(1924, रोहन शर्मा) नई दिल्ली का वह लड़का जिसे विज्ञान समझ नहीं पाया
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क्या आपने कभी सोचा है कि विज्ञान की
सीमाएं कहां खत्म होती हैं और अज्ञात की
शुरुआत कहां से होती है? क्या होता है जब
चिकित्सा विज्ञान किसी ऐसी चीज के सामने
घुटने टेक देता है जो मानव समझ से परे है?
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हैं और इस चैनल को सब्सक्राइब करना ना
भूलें क्योंकि हमें आपकी मदद की सख्त
जरूरत है ताकि हम इन छिपी हुई सच्चाइयों
को दुनिया के सामने लाते रहे। 1921 की
गर्मियों में मुंबई के किद्वई नगर इलाके
में कुछ ऐसा हुआ जिसने ब्रिटिश भारत के
चिकित्सा इतिहास को हमेशा के लिए बदल
दिया। यह कहानी राजेश पिल्लई नाम के एक छ
साल के बच्चे की है जिसके साथ कुछ ऐसा हो
रहा था जो किसी भी चिकित्सा विज्ञान से
परे था। जब बंबई मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठतम
डॉक्टरों ने इस मामले की जांच शुरू की तो
उन्हें पता नहीं था कि वे जिस रहस्य को
सुलझाने जा रहे हैं वह उन्हें ऐसी जगह ले
जाएगा जहां तर्क और विज्ञान दोनों ही असफल
हो जाएंगे। राजेश का जन्म 1915 में
मालाबार हिल्स के पास एक साधारण
मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उसके पिता
नारायण पिल्लई फोर्ट इलाके में एक छोटी सी
किताबों की दुकान चलाते थे और मां लक्ष्मी
एक गृहिणी थी। राजेश अपने माता-पिता की
इकलौती संतान था। पहले 5 साल तक राजेश एक
बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ बच्चा था। वह
हंसता खेलता था। अपनी उम्र के अन्य बच्चों
की तरह। लेकिन 1921 के फरवरी महीने में सब
कुछ बदल गया। उस दिन की सुबह लक्ष्मी
पिल्लई ने अपने बेटे को उसके कमरे में
बिल्कुल शांत बैठे पाया। राजेश की आंखें
खुली थी लेकिन वह किसी चीज को घूर रहा था
जो कमरे में नहीं थी या कम से कम जो उसकी
मां को दिखाई नहीं दे रही थी। जब लक्ष्मी
ने उसे हिलाया तो राजेश ने कोई
प्रतिक्रिया नहीं दी। उसका शरीर ठंडा था
और नाड़ी धीमी थी। घबराई हुई मां ने तुरंत
पड़ोस के वैद्य को बुलाया। वैद्य गोविंद
राव शास्त्री ने जब राजेश को देखा तो
उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।
बच्चे की आंखें खुली थी लेकिन उसमें कोई
हलचल नहीं थी। सांस चल रही थी लेकिन बहुत
धीमी। शरीर का तापमान सामान्य से कम था।
वैद्य जी ने कई परंपरागत उपचार किए लेकिन
राजेश की हालत में कोई सुधार नहीं आया।
तीन दिन तक बच्चा उसी अवस्था में रहा।
चौथे दिन अचानक राजेश सामान्य हो गया जैसे
कुछ हुआ ही नहीं था। वह उठा, खाना खाया और
खेलने लगा। परिवार ने राहत की सांस ली और
सोचा शायद यह कोई अजीब बीमारी थी जो अब
ठीक हो गई। लेकिन दो हफ्ते बाद यह फिर
हुआ। इस बार राजेश चार दिन तक उसी अवस्था
में रहा और इस बार जब वह होश में आया तो
उसने कुछ ऐसा कहा जिसने उसके माता-पिता को
हिला दिया। राजेश ने अपनी मां से कहा कि
उसे एक जगह दिखाई देती है जहां बहुत सारे
बच्चे हैं और वे सब रो रहे हैं। उसने कहा
कि वहां अंधेरा है और एक आदमी है जो
बच्चों को देख रहा है। राजेश के शब्द इतने
स्पष्ट और विस्तृत थे कि लक्ष्मी को लगा
यह कोई सपना नहीं बल्कि कुछ और है। नारायण
पिल्लई ने तय किया कि अब उन्हें किसी
अंग्रेज डॉक्टर को दिखाना चाहिए। वे राजेश
को लेकर बंबई के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सक
डॉक्टर अलेक्जेंडर मैकेंजी के पास गए।
डॉक्टर मैकेंजी ने राजेश की जांच की और
कोई शारीरिक समस्या नहीं पाई। उन्होंने
कहा कि यह शायद कोई मानसिक विकार है और
उन्होंने बच्चे को कुछ दवाइयां दी। लेकिन
दवाइयों का कोई असर नहीं हुआ। मार्च के
अंत तक राजेश को यह दौरे पांच बार पड़
चुके थे और हर बार जब वह होश में आता तो
वह उस अंधेरी जगह के बारे में और विस्तार
से बताता। उसने कहा कि वहां एक कमरा है
जहां दीवारों पर अजीब निशान बने हैं। उसने
कहा कि बच्चे वहां किसी का इंतजार कर रहे
हैं और सबसे भयावह बात यह थी कि राजेश ने
कहा कि वह आदमी अब उसे भी देख सकता है।
अप्रैल में जब राजेश को छठा दौरा पड़ा तो
कुछ और भी हुआ। इस बार जब वह उस अवस्था
में था तो उसके मुंह से आवाजें निकलनी
शुरू हुई। लेकिन यह आवाजें राजेश की नहीं
थी। यह किसी और की आवाजें थी। कभी किसी
लड़की की, कभी किसी छोटे बच्चे की। और वे
सब एक ही चीज कह रहे थे। हमें बाहर
निकालो, हमें बचाओ। लक्ष्मी पिल्लई इतनी
डर गई कि उसने पूरे घर में दिए जलवा दिए
और पंडित जी को बुलाकर पूजा करवाई। नारायण
पिल्लई ने इस बार बंबई मेडिकल कॉलेज के
डीन डॉ. जेम्स रदरफोर्ड को एक पत्र लिखा।
उन्होंने पूरी स्थिति विस्तार से बताई और
मदद मांगी। डॉक्टर रदरफोर्ड एक अनुभवी
चिकित्सक थे और उन्होंने अपने करियर में
कई असामान्य मामले देखे थे। लेकिन जब
उन्होंने नारायण का पत्र पढ़ा तो उन्हें
भी यह मामला असाधारण लगा। उन्होंने तय
किया कि वे खुद राजेश को देखेंगे और यदि
जरूरी हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती
करेंगे। मई के पहले सप्ताह में डॉक्टर
रदरफोर्ड राजेश से मिलने पिल्लई परिवार के
घर गए। उनके साथ उनके सहायक डॉक्टर
श्रीनिवास अय्यर भी थे जो मनोविज्ञान में
विशेषज्ञ थे। जब डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश
को देखा तो पहली नजर में बच्चा बिल्कुल
सामान्य लग रहा था। वह खेल रहा था और
बातें कर रहा था। लेकिन जब डॉक्टर अय्यर
ने राजेश से उन दौरों के बारे में पूछा तो
बच्चे की आंखों में एक अजीब सी दूरी आ गई।
राजेश ने डॉक्टरों को बताया कि जब वह उस
जगह जाता है तो उसे लगता है जैसे वह अपने
शरीर से बाहर है। उसने कहा कि वह जगह एक
बड़ी इमारत के नीचे है। वहां सीढ़ियां हैं
जो नीचे जाती हैं और फिर एक लंबा गलियारा
है। गलियारे के दोनों तरफ कमरे हैं और हर
कमरे में बच्चे हैं। राजेश ने यह भी कहा
कि वह आदमी अब उससे बात करने की कोशिश कर
रहा है। वह चाहता है कि राजेश उसके पास
आए। डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश के
माता-पिता से कहा कि वे बच्चे को अस्पताल
में भर्ती करना चाहते हैं ताकि उसकी
निगरानी की जा सके। नारायण और लक्ष्मी
राजी हो गए क्योंकि अब उनके पास कोई और
विकल्प नहीं था। 10 मई 1921 को राजेश
पिल्लई को बंबई मेडिकल कॉलेज के
न्यूरोलॉजी विभाग में भर्ती किया गया।
अस्पताल में पहले तीन दिन राजेश को कोई
दौरा नहीं पड़ा। डॉक्टरों ने उसकी पूरी
शारीरिक जांच की। खून की जांच, मूत्र की
जांच सभी रिपोर्ट सामान्य आई। चौथे दिन
सुबह 5:00 बजे जब नर्स मैरी डिसूजा ने
राजेश के कमरे में झांका तो उसने देखा कि
बच्चा बिस्तर पर सीधा बैठा हुआ है और उसकी
आंखें खुली हैं। नर्स ने जब राजेश को
हिलाया तो कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने
तुरंत ड्यूटी डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर पी
के मेनन ने जब राजेश को देखा तो उन्हें
लगा कि बच्चा किसी तरह की कैटाटॉनिक
अवस्था में है। नाड़ी धीमी थी, सांस हल्की
थी और शरीर का तापमान गिरा हुआ था। डॉक्टर
मेनन ने तुरंत डॉक्टर रदरफोर्ड को सूचना
भेजी। जब तक डॉक्टर रदरफोर्ड पहुंचे तब तक
राजेश 3 घंटे से उसी अवस्था में था।
डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश की विस्तृत जांच
की। उन्होंने बच्चे की पलकों को छुआ।
आंखों में रोशनी डाली। कानों के पास तेज
आवाज की लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
यह ऐसा था जैसे राजेश वहां था लेकिन वहां
नहीं था। डॉक्टर रदरफोर्ड ने तय किया कि
वे इस पूरे दौरे को दर्ज करेंगे। उन्होंने
नर्स डिसूजा को कहा कि वे हर 5 मिनट में
राजेश की नाड़ी, सांस और तापमान नोट करें।
दोपहर 12:00 बजे के करीब राजेश के मुंह से
आवाजें निकलनी शुरू हुई। लेकिन यह राजेश
की आवाज नहीं थी। यह किसी बहुत छोटी बच्ची
की आवाज थी। वह मराठी में कुछ कह रही थी।
डॉक्टर अय्यर जो मराठी समझते थे, उन्होंने
ध्यान से सुना। बच्ची कह रही थी, मुझे
यहां से निकालो। मुझे घर जाना है। मेरी आई
मुझे ढूंढ रही होगी। डॉक्टर अय्यर ने
तुरंत एक नोटबुक निकाली और सब कुछ लिखना
शुरू किया। आवाज लगभग 10 मिनट तक आती रही।
फिर अचानक रुक गई। कुछ मिनटों की चुप्पी
के बाद फिर से आवाज आई। इस बार यह किसी
लड़के की आवाज थी। वह गुजराती में कुछ कह
रहा था। डॉक्टर रदरफोर्ड ने एक गुजराती
भाषी नर्स को बुलाया। नर्स रुक्मणी पटेल
ने सुना और अनुवाद किया। लड़का कह रहा था
मैं अंधेरे में हूं। मुझे रोशनी नहीं दिख
रही। कोई मुझे सुन नहीं रहा। यह सिलसिला
शाम 6:00 बजे तक चलता रहा। इस दौरान कुल
सात अलग-अलग आवाजें आई। हर आवाज एक अलग
बच्चे की थी। कुछ मराठी में बोल रहे थे,
कुछ गुजराती में और एक हिंदी में। सभी मदद
मांग रहे थे। सभी डरे हुए थे। सभी कह रहे
थे कि वे किसी अंधेरी जगह में फंसे हैं।
शाम 6:20 पर राजेश अचानक सामान्य हो गया।
उसने आंखें झपकाई। चारों तरफ देखा और रोने
लगा। उसकी मां जो पूरे समय बाहर इंतजार कर
रही थी, दौड़ कर आई और राजेश को गले लगा
लिया। बच्चा कांप रहा था और रो रहा था। जब
डॉक्टर रदरफोर्ड ने उससे पूछा कि क्या हुआ
था? तो राजेश ने कहा कि उस आदमी ने उसे वे
सब बच्चे दिखाए। उसने कहा कि वह आदमी
चाहता है कि राजेश उनके बारे में लोगों को
बताएं। डॉक्टर रदरफोर्ड अब गंभीरता से
परेशान थे। यह कोई साधारण मानसिक विकार
नहीं था। उन्होंने अपने करियर में ऐसा कुछ
नहीं देखा था। उन्होंने तय किया कि वे इस
मामले को और गहराई से जांचेंगे। उन्होंने
राजेश के द्वारों के बारे में विस्तृत
नोट्स बनाए और बच्चे द्वारा कही गई हर बात
को दर्ज किया। अगले कुछ दिनों में डॉक्टर
अय्यर ने राजेश से लंबी बातचीत की।
उन्होंने बच्चे से उस जगह के बारे में
विस्तार से पूछा। राजेश ने बताया कि वह
इमारत बहुत पुरानी है और पत्थर की बनी है।
उसने कहा कि नीचे जाने वाली सीढ़ियां
गोलाकार हैं और दीवारों पर नमी है।
गलियारे में मशालें जल रही हैं और एक अजीब
सी बदबू आ रही है। राजेश ने यह भी कहा कि
वह आदमी हमेशा एक लंबे काले कोट में रहता
है और उसका चेहरा छाया में रहता है।
डॉक्टर अय्यर ने राजेश से पूछा कि क्या वह
उन बच्चों में से किसी को पहचानता है?
राजेश ने कहा नहीं लेकिन उनमें से कुछ ने
अपने नाम बताए हैं। उसने कुछ नाम गिनाए
अनीता रघुनाथन, विजय पवार, तारा देसाई,
मुकेश शर्मा यह सब छ से 10 साल के बीच के
बच्चे थे। डॉक्टर रदरफोर्ड के मन में एक
विचार आया। उन्होंने तय किया कि वे इन
नामों की जांच करेंगे। उन्होंने अपने
सहायक को बंबई पुलिस में भेजा और पूछा कि
क्या पिछले कुछ वर्षों में इन नामों के
कोई बच्चे लापता हुए हैं? दो दिन बाद जो
जानकारी आई वह चौंकाने वाली थी। अनीता
रघुनाथन नाम की 7 साल की एक लड़की 1918
में दादर इलाके से लापता हुई थी। विजय
पवार नाम का 8 साल का लड़का 1919 में
माहिम से गायब हुआ था। तारा देसाई नाम की
6 साल की लड़की 1917 में गिरगांव से लापता
हुई थी। और मुकेश शर्मा नाम का 9 साल का
लड़का 1920 में बांद्रा से गायब हो गया
था। चारों मामलों में पुलिस कोई सुराग
नहीं खोज पाई थी और मामले अनसुलझे रह गए
थे। जब डॉक्टर रदरफोर्ड ने यह जानकारी
देखी तो उनकी रीढ़ में सर्दी दौड़ गई। यह
सब केवल संयोग नहीं हो सकता था। किसी तरह
राजेश उन बच्चों के बारे में जानता था जो
सच में लापता थे। लेकिन कैसे? राजेश एक छ
साल का बच्चा था जो किधई नगर से बाहर बहुत
कम गया था। उसे इन बच्चों के बारे में
कैसे पता चल सकता था? डॉक्टर रदरफोर्ड ने
तुरंत बंबई पुलिस के इंस्पेक्टर रमेश
चंद्रन को बुलाया। इंस्पेक्टर चंद्रन एक
अनुभवी पुलिस अधिकारी थे और लापता बच्चों
के मामलों में उनकी विशेष रुचि थी। जब
डॉक्टर रदरफोर्ड ने उन्हें पूरी स्थिति
बताई तो इंस्पेक्टर चंद्रन पहले तो यकीन
नहीं कर पाए। लेकिन जब उन्होंने डॉक्टरों
के नोट्स देखे और राजेश के बयानों को पढ़ा
तो वे गंभीर हो गए। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
कहा कि वे राजेश से मिलना चाहते।
21 मई को इंस्पेक्टर चंद्रन बंबई मेडिकल
कॉलेज पहुंचे। उनके साथ कांस्टेबल नटराजजन
भी थे। जब इंस्पेक्टर चंद्रन ने राजेश से
बात की तो बच्चा पहले तो डर गया। लेकिन
डॉक्टर अय्यर ने उसे समझाया कि इंस्पेक्टर
साहब उन बच्चों की मदद करना चाहते हैं।
राजेश ने इंस्पेक्टर चंद्रन को वही सब
बताया जो उसने डॉक्टरों को बताया था।
लेकिन इस बार उसने कुछ नई जानकारियां भी
दी। उसने कहा कि वह आदमी बच्चों को कहीं
और ले जाता है। उसने कहा कि एक और जगह है
जहां और भी बच्चे हैं। राजेश ने बताया कि
वह आदमी कभी-कभी बच्चों से बातें करता है
और उन्हें कुछ सिखाता है। लेकिन राजेश
नहीं समझ पाया कि वह क्या सिखा रहा है।
इंस्पेक्टर चंद्र ने राजेश से पूछा कि
क्या वह उस इमारत के बारे में कुछ और बता
सकता है जो उसे पहचानने में मदद करे।
राजेश ने आंखें बंद की और सोचने लगा। फिर
उसने कहा कि इमारत के बाहर एक बड़ा पत्थर
का दरवाजा
और उस पर कुछ निशान बने हैं। उसने कहा कि
दरवाजे के ऊपर एक प्रतीक है जो एक आंख
जैसा दिखता है। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
राजेश को कागज और पेंसिल दी और कहा कि वह
उस प्रतीक को बनाए। राजेश ने ध्यान से एक
चिन्ह बनाया। यह एक आंख थी जिसके चारों
तरफ तीन गोलाकार रेखाएं थी। इंस्पेक्टर
चंद्रन ने जब यह चिन्ह देखा तो उन्हें कुछ
याद आया। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह
प्रतीक पहले कहीं देखा है लेकिन उन्हें
याद नहीं आया। रहा कहां? इंस्पेक्टर
चंद्रन पुलिस स्टेशन वापस गए और अपनी
पुरानी फाइलों में खोजने लगे। दो दिन बाद
उन्हें वह मिल गया जो वे ढूंढ रहे थे।
1914 में बंबई के फोर्ट इलाके में एक
पुरानी इमारत की खुदाई के दौरान एक भूमिगत
कक्ष मिला था। उस कक्ष के दरवाजे पर यही
प्रतीक बना था। उस समय पुरातत्व विभाग ने
उस जगह की जांच की थी और कहा था कि यह
किसी पुराने धार्मिक संप्रदाय का स्थान हो
सकता है। लेकिन कोई विशेष खोज नहीं हुई थी
और उस जगह को फिर से बंद कर दिया गया था।
इंस्पेक्टर चंद्रन ने तुरंत उस इमारत का
पता लगाया। वह जगह अब एक गोदाम के नीचे थी
जो बल्लाड स्टेट में था। उन्होंने गोदाम
के मालिक श्री हरिहरण नायर से संपर्क किया
और उन्हें बताया कि वे उस भूमिगत हिस्से
की जांच करना चाहते हैं। श्री नायर ने कहा
कि उन्हें उस भूमिगत हिस्से के बारे में
पता नहीं था और वे गोदाम खरीदने के बाद
कभी नीचे नहीं गए। 24 मई को इंस्पेक्टर
चंद्रन अपनी टीम के साथ उस गोदाम पहुंचे।
उनके साथ कांस्ट्टेबल नटराजजन कांस्टेबल
रमन और सब इंस्पेक्टर अब्दुल करीम थे।
गोदाम के अंदर एक कोने में एक पुराना
लकड़ी का दरवाजा था जो बंद था और जिस पर
धूल और मकड़ी के जाले थे। जब उन्होंने वह
दरवाजा खोला तो नीचे जाती हुई पत्थर की
सीढ़ियां दिखाई दी। पुलिस टीम ने लाल अटेन
जलाई और नीचे उतरना शुरू किया। सीढ़ियां
गोलाकार थी बिल्कुल वैसी ही जैसा राजेश ने
बताया था। दीवारें नम थी और एक अजीब सी
बदबू आ रही थी। लगभग 50 सीढ़ियां उतरने के
बाद वे एक लंबे गलियारे में पहुंचे।
गलियारे की दीवारों पर अजीब निशान बने थे।
कुछ चित्र, कुछ प्रतीक जो किसी अज्ञात
भाषा में लगते थे। गलियारे के दोनों तरफ
कमरे थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने पहले कमरे
का दरवाजा खोला। कमरा छोटा था और बिल्कुल
खाली। लेकिन दीवारों पर खरोचे थी। जब
उन्होंने लाल अटेन की रोशनी दीवार पर डाली
तो उन्हें कुछ शब्द दिखाई दिए जो किसी ने
नाखूनों से लिखे थे। वे शब्द मराठी में थे
और लिखा था मदद करो मुझे बचाओ। दूसरे कमरे
में भी वही स्थिति थी। खरोचे शब्द और
दीवारों पर छोटे हाथों के निशान। तीसरे
कमरे में पुलिस को कुछ कपड़े के टुकड़े
मिले जो बच्चों के कपड़ों के लगते थे।
चौथे कमरे में उन्हें एक छोटी सी जूती
मिली जो लड़की की थी। इंस्पेक्टर चंद्रन
की टीम ने पूरे गलियारे की जांच की। कुल
10 कमरे थे। हर कमरे में कुछ ना कुछ मिला
जो बताता था कि वहां बच्चे रहे थे या रखे
गए थे। आखिरी कमरे में उन्हें कुछ ऐसा
मिला जिसने उन्हें हिला दिया। दीवार पर एक
सूची बनी थी नामों की सूची और उनमें से
कुछ नाम वही थे जो राजेश ने बताए थे।
अनीता, विजय, तारा, मुकेश। गलियारे के अंत
में एक और दरवाजा था। यह दरवाजा बाकी
दरवाजों से अलग था। यह लोहे का बना था और
इस पर वही प्रतीक बना था जो राजेश ने
बनाया था। वह आंख तीन गोलाकार रेखाओं से
घिरी हुई। इंस्पेक्टर चंद्रन ने दरवाजा
खोलने की कोशिश की लेकिन वह बंद था।
उन्होंने जोर लगाया लेकिन दरवाजा नहीं
खुला। सब इंस्पेक्टर करीम ने कहा कि शायद
कोई ताला है या कोई तंत्र है जिससे यह
खुलता है। उन्होंने दरवाजे की पूरी जांच
की। दरवाजे के बीचोंबीच उस प्रतीक के नीचे
एक छोटा सा गड्ढा था। कांस्टेबल नटराजजन
ने अपनी उंगली उस गड्ढे में डाली और कुछ
दबाया। अंदर से एक क्लिक की आवाज आए और
दरवाजा थोड़ा सा खुल गया। जब पुलिस टीम ने
वह दरवाजा पूरी तरह खोला तो उन्हें एक
बड़ा कक्ष दिखाई दिया। यह कक्ष बाकी कमरों
से बहुत बड़ा था। बीच में एक गोलाकार
पत्थर का चबूतरा था। चबूतरे के चारों तरफ
वही अजीब प्रतीक बने थे। दीवारों पर
मशालों के लिए जगह थी लेकिन मशाल नहीं थी।
कमरे के एक कोने में एक मेज थी और उस पर
कुछ किताबें रखी थी। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
उन किताबों को उठाया। वे बहुत पुरानी थी
और उन पर धूल जमी थी। किताबें किसी अजीब
भाषा में लिखी थी जो उन्हें समझ नहीं आई।
लेकिन एक किताब में कुछ चित्र थे। वे
चित्र भयावह थे। उनमें बच्चों को दिखाया
गया था जो किसी अनुष्ठान में भाग ले रहे
थे। चित्रों में एक आदमी भी था जो लंबे
कोट में था और जिसका चेहरा छाया में था।
मेज की दराज में इंस्पेक्टर चंद्रन को एक
डायरी मिली। डायरी अंग्रेजी में लिखी थी।
पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था डॉक्टर
विलियम थर्नटन। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
डायरी के कुछ पन्ने पलटे। डायरी में अजीब
प्रविष्टियां थी। एक जगह लिखा था मैंने आज
पांचवें विषय पर प्रयोग पूरा किया। परिणाम
संतोषजनक नहीं। विषय ने प्रतिरोध दिखाया।
एक और जगह लिखा था संप्रदाय के बड़े लोग
कोलकाता से आ रहे हैं। वे प्रगति देखना
चाहते हैं। मुझे अगले महीने तक 10 और विषय
चाहिए। इंस्पेक्टर चंद्रन ने जब यह पढ़ा
तो उन्हें समझ आ गया कि यहां कुछ बहुत
भयानक हुआ था। विषय का मतलब बच्चे थे और
प्रयोग का मतलब वह नहीं जानना चाहते थे।
इंस्पेक्टर चंद्रन ने अपनी टीम को कहा कि
वे सब कुछ सबूत के तौर पर इकट्ठा करें।
उन्होंने उस पूरी जगह की तस्वीरें ली।
किताबें, डायरी सब कुछ अपने साथ ले गए। जब
वे ऊपर आए तो शाम हो चुकी थी। सबकी हालत
खराब थी। वे सब चुप थे क्योंकि उन्होंने
जो देखा था वह उनके दिमाग से निकल नहीं
रहा था। इंस्पेक्टर चंद्रन सीधे बंबई
मेडिकल कॉलेज गए और डॉक्टर रदरफोर्ड को सब
कुछ बताया। उन्होंने डायरी दिखाई, किताबें
दिखाई और बताया कि उन्हें नीचे क्या मिला।
डॉक्टर रदरफोर्ड हैरान थे। उन्होंने कभी
सोचा नहीं था कि राजेश जो कुछ कह रहा था,
वह सच हो सकता है। अगले दिन इंस्पेक्टर
चंद्रन ने उस डॉक्टर विलियम थर्नटन के
बारे में जानकारी खोजनी शुरू की। उन्होंने
बंबई के ब्रिटिश रिकॉर्ड खंगाले। उन्हें
पता चला कि डॉक्टर विलियम थर्नटन एक
अंग्रेज चिकित्सक थे जो 19 100 में बंबई
आए थे। वे किसी शोध परियोजना पर काम कर
रहे थे जो बाल मनोविज्ञान से संबंधित थी।
लेकिन 1914 में अचानक उनका नाम सभी
रिकॉर्ड से गायब हो गया। कोई मृत्यु
प्रमाण पत्र नहीं था। कोई प्रस्थान
रिकॉर्ड नहीं था। डॉक्टर थार्नटन बस गायब
हो गए थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने और खोजबीन
की। उन्हें पुराने अखबारों में एक छोटी सी
खबर मिली जो 1913 में छपी थी। खबर में
लिखा था कि फोर्ट इलाके में एक रहस्यमय
संगठन की गतिविधियों की जांच हो रही है।
खबर में संगठन का नाम नहीं था लेकिन कहा
गया था कि यह संगठन गुप्त अनुष्ठान करता
है और इसके सदस्य बंबई के कुछ प्रभावशाली
लोग हैं। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस खबर
लिखने वाले पत्रकार को ढूंढने की कोशिश
की। उन्हें पता चला कि वह पत्रकार श्री
कृष्ण राव पांडे थे जो अब रिटायर हो चुके
थे और पुणे में रह रहे थे। इंस्पेक्टर
चंद्रन ने श्री पांडे को एक पत्र लिखा और
पूछा कि क्या वे उस संगठन के बारे में कुछ
और बता सकते हैं। 10 दिन बाद श्री पांडे
का जवाब आया। उन्होंने लिखा कि 1913 में
उन्हें एक सूत्र से खबर मिली थी कि बंबई
में एक गुप्त संप्रदाय सक्रिय है जो खुद
को द आर्डर ऑफ द एटरर्नल आई कहता है। यह
संप्रदाय मानता था कि बच्चों के मन में
अलौकिक शक्तियां होती हैं और उन शक्तियों
को कुछ खास अनुष्ठानों से जागृत किया जा
सकता है। श्री पांडे ने लिखा कि उनके
सूत्र ने बताया था कि इस संप्रदाय के
सदस्य बच्चों का अपहरण करते थे और उन पर
प्रयोग करते थे। लेकिन जब श्री पांडे ने
यह खबर छापी तो उन्हें धमकियां मिलनी शुरू
हो गई और उनके संपादक ने उन्हें कहा कि वे
इस विषय पर और कुछ ना लिखें। श्री पांडे
ने यह भी लिखा कि उनके सूत्र ने बताया था
कि संप्रदाय का मुख्यालय फोर्ट इलाके में
किसी पुरानी इमारत के नीचे था और संप्रदाय
का नेता एक अंग्रेज डॉक्टर था जिसका नाम
उन्हें याद नहीं लेकिन 1914 में अचानक सब
कुछ शांत हो गया। लापता बच्चों की खबरें
आनी बंद हो गई और संप्रदाय के बारे में
कोई और जानकारी नहीं मिली। इंस्पेक्टर
चंदन ने जब यह पत्र पढ़ा तो सारी पहेली
अपनी जगह बैठने लगी। डॉक्टर विलियम
थार्नटन द आर्डर ऑफ द इटरनल आई के नेता
थे। वे बच्चों का अपहरण करते थे और उन पर
अनुष्ठान और प्रयोग करते थे। 1914 में
शायद पुलिस उनके करीब पहुंच गई और उन्हें
अपना ठिकाना छोड़ना पड़ा। लेकिन फिर क्या
हुआ? क्या वे पकड़े गए? क्या वे भाग गए?
और सबसे बड़ा सवाल वे बच्चे कहां गए जो उस
भूमिगत जगह में थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
तय किया कि वे उस जगह की फिर से पूरी तरह
जांच करेंगे। 6 जून को वे फिर से उस गोदाम
पहुंचे। इस बार उनके साथ पुरातत्व विभाग
के एक विशेषज्ञ डॉक्टर सुब्रमण्यम अय्यर
भी थे। डॉक्टर अय्यर ने उस भूमिगत कक्ष की
दीवारों पर बने प्रतीकों और चित्रों का
अध्ययन किया। उन्होंने कहा कि यह प्रतीक
किसी प्राचीन गढ़ परंपरा से संबंधित लगते
हैं जो शायद तांत्रिक अनुष्ठानों में
इस्तेमाल होते थे। डॉक्टर अय्यर ने उस
बड़े कक्ष में बीच में बने चबूतरे की भी
जांच की। उन्होंने कहा कि यह चबूतरा शायद
किसी अनुष्ठान के लिए इस्तेमाल होता था।
चबूतरे के बीच में एक छोटा सा गड्ढा था।
जब उन्होंने उस गड्ढे की मिट्टी निकाली तो
नीचे कुछ हड्डियों के टुकड़े मिले। डॉक्टर
अय्यर ने कहा कि यह हड्डियां जानवरों की
लग रही है, लेकिन पूरी जांच के लिए इन्हें
प्रयोगशाला भेजना होगा। इंस्पेक्टर चंद्रन
ने उस पूरी जगह को फिर से खंगालना शुरू
किया। उन्हें उस बड़े कक्ष की एक दीवार
में एक छिपा हुआ दरवाजा मिला। यह दरवाजा
इतनी चालाकी से बनाया गया था कि पहली बार
में दिखता ही नहीं था। जब उन्होंने उस
दरवाजे को खोला तो उन्हें एक संकरा रास्ता
मिला जो और नीचे जाता था। यह रास्ता बहुत
संकरा था और छत इतनी नीची थी कि उन्हें
झुक कर चलना पड़ा। लगभग 20 मीटर चलने के
बाद रास्ता एक और कक्ष में खुल गया। यह
कक्ष पहले वाले कक्ष से भी बड़ा था और जो
उन्होंने यहां देखा वह इतना भयावह था कि
सब इंस्पेक्टर करीम को उल्टी हो गई। कक्ष
की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।
बच्चों के नाम और हर नाम के साथ एक तारीख
थी। सबसे पुराना नाम 1907 का था और सबसे
नया 1914 का। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उन
नामों को गिनने की कोशिश की। कम से कम 200
नाम थे। कक्ष के एक कोने में लकड़ी के
बक्से रखे थे। जब इंस्पेक्टर चंद्रन ने एक
बक्सा खोला तो उसमें बच्चों के कपड़े थे।
जूते थे, खिलौने थे। हर चीज पर एक नाम
लिखा था। यह वही नाम थे जो दीवार पर थे।
यह एक भयानक संग्रह था। हर बच्चे की कुछ
ना कुछ निशानी यहां थी। दूसरे बक्से में
इंस्पेक्टर चंद्रन को कुछ तस्वीरें मिली।
यह तस्वीरें बच्चों की थी। कुछ तस्वीरों
में बच्चे खेल रहे थे। कुछ में वे रो रहे
थे और कुछ तस्वीरों में वे उस गोलाकार
चबूतरे के चारों तरफ खड़े थे और उनके
चेहरों पर एक अजीब सा खालीपन था। तीसरे
बक्से में कुछ दस्तावेज थे। यह दस्तावेज
संप्रदाय की बैठकों के रिकॉर्ड थे। हर
बैठक में यह लिखा था कि कितने सदस्य मौजूद
थे और क्या निर्णय लिए गए। एक दस्तावेज
में लिखा था कि संप्रदाय का उद्देश्य
बच्चों की चेतना को एक उच्च स्तर पर ले
जाना है ताकि वे अलौकिक संसार से संपर्क
कर सकें। एक और दस्तावेज में एक अनुष्ठान
का विवरण था। उसमें लिखा था कि बच्चों को
विशेष जड़ी बूटियों का मिश्रण दिया जाता
था। जिससे उनकी चेतना बदल जाती थी। फिर
उन्हें उस गोलाकार चबूतरे पर लिटाया जाता
था और संप्रदाय के सदस्य उनके चारों तरफ
खड़े होकर विशेष मंत्रों का जाप करते थे।
इंस्पेक्टर चंद्रन के हाथ कांप रहे थे जब
वे यह दस्तावेज पढ़ रहे थे। उन्हें समझ आ
गया था कि यहां क्या हुआ था। डॉक्टर
थार्नटन और उनका संप्रदाय बच्चों को अपहरण
कर रहे थे और उन पर भयानक प्रयोग कर रहे
थे। वे बच्चों को नशीली चीजें देते थे और
फिर उन पर मानसिक प्रयोग करते थे और अगर
बच्चे उन प्रयोगों में मर जाते या पागल हो
जाते तो उनके बारे में कोई सवाल नहीं
उठाता क्योंकि वे गरीब परिवारों से थे।
इंस्पेक्टर चंद्रन ने उन सभी दस्तावेजों
को इकट्ठा किया और अपने साथ ले गए। जब वे
ऊपर आए तो उन्होंने तय किया कि अब इस
मामले को उच्च अधिकारियों तक पहुंचाना
होगा। अगले दिन उन्होंने मुंबई के पुलिस
कमिश्नर सर चार्ल्स टेबोट से मुलाकात की
और पूरी स्थिति बताई। सर टेबोट हैरान थे
लेकिन उन्होंने इंस्पेक्टर चंद्रन को कहा
कि वे इस मामले में बहुत सावधानी से काम
करें क्योंकि अगर संप्रदाय के सदस्य वाकई
प्रभावशाली लोग थे तो यह बहुत संवेदनशील
मामला हो सकता है। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
डॉक्टर थार्नटन के बारे में और जानकारी
जुटाने के लिए लंदन में ब्रिटिश पुलिस को
एक तार भेजा। दो हफ्ते बाद जवाब आया। लंदन
पुलिस ने बताया कि डॉक्टर विलियम थर्नटन
का जन्म 1970 में लंदन में हुआ था। वे
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी से चिकित्सा की
पढ़ाई किए थे। लेकिन उन्हें वहां से निकाल
दिया गया था क्योंकि उन्होंने अनैतिक
प्रयोग किए थे। 1906 में वे भारत आ गए और
उसके बाद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं
थी। जून के आखिरी हफ्ते में इंस्पेक्टर
चंद्रन को एक और चौंकाने वाली जानकारी
मिली। उन्हें पता चला कि 1914 में कोलकाता
में भी एक ऐसी ही भूमिगत जगह मिली थी जहां
बच्चों को रखा जाता था। वह मामला भी
रहस्यमय तरीके से बंद कर दिया गया था।
इंस्पेक्टर चंद्रन ने कोलकाता पुलिस से
संपर्क किया और उस मामले की फाइल मंगवाई।
जब फाइल आई तो इंस्पेक्टर चंद्रन को पता
चला कि कोलकाता की उस जगह में भी वही
प्रतीक था द एटरनल आई और वहां भी बच्चों
के नाम दीवारों पर लिखे थे। कोलकाता पुलिस
ने उस समय कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया
था लेकिन सभी को कुछ हफ्तों बाद रिहा कर
दिया गया था। फाइल में यह भी लिखा था कि
गिरफ्तार लोगों में से एक ने बयान दिया था
कि संप्रदाय के अलग-अलग शहरों में कई
ठिकाने हैं। मुंबई के अलावा कोलकाता,
मद्रास और लाहौर में भी। इंस्पेक्टर
चंद्रन को अब लगने लगा था कि यह कोई छोटा
मामला नहीं है। यह एक बहुत बड़ा नेटवर्क
था जो पूरे भारत में फैला हुआ था और इस
नेटवर्क के पीछे कुछ बहुत ताकतवर लोग थे
जो अपनी पहचान छिपाए रखने में सफल रहे थे।
इसी बीच बंबई मेडिकल कॉलेज में राजेश की
हालत और बिगड़ती जा रही थी। उसे अब रोज
दौरे पड़ने लगे थे और हर दौरे में वह और
भयानक चीजें बताता था। उसने कहा कि वह
आदमी अब उससे बात कर रहा है। वह चाहता है
कि राजेश उसके पास आए। राजेश ने यह भी कहा
कि वह देख सकता है कि वह आदमी अब भी जीवित
है और वह अब भी बच्चों को ढूंढ रहा है।
डॉक्टर रदरफोर्ड बहुत चिंतित थे। उन्होंने
राजेश को हर संभव इलाज दिया लेकिन कुछ काम
नहीं कर रहा था। राजेश दिन बदिन कमजोर
होता जा रहा था। वह खाना पीना छोड़ चुका
था। वह बस अपने बिस्तर पर लेटा रहता और
कभी-कभी अपने आप से बातें करता। जुलाई के
दूसरे हफ्ते में राजेश को एक बहुत लंबा
दौरा पड़ा जो पूरे 18 घंटे तक चला। इस
दौरे में राजेश के मुंह से ना जाने कितनी
आवाजें निकली। बच्चों की आवाजें, औरतों की
आवाजें और एक गहरी आवाज जो किसी बूढ़े
आदमी की थी। वह आवाज अंग्रेजी में कुछ कह
रही थी। डॉक्टर रदरफोर्ड ने ध्यान से
सुना। वह आवाज कह रही थी द वर्क मस्ट
कंटिन्यू द चिल्ड्रन आर द की काम जारी
रहना चाहिए बच्चे ही कुंजी है जब राजेश
होश में आया तो वह बहुत डरा हुआ था उसने
डॉक्टर रदरफोर्ड से कहा कि वह आदमी उसे
पकड़ना चाहता है उसने कहा कि वह अब भी
वहां है उस अंधेरी जगह में और वह इंतजार
कर रहा है। राजेश ने यह भी कहा कि वह आदमी
अकेला नहीं है। उसके साथ और भी लोग हैं जो
उसकी मदद करते हैं। डॉक्टर रदरफोर्ड ने
तुरंत इंस्पेक्टर चंद्रन को बुलाया और
राजेश की नई बातें बताई। इंस्पेक्टर
चंद्रन ने कहा कि शायद राजेश सही कह रहा
है। शायद संप्रदाय के कुछ सदस्य अब भी
सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि वे इस बारे
में जांच करेंगे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
अपनी टीम को उन लोगों की जांच करने के लिए
कहा जो 1914 के आसपास उस इमारत के आसपास
रहते थे। उन्हें कुछ लोग मिले जिन्होंने
बताया कि उस समय अक्सर रात में उस इमारत
से अजीब आवाजें आती थी। कुछ लोगों ने यह
भी कहा कि उन्होंने देखा था कि कुछ सफेदपश
लोग रात में उस इमारत में जाते थे। एक
बूढ़ी औरत जिसका नाम सुलोचना बाई था। उसने
बताया कि उसकी पोती 1912 में गायब हो गई
थी। उसने कहा कि उसकी पोती एक दिन खेलने
गई थी और फिर कभी वापस नहीं आई। पुलिस ने
खोजा लेकिन कुछ नहीं मिला। सुलोचना बाई ने
यह भी कहा कि उसे हमेशा शक था कि उसकी
पोती का गायब होना उस इमारत से जुड़ा है।
क्योंकि जिस दिन उसकी पोती गायब हुई उसी
दिन उसने देखा था कि एक काली गाड़ी उस
इलाके में घूम रही थी। इंस्पेक्टर चंद्रन
ने सुलोचना बाई से उसकी पोती का नाम पूछा।
उसने कहा कि उसका नाम गीता था। जब
इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस भूमिगत कक्ष की
दीवार पर लिखे नामों की सूची देखी तो
उसमें गीता का नाम भी था। सुलोचना बाई को
जब यह पता चला तो वह फूट-फूट कर रोने लगी।
उसे अपनी पोती का सच जानने में 9 साल लग
गए थे। अगस्त आ गया था और राजेश की हालत
बहुत खराब हो गई थी। वह अब ज्यादातर समय
बेहोश ही रहता था और जब भी होश आता तो वह
चिल्लाता था कि वह आदमी उसके पास आ रहा
है। डॉक्टर रदरफोर्ड और उनकी टीम ने हर
संभव कोशिश की लेकिन कुछ काम नहीं कर रहा
था। राजेश के माता-पिता पूरे समय अस्पताल
में ही रहने लगे थे। लक्ष्मी पिल्लई दिन
रात अपने बेटे के पास बैठी रहती थी और
प्रार्थना करती रहती थी। 15 अगस्त की रात
को कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको हिला। दिया
राजेश को फिर से एक दौरा पड़ा लेकिन इस
बार कुछ अलग था। राजेश के शरीर में अजीब
तरह की ऐंठन आने लगी। उसके मुंह से झाग
निकलने लगा। डॉक्टर रदरफोर्ड और नर्स
डिसूजा ने तुरंत उसे संभाला। उन्होंने
दवाइयां दी लेकिन कुछ असर नहीं हुआ। अचानक
राजेश का शरीर बिल्कुल शांत हो गया। उसकी
सांस रुक गई। डॉक्टर रदरफोर्ड ने तुरंत
उसके दिल की धड़कन चेक की। कोई धड़कन नहीं
थी। उन्होंने तुरंत राजेश के सीने पर दबाव
डालना शुरू किया। नर्स डिसूजा ने मुंह से
सांस देनी शुरू की। लगभग 5 मिनट तक वे
कोशिश करते रहे और फिर अचानक राजेश ने एक
लंबी सांस ली और उसकी आंखें खुल गई। लेकिन
जो आंखें खुली वे राजेश की आंखें नहीं
लगती थी। वे बिल्कुल खाली थी। कोई भावना
नहीं, कोई पहचान नहीं। राजेश ने डॉक्टर
रदरफोर्ड की तरफ देखा और फिर एक आवाज
निकली जो राजेश की नहीं थी। यह एक बूढ़े
आदमी की आवाज थी। वह अंग्रेजी में बोल रहा
था। उसने कहा योर इंटरफेरेंस इज फटाइल्ड
आर्डर विल नेवर डाई एस लॉन्ग एस डेयर आर
चिल्ड्रन डेयर इज होप फॉर द ग्रेट
अवेकनिंग। तुम्हारा हस्तक्षेप बेकार है।
संप्रदाय कभी नहीं मरेगा। जब तक बच्चे हैं
महान जागरण की उम्मीद है। डॉक्टर रदरफोर्ड
के रोंगटे खड़े हो गए। यह आवाज किसकी थी?
क्या यह डॉक्टर थटन थे? लेकिन कैसे? यह सब
कैसे संभव था? उन्होंने राजेश को हिलाया।
राजेश की आंखें बंद हो गई और वह फिर से
बेहोश हो गया। इस बार वह तीन दिन तक बेहोश
रहा। 18 अगस्त को राजेश होश में आया।
लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। वह बात
नहीं कर रहा था। वह किसी को पहचान नहीं
रहा था। यहां तक कि उसने अपनी मां को भी
नहीं पहचाना। डॉक्टर रदरफोर्ड ने उसकी
जांच की। शारीरिक रूप से राजेश ठीक था
लेकिन मानसिक रूप से वह बिल्कुल खाली हो
गया था। ऐसा लगता था जैसे राजेश का मन
कहीं और चला गया हो और सिर्फ उसका शरीर
यहां बचा हो। लक्ष्मी पिल्लई टूट गई। उसने
अपने बेटे को खो दिया था। हालांकि राजेश
जीवित था लेकिन जो राजेश था वह अब नहीं रह
गया था। नारायण पिल्लई ने राजेश को घर ले
जाने का फैसला किया। डॉक्टर रदरफोर्ड ने
कहा कि अब वे कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने
राजेश के इलाज के लिए कुछ दवाइयां दी और
कहा कि शायद समय के साथ राजेश ठीक हो जाए।
22 अगस्त को राजेश को अस्पताल से छुट्टी
मिल गई। पिल्लई परिवार अपने बेटे को लेकर
घर वापस चला गया। लेकिन वह घर अब पहले
जैसा नहीं था। वहां कोई हंसी नहीं थी। कोई
खुशी नहीं थी। राजेश पूरे दिन एक कोने में
बैठा रहता था और दीवार को घूरता रहता था।
इंस्पेक्टर चंद्रन ने अपनी जांच जारी रखी।
उन्होंने मद्रास और लाहौर पुलिस को भी
पत्र लिखे और पूछा कि क्या उनके इलाकों
में भी कोई ऐसी जगह है जो संप्रदाय से
जुड़ी हो? मद्रास पुलिस ने जवाब दिया कि
1910 में उन्हें एक संदिग्ध जगह के बारे
में जानकारी मिली थी। लेकिन जब तक वे वहां
पहुंचे तब तक वह जगह खाली हो चुकी थी।
लाहौर से कोई जवाब नहीं आया। सितंबर में
इंस्पेक्टर चंद्रन को एक चौंकाने वाली
सूचना मिली। उन्हें पता चला कि पुणे में
एक बच्चा गायब हुआ है जिसकी उम्र 7 साल
है। बच्चे के माता-पिता ने पुलिस में
रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इंस्पेक्टर चंद्र
ने तुरंत पुणे पुलिस से संपर्क किया।
मामले की विस्तृत जानकारी मांगी। पुणे
पुलिस ने बताया कि बच्चे का नाम अर्जुन
देश पांडे है और वह दो दिन पहले अपने घर
के पास खेलते समय गायब हो गया। कुछ लोगों
ने देखा था कि एक काली गाड़ी उस इलाके में
घूम रही थी। इंस्पेक्टर चंद्रन को लगा कि
यह वही तरीका है जो संप्रदाय इस्तेमाल
करता था। उन्होंने तुरंत पुणे जाने का
फैसला किया। 3 सितंबर को इंस्पेक्टर
चंद्रन और कांस्टेबल नटराजजन पुणे पहुंचे।
उन्होंने स्थानीय पुलिस से मुलाकात की और
मामले की जांच शुरू की। उन्होंने अर्जुन
के माता-पिता से बात की। अर्जुन की मां
सुधा देशपांडे रो रही थी और उनके पति
प्रकाश देश पांडे बहुत परेशान थे।
उन्होंने बताया कि अर्जुन एक बहुत ही शांत
और समझदार बच्चा था। वह अकेले कहीं नहीं
जाता था। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस इलाके
में पूछताछ की। उन्हें एक दुकानदार मिला
जिसने बताया कि उसने एक काली गाड़ी देखी
थी जो धीरे-धीरे उस गली में घूम रही थी।
उसने यह भी कहा कि गाड़ी में दो आदमी थे
जो बच्चों को देख रहे थे। दुकानदार ने उस
समय इसे संदिग्ध नहीं माना था। लेकिन अब
जब बच्चा गायब हो गया तो उसे लगा कि शायद
वही लोग थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने पुणे
पुलिस से कहा कि वे उस काली गाड़ी की
जानकारी निकाले। उन्होंने यह भी कहा कि वे
पुणे में किसी भी पुरानी इमारत की जांच
करें जो संप्रदाय का ठिकाना हो सकती है।
पुणे पुलिस ने अगले कुछ दिनों में कई
जगहों की तलाशी ली लेकिन कुछ नहीं मिला।
10 सितंबर को अर्जुन का शव पुणे से 20
किलोमीटर दूर एक सूखी नदी में मिला। शव की
हालत बहुत खराब थी। डॉक्टरों ने जांच के
बाद बताया कि अर्जुन को कोई नशीला पदार्थ
दिया गया था और फिर उसकी मौत हो गई। यह भी
पता चला कि अर्जुन के शरीर पर कुछ अजीब
निशान थे जो किसी अनुष्ठान के हो सकते थे।
इंस्पेक्टर चंद्रन को यकीन हो गया कि
संप्रदाय अब भी सक्रिय है। वे अब भी
बच्चों को अपहरण कर रहे हैं और उन पर
प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अब सवाल यह था
कि वे लोग कौन हैं और वे कहां छिपे हुए
हैं? इंस्पेक्टर चंद्रन बंबई वापस आ गए।
उन्होंने अपनी रिपोर्ट पुलिस कमिश्नर सर
टेबोट को दी। सर टेबोट ने कहा कि यह मामला
बहुत गंभीर है और इसे उच्च स्तर पर जांच
की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वे इस मामले
को ब्रिटिश भारत सरकार के गृह विभाग को
भेजेंगे। अक्टूबर में एक विशेष जांच टीम
बनाई गई जिसमें बंबई, मद्रास और कोलकाता
के पुलिस अधिकारी शामिल थे। इस टीम का काम
था डार्डर ऑफ द एटरर्नल आई के बचे हुए
सदस्यों को खोजना और उन्हें पकड़ना। लेकिन
यह काम आसान नहीं था। संप्रदाय के सदस्य
बहुत सावधान थे और उन्होंने अपनी पहचान
बहुत अच्छी तरह से छिपाई थी। नवंबर में
जांच टीम को एक बड़ी कामयाबी मिली। उन्हें
एक व्यक्ति मिला जो पहले संप्रदाय का
सदस्य था, लेकिन अब वह संप्रदाय छोड़ चुका
था। उसका नाम दिनकर राव था और वह अब एक
छोटे से गांव में रह रहा था। जब पुलिस ने
उससे पूछताछ की तो पहले तो वह कुछ नहीं
बोला लेकिन जब उसे डॉक्टर थर्नटन की डायरी
दिखाई गई तो वह टूट गया और सब कुछ बताने
लगा। दिनकर राव ने बताया कि वह 1911 में
संप्रदाय में शामिल हुआ था। उस समय उसे
नहीं पता था कि संप्रदाय क्या करता है।
उसे बताया गया था कि यह एक धार्मिक संगठन
है जो बच्चों की आध्यात्मिक शक्तियों को
जागृत करता है। लेकिन जब उसने असली सच्चाई
देखी तो वह हैरान रह गया। उसने देखा कि
डॉक्टर थर्नेटन बच्चों को नशीली चीजें
देते थे और फिर उन पर भयानक प्रयोग करते
थे। कुछ बच्चे उन प्रयोगों में मर जाते थे
और कुछ पागल हो जाते थे। दिनकर राव ने यह
भी बताया कि संप्रदाय में बहुत सारे
प्रभावशाली लोग थे। वकील, व्यापारी,
सरकारी अधिकारी और यहां तक कि कुछ अंग्रेज
भी। इन लोगों का मानना था कि बच्चों के मन
में अलौकिक शक्तियां होती हैं और उन
शक्तियों को जागृत करके वे किसी उच्च
सत्ता से संपर्क कर सकते हैं। डॉक्टर
थार्नटन इस विचार के मुख्य प्रचारक थे।
दिनकर राव ने बताया कि 1914 में जब पुलिस
उनके करीब आने लगी तो संप्रदाय ने अपना
ठिकाना बदल लिया। डॉक्टर थार्नटन गायब हो
गए और संप्रदाय के बाकी सदस्य अलग-अलग
जगहों पर चले गए। दिनकर राव ने कहा कि
उसने उसी समय संप्रदाय छोड़ दिया क्योंकि
वह अब और नहीं कर सकता था। जांच टीम ने
दिनकर राव से पूछा कि क्या वह बाकी
सदस्यों के नाम बता सकता है? दिनकर राव ने
कुछ नाम बताए। इनमें से कुछ लोग अब मर
चुके थे, लेकिन कुछ अब भी जीवित थे। जांच
टीम ने तुरंत उन लोगों की जांच शुरू की।
दिसंबर में पुलिस ने तीन लोगों को
गिरफ्तार किया जो संप्रदाय के पुराने
सदस्य थे। उनमें से एक रमेश कुलकर्णी नाम
का व्यक्ति था, जो एक वकील था। दूसरा था
कर्नल जेम्स मैकग्रेगर, जो एक रिटायर्ड
ब्रिटिश अधिकारी था। और तीसरा था शंकर
नायर जो एक व्यापारी था। तीनों ने शुरू
में सब कुछ इंकार किया लेकिन जब उन्हें
सबूत दिखाए गए तो वे टूट गए। रमेश
कुलकर्णी ने बताया कि संप्रदाय अब भी
सक्रिय है। लेकिन अब वे बहुत सावधानी से
काम करते हैं। उन्होंने कहा कि डॉक्टर
थार्नटन 1916 में मर गए थे। लेकिन उनके
बाद संप्रदाय का नेतृत्व किसी और ने संभाल
लिया था। रमेश ने उस व्यक्ति का नाम नहीं
बताया। कर्नल मैग्रेगर ने कहा कि संप्रदाय
का मानना है कि बच्चे एक महान जागरण के
लिए जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि संप्रदाय
का लक्ष्य एक ऐसी दुनिया बनाना है जहां
चुनिंदा लोग अलौकिक शक्तियों को नियंत्रित
कर सकें और बच्चे इस प्रक्रिया में एक
माध्यम है। शंकर नायर ने बताया कि
संप्रदाय के अब पूरे देश में छोटे-छोटे
समूह हैं जो गुप्त रूप से काम करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि संप्रदाय के पास
बहुत पैसा है और बहुत ताकतवर लोगों का
समर्थन है। इसलिए उन्हें पकड़ना बहुत
मुश्किल है। जांच टीम ने तीनों को जेल में
डाल दिया और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।
लेकिन जल्द ही कुछ अजीब होने लगा। रमेश
कुलकर्णी के वकील ने अदालत में ऐसे सबूत
पेश किए जो उन सभी सबूतों को कमजोर कर रहे
थे जो पुलिस के पास थे। कर्नल मैग्रेगर के
लिए लंदन से एक बहुत बड़ा वकील आया जिसने
कहा कि कर्नल पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद
है और शंकर नायर को अचानक जमानत मिल गई।
इंस्पेक्टर चंद्रन को लगने लगा कि कोई
बहुत ताकतवर व्यक्ति इन लोगों की मदद कर
रहा है। उन्होंने इस बारे में अपने वरिष्ठ
अधिकारियों से बात कि लेकिन उन्हें कोई
संतोषजनक जवाब नहीं मिला। जनवरी 1922 में
अदालत ने फैसला सुनाया। तीनों आरोपियों को
सबूतों की कमी के कारण रिहा कर दिया गया।
इंस्पेक्टर चंद्रन टूट गए। उन्होंने इतनी
मेहनत की थी, इतने सबूत जुटाए थे, लेकिन
सब बेकार हो गया। उन्होंने पुलिस कमिश्नर
से मुलाकात की और कहा कि यह सब गलत है।
लेकिन पुलिस कमिश्नर ने कहा कि अब वे कुछ
नहीं कर सकते। अदालत का फैसला आ गया है और
उसे मानना होगा। इंस्पेक्टर चंद्रन ने
मामले की फाइल बंद कर दी। लेकिन उनके मन
में हमेशा यह सवाल रहा कि वे लोग कौन थे
जिन्होंने इन आरोपियों को बचाया और क्या
संप्रदाय अब भी सक्रिय है? फरवरी में
इंस्पेक्टर चंद्रन को पता चला कि राजेश
पिल्लई की हालत और खराब हो गई है। वह अब
बिस्तर से उठ भी नहीं पाता। डॉक्टर
रदरफोर्ड ने कहा कि राजेश का मानसिक
संतुलन पूरी तरह से खत्म हो चुका है।
इंस्पेक्टर चंद्रन राजेश से मिलने गए। जब
उन्होंने राजेश को देखा तो उनकी आंखों में
आंसू आ गए। वह छ साल का बच्चा जो पहले
इतना चंचल था अब एक खाली खोल बनकर रह गया
था। मार्च में एक और बच्चा लापता हुआ। इस
बार सूरत में और फिर अप्रैल में कानपुर
में। इंस्पेक्टर चंद्रन को लगने लगा कि
संप्रदाय अब फिर से सक्रिय हो रहा है।
उन्होंने फिर से जांच शुरू करनी चाही
लेकिन उन्हें रोक दिया गया। उन्हें कहा
गया कि वे दूसरे मामलों पर ध्यान दें। मई
में इंस्पेक्टर चंद्रन को बंबई से बाहर
तबादला कर दिया गया। उन्हें एक छोटे से
शहर में भेज दिया गया। उन्हें लगा कि यह
तबादला इसलिए हुआ है ताकि वे इस मामले को
छोड़ दें। लेकिन इंस्पेक्टर चंद्रन ने हार
नहीं मानी। उन्होंने एक निजी डायरी रखनी
शुरू की जिसमें वे इस मामले से जुड़ी सभी
जानकारियां लिखते रहे। जून में राजेश
पिल्लई की मौत हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि
उसकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। लेकिन
डॉक्टर रदरफोर्ड को पता था कि सच क्या है।
राजेश उस भयानक अनुभव से उभर नहीं पाया।
उसका मन उस अंधेरी जगह में ही फंस गया था
और अंत में उसने लड़ना छोड़ दिया। राजेश
की मौत के बाद डॉक्टर रदरफोर्ड ने उसके
पूरे मामले की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार
की। उन्होंने उस रिपोर्ट में सब कुछ लिखा।
राजेश के दौरे, उसके द्वारा बताए गए नाम व
भूमिगत जगह संप्रदाय सब कुछ उन्होंने उस
रिपोर्ट को बंबई मेडिकल कॉलेज के
आर्काइव्स में रख दिया ताकि भविष्य में
अगर कोई इस तरह का मामला आए तो उसे इससे
मदद मिल सके। जुलाई में दिनकर राव की भी
मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि वह आत्महत्या
थी। लेकिन जो लोग इस मामले को जानते थे
उन्हें शक था। दिनकर राव ने संप्रदाय के
खिलाफ गवाही दी थी। शायद इसका बदला लिया
गया। समय बीतता गया। 1922 के बाद के सालों
में कभी कभार बच्चे लापता होते रहे। कभी
बंबई में, कभी मद्रास में, कभी कोलकाता
में। लेकिन हर बार मामला अनसुलझा रह जाता।
पुलिस को कोई सुराग नहीं मिलता और
धीरे-धीरे लोग भूल जाते। 1950 में
इंस्पेक्टर रमेश चंद्रन रिटायर हो गए।
उन्होंने अपनी पूरी डायरी अपने एक
विश्वसनीय जूनियर इंस्पेक्टर विनोद मेहता
को दे दी और कहा कि अगर कभी वे इस मामले
को सुलझाने का मौका पाए तो इस डायरी से
मदद मिलेगी। 1957 में डॉक्टर जेम्स
रदरफोर्ड की मौत हो गई। उनकी मौत से पहले
उन्होंने राजेश पिल्लई के मामले की फाइल
अपने एक शिष्य डॉक्टर प्रकाश शनोई को दे
दी और कहा कि इस मामले को कभी भुलाया नहीं
जाना चाहिए। समय और बीतता गया। भारत आजाद
हुआ। नए जमाने आए। शहर बदले, लोग बदले
लेकिन कुछ चीजें नहीं बदली। बच्चे अब भी
गायब होते रहे। कभी-कभी कुछ अजीब निशान
मिलते पुराने प्रतीक जो किसी को समझ नहीं
आते। आज भी बंबई जिसे अब मुंबई कहते हैं
कि पुरानी इमारतों के नीचे वे अंधेरे
गलियारे हैं। आज भी कभी-कभी कोई। पुरानी
इमारत तोड़ी जाती है तो नीचे कोई अजीब जगह
मिलती है। दीवारों पर खरोचे मिलती हैं।
बच्चों के कपड़ों के पुराने टुकड़े मिलते
हैं और कभी-कभी वह प्रतीक मिलता है वह आंख
तीन गोलाकार रेखाओं से घिरी हुई। पुलिस हर
बार जांच करती है और हर बार कहती है कि यह
कोई पुरानी जगह है शायद 100 साल पुरानी और
फिर मामला बंद हो जाता है। लेकिन जो लोग
जानते हैं वे चुप रहते हैं क्योंकि कुछ
सच्चाइयां इतनी भयानक होती हैं कि उन्हें
बोला नहीं जा सकता। राजेश पिल्लई के मामले
की फाइल अब भी बंबई मेडिकल कॉलेज के
आर्काइव्स में है। वह फाइल धूल से भरी है
और उस पर मकड़ी के जाले लगे हैं। कोई उसे
पढ़ता नहीं। कोई उसे जानता नहीं। लेकिन वह
वहां है साक्ष्य के रूप में, गवाही के रूप
में। उस बच्चे की याद के रूप में जिसने एक
ऐसी दुनिया देखी जो किसी को नहीं देखनी
चाहिए। और कभी-कभी देर रात जब शहर सो जाता
है तो पुरानी इमारतों के नीचे से अजीब
आवाजें आती हैं। बच्चों के रोने की
आवाजें, मदद मांगने की आवाजें लेकिन कोई
सुनता नहीं या शायद लोग सुनना नहीं चाहते।
इंस्पेक्टर चंद्रन की डायरी में आखिरी
पन्ने पर लिखा है मुझे यकीन है कि डी
आर्डर ऑफ द एटरनल आई अब भी कहीं ना कहीं
सक्रिय है। वे लोग अभी भी वही काम कर रहे
हैं जो डॉक्टर थर्नाटन करते थे और जब तक
कोई उन्हें रोकता नहीं तब तक बच्चे गायब
होते रहेंगे। भगवान हमारी रक्षा करे क्या
इंस्पेक्टर चंद्रन सही थे? क्या ड आर्डर
ऑफ एटरर्नल आई अब भी मौजूद है? यह सवाल
अनुत्तरित है। लेकिन जो पक्की बात है वह
यह कि राजेश पिल्लई ने कुछ ऐसा देखा था जो
उसे नहीं देखना चाहिए था और उसने उस
अंधेरे का सामना किया जो आज भी कहीं छिपा
बैठा है। कुछ रहस्य कभी सुलझते नहीं। कुछ
सच्चाइयां हमेशा अंधेरे में ही रहती हैं
और कुछ बच्चे कभी घर वापस नहीं आते। राजेश
पिल्लई का मामला आज भी भारत के सबसे
रहस्यमय और भयावह मामलों में से एक है। वह
बच्चा जिसे विज्ञान कभी समझ नहीं पाया। वह
बच्चा जिसने एक ऐसी दुनिया की झलक देखी
जहां बुराई का कोई अंत नहीं है। वह बच्चा
जिसकी आत्मा शायद आज भी उस अंधेरी जगह में
भटक रही है। उन सब बच्चों के साथ जो कभी
घर नहीं लौटे। अगर आप कभी मुंबई की पुरानी
इमारतों के पास से गुजरे और आपको नीचे से
कोई अजीब आवाज सुनाई दे तो रुकिएगा मत।
चलते रहिएगा क्योंकि कुछ चीजें जाननी नहीं
चाहिए। कुछ दरवाजे खोलने नहीं चाहिए और
कुछ आवाजें सुननी नहीं चाहिए। राजेश
पिल्लई की कहानी हमें याद दिलाती है कि इस
दुनिया में अंधेरा बहुत गहरा है और
कभी-कभी वह अंधेरा किसी मासूम बच्चे को
अपने में खींच लेता है। हम सिर्फ
प्रार्थना कर सकते हैं कि ऐसा दोबारा ना
हो और हम उम्मीद कर सकते हैं कि जो बच्चे
उस अंधेरे में खो गए हैं वे अब शांति में
हैं। इस कहानी के अंत में केवल एक ही बात
कही जा सकती है कि अपने बच्चों की रक्षा
कीजिए। उन पर नजर रखिए और सबसे जरूरी
ईश्वर और यीशु मसीह में विश्वास रखिए
क्योंकि वही सच्चा प्रकाश है जो हर अंधेरे
को दूर कर सकता है। वही एकमात्र शक्ति है
जो बुराई से हमारी रक्षा कर सकती है।
राजेश पिल्लई की आत्मा को शांति मिले और
उन सभी बच्चों को शांति मिले जो कभी घर
नहीं लौटे। आमीन।
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