों ना एलएलपी बना लिया जाए। तो
आजकल ये बहुत पॉपुलर फॉर्म ऑफ़ बिज़नेस है।
आप जितने भी कॉमर्स में बिग फोर्स देखते
हो ना बिग फोर्स का बहुत नाम है। जो हमारी
टॉप फोर बिनेस एंड अकाउंटिंग फर्म्स हैं।
पीडब्ल्यू डेलॉयट आपने नाम सुना होगा ईवाई
है ना केपीएमजी। तो ये सारी की सारी
एलएलपीस हैं। देखो क्या
है? एलएलपी मींस अ पार्टनरशिप फॉर्म्ड एंड
रजिस्टर्ड अंडर दिस एक्ट। नेचर ऑफ़ एलएलपी
क्या होता है? एलएलपी इज़ अ बॉडी
कॉर्पोरेट। बॉडी कॉर्पोरेट का मतलब कि ये
एक सेपरेट लीगल एंटिटी है। देखो सेपरेट
लीगल एंटिटी। इसका रजिस्ट्रेशन हुआ हुआ
है। रजिस्ट्रेशन कंपलसरी होता है बेटा
इसका। परपीचुअल सक्सेशन है। यानी मेंबर्स
आते जाते हैं। लेकिन इसको फर्क नहीं
पड़ता। क्या-क्या मेन डिफरेंस है? अब देखो
एप्लीकेबल लॉ कौन सा है? पार्टनरशिप में
पार्टनरशिप एक्ट चलता है। एलएलपी में
एलएलपी एक्ट लगता है। रजिस्ट्रेशन
पार्टनरशिप का ऑप्शनल है। उसका कंपलसरी
है। पार्टनरशिप एग्रीमेंट से बनती है। वो
लॉ से बनती है। क्या पार्टनरशिप में बॉडी
कॉर्पोरेट जो है वो पार्टनर हो सकता है?
बॉडी कॉर्पोरेट का मतलब क्या होता है
बच्चों? क्या कोई और कंपनी जो फॉरेन में
भी रजिस्टर्ड है क्या वो पार्टनर हो सकती
है? तो इसके अंदर बॉडी कॉर्पोरेट जो है वो
पार्टनर नहीं हो सकता। लेकिन उसके अंदर हो
सकता है। इसकी सेपरेट लीगल एंटिटी नहीं
है। उसकी सेपरेट लीगल एंटिटी है।
पार्टनरशिप में परपचुअल सक्सेशन नहीं
होता। वहां पे परमेपचुअल सक्सेशन होता है।
नंबर ऑफ़ पार्टनर दो से 50 उधर दो से
मैक्सिमम की कोई लिमिट नहीं है। ओनरशिप ऑफ़
एसेट्स फर्म जो है वो एसेट ओन नहीं करती।
पार्टनर्स ओन करते हैं। एलएलबी खुद अपने
एसेट्स ओन करती है। लायबिलिटी यहां पे
अनलिमिटेड वहां पे लिमिटेड। ठीक है बेटा?
इसके बाद वी हैव पार्टनरशिप डीड।
पार्टनरशिप डीड क्या होता है बच्चों?
पार्टनरशिप एक एग्रीमेंट है जिसके अंदर
पार्टनरशिप के सारे टर्म्स एंड कंडीशंस
लिखे होते हैं। ये ओरल भी हो सकता है,
रिटर्न भी हो सकता है लेकिन प्रेफरेबली
रिटर्न होना चाहिए। इसका दूसरा नाम बच्चों
आर्टिकल्स ऑफ़ पार्टनरशिप भी होता है।
पार्टनरशिप डीड के अंदर क्या-क्या चीजें
आती हैं? देखो, नेम एंड एड्रेस ऑफ़ द फर्म।
पार्टनर्स का नेम एंड एड्रेस, क्या बिनेस
करते हैं? कितना कैपिटल लगाया है?
इंटरेस्ट ऑन कैपिटल कितना? ड्रॉइंग्स
कितना? इंटरेस्ट ऑन ड्रॉइंग्स कितना?
प्रॉफ़िट्स कैसे बांटेंगे? सैलरी कैसे
बांटेंगे? गुडविल कैसे इवैल्यूएट करेंगे?
अकाउंटिंग पीरियड कौन सा कंसीडर करने वाले
हैं? तो ये सब बच्चों पार्टनरशिप डीड के
अंदर लिखा होता है। कोई भी 5 7 10 आपको
याद कर लेने हैं। देखो कितने सारे 20
पॉइंट्स हैं। ठीक है? परफेक्ट। बढ़िया सर।
अब बेटा पार्टनरशिप डीड क्यों इंपॉर्टेंट
है? पार्टनरशिप डीड बेटा इसलिए इंपॉर्टेंट
है। देखो पहले बोल रहा है कि लॉ कंपलसरी
नहीं करता लेकिन बोलता है कि होगा तो
अच्छा है। है ना? क्यों? क्योंकि ये आपकी
राइट्स, ड्यूटीज, लायबिलिटीज़ के बारे में
बताता है। कोई भी मिसअंडरस्टैंडिंग नहीं
होती। अगर कोई डिस्प्यूट होगा भी तो डीड
को पढ़ के आसानी से वो डिस्प्यूट सॉल्व
किया जा सकता है। तो हमेशा बोला जाता है
कि रिटन डीड हो तो बहुत अच्छी बात है। अगर
डीड नहीं होगी तो क्या रूल्स चलेंगे बेटा?
रूल्स मैंने आपको बताए हुए हैं। प्रॉफिट्स
और लॉसेस कैसे बटेंगे? बराबर-बराबर।
इंटरेस्ट ऑन कैपिटल नहीं मिलेगा। इंटरेस्ट
ऑन ड्रॉइंग्स चार्ज नहीं होगा। कोई सैलरी
वगैरह नहीं मिलेगी। इंटरेस्ट ऑन लोन फर्म
पे करेगी 6% के हिसाब से। जाए फर्म को
लॉसेस भी क्यों ना हो। ठीक है? उसके बाद
बिना कंसेंट के सारे पार्टनर्स के कंसेंट
के कोई भी न्यू पार्टनर एडमिट नहीं हो
सकता।
परफेक्ट। बिना डीड के बच्चों हर पार्टनर
बिज़नेस में कंडक्ट कर सकता है और बिनेस की
बुक्स को इंस्पेक्ट भी कर सकता है। देन वी
हैव पीएंडएल एप्रोप्रिएशन अकाउंट का
क्या-क्या फीचर्स हैं बच्चों? पीएंडएल
एप्रोप्रिएशन अकाउंट। पीएंडएल का
एक्सटेंशन कहलाता है। यह पार्टनरशिप
फर्म्स बनाती है। सिर्फ और कोई नहीं
बनाता। नॉमिनल अकाउंट है डेबिट ऑल
एक्सपेंसेस, क्रेडिट ऑल इनकम्स एंड गेंस।
उसके बाद बच्चों हमारे पास इसका काम क्या
है? प्रॉफिट को डिस्ट्रीब्यूट करना। और
जितनी भी एंट्रीज हैं वो पार्टनरशिप डीड
के हिसाब से करी जाती है। इसके बाद आता है
बच्चों रिकॉन्स्टिट्यूशन किसको बोलते हैं?
रिकॉनस्टिट्यूशन बोलते हैं जब पुराना
एग्रीमेंट खत्म हो जाए और नया एग्रीमेंट
पिक्चर में आए उसको हम रिकॉन्स्टिट्यूशन
बोलते हैं। बोल रहा है पार्टनरशिप इज़ अ
रिजल्ट ऑफ़ एग्रीमेंट बिटवीन पर्संस जो
प्रॉफिट को बांटेंगे। अगर कोई भी चेंज
होगा एग्रीमेंट में तो पुराने वाला खत्म
होगा और नया एग्रीमेंट बनेगा। इसी को हम
रिकॉन्स्टिट्यूशन बोलते हैं।
रिकॉन्स्टिट्यूशन कब-क होता है? बस ये याद
रखना। कब-कब होता है? चेंज इन पीएसआर हो
जब रेश्यो चेंज हो। ये आपका चैप्टर भी है।
जब एडमिशन हो ये भी आपका चैप्टर है। जब
रिटायरमेंट हो ये भी आपका चैप्टर है। किसी
पार्टनर की डेथ हो जाए ये भी आपका चैप्टर
है। तो चार तो आपके चैप्टर्स ही हैं जब
रिकॉन्स्टिट्यूशन होगा। चेंज इन पीएसआर
एडमिशन, रिटायरमेंट, डेथ। लेकिन सीबीएसई
पूछता है पांचवा बताओ क्या है? तो वो है
एमल्गमेशन। ध्यान रखना। एमल्गमेशन का मतलब
होता है बच्चों जब दो फर्म्स मिलके एक
फर्म बनाती है उसको एमल्गमेशन बोल देते
हैं। डन। अच्छा जी। चेंज इन प्रॉफिट
शेयरिंग रेशियो में क्या-क्या
एडजस्टमेंट्स होती हैं? तो ऐसे ही है। कुछ
काम का नहीं है। सैक्रिफाइजिंग रेशियो का
फार्मूला याद रखना। ओल्ड माइनस न्यू।
गेनिंग का न्यू माइनस ओल्ड। चलो गुडविल
क्या होता है सर? गुडविल की डेफिनेशन याद
रखनी है बच्चों। ये लॉर्ड एल्डन वाली
डेफिनेशन याद कर लेना। एग्जाम में आएगा तो
यही लिख के आना। गुडविल क्या है? गुडविल
इज़ नथिंग मोर देन द प्रोबेबिलिटी। गुडविल
एक प्रोबेबिलिटी है। दैट ओल्ड कस्टमर्स
विल रिसोर्ट टू ओल्ड प्लेस। कि पुराना
कस्टमर वापस उसी दुकान पे आएगा जिससे उसने
पहले सामान लिया था। वो क्यों आ रहा है?
क्योंकि आपने गुडविल बनाई है, रेपुटेशन
बनाई है। फीचर्स क्या हैं गुडविल के?
इनटेंजिबल एसेट है। यानी आप जो गुडविल है
उसको देख नहीं सकते। आप सिर्फ उसको फील कर
सकते हो। वैल्यूुएबल एसेट है। इसकी वैल्यू
लग सकती है। ये बिनेस को ज्यादा पैसा
कमाने में हेल्प करता है एक नॉर्मल बिज़नेस
से। इसकी वैल्यू कॉन्सेंटली ऊपर नीचे ऊपर
नीचे होती रहती है। ठीक है बेटा? देखो बोल
रहा है व्हाइल गुडविल डज़ नॉट डेप्रिशिएट।
ये डेप्रिशिएट नहीं होता। लेकिन फिर भी
वैल्यू टाइम के साथ ऊपर नीचे ऊपर नीचे
होती रहती है अर्निंग्स के हिसाब से। ठीक
है? इट इज़ वैल्यूुएबल ओनली व्हेन द एंटायर
बिज़नेस इज़ सोल्ड। गुडविल को हम पार्ट्स
में नहीं बेच सकते। ये तभी चलेगी जब
बिज़नेस पूरा का पूरा बेचा जाएगा। ठीक है?
क्या गुडविल की हम एग्जैक्ट वैल्यू लगा
सकते हैं?
नहीं। नेचर ऑफ़ गुडविल क्या है बच्चों?
गुडविल एक इंटेंजिबल एसेट है। ध्यान रखना।
एग्जाम में कई बार लिखा आता है गुडविल इज़
अ फिक्टीशियस एसेट। ट्रू और फॉल्स। तो आप
बोलोगे फॉल्स। फिक्टिशियस नहीं है,
इनटेंजिबल है। ठीक है? उसके बाद कौन-कौन
सी चीजों से गुडविल इंपैक्ट होता है? सबसे
पहले लोकेशन। आपका लोकेशन अच्छा है या
नहीं है? लोकेशन अच्छा है तो गुडविल जल्दी
बनेगा। दूसरा एफिशिएंसी मैनेजमेंट कितना
एफिशिएंट है। जितना एफिशिएंट मैनेजमेंट
होगा उतना ज्यादा प्रॉफिट कमाओगे, उतना
गुडविल ज्यादा होगा। बिनेस को चलते हुए
कितना टाइम हो गया है? लोंजिविटी ऑफ़ द
बिज़नेस कितना टाइम हो चुका है। जितने समय
से बिज़नेस चल रहा होगा, उतना रेपुटेशन
ज्यादा होगा बिज़नेस का। नेचर ऑफ द गुड्स
कौन सा बिजनेस कौन से गुड्स में डील करता
है? अगर वो डेली यूज़ के गुड्स हैं तो फिर
उनके अच्छे प्रॉफिट्स बन रहे होंगे। तो
इनकी डिमांड स्टेबल रहती है। तो इनकी
ज्यादा गुडविल होती है। लेकिन फैंसी गुड्स
हैं अगर तो डिमांड ऊपर नीचे होती है तो
फिर गुडविल भी इतनी स्टेबल नहीं होती।
लाइसेंस है या नहीं है? अगर आपके पास
लाइसेंस है तो गुडविल ज्यादा होगी।
लाइसेंस नहीं है तो गुडविल ज्यादा नहीं
होगी। ठीक है? अगर आपकी मोनोपोली है तो
पक्के प्रॉफिट्स होंगे तो गुडविल ऑफ कोर्स
होगी ही होगी। है ना?
रिस्क इनवॉल्वड अगर ज्यादा रिस्क है तो
गुडविल भी कम होगी। ऊपर नीचे होगी। तो
बहुत सारे फैक्टर्स हैं। कोई भी पांच
फैक्टर्स आपको याद होने चाहिए। ठीक है?
इसका भी स्क्रीनशॉट ले
लो। ट्रेंड ऑफ प्रॉफिट कैसा है? फ्यूचर
में कंपटीशन है या नहीं है? कैपिटल कितनी
लगी हुई है? राइट? तो ये सब आपको पता होने
चाहिए। अब गुडविल कौन-कौन सी होती है?
परचेस्ड और सेल्फ जनरेटेड। परचेस्ड कौन सी
होती है? जिसका आप पैसा देते हो जो बुक्स
ऑफ़ अकाउंट्स में दिखाई देती है जिसको आप
राइट ऑफ करते हो हर चैप्टर में। है ना? और
सेल्फ जनरेटेड आपकी खुद की गुडविल। इसको
इनहेरेंट गुडविल भी बोल देते हैं। तो
परचेस्ड गुडविल आपको नॉर्मली कैसे देखने
को मिलता है? गुडविल कैसे निकालते हो?
देखो, बोल रहा है एसेट्स माइनस लायबिलिटीज़
इज़ रेफर्ड टू एज़ परचेस्ड गुडविल। सर, ऐसे
कैसे? भाई, देखो, सीधी-सीधी सी बात है।
आपने जो पेमेंट करा
है ये लाइन ध्यान रखना। द एक्सेस ऑफ परचेस
कंसीडरेशन ओवर नेट एसेट्स। इसको हम गुडविल
बोलते हैं। एक्सेस ऑफ़ परचेस कंसीडरेशन ओवर
नेट एसेट्स। नेट एसेट्स हैं ये एसेट्स
माइनस लायबिलिटी। सपोज़ ₹10 के एसेट है। ₹3
की लायबिलिटी है तो बिज़नेस ₹7 का हो गया।
नेट एसेट ₹7 के हो गए। और आपने खरीदा है
इसको परचेस कंसीडरेशन है ₹9 का। तो सात
वाली चीज के आप नौ दे रहे हो तो ₹2 किस
चीज के दे रहे हो? वो गुडविल है। ठीक है?
तो परचेस गुडविल कैसे कैलकुलेट होती है? द
एक्सिस ऑफ़ परचेस कंसीडरेशन ओवर नेट
एसेट्स। सही है? ये ध्यान लाइन ध्यान
रखना। ये आपको एमसीक्यू में देखने को मिल
सकती है। फीचर्स बताओ परचेस गुडविल के। जब
आप परचेस खरीद जब आप बिनेस परचेस करते हो
तब आपको देखने को मिलेगी। बुक्स ऑफ
अकाउंट्स में हमारे पास ये रिकॉर्ड करी
जाती है। ठीक है? बैलेंस शीट में एसेट के
तरीके से दिखाई जाती है और इसको अमोरेटाइज
कर दिया जाता है एट द अर्लियस्ट। सही है
जी। सेल्फ जनरेटेड कौन सी होती है? जो
सेल्फ जनरेटेड गुडविल आपकी खुद की होती
है। वो हमने पीछे पढ़ ली। इंटरनली जनरेट
होती है। अकाउंटिंग स्टैंडर्ड 26 इंडिया
ईएस 36 अ 38 इनटेंजिबल एसेट ये बोलता है
कि इसको रिकॉर्ड नहीं करना। ये अकाउंटिंग
स्टैंडर्ड और इंडिया ईएस याद रखना। ठीक
है? गुडविल को कब-कब वैल्यू करा जाएगा
बच्चों ये आप जानते हो। जब प्रॉफिट
शेयरिंग रेशियो चेंज होगा या न्यू पार्टनर
आएगा या पार्टनर की रिटायरमेंट डेथ होगी
या फर्म बेची जाएगी या फर्म का अमेल्गमेशन
होगा। ठीक है? मेथड्स क्या-क्या हैं? ये
सब हमने पढ़ लिया है। एवरेज प्रॉफिट, सुपर
प्रॉफिट, कैपिटलाइजेशन। इसमें तो बस
फार्मूलाज़ हैं। ठीक
है? इसके बाद बच्चों बोल रहा है एडमिशन
में जब एक पार्टनर का एडमिशन होता है, तो
उसको क्या-क्या राइट्स मिलते हैं? सबसे
पहला राइट्स कि वो प्रॉफिट शेयर करेगा।
दूसरा राइट्स वो एसेट्स के ओनरशिप भी शेयर
करने वाला है। ठीक है? लेकिन उसके साथ-साथ
वो लायबल भी हो जाएगा लायबिलिटी के लिए।
ये भी डन है सर। एडमिशन में क्या-क्या
करते हो आप? ये सब आपको पता ही है। इसमें
कुछ खास काम नहीं है। इसके बाद बेटा हमारे
पास लिखा हुआ है रिटायरमेंट ऑफ़ अ पार्टनर।
जब एक रिटायरिंग पार्टनर होगा तो वो
क्या-क्या लेके जाएगा? अपना गुडविल का
हिस्सा, अपना रिजर्व्स का हिस्सा, अपना
रिवैल्यूएशन में प्रॉफिट या लॉस। ये सब
चीजें ठीक है। क्या-क्या पढ़ना है हमें
रिटायरमेंट में? ये आ गया। इसके बाद हमारे
पास आता है बच्चों डिसोल्यूशन। कि
डिसोल्यूशन का क्या मतलब है? क्या फर्क
है? तो देखो दो चीजें हैं। डिसोल्यूशन ऑफ़
पार्टनरशिप और डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप
फर्म। डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप का मतलब
होता है बस पार्टनरशिप का खत्म होना।
पुराने एग्रीमेंट का खत्म होना। उसको हम
डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप बोलते हैं।
डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप फर्म का क्या
मतलब होता है? बिनेस का ही बंद हो जाना।
तो ध्यान रखना बिज़नेस बंद होने के लिए
पार्टनरशिप फर्म का डिॉल्व होना जरूरी है।
पुराना एग्रीमेंट खत्म। नया एग्रीमेंट बन
रहा है वो डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप है।
देखो लिखा हुआ है डिसोल्यूशन ऑफ़
पार्टनरशिप मींस टर्मिनेशन ऑफ़ ओल्ड
पार्टनरशिप एग्रीमेंट और नया बनेगा। राइट?
जबकि डिसोल्यूशन ऑफ़ फर्म मींस क्लोज्ड
डाउन ऑफ द बिनेस। ठीक है बेटा? डिसोल्यूशन
जो
है पार्टनरशिप का पार्टनरशिप का मतलब
पुराना एग्रीमेंट खत्म कब-कब होगा अगर
रेशो चेंज होगा एडमिशन होगा रिटायरमेंट
होगा किसी बिनेस को निकाल दिया जाएगा
एक्सपशन होगा किसी पार्टनर की डेथ होगी
इनसॉल्वेंसी होगी किसी पार्टनर की या फिर
पार्टनरशिप का टाइम पीरियड खत्म हो गया
क्योंकि फिक्स्ड टाइम पीरियड वाली
पार्टनरशिप भी तो होती है वो खत्म हो गया
तब भी पुराना खत्म फिर नया बनेगा लेकिन
फर्म कब बंद होगी अब देखो बच्चों फर्म
फर्म बंद करने के क्या-क्या तरीके हैं?
सबसे पहले विदाउट द इंटरवेंशन ऑफ कोर्ट
जिसमें आपको कोर्ट नहीं जाना पड़ेगा। खुद
ही फर्म बंद हो जाएगी। कब? बाय म्यूचुअल
एग्रीमेंट। आपने अपने हिसाब से खुद ही
एग्रीमेंट करके डिॉल्व कर दिया कि हमने
बिज़नेस करा था। अब हमने बहुत कर लिया। अब
नहीं चला पा रहे। बस बंद कर दो। तो
म्यूचुअली कर दिया। इसमें कोर्ट की जरूरत
नहीं पड़ती। कंपलसरीली डिसोल्यूशन।
कंपलसरीली कब होता है? जब सारे के सारे
पार्टनर जो हैं वो इनसॉल्वेंट हो जाए।
सारे के सारे पार्टनर जो हैं वो
इनसॉल्वेंट हो जाए या फिर बिजनेस अनलॉफुल
हो जाए तो भी यह क्या हो
जाएगा? बिनेस डिॉल्व हो जाएगा या फिर कोई
इवेंट हो जाए। क्या इवेंट हो जाए? पार्टनर
कोई इनसॉल्वेंट हो जाए। डेथ हो जाए किसी
पार्टनर की। आपका जो ऑब्जेक्ट है वो
फुलफिल हो जाए या टाइम पीरियड एक्सपायर हो
जाए। है ना? या नोटिस देके भी आप लोग अगर
चाहो तो पार्टनरशिप को डिॉल्व कर सकते हो।
ठीक है जी। परफेक्ट। अब कोर्ट कब ऑर्डर
देता है? तो सबसे पहले तो आप ये ध्यान
रखना कि बिना कोर्ट के इंटरवेंशन के कब कब
हो सकता है? म्यूचुअल एग्रीमेंट से।
कंपलसरी हो सकता है कब? जब सारे पार्टनर्स
या कोई एक पार्टनर इनसॉल्वेंट हो जाए। या
फर्म का जो बिजनेस है वो अनलॉफुल हो जाए।
या इसमें से कोई एक इवेंट हो जाए,
इनसॉल्वेंसी हो जाए, डेथ हो जाए पार्टनर
की। ऑब्जेक्ट जिसके लिए पार्टनरशिप बनाई
थी वो फुलफिल हो जाए। टाइम पीरियड
एक्सपायर हो जाए। राइट? अच्छा कोर्ट को कब
आना पड़ता है? कोर्ट में जाके कब
पार्टनरशिप डिॉल्व होती है? कोर्ट में
जाके पार्टनरशिप डिॉल्व होती है बेटा? जब
कोई पार्टनर अनसाउंड माइंड हो जाए। पागल
हो जाए तो फिर बाकी पार्टनर कोर्ट में
जाते हैं। जज साहब को बोलते हैं कि साहब
ये तो अनसाउंड माइंड है। अब इससे
एग्रीमेंट भी नहीं कर पा रहे। आप ही ऑर्डर
दो। इसको बंद कराओ। ठीक है? जब एक पार्टनर
कुछ सूट फाइल कर दे कि मैं तो इनकैपेबल
हूं। मैं अपनी ड्यूटी नहीं निभा सकता।
कोर्ट में जाके बोल दे तो फिर जज साहब
बोलेंगे ठीक है बिज़नेस बंद करो। ऐसा हो
सकता है। जब एक पार्टनर मिसकंडक्ट करता
हुआ पाया जाए कि भैया ये नुकसान कर सकता
है पार्टनरशिप में और खुद से जा नहीं रहा
तो बाकी पार्टनर कोर्ट में जाके बोलेंगे
जज साहब इसको प्लीज बंद करा दो है ना? कोई
ब्रीच कर दे पार्टनर एग्रीमेंट का।
एग्रीमेंट तोड़ दे। ब्रीच का मतलब होता है
तोड़ना। एग्रीमेंट को फॉलो ना करना। ठीक
है? या फिर अपना पूरा का पूरा हित किसी
तीसरी पार्टी को बेच दे। अपना शेयर किसी
थर्ड पार्टी को बेच दे या कोर्ट को लगे कि
भाई बिजनेस में लॉस ही हो रहे हैं। बिजनेस
में प्रॉफिट कभी होने ही नहीं वाले। तब भी
कोर्ट ऑर्डर दे सकता है कि बंद कर दो। ठीक
है? परफेक्ट। तो ये सब कोर्ट के ऑर्डर्स
पे बिनेस बंद हो सकता है। ठीक हो गया
बेटा? उसके बाद एक बेसिक सा डिफरेंस है।
डिसोल्यूशन ऑफ़ पार्टनरशिप में सिर्फ
एग्रीमेंट चेंज होगा। फर्म में फर्म ही
बंद हो जाएगी। इसमें बिज़नेस चलता रहता है।
उसमें बिज़नेस नहीं चलता। ठीक है? इसमें जो
पार्टनर्स के रिलेशन है वो नए फॉर्म में
बनेंगे। वहां पे रिलेशंस खत्म हो जाते
हैं। यहां पे बुक्स ऑफ अकाउंट्स क्लोज
नहीं होती वहां पे क्लोज होती हैं। यहां
पे एसेट्स और लायबिलिटीज़ को बेचते नहीं
है। बस रिवैल्यू करते हैं। प्रॉफिट्स और
लॉसेस को डिस्ट्रीब्यूट करते हैं। वहां पे
एसेट्स और लायबिलिटीज़ का सेटलमेंट फाइनल
कर दिया जाता है। ठीक है? डिसोल्यूशन ऑफ़
पार्टनरशिप से जरूरी नहीं है कि फर्म भी
बंद होगी। लेकिन फर्म से ऑफ कोर्स
पार्टनरशिप भी बंद हो जाएगी। इसके अंदर
कोई कोर्ट का इंटरवेंशन नहीं है। वहां पे
कोर्ट का इंटरवेंशन हो सकता है।
डिसोल्यूशन के अकाउंट्स कैसे सेटल करते
हैं बच्चों? इस बात का भी प्लीज ध्यान
रखना। बहुत ध्यान से। बहुत बहुत ध्यान से।
देखो क्या बोल रहा है? सेक्शन 48 ये चीज
आपसे पूछ सकता है थ्योरी में। सेक्शन 48
ने ये बताया है कि मोड ऑफ सेटलमेंट क्या
रहने वाला है? क्या-क्या मोड ऑफ सेटलमेंट
रहने वाला है? सबसे पहले ध्यान रखना द
अमाउंट ऑफ लॉस इंक्लूजिंग द डेफिशिएंसी ऑफ़
द कैपिटल शैल बी पेड आउट ऑफ प्रॉफिट। सबसे
पहले तो आपको जो भी कैपिटल पेमेंट करना है
या जो भी पेमेंट करना है वो आउट ऑफ
प्रॉफिट होगा। उसके बाद आउट ऑफ कैपिटल
होगा। और लास्टली अगर फिर भी पैसा कम पड़
गया तो पार्टनर अपने घर से लेके आएंगे।
यानी आपको कोई भी पेमेंट करना है लॉस का
तो सबसे पहले प्रॉफिट में से होगा।
प्रॉफिट कम पड़ गया तो कैपिटल में से
होगा। वो भी कम पड़ गया तो फिर पार्टनर्स
घर से लेके आएंगे। पैसा तो देना ही है। है
ना? उसके बाद अमाउंट रियलाइज़्ड फ्रॉम द
सेल ऑफ़ एसेट। जो आप एसेट बेचोगे उससे जो
पैसा आएगा सॉरी जो आप एसेट बेचोगे उससे जो
पैसा आएगा वो कैसे यूटिलाइज़ होगा? सबसे
पहले उस पैसे से कर्जे चुकाए जाएंगे। उसके
बाद अगर कोई लोंसवों्स हैं वो पे करे
जाएंगे। है ना? पार्टनर्स के लोंस पे करे
जाएंगे। यानी सबसे पहले तो आउटसाइडर का
पैसा। उसके बाद जो पार्टनर से लोन लिए हुए
हैं वो चुकाए जाएंगे। उसके बाद पार्टनर का
कैपिटल का पेमेंट करा जाएगा। उसके बाद कुछ
बच गया तो पार्टनर्स आपस में बांट लेंगे।
ये ऑर्डर ध्यान रखना। पहले आउटसाइड डेप्ट
को चुकाया जाएगा। फिर पार्टनर्स के लोन को
चुकाया जाएगा। फिर पार्टनर्स का कैपिटल पे
करा जाएगा और फिर भी कुछ बच गया तो
प्रॉफिट्स के फॉर्म में बांट लेंगे। ठीक
है बेटा? उसके बाद आ रहा है फर्म के कर्जे
और प्राइवेट कर्जे। इसमें क्या फर्क होता
है? देखो डेप्ट जो फर्म ने पे करने हैं
उसको हम फर्म डेप्ट बोलते हैं। और जो
पार्टनर ने अपनी कैपेसिटी में पे करने हैं
उसको हम प्राइवेट डेप्ट्स बोल देते हैं।
ठीक हो गया बेटा? ओके परफेक्ट। डन सर ये
बात तो समझ गए।
डन। ये एक छोटा सा डिफरेंस है। ये तो बस
रीड ओनली है। वैसे एक बार पढ़ लेना।
क्या-क्या बनता है इसमें रियलाइजेशन लोन
अकाउंट दोनों तरीके का। पार्टनर कैपिटल
अकाउंट, कैश और बैंक अकाउंट। चलो। जनरल
एंट्रीज तो हमने अलग से पढ़ी हुई है
सारी। जनरल एंट्रीज की हमें जरूरत नहीं
है। इसके बाद बच्चों हमारे पास आता है
कंपनी क्या है? व्हाट इज अ कंपनी? जो हम
कंपनी में मेनली थ्योरी पढ़ते हैं। तो
कंपनी की डेफिनेशन याद रखना बच्चों। सबसे
पहले आर्टिफिशियल पर्सन है जो लॉ से बना
है। यानी कि रजिस्ट्रेशन होगा तो ही
बनेगा। सेपरेट लीगल एंटिटी है। परपचुअल
सक्सेशन है। कॉमन सील है। सेपरेट लीगल
एंटिटी का मतलब कंपनी अलग है। उसके ओनर्स
अलग हैं। कंपनी अपने नाम से एग्रीमेंट कर
सकती है। संपत्ति खरीद सकती है। किसी के
ऊपर केस कर सकती है। कुछ भी कर सकती है
कंपनी। सेपरेट लीगल एंटिटी है। ठीक है?
परपचुअल सक्सेशन मेंबर्स आते-जाते रहेंगे।
कंपनी फॉरएवर चलेगी। कॉमन सील सिग्नेचर को
बोलते हैं। ठीक है? कंपनी आर्टिफिशियल
पर्सन होगी। सेपरेट लीगल एंटिटी होगी।
सेपरेट लीगल एंटिटी का मतलब अपने नाम से
बैंक अकाउंट खोल सकती है। अपने नाम से
संपत्ति खरीद सकती है। किसी भी
कॉन्ट्रैक्ट में एंटर कर सकती है। परपचुअल
एकिस्टेंस है। किसी भी मेंबर की डेथ हो
जाए, रिटायरमेंट हो जाए, पागल हो जाए,
इनॉल्वेंट हो जाए, कंपनी को फर्क नहीं
पड़ता। कंपनी चलती रहेगी। लिमिटेड
लायबिलिटी कंपनी की जो लायबिलिटी है, आपने
जितना पैसा लगाया है, उतनी ही है। बस आपकी
लायबिलिटी कंपनी के टवर्ड्स उतनी ही है।
सपोज मैंने ₹10 लगाए हैं और मैंने आठ दे
दिए हैं। तो बस मैं ₹2 के लिए और लायबल
हूं। उससे ज्यादा के लिए लायबल नहीं हूं।
कॉमन सील सिग्नेचर को बोलते हैं क्या
कंपनी में हम शेयर्स को ट्रांसफर कर सकते
हैं? बिल्कुल कर सकते हैं प्राइवेट कंपनीज़
को छोड़ के। तो प्राइवेट कंपनीज़ में
शेयर्स ट्रांसफर नहीं होते। पब्लिक कंपनीज़
में हो जाते हैं। कंपनी में बच्चों
मैनेजमेंट अलग है। ओनरशिप अलग है। ठीक है?
कितने तरीके की कंपनीज़ होती हैं बेटा?
अनलिमिटेड कंपनी, कंपनी लिमिटेड बाय
गारंटी, कंपनी लिमिटेड बाय शेयर्स।
अनलिमिटेड का मतलब क्या है? जिसके अंदर जो
लायबिलिटी ऑफ़ द पार्टनर्स हैं वो
अनलिमिटेड है। ठीक है? यह हमें जनरली कम
देखने को मिलती है। जनरली कम देखने को
मिलती है। ठीक है? उसके बाद कंपनी लिमिटेड
बाय गारंटी। इसमें क्या होता है कि
लायबिलिटी आपने जितनी गारंटी करी है उतनी
होती है कि मैंने गारंटी कर दी कि भैया
कंपनी को अगर लॉस होगा तो ₹25 लाख तक की
गारंटी मेरी है। मैं लायबल हूं। यह होती
है कंपनी लिमिटेड बाय गारंटी। और यह हमें
सबसे ज्यादा देखने को मिलती है कंपनी
लिमिटेड बाय शेयर्स। प्राइवेट कंपनी जिसके
अंदर सिर्फ प्राइवेट हाउसहोल्ड्स होंगे।
उन्होंने पैसा लगाया है। जितना-जितना उनका
अनपेड कैपिटल है उतना लायबल है। पब्लिक
कंपनी जिसके अंदर जनता पैसा लगाती है।
पब्लिक में शेयर्स बेचे जाते हैं। और
ओपीसी यानी वन पर्सन कंपनी जिसमें एक ही
इंडिविजुअल जैसे सोल प्रोपराइटर होता है
बस वो खुद को एज अ कंपनी रजिस्टर कर देता
है। उसको हम वन पर्सन कंपनी बोलते हैं। तो
ध्यान रखना अनलिमिटेड कंपनी कौन सी होती
है? जिसके अंदर कोई लिमिट नहीं होती
लायबिलिटी की ऑफ़ द मेंबर्स पे। बहुत
ज्यादा रिस्क होता है। तो दीज़ आर नॉट
फाउंड इन इंडिया। कंपनी लिमिटेड बाय
गारंटी में आपने जितने की गारंटी करी है
बस उतने के लिए ही आप लायबल हो। और कंपनी
लिमिटेड बाय शेयर्स में तो शेयर्स के ऊपर
डिपेंड करता है। अब आ गया प्राइवेट कंपनी
और पब्लिक कंपनी। ठीक है? ये स्क्रीनशॉट
लो। मैं आपको डिफरेंस नीचे से समझाता हूं।
देखो प्राइवेट कंपनी में ध्यान रखना
मिनिमम दो मैक्सिमम 200 मेंबर्स होंगे। दो
से 200 पब्लिक में सेवन से अनलिमिटेड। ये
ध्यान रखना। क्लास 11th में पढ़ा होगा
लेकिन फिर से एक बार रिवाइज़ कर लो। क्या
प्राइवेट कंपनी पब्लिक से पैसा रेज कर
सकती है? नहीं। इट कैन नॉट इनवाइट पब्लिक।
पब्लिक कंपनी कर सकती है। क्या प्राइवेट
कंपनी के शेयर्स ट्रांसफर हो सकते हैं?
नहीं हो सकते। पब्लिक के हो सकते हैं।
क्या प्राइवेट कंपनी को आर्टिकल्स बनाना
नेसेसरी होता है? बिल्कुल नेसेसरी होता
है। वहां पे नेसेसरी नहीं है। ठीक है?
नंबर ऑफ़ डायरेक्टर्स जिसमें कम से कम दो
उसमें कम से कम तीन। ये बहुत इंपॉर्टेंट
है। अपने नाम के पीछे प्राइवेट कंपनी
प्राइवेट लिमिटेड लगाएगी और पब्लिक कंपनी
खाली लिमिटेड लगाएगी। ओपीसी क्या होता है
बच्चों? वन पर्सन कंपनी ध्यान रखना ये
2013 से ही आया। उससे पहले नहीं होता था।
तो कंपनीज़ एक्ट 2013 ने एक नई एंटिटी को
एक्सिस्ट करा जिसका नाम है ओपीसी। वन
पर्सन कंपनी जिसमें एक ही मेंबर होगा। ठीक
है? अब मेंबर कौन होना चाहिए भाई? अ मेंबर
हु इज़ एन इंडियन सिटीजन एंड रेजिडेंट।
यानी कोई आउटसाइडर नहीं हो सकता। इंडियन
सिटीजन होना चाहिए। इंडियन रेजिडेंट भी
होना चाहिए। ठीक
है? बढ़िया सर। इसका पेड अप कैपिटल शुड नॉट
एक्सीड ₹ लैक्स। और इसका टर्नओवर ऑफ़ थ्री
इयर्स शुड नॉट एक्सीड ₹ करोड़। एवरेज एवरेज
टर्नओवर बच्चों ₹2 करोड़ से ऊपर नहीं जाना
चाहिए। तो पेड अप शेयर कैपिटल याद रखना 50
लाख और टर्नओवर जो है एवरेज पिछले तीन
सालों का 2 करोड़ से ऊपर नहीं जाना चाहिए।
दूसरा ओपीसी चैरिटेबल पर्पस के लिए नहीं
बन सकता। सिर्फ बिज़नेस के लिए ही बनेगा।
क्या ओपीसी खुद को कन्वर्ट कर सकता है
पब्लिक या प्राइवेट कंपनी में? 2 साल से
पहले नहीं कर सकता। 2 साल के बाद कर
पाएगा। ठीक है बेटा। अच्छा जी।
लेकिन सर अगर पहले ही ये लिमिट क्रॉस हो
जाए। अगर ये 50 लाख से ऊपर जा रहा है या
टर्नओवर 2 करोड़ से ऊपर जा रहा है फिर तब
हो जाएगा। ठीक है। बढ़िया सर। इसके बाद
बेटा हमारे पास लिस्टेड और अनलिस्टेड
कंपनी कौन सी होती है? लिस्टेड कंपनी वो
होती हैं जिसके शेयर्स किसी भी स्टॉक
एक्सचेंज पे लिस्टेड हैं। वो पब्लिक को
शेयर्स इशू करती है। अनलिस्टेड वो होती है
यानी जिसके शेयर्स अभी तक लिस्टेड नहीं
है। ठीक
है? मीनिंग ऑफ शेयर्स। शेयर्स आप समझते
हो। शेयर्स क्या होता है? जो टोटल कैपिटल
ऑफ द कंपनी है, उसको छोटे पार्ट्स में
बांटा जाता है। तो उसको शेयर्स बोलते हैं।
शेयर्स कौन-कौन से होते हैं? प्रेफरेंस
शेयर्स, इक्विटी शेयर्स। ये भी आपको पता
है। ठीक है? शेयर्स कौन-कौन से होते हैं?
प्रेफरेंस और इक्विटी।
ठीक है? एक बात और ध्यान रखना जो सेल्स ऑफ़
गुड्स एक्ट है, शेयर्स ऑफ़ अ कंपनी आर
ट्रीटेड एज़ गुड्स। सेल्स ऑफ़ गुड्स एक्ट
वहां पे शेयर्स को गुड्स कंसीडर करता है।
कितने तरीके के शेयर्स हैं? प्रेफरेंस और
इक्विटी। प्रेफरेंस शेयर्स कौन से होते
हैं? जिनको प्रेफरेंशियल राइट मिलता है कि
डिविडेंड भी पहले मिलेगा इक्विटी से। और
उसके साथ-साथ कंपनी जब वाउंड अप होगी तो
कैपिटल भी पहले मिलेगा। लेकिन इनको वोटिंग
राइट्स नहीं होते। इक्विटी शेयर्स को
वोटिंग राइट्स होते हैं। उसके बाद बच्चों
प्रेफरेंस शेयर्स की कुछ कैटेगरीज हैं।
जैसे क्यूम्युलेटिव और नॉन क्यूम्युलेटिव।
क्यूम्युलेटिव का मतलब क्या होता है? कि
अगर पिछले किसी सालों में इनको डिविडेंड
नहीं मिला तो अगले साल ऐड करके दे देंगे।
उसको क्यूम्युलेटिव बोलते हैं। नॉन
क्यूम्युलेटिव कौन से होते हैं? जिसमें
ऐसा नहीं होता कि पिछले साल नहीं मिला तो
ऐड करके देंगे। ऐसा इसमें नहीं होता। वो
रह जाता है तो रह जाता है। ठीक है? तो
क्यूम्युलेटिव में ऐड करके मिलता है। नॉन
क्यूलेटिव में ऐड करके नहीं मिलता।
पार्टिसिपेटिंग और नॉन पार्टिसिपेटिंग।
पार्टिसिपेटिंग कौन से होते हैं कि अगर
कोई सरप्लस प्रॉफिट हुआ, एडिशनल प्रॉफिट
हुआ तो उसमें भी पार्टिसिपेट करेंगे। नॉन
पार्टिसिपेटिंग में ऐसा नहीं होता। उनका
जो फिक्स्ड है बस उतना ही मिलेगा। सरप्लस
से उनको कोई भी लेना देना नहीं है। ठीक
है? रिडीमेबल इररिडीमेबल कौन से होते हैं?
रिडीमेबल होते हैं जो एक फिक्स्ड पीरियड
में रिडीम हो जाते हैं। उनको रिडीमेबल
बोलते हैं। यानी कंपनी उनका पेमेंट कर
देती है। और इररिडीमेबल होते हैं कि यहां
इनका कोई फिक्स टाइम पीरियड नहीं होता। ये
वाइंड अप पे ही जब कंपनी बंद होगी तभी
इनका पेमेंट होगा। उसके बाद कन्वर्टेबल
नॉन कन्वर्टेबल कौन से हैं? जो इक्विटी
में कन्वर्ट हो जाएंगे वो कन्वर्टेबल। जो
कन्वर्ट नहीं हो सकते वो नॉन
कन्वर्टेबल। इक्विटी शेयर्स हमने देख ही
लिए। ठीक है? देखो जी प्रेफरेंस कौन से
हैं जिनको फिक्स्ड रेट ऑफ़ डिविडेंड मिलता
है। इक्विटी कौन से हैं जिस पे कोई
फिक्स्ड रेट ऑफ़ डिविडेंड नहीं होता।
एरियर्स ऑफ़ डिविडेंड बच्चों अगर
क्यूम्युलेटिव है तो उसमें ऐड ऑन हो के
मिल जाएगा। इक्विटी में ऐसा कुछ भी पर्पस
नहीं है। प्रेफरेंशियल राइट होता है क्या?
पेमेंट ऑफ डिविडेंड में इनको होता है।
उनका डिविडेंड हमेशा प्रेफरेंस के बाद ही
दिया जाएगा। पेमेंट ऑफ कैपिटल में भी पहले
इनका होगा बाद में उनका होगा। वोटिंग
राइट्स इनको वोटिंग राइट्स नहीं होते।
उनको वोटिंग राइट्स होते हैं। पार्टिसिपेट
करते हैं क्या मैनेजमेंट में? ये वो करते
हैं। ये नहीं करते। ठीक है? फिर शेयर
कैपिटल कितने तरीके का होता है बच्चों?
ऑथोराइज्ड शेयर कैपिटल। इसी को हम
रजिस्टर्ड भी बोलते हैं, नॉमिनल भी बोलते
हैं। ऑथराइज्ड शेयर कैपिटल वो है जो कंपनी
के एमओए में लिखा होता है। इट रेफर्स टू द
अमाउंट व्हिच इज़ स्टेटेड इन द मेमोरेंडम
ऑफ एसोसिएशन। ठीक है? ये कंपनी के एमओए
में लिखा होता है। इशूड कैपिटल कौन सा
होता है? जो एक्चुअल में पब्लिक में इशू
किया जाता है। अच्छा ये ध्यान रखना कई बार
ये पूछता है कि जो इशूड है वो किसका पार्ट
है? तो ध्यान रखना इशूड इज़ द पार्ट ऑफ़
ऑथराइज़्ड कैपिटल व्हिच इज़ ऑफर्ड टू द
पब्लिक। ठीक है? सब्सक्राइब्ड क्या है? जो
पब्लिक ने एक्चुअल में सब्सक्राइब करा। यह
किसका पार्ट है? इट इज़ अ पार्ट ऑफ इशूड
कैपिटल व्हिच हैज़ बीन सब्सक्राइब बाय द
पब्लिक। अब सब्सक्राइब में दो होते हैं।
फुल्ली पेड, नॉट फुल्ली पेड। फुल्ली पेड
तब होता है जब पूरा पैसा मिल गया। नॉट
फुल्ली पेड कब होता है? जब पूरा पैसा मिला
नहीं या कंपनी ने अभी मांगा ही नहीं। ठीक
है? कॉल्ड अप कैपिटल किसको बोलते हैं? ने
जितना पैसा कंपनी ने अभी तक कॉल कर लिया
है। डायरेक्टर्स ने कॉल कर लिया है। जैसे
10 में से अभी ₹6 मांगे तो वही कॉल्ड अप
है। चार अभी अनकॉल्ड है। पेड अप का मतलब
कि कॉल्ड अप में से कितना पैसा एक्चुअली
मिल गया है। ध्यान रखना इट इज़ दैट पोर्शन
ऑफ़ कॉल्ड अप कैपिटल व्हिच हैज़ बीन
एक्चुअली रिसीव्ड। ठीक है? रिजर्व कैपिटल
किसको बोलते हैं बच्चों? यह बहुत
इंपॉर्टेंट है। ध्यान रखना है रिजर्व
कैपिटल में ओनली एन अनलिमिटेड कंपनी
हैविंग अ शेयर कैपिटल व्हाइल कन्वर्टिंग
इंटू अ लिमिटेड कंपनी मे हैव अ रिजर्व
कैपिटल। इसका मतलब ये वो कैपिटल होता है
जो कंपनी अपने पास रिजर्व कर सकती है।
कंपनी बोलती है कि हम इस पैसे को मांगेंगे
ही नहीं। तब मांगेंगे जब कंपनी वाइंड अप
हो रही होगी। उसको हम रिजर्व कैपिटल बोल
देते हैं। ठीक हो
गया? और कैपिटल रिजर्व तो आप जानते ही हो।
कैपिटल रिजर्व क्या होता है? वो सारे
रिजर्व्स जो कैपिटल प्रॉफिट में से बनाए
जाते हैं उनको हम कैपिटल रिजर्व बोलते
हैं। सर कैपिटल प्रॉफिट कौन-कौन से होते
हैं? कोई एसेट बेचा तो प्रॉफिट हुआ। कोई
फिक्स्ड एसेट्स का हमने रिवैल्यूएशन करा
तब हो गया। प्रीमियम आया कोई इशू ऑफ
शेयर्स और डिबेंचर्स पे। ठीक हो गया बेटा?
सही है
क्या? एग्जांपल ये सब दो-तीन याद रख लेना
बस। ठीक है? ये सबसे प्रॉफिट जो होगा वो
कैपिटल रिजर्व में जा सकता है। दोनों में
फर्क देखो। रिजर्व कैपिटल क्या है? द
पोर्शन ऑफ़ अनकॉल्ड कैपिटल जो हम मांगेंगे
ही नहीं। एक्सेप्ट इन द इवेंट ऑफ़ वाइंडिंग
अप। और कैपिटल रिजर्व क्या है? जो कैपिटल
प्रॉफिट में से बनाया जाएगा। क्या रिजर्व
कैपिटल नेसेसरी होता है? नहीं। क्या
कैपिटल रिज़र्व नेसेसरी होता है? यस।
रेज़ोल्यूशन इसके लिए रेज़ोल्यूशन चाहिए
होता है। बोर्ड को बताना पड़ता है।
डायरेक्टर्स को बताना पड़ता है कि हम
रिज़र्व कैपिटल बना रहे हैं। उसके लिए कोई
रेज़ोल्यूशन नहीं चाहिए। ठीक हो गया बेटा।
परफेक्ट है। ओके। जल्दी से स्क्रीनशॉट लो।
यह बैलेंस शीट में नहीं आता। वो बैलेंस
शीट में रिजर्व सरप्लस में आ जाता है। ये
सिर्फ वाइंड अप पे काम आता है। वो कैपिटल
लॉसेस में यूज़ कर सकते हो या बोनस शेयर्स
देने में भी यूज़ कर सकते हो। ठीक है? उसके
बाद ऑथराइज़्ड और इशूड में एक छोटा सा
डिफरेंस लिखा हुआ है। ये भी रीड ओनली है।
आप एक बार रीड कर लेना। ठीक है जी?
परफेक्ट। अब शेयर्स कैसे-कैसे इशू करते
हो? प्राइवेट प्लेसमेंट में। प्राइवेट
प्लेसमेंट का क्या मतलब होता है? जब आप
शेयर्स कुछ सेलेक्टिव इंडिविजुअल्स को
देते हो उसको प्राइवेट प्लेसमेंट बोलते
हैं। पब्लिक सब्सक्रिप्शन जब आप जनता को
देते हो फॉर कंसीडरेशन अदर दैन कैश जब आप
वेंडर को देते हो। कुछ सामान खरीदते हो
उसके बदले में उसको शेयर्स देते हो। तो
प्राइवेट प्लेसमेंट क्या है? द प्रमोटर्स
ऑफ़ द कंपनी आर कॉन्फिडेंट ऑफ़ रेिंग कैपिटल
थ्रू प्राइवेट सोर्सेस एंड कांटेक्ट्स। तो
जब प्राइवेट सोर्सेस और कॉन्टैक्ट्स को
शेयर्स दिए जाते हैं तो उसको हम प्राइवेट
प्लेसमेंट बोल देते हैं।
ठीक है? परफेक्ट है जी। देखो लिखा हुआ है
इन केस ऑफ़ प्राइवेट प्लेसमेंट ऑफ़ शेयर्स
अलॉटज़ विल नॉट सेल द शेयर्स फॉर अ मिनिमम
पीरियड ऑफ़ 3 इयर्स। 3 साल का लॉक इन
पीरियड होता है बच्चों प्राइवेट प्लेसमेंट
के अंदर। ठीक है? उसके बाद वी हैव स्वेट
इक्विटी शेयर्स। स्वेट इक्विटी शेयर्स कौन
से होते हैं? स्वेट इक्विटी शेयर्स का
मतलब वो शेयर्स जो उन लोगों को दिए जाते
हैं जिन्होंने अपना पसीना बहाया है कंपनी
के लिए। मेहनत करी है कंपनी के लिए। वो
कौन लोग हैं? कंपनीज़ के एंप्लाइजज़,
डायरेक्टर्स। अ कंपनी में इशू स्वेट
इक्विटी शेयर्स। स्वेट इक्विटी शेयर्स
मींस इक्विटी शेयर्स इशूड बाय द कंपनी टू
इट्स एंप्लाइजज़ और डायरेक्टर्स एट अ
डिस्काउंट और फॉर कंसीडरेशन अदर दैन कैश।
या तो डिस्काउंट में या फिर उनकी सर्विज
के बदले में दिए जाते हैं जो उन्होंने
अपनी सर्विसेज दी हैं। ठीक है? परफेक्ट।
लेकिन ये जो शेयर्स हैं ये भी 3 साल से
पहले बेचे नहीं जा सकते। ठीक हो गया बेटा?
परफेक्ट है या नहीं है? परफेक्ट सर। तो
स्वेट इक्विटी शेयर सस्ते में ऑफर किए
जाते हैं। और ईशॉप क्या होता है? व्हाट इज़
एंप्लई स्टॉक ऑप्शन प्लान? एंप्लई स्टॉक
ऑप्शन प्लान ये होता है बच्चों जहां पे
देखो ऑप्शन है ये एक। ये क्या है? ये एक
ऑप्शन है। देखो एंप्लई स्टॉक ऑप्शन मींस द
ऑप्शन गिवेन टू द डायरेक्टर्स, ऑफिसर्स
एंड एंप्लाइजज़
टू परचेस और सब्सक्राइब एट अ फ्यूचर डेट।
द सिक्योरिटी ऑफर्ड बाय द कंपनी एट अ
प्रीडटरमिन प्राइस व्हिच यूजुअली इज़ लोअर
देन द मार्केट प्राइस। यानी स्टॉक ऑप्शन
जो है एक ऑप्शन है जो एंप्लाइजज़ को दिया
जाता है कि आप किसी भी फ्यूचर डेट पे जो
स्पेसिफाइड फ्यूचर डेट होगी कंपनी के
शेयर्स को सब्सक्राइब कर पाओगे एक
स्पेसिफाइड प्राइस पे। यानी कि प्राइस
चाहे कुछ भी हो मार्केट में उस टाइम। आज
जो हम स्पेसिफाई कर रहे हैं उस प्राइस पे
आप मार्केट में उन शेयर्स को सब्सक्राइब
कर पाओगे। तो नॉर्मली क्योंकि प्राइस तो
बढ़ता ही है ना शेयर्स का तो डिस्काउंटेड
में ही मिल जाते हैं ये भी। तो एंप्लई
स्टॉक ऑप्शन एक ऑप्शन है जो किसको मिलता
है? ये देखो ऑब्लिगेशन नहीं है। ऐसा नहीं
है कि लेने ही लेने हैं। ऑप्शन है जो होल
टाइम डायरेक्टर्स को, ऑफिसर्स को,
एंप्लाइजज़ को दिया जाएगा कि आप परचेस कर
सकते हो किसी भी फ्यूचर डेट पे
सिक्योरिटीज़ एट अ प्रीडटरिंड प्राइस। और
वो प्राइस नॉर्मली कम होता है मार्केट
प्राइस से। ठीक है बेटा? ये वॉलंटरी स्कीम
होती है। इच्छा है कि आप चाहो तो ले सकते
हो नहीं तो नहीं लेना। और ईसोप में भी लॉक
इन होता है। देखो क्या लिखा हुआ है?
शेयर्स अलॉटेड अंडर दिस स्कीम शैल बी
लॉक्ड इन फॉर अ मिनिमम पीरियड ऑफ़ वन ईयर।
एक साल से पहले आप इनको भी बेच नहीं सकते।
ठीक है
जी। बढ़िया हो गया सर। अच्छा ईशॉप क्यों
दिया जाता है? एंप्लाइजज़ को इंस्पायर करने
के लिए, लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएट करने के
लिए, एंप्लाइजज़ के लिए बेनिफिट्स क्रिएट
करने के लिए। तो ये सारी चीजें होती हैं।
पब्लिक सब्सक्रिप्शन बच्चों आप जानते ही
हो। भाई सबसे पहले प्रोस्पेक्टस इशू करना,
फिर एप्लीकेशन रिसीव करना, अलॉटमेंट करना,
फिर कॉल्स मांगना। ये हमारा बेसिक
है। कुछ छोटी-छोटी सी चीजें हैं बेटा इसके
अंदर भी। जैसे द अमाउंट टू बी कॉल्ड ऑन
एप्लीकेशन, अलॉटमेंट या कॉल शैल नॉट
एक्सीड 25% ऑफ द इशू। 25% से ऊपर नहीं
होना चाहिए। जितना भी अमाउंट ऑफ शेयर्स है
वो फुल्ली कॉल्ड अप कर लेना है आपने 12
महीने के अंदर-अंदर। जब आपने अलॉट करा है
उससे 12 महीने के अंदर-अंदर आपको कर लेना
है। कम से कम 1 महीने का इंटरवल होना
चाहिए दो कॉल्स के बीच में। शेयरहोल्डर को
कम से कम 14 डेज पहले नोटिस देना पड़ेगा
कि अमाउंट दे दो आप। और जो कॉल्स हैं वो
यूनिफॉर्म बेसिस पे ही आपने मांगनी है। अन
बहुत उल्टी सीधी बेसिस पे नहीं मांगनी।
ठीक है? उसके बाद आता है बेटा प्रीलिमिनरी
एक्सपेंसेस। किसको बोलते हैं? जो कंपनी को
बनाने में खर्चे आते हैं उनको हम
प्रिलिमिनरी एक्सपेंसेस बोल देते हैं। सही
हो गया बेटा? फिर फॉर फीचर आ गया। उससे
पहले कॉल्स इन सिनेरियर्स। कॉल्स इन
एडवांस। कॉल्स इन एररियर्स क्या है? अगर
कोई शेयरहोल्डर अपना पैसा नहीं दे पाता।
कॉल्स इन एडवांस क्या है? जब वो एडवांस
में दे देता है। ये डेबिट बैलेंस है। ये
क्रेडिट बैलेंस है। ठीक है? इस पे
इंटरेस्ट 10% उस पे इंटरेस्ट 12% ये
मैक्सिमम है। ओके? उसके बाद जो इंटरेस्ट
ऑन कॉल्स इन एररियर्स हैं ये कंपनी के लिए
इनकम है। वो कंपनी के लिए एक्सपेंस है।
राइट? ये कहां दिखाया जाता है? कि कहां
दिखाया जाता है? कॉल्स सिनेरियर्स
सब्सक्राइब्ड कैपिटल में से माइनस करके।
है ना? और वो कहां दिखाया जाता है? अदर
करंट लायबिलिटीज़ में। उसके बाद बच्चों
डिबेंचर्स आ गया। डिबेंचर्स क्या है
हमारे? डिबेंचर्स से एक ऑब्लिगेशन है।
डिबेंचर एक ऑब्लिगेशन है कंपनी का कि
कंपनी पैसा ले रही है और वो फ्यूचर में पे
कर देगी। राइट? डिबेंचर इंक्लूड डिबेंचर
स्टॉक, बोंड्स, एनी सिक्योरिटीज़ जो चार्ज
भी बना सकती है और नहीं भी बना सकती।
कैरेक्टरिस्टिक्स क्या है? कंपनी इशू करती
है सर्टिफिकेट के फॉर्म में। एकनॉलेजमेंट
ऑफ़ डेप्ट है कि ठीक है हमने कर्जा लिया
है। डिबेंचर कंपनी की सील के अंडर इशू करे
जाते हैं। यानी कॉमन सील के अंडर इशू करे
जाते हैं। इसमें कॉन्ट्रैक्ट ऑफ रीपेमेंट
होता है कि फ्यूचर में पे किया जाएगा।
राइट? देखो लिखा हुआ है नो कंपनी इज़ अलाउड
टू इशू डिबेंचर्स हैविंग मैच्योरिटी डेट
ऑफ़ मोर देन 10 इयर्स। 10 साल से ज्यादा
नॉर्मली डिबेंचर का टाइम पीरियड नहीं
होता। लेकिन अगर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी है
तो वो 10 साल से ज्यादा का डिबेंचर इशू कर
सकती है। लेकिन वो 30 से ज्यादा नहीं होना
चाहिए। ठीक है? ओके। उसके बाद बेटा
डिबेंचर का कूपन रेट किसको बोलते हैं हम?
इंटरेस्ट को। इंटरेस्ट को हम लोग कूपन रेट
भी बोलते हैं। सही हो गया
बेटा। बाकी तो ऐसा ही है। कितने तरीके के
डिबेंचर्स होते हैं बच्चों? सिक्यर्ड
डिबेंचर्स, अनसिक्यर्ड डिबेंचर्स।
सिक्यर्ड को ही मॉर्गेज बोलते हैं।
अनसिक्यर्ड को ही नेकेड बोलते हैं। ठीक
है? तो सिक्यर्ड कौन से हैं? जिनको बैक
किया जाता है किसी ना किसी एसेट से। यानी
कि अगर डिबेंचर का पेमेंट नहीं कर पाई
कंपनी तो ये एसेट बिकेगा और पैसा मिलेगा।
उसको सिक्यर्ड बोलते हैं। अनसिक्यर्ड कौन
से होते हैं? जिसके अंदर ऐसी कोई
सिक्योरिटी नहीं रखी जाती। तो ये
अनसिक्यर्ड होते हैं। ठीक है? ये हमें
यूजुअली देखने को नहीं मिलते। यूजुअली
हमें सिक्यर्ड ही देखने को मिलते हैं
बेटा। उसके बाद कौन से आ रहे हैं?
रजिस्टर्ड डिबेंचर्स और बियरर्डर
डिबेंचर्स। रजिस्टर्ड कौन से होते हैं? जो
रजिस्ट्रार के पास एंट्री होती है जिनकी।
जो रजिस्ट्रार के पास एंट्री है अगर आपको
ट्रांसफर करने हैं तो रजिस्ट्रार के पास
जाकर एंट्री करानी पड़ेगी। ठीक है? यह
फ्रीली ट्रांसफरेबल नहीं होते। लेकिन
बियरर कौन से हैं? जिनकी कोई एंट्री नहीं
है और फ्रीली ट्रांसफरल है। जिसको चाहे
उसको आप ट्रांसफर कर सकते हो। फिर
रिडीमेबल इररिडीमेबल रिडीमेबल कौन से होते
हैं? जो एक स्पेसिफाइड पीरियड में इनकी
पेमेंट हो जाती है। और इररिडीमेबल कौन से
होते हैं? जो ड्यूरिंग द लाइफ टाइम कंपनी
पे नहीं करती। वाइंड अप के टाइम पे ही पे
करेगी। कन्वर्टेबल कौन से हैं जो एक
फिक्स्ड टाइम के बाद शेयर्स में कन्वर्ट
हो सकते हैं और नॉन कन्वर्टेबल कौन से
होते हैं जो कन्वर्ट नहीं हो सकते। ठीक हो
गया बेटा? फिर शेयर डिबेंचर में डिफरेंस
है। शेयर बेटा ओनर्स फंड का पार्ट है।
डिबेंचर बोरोड फंड का पार्ट है।
शेयरहोल्डर को डिविडेंड मिलेगा। डिबेंचर
होल्डर को इंटरेस्ट मिलेगा। राइट?
डिविडेंड ऊपर नीचे होता है। डिबेंचर पे
इंटरेस्ट फिक्स्ड होता है। सही हो गया
क्या बच्चों?
ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे पॉइंट्स और हैं। ये
भी आप एक बार रीड ओनली है। स्क्रीनशॉट ले
लो बस। सिर्फ रीड ओनली है कि एक को वोटिंग
राइट्स होते हैं। उसको वोटिंग राइट्स कुछ
नहीं होते। राइट? शेयर्स हमेशा अनसिक्यर्ड
होते हैं। वो सिक्यर्ड भी हो सकते हैं। है
ना? चलो। अच्छा एक पॉइंट ये भी इंपॉर्टेंट
है कि शेयर्स जो हैं वो डिस्काउंट पे इशू
नहीं होते। स्वेट इक्विटी शेयर्स को छोड़
के। वहां पे ऐसा नहीं है। वो डिस्काउंट पे
इशू हो सकते हैं। अब इशू ऑफ़ डिबेंचर्स में
आपने पढ़ा ही हुआ है। राइट? परफेक्ट। बस
यहां पे ध्यान रखना। मिनिमम सब्सक्रिप्शन
जो है डिबेंचर्स में 75% होता है। सेबी के
हिसाब से शेयर्स में 90% होता है मिनिमम
सब्सक्रिप्शन। डिबेंचर्स में 75% होता है।
अब यहां तक होती है बच्चों हमारी पूरी
पार्टनरशिप और पूरी की पूरी कंपनी की
थ्योरी। ठीक है? इसके बाद हमारे पास
एनालिसिस में बेटा थ्योरी में सिर्फ मेनली
चैप्टर नंबर टू है जो मैंने आपको पहले
कराया हुआ है। वो फिर भी मैं इसके साथ
अटैच कर देता हूं ताकि आप चैप्टर नंबर टू
भी एक बार रिवाइज कर पाओ। मेनली हमारी
थ्योरी यहीं से बनती है। यहीं से पूछी
जाएगी। तो मुझे उम्मीद है कि आपकी सारी
थ्योरी रिवाइज़ हो जाएगी और आपको काफी कुछ
नया भी इसमें पढ़ने को मिला होगा। छोड़ आप
इसमें कुछ भी नहीं सकते। सब इंपॉर्टेंट
है। ये अच्छे तरीके से पढ़ना ही है। ठीक
है? तो पार्टनरशिप की थ्योरी डन, कंपनी की
थ्योरी डन, एनालिसिस की थ्योरी भी डन है।
इसके बाद अब काफी सारी चीजें आज करनी है।
आज जितनी-जितने क्वेश्चंस कराऊंगा सारे
बहुत ध्यान से करेंगे और उसको कंप्लीट
करेंगे। ठीक है? थैंक यू सो मच एवरीवन।
कीप ग्रोइंग, कीप ग्लोइंग, कीप स्माइलिंग।
एंड अब आप कंटिन्यू करो। कौन सा पार्ट?
एनालिसिस का चैप्टर नंबर टू। चैप्टर नंबर
टू प्योरली थ्यरिटिकल चैप्टर है। एक
डिफरेंस इसके अंदर मोस्टेंट है। वो बहुत
ध्यान से करना है। बाकी सब आपके लिए बहुत
इजी है। दूसरी बात बेटा जब ये चैप्टर आप
पढ़ोगे तो मैं आपको बेसिक समझा रहा हूं।
फिर जो भी बुक आप यूज़ करते हो, जिस भी ऑथर
की बुक आप यूज़ करते हो, उसको खोल के थोड़ा
सा उसमें से आप लर्निंग पार्ट कर लेना।
ठीक है? आओ शुरू करते हैं। सबसे पहले होता
है बच्चों फाइनशियल स्टेटमेंट। एनालिसिस
का मतलब क्या होता है? तो एनालिसिस में
बच्चों सीधी-सीधी सी बातें हैं कि हमने
फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स बनाने सीखे। हमने
सीखा कि कैसे बैलेंस शीट बनता है। हमने
सीखा कि कैसे पीएंडएल बनता है। हमने सीखा
कि कैसे कैश फ्लो बनता है। कैश फ्लो एक
बार तो कराया ही है मैंने। कैश फ्लो कैसे
बनता है। वो सब आपने सीखा। अब उन सारी
स्टेटमेंट्स को कंपेयर करना ताकि ये पता
चले कि ग्रोथ है या नहीं है। रीड करना
पढ़ना आना चाहिए कि कैसे बैलेंस शीट पढ़ी
जाती है। कैसे पीएंडएल पढ़ा जाता है। उनकी
स्टडी करना यानी प्रॉपर्ली वहां से आप कुछ
ना कुछ रिजल्ट्स निकाल पाओ। वहां से कुछ
ना कुछ डाटा निकाल पाओ और उसको समझना ताकि
आपको यह समझ में आए कि आपकी पॉलिसीज, आपकी
प्लानिंग सब अच्छी है भी या नहीं है और
फ्यूचर में कैसे करनी है। इसी को हम
फाइनशियल स्टेटमेंट एनालिसिस बोलते हैं।
तो एनालिसिस में आप कंपेयर करते हो, रीड
करते हो, स्टडी करते हो, अंडरस्टैंड करते
हो। सारी की सारी फाइनशियल स्टेटमेंट्स ऑफ
अ कंपनी। ठीक है? फिर कुछ छोटे-छोटे
टाइप्स आते हैं एनालिसिस के। सबसे पहला
आता है बच्चों एक्सटर्नल एनालिसिस, इंटरनल
एनालिसिस। एक्सटर्नल एनालिसिस नाम में ही
है। वो लोग करते हैं व्हिच इज डन बाय
आउटसाइडर्स जो हमारे ऑर्गेनाइजेशन का
पार्ट ही नहीं है। जितने लोग हमारे
ऑर्गेनाइजेशनंस का हिस्सा ही नहीं है।
जैसे आपका इन्वेस्टर आउटसाइडर है। आपका
बैंक आउटसाइडर है। आपका क्रेडिटर आउटसाइडर
है। अब सर ये स्टडी क्यों करेगा बैंकर?
भाई बैंकर इसलिए करेगा क्योंकि उसने आपको
लोन देना है। पैसा देना है। तो वो स्टडी
तो करेगा ना कि ये कंपनी है कैसी?
क्रेडिटर ने आपको उधार देना है। स्टडी तो
करेगा ना कि दूं या ना दूं। उसके बाद
गवर्नमेंट एजेंसीज़ कि टैक्स वगैरह सही से
करते हैं या नहीं करते हैं। रिसर्चरर्स जो
आपके बारे में रिसर्च कर रहे हैं वो। तो
जितने भी आउटसाइडर्स क्लास 11th में भी हम
लोग इसको पढ़ते हैं एक्सटर्नल यूज़र्स के
नाम से। याद है कि अकाउंट्स के दो यूज़र्स
होते हैं। एक्सटर्नल इंटरनल। तो जो
एक्सटर्नल यूज़र्स होंगे वो जो एनालिसिस
करेंगे उसको एक्सटर्नल एनालिसिस बोला
जाएगा। इंटरनल एनालिसिस क्या है
बच्चों? जो ओनर और मैनेजमेंट करेगा। ओनर
कौन होगा हमारे पास? ओनर होगा बेटा हम लोग
का मेनली मालिक लोग जिसका बिजनेस है जिसकी
कंपनी है और मैनेजमेंट। ये लोग जो स्टडी
करेंगे उसको हम इंटरनल एनालिसिस का पार्ट
मानेंगे। इसके बाद आती है बच्चों
हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल। यही सबसे
इंपॉर्टेंट है। ये सावधान इंडिया है।
एग्जाम में सबसे ज्यादा यही आती हैं। इसको
अभी देखते हैं। देन वी हैव
इंट्राफर्म जिसको हम टाइम
सीरीज जिसको हम
टाइम सीरीज और ट्रेंड एनालिसिस भी बोलते
हैं। और इंटरफर्म जिसको हम क्रॉस सेक्शनल
भी बोलते हैं। देखो सबसे पहले यह समझो कि
इंट्रा क्या होता है? इंट्रा का मतलब होता
है बेटा विद इन द सेम
फर्म। विद इन
द सेम फर्म। इसका मतलब मैं अपनी फर्म के
अंदर ही सारा डाटा एनालाइज कर रहा हूं कि
भाई पिछले साल मेरा नॉन करंट एसेट कितने
का था प्रीवियस ईयर में? इस साल कितने का
है? तो 1 साल, 2 साल, 3 साल जितने भी साल
की आपको स्टडी करनी है। जब आप अपनी ही
ऑर्गेनाइजेशन के अंदर-अंदर चीजों को पढ़
रहे हो, एनालाइज कर रहे हो, स्टडी कर रहे
हो वो होगा इंट्राफर्म एनालिसिस। वहीं पे
अगर मैं ये देखूं कि मेरी कंपनी का ग्रॉस
प्रॉफिट कितना है? मेरी कंपनी
का और किसी दूसरी कंपनी का कितना है? यानी
जब मैं अपनी कंपनी का जीपी किसी दूसरी
कंपनी की जीपी के साथ कंपेयर कर रहा हूं,
एनालाइज कर रहा हूं, उसको बोलेंगे
इंटरफर्म। तो इंटरफर्म का मतलब होता है जो
दो फर्म्स के बीच में कंपैरिजन होता है।
दो कंपनीज़ के बीच में कंपैरिजन होता है।
और इंट्रा क्या होता है? जो सेम फर्म के
बीच में होता है। बेटा। इंट्रा को ही टाइम
सीरीज़ भी बोलते हैं या ट्रेंड एनालिसिस भी
बोलते हैं। और इंटर को हम क्रॉस सेक्शनल
भी बोलते हैं। एमसीक्यू जरूर आ जाते हैं
कि इसका दूसरा नाम क्या है? इसका दूसरा
नाम क्या है? तो याद कर लेना एक बार। ठीक
है? अब इस पे चलते हैं। हॉरिजॉन्टल
एनालिसिस क्या होती है? हॉरिजॉन्टल को ही
हम लोग डायनेमिक भी बोलते हैं। और वर्टिकल
एनालिसिस क्या होती है? इसको हम लोग
स्टैटिक भी बोलते हैं। तो पहले आप
स्क्रीनशॉट लो फिर मैं आपको समझाता हूं।
हॉरिजॉन्टल और
वर्टिकल। देखो
बच्चों ये होती है हमारे पास हॉरिजॉन्टल
एनालिसिस और वर्टिकल एनालिसिस। जो भी
एनालिसिस दो या दो से ज्यादा साल की करी
जाएगी कि प्रीवियस ईयर में इतना करंट ईयर
में इतना देखो दो साल की एनालिसिस कर रहा
हूं ना इसको हम हॉरिजॉन्टल बोलते हैं। तो
हॉरिजॉन्टल में दो या दो से ज्यादा सालों
का जब कंपैरिजन होगा उसको हॉरिजॉन्टल
एनालिसिस बोलेंगे। अगर एक ही साल का हो
रहा है, वन अकाउंटिंग ईयर का हो रहा है तो
उसको हम क्या बोल देते हैं? वर्टिकल
एनालिसिस बोल देते हैं। जैसे आपने
कंपैरेटिव स्टेटमेंट बनाया। सपोज़ आपने
कंपैरेटिव PNL बनाया। तो कंपैरेटिव PNL
में क्या करोगे? करंट ईयर और प्रीवियस ईयर
दोनों होगा ना? A और B फिर C निकलेगा B -
A करके। फिर D निकलेगा C / A * 100 करके।
तो ऐसे चलता है। देखो कंपैरेटिव भी। पहले
A फिर B फिर C फिर D ऐसे चलता है ना? तो
इस तरीके से चल रहा है और दो सालों का
डेटा कंपेयर होता है। तो कंपैरेटिव
स्टेटमेंट्स भी हॉरिजॉन्टल का ही एग्जांपल
है। वहीं पे अगर मैं पीएंडएल का एक कॉमन
साइज़ बनाऊं तो कॉमन साइज़ में आपको क्या
करना होता है? बस एक बेस लेना होता है।
आपने एक बेस ले लिया वो आरएफओ हो गया। तो
आरएफओ / RFO * 100 पहला आ गया। फिर अदर
इनकम अप RFO * 100 दूसरा आ गया। फिर
एक्सपेंसेस / RFO * 100 तीसरा आ गया। फिर
उसके बाद लास्ट में प्रॉफिट अप RFO * 100
तो अल्टीमेटली ऐसे चल रहा है और एक ही साल
की बात हो रही है तो कॉमन साइज वर्टिकल का
एग्जांपल होता है बच्चों। है ना? तो जब आप
एक ही साल का डेटा एनालाइज कर रहे हो उसको
आप वर्टिकल एनालिसिस बोलते हो। दो साल का
कर रहे हो तो हॉरिजॉन्टल बोलते हो। आइटम्स
इसमें सेम आइटम्स की स्टडी होती है बेटा।
जैसे हम जब कंपैरेटिव बनाते हैं तो आरएफओ
को आरएफओ से कंपेयर करेंगे। प्रीवियस और
करंट। है ना? उसके बाद इस तरीके से अदर
इनकम को अदर इनकम से कंपेयर करेंगे।
प्रीवियस और करंट। तो सेम आइटम की स्टडी
होती है। जबकि कॉमन साइज में अलग-अलग
आइटम्स होती हैं। सेम ईयर में ही। पहले
आरएफओ फिर अदर इनकम, फिर एक्सपेंसेस, फिर
प्रॉफिट, फिर टैक्स, फिर प्रॉफिट आफ्टर
टैक्स। अलग-अलग आइटम्स होती हैं। ये आ
गया। ये बच्चों एब्सोल्यूट फॉर्म में भी
होता है और परसेंटेज फॉर्म में भी होता
है। कंपैरेटिव देखते हो अमाउंट में भी
होता है, परसेंटेज में भी होता है। ये
सिर्फ परसेंटेज में होता है। ये सिर्फ और
सिर्फ परसेंटेज में हो जाता है। उसके बाद
बेटा स्टेटमेंट में
यहां पर हम लोग कंपैरेटिव स्टेटमेंट ले
लेते हैं या ट्रेंड एनालिसिस ले लेते हैं।
भाई कंपैरेटिव स्टेटमेंट और ट्रेंड
एनालिसिस इसी में आता है। इधर कॉमन साइज
आता है। ठीक है? अदर नेम इसको बच्चों
डायनेमिक बोलते हैं। इसको बच्चों स्टैटिक
बोलते हैं। एक को डायनेमिक बोला जाता है।
एक को स्टैटिक बोला जाता है। डायनेमिक
क्यों? क्योंकि दो सालों के बीच में
कंपैरिजन हो रहा है। स्टैटिक क्यों?
क्योंकि एक ही साल के बीच में हो रहा है।
इसका भी स्क्रीनशॉट ले लो बच्चों।
डन। यही सबसे इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है इस
चैप्टर में से। बढ़िया।
अब हमारे पास आ रहा है कि देखो ये सात आठ
सात आठ पॉइंटर्स हैं। आपको कोई भी तीन
पॉइंट्स जो आपको इजी लगे अपनी बुक में से
याद कर लेने हैं बेटा। कोई भी तीन-तीन
पॉइंट्स क्योंकि तीन नंबर से ऊपर का
थ्योरी नहीं आने वाला। तो आपको कोई भी
तीन-तीन पॉइंट्स जो हैं याद कर लेने हैं।
देखो क्या दिया हुआ है? बोल रहा है पर्पस
क्या है एनालिसिस का? हम एनालिसिस क्यों
कर रहे हैं? व्हाई? तो ये बेटा लर्निंग
वाला पार्ट है। सारे के सारी पॉइंटर्स मैं
आपको समझा रहा हूं। कोई भी तीन जो आसानी
से याद कर सको कर लेना। टू मेजर द अर्निंग
कैपेसिटी। हम लोग ये एनालाइज करते हैं कि
हमारी प्रॉफिटेबिलिटी क्या है? हम कितना
पैसा कमा सकते हैं? हम अलग-अलग रेशियोज़
निकालते हैं ना प्रॉफिटेबिलिटी रेशियोज़
वो। क्यों निकालते हैं? एनालाइज़ करने के
लिए। राइट? टू मेज़र द सॉल्वेंसी। हम लॉन्ग
टर्म पोजीशन चेक करते हैं कि कंपनी अपने
लॉन्ग टर्म बोरोइंग्स पे कर भी पाएगी या
नहीं कर पाएगी। स्टडी करके ही तो पता
चलेगा। उसके बाद टू मेज़र द फाइनेंशियल
स्ट्रेंथ। हम बैलेंस शीट को अच्छे से
कंपेयर करते हैं। कंपैरेटिव स्टेटमेंट्स
बनाते हैं। कॉमन साइज स्टेटमेंट्स बनाते
हैं। उससे हमें पता चलता है रेशोज़ निकालते
हैं। उससे हमें स्ट्रेंथ पता चलती है।
बैलेंस शीट की डे इक्विटी क्या है? टोटल
एसेट्स टू डे क्या है? मल्टीपल रेशियोज़
निकालते हो ना? चौथा टू मेक कंपैरेटिव
स्टडी। ये मैंने आपको अभी ऊपर ही बता दिया
ताकि आप कंपेयर कर पाओ। पांचवा कैपेबिलिटी
पता लग सके कि पेमेंट कर भी पाएंगे या
नहीं कर पाएंगे। है ना? बिज़नेस के ट्रेंड
देखना कि पहले साल क्या, फिर अगले साल
क्या, फिर अगले साल क्या, फिर उससे अगले
साल क्या? ये सब एनालिसिस से ही पता
चलेगा। टू जज द एफिशिएंसी ऑफ़ मैनेजमेंट।
जब हम एनालाइज़ करेंगे बच्चों, तो जितने
पॉजिटिव रिजल्ट्स आ रहे होंगे, उतना
एफिशिएंट है मैनेजमेंट। जितने नेगेटिव
रिजल्ट्स आ रहे होंगे, उतना इनफिशिएंट है
मैनेजमेंट। तो मैनेजमेंट की एफिशिएंसी जज
करने के लिए भी एनालिसिस करी जाती है।
उसके बाद यूज़फुल इनेशन देना यूज़र्स को।
जितने भी यूज़र्स हैं चाहे वो इंटरनल हो,
चाहे वो एक्सटर्नल हो, सबको देने के लिए
एनालिसिस किया जाता है। परफेक्ट। चलो
सर। इसके बाद आता है बच्चों, क्यों
इंपॉर्टेंट है एनालाइज़ करना? व्हाई इट इज़
वेरीेंट टू एनालाइज़। तो देखो सब कुछ आ
जाता
है। मैनेजमेंट के लिए क्यों इंपॉर्टेंट
है? टू चेक द परफॉर्मेंस। ताकि हम
परफॉर्मेंस चेक कर सकें। इन्वेस्टर के लिए
क्यों इंपॉर्टेंट है? ताकि वो कंपनी की
पोजीशन चेक कर पाए कि हम इसको पैसा दें भी
या ना दें। क्रेडिटर के लिए क्यों
इंपॉर्टेंट है? ताकि वो क्रेडिट वर्दीनेस
चेक कर पाए कि ये कंपनी क्रेडिट वर्दी भी
है या नहीं है। गवर्नमेंट के लिए क्यों
इंपॉर्टेंट है? ताकि वो टैक्स कंप्लायंस
देख पाए कि कंपनी टैक्स कंप्लायंस या लीगल
कंप्लायंसेस फॉलो करती भी है या नहीं करती
है। तो टैक्स कंप्लायंसेस लीगल
कंप्लायंसेस के लिए। फाइनेंसियल
इंस्टीटशंस के लिए क्यों? फाइनेंसियल
इंस्टीटशंस भी बच्चों मेनली क्रेडिट
वर्दीनेस ही देखते हैं कि कंपनी की क्या
पोजीशंस हैं। तो देखो बहुत सारी पार्टीज
के लिए अलग-अलगेंस है इसकी। है ना?
एंप्लाइजज़ के लिए क्यों? ताकि वो देख पाएं
कि ये कंपनी हमारी सैलरी वगैरह भी टाइम पे
दे देगी या नहीं दे देगी? स्टॉक एक्सचेंज
अथॉरिटीज़ के लिए क्यों? कि अगर ये कंपनी
हमारे यहां लिस्टेड कंपनी है, शेयर वगैरह
इशू करने के लिए आएगी तो क्या ये कंपनी
सही भी है? भागुक तो नहीं जाएगी। टैक्सेशन
अथॉरिटीज़ के लिए क्यों? वही टैक्स
कंप्लायंस सही से हो रहा है या नहीं हो
रहा है? अदर पार्टीज के लिए क्यों? ताकि
पता लग सके कंपनी एक्चुअल में प्रॉफिटेबल
है। कंपनी की फाइनेंसियल पोजीशन क्या है?
कंपनी की पब्लिक रिलेशंस कैसे हैं? कंपनी
की परफॉर्मेंस कैसी है? गोल्स कैसे हैं?
तो सबके लिए कुछ ना कुछ पर्पस होता है चेक
करने का फाइनेंसियल एनालिसिस को। ठीक है
बेटा? ये सबसे इंपॉर्टेंट आता है कि
क्या-क्या लिमिटेशंस हैं फाइनशियल
स्टेटमेंट्स एनालिसिस की। क्या-क्या
लिमिटेशंस इसके अंदर आ जाती हैं बच्चों?
सबसे पहले फाइनशियल स्टेटमेंट्स आर
अफेक्टेड बाय विंडो ड्रेसिंग। विंडो
ड्रेसिंग का मतलब होता है बच्चों
मैनपुलेशन करना। देखो कई बार कंपनीज़
इन्वेस्टमेंट लेने के लिए कई बार अपने आप
को ओवर प्रॉफिटेबल दिखा देती हैं या कई
बार प्रॉफिट्स को अंडरस्टेट कर देती हैं।
तो ओवरस्टेटमेंट भी होती है,
अंडरस्टेटमेंट भी होती है। प्रॉफिट्स को
ऊपर नीचे किया जाता है। तो जो ये
मैनपुलेशंस होती है ना बच्चों, इसको हम
विंडो ड्रेसिंग बोलते हैं। तो फाइनेंसियल
स्टेटमेंट्स कई बार विंडो ड्रेसिंग से
अफेक्टेड होती हैं। उसके बाद जितनी भी
फ़ेंसियल स्टेटमेंट्स हैं, वह प्राइस लेवल
में कितना चेंज है, यह रिफ्लेक्ट नहीं
करती। एक्चुअल में तो हम टोटल अमाउंट ले
लेते हैं ना, बस। भाई, हम लोग फ़ेंसियल में
क्या लिखते हैं? प्राइस इंटू क्वांटिटी,
टोटल सेल। उसमें कितना बदलाव प्राइस की
वजह से है, कितना क्वांटिटी की वजह से है,
वो कोई भी रिफ्लेक्ट नहीं करता। तो, हमारा
काम यहां पे इनफ्लेशन डिफ्लेशन दिखाना
नहीं है। हमारा काम तो सिर्फ प्रॉफिट या
लॉस निकालना है। यह भी इसकी एक लिमिटेशन
में आ जाता है। तीसरा बच्चों, डिफरेंट
अकाउंटिंग पॉलिसीज़। अब आप देखते हो ना
डेप्रिसिएशन के अलग-अलग मेथड्स हैं।
इन्वेंटरी वैल्यू्यूएशन के अलग-अलग मेथड्स
हैं। इसी तरीके से एकाउंटिंग में बहुत
सारी चीजें हैं जिनके अलग-अलग मेथड्स हैं।
तो कोई कुछ लगा रहा है, कोई कुछ लगा रहा
है, कोई कुछ लगा रहा है। फिर कंपैरिजन
कैसे करूं? तो कंपैरिजन पॉसिबल नहीं हो
पाता। उसके बाद पर्सनल एबिलिटी पे डिपेंड
करता है कि एनालिस्ट कितने अच्छे से
एनालाइज कर रहा है। किसी ने बहुत बढ़िया
से करी। कोई नहीं कर पाया। यह भी प्रॉब्लम
है। उसके बाद डिफिकल्टी इन फॉरकास्टिंग।
सिर्फ अकाउंटिंग के बेसिस पर बेटा आप
फॉरकास्ट नहीं कर सकते कोई भी चीज। तो
बहुत सारी ऐसी कंपनीज़ हैं जो चीजें अच्छी
दिखा रही है। आप कैसे फॉरकास्ट करोगे?
लाइक फॉर एग्जांपल गुडविल ही है या एवरेज
प्रॉफिट ही है। अब सपोज़ करो किसी कंपनी का
पहले साल प्रॉफिट 10,000 है। फिर 20,000
है। फिर 3,000 है। ये है कंपनी A. एक
कंपनी B है। पहले साल 30 फिर 20 फिर 10।
अगर आप एवरेज करोगे तो 60/ 3 20,000 का
एवरेज आएगा। यहां भी एवरेज करोगे तो 60/ 3
20,000 का एवरेज यहां आ जाएगा। तो देखो
एवरेज प्रॉफिट के हिसाब से तो दोनों
कंपनियां एक ही है। एक ही तरीके से चल रही
है। लेकिन अगर रियल देखा जाए तो ये तो
कंपनी ग्रो कर रही है। हर साल प्रॉफिट बढ़
रहा है और ये डूबती जा रही है। हर साल
प्रॉफिट कम हो रहा है। तो एवरेज प्रॉफिट
के बेसिस पे आप कैसे फॉरकास्टिंग करोगे?
दिक्कत है या नहीं है? नेक्स्ट लैक ऑफ
क्वालिटेटिव एनालिसिस। अकाउंटिंग में हम
क्वालिटेटिव जैसी चीजें लिखते ही नहीं
हैं। बच्चों अगर आपका आज मूड खराब है और
आप सही से सेल्स नहीं कर पा रहे।
अकाउंटिंग में लिखा ही नहीं आपने। मैनेजर
के बीच में एंप्लाइजज़ के बीच में गजेस हो
गए। उन्होंने ठीक से काम ही नहीं किया।
लिखा ही नहीं है आपने। आपकी पूरी टीम
स्ट्राइक पे चली गई। बहुत सारा नुकसान
हुआ। लिखा ही नहीं आपने। तो ये
क्वालिटेटिव जैसी चीजें बच्चों लिखते ही
नहीं है। ये भी एक लिमिटेशन है। उसके बाद
सिंगल ईयर एनालिसिस का बस लिमिटेड यूज़ हो
सकता है। बहुत ज्यादा एक्सटेंडेड यूज़ नहीं
हो सकता क्योंकि हर साल चीजें चेंज हो
जाती हैं। तो आपको हर साल दोबारा एनालिसिस
दोबारा खर्चा करना ही पड़ेगा। तो कोई भी
बच्चों रीड सारी लिमिटेशंस करनी है लेकिन
लर्न कोई भी तीन-चार लिमिटेशंस आप कर सकते
हो। ओ तो तीनचार लिमिटेशंस
तीनचारेंस करते हुए आपका चैप्टर ये हो
जाएगा समाप्त। सर छोटा सा चैप्टर है।
बिल्कुल बच्चों छोटू सा चैप्टर है। नन्ना
सा चैप्टर है। ये हमने कंप्लीट कर लिया।
थैंक यू सो मच गाइस फॉर जॉइनिंग इन। आई एम
गना सी यू ऑल वेरी वेरीरी सून। टिल देन
सी। टेक केयर। बाय-ब। कीप ग्रोइंग, कीप
ग्लोइंग एंड कीप स्माइलिंग।
[संगीत]
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