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(1924, रोहन शर्मा) नई दिल्ली का वह लड़का जिसे विज्ञान समझ नहीं पाया

51m 0s8,162 words1,001 segmentsHindi

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0:00

क्या आपने कभी सोचा है कि विज्ञान की

0:03

सीमाएं कहां खत्म होती हैं और अज्ञात की

0:06

शुरुआत कहां से होती है? क्या होता है जब

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चिकित्सा विज्ञान किसी ऐसी चीज के सामने

0:11

घुटने टेक देता है जो मानव समझ से परे है?

0:15

कृपया नीचे कमेंट में बताएं कि आप कहां से

0:18

हैं और इस चैनल को सब्सक्राइब करना ना

0:21

भूलें क्योंकि हमें आपकी मदद की सख्त

0:24

जरूरत है ताकि हम इन छिपी हुई सच्चाइयों

0:27

को दुनिया के सामने लाते रहे। 1921 की

0:31

गर्मियों में मुंबई के किद्वई नगर इलाके

0:34

में कुछ ऐसा हुआ जिसने ब्रिटिश भारत के

0:37

चिकित्सा इतिहास को हमेशा के लिए बदल

0:40

दिया। यह कहानी राजेश पिल्लई नाम के एक छ

0:44

साल के बच्चे की है जिसके साथ कुछ ऐसा हो

0:47

रहा था जो किसी भी चिकित्सा विज्ञान से

0:50

परे था। जब बंबई मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठतम

0:54

डॉक्टरों ने इस मामले की जांच शुरू की तो

0:57

उन्हें पता नहीं था कि वे जिस रहस्य को

1:00

सुलझाने जा रहे हैं वह उन्हें ऐसी जगह ले

1:03

जाएगा जहां तर्क और विज्ञान दोनों ही असफल

1:06

हो जाएंगे। राजेश का जन्म 1915 में

1:10

मालाबार हिल्स के पास एक साधारण

1:14

मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उसके पिता

1:17

नारायण पिल्लई फोर्ट इलाके में एक छोटी सी

1:21

किताबों की दुकान चलाते थे और मां लक्ष्मी

1:24

एक गृहिणी थी। राजेश अपने माता-पिता की

1:27

इकलौती संतान था। पहले 5 साल तक राजेश एक

1:31

बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ बच्चा था। वह

1:34

हंसता खेलता था। अपनी उम्र के अन्य बच्चों

1:37

की तरह। लेकिन 1921 के फरवरी महीने में सब

1:41

कुछ बदल गया। उस दिन की सुबह लक्ष्मी

1:44

पिल्लई ने अपने बेटे को उसके कमरे में

1:46

बिल्कुल शांत बैठे पाया। राजेश की आंखें

1:49

खुली थी लेकिन वह किसी चीज को घूर रहा था

1:53

जो कमरे में नहीं थी या कम से कम जो उसकी

1:56

मां को दिखाई नहीं दे रही थी। जब लक्ष्मी

1:59

ने उसे हिलाया तो राजेश ने कोई

2:01

प्रतिक्रिया नहीं दी। उसका शरीर ठंडा था

2:04

और नाड़ी धीमी थी। घबराई हुई मां ने तुरंत

2:08

पड़ोस के वैद्य को बुलाया। वैद्य गोविंद

2:11

राव शास्त्री ने जब राजेश को देखा तो

2:13

उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।

2:17

बच्चे की आंखें खुली थी लेकिन उसमें कोई

2:19

हलचल नहीं थी। सांस चल रही थी लेकिन बहुत

2:23

धीमी। शरीर का तापमान सामान्य से कम था।

2:26

वैद्य जी ने कई परंपरागत उपचार किए लेकिन

2:29

राजेश की हालत में कोई सुधार नहीं आया।

2:32

तीन दिन तक बच्चा उसी अवस्था में रहा।

2:35

चौथे दिन अचानक राजेश सामान्य हो गया जैसे

2:38

कुछ हुआ ही नहीं था। वह उठा, खाना खाया और

2:41

खेलने लगा। परिवार ने राहत की सांस ली और

2:44

सोचा शायद यह कोई अजीब बीमारी थी जो अब

2:47

ठीक हो गई। लेकिन दो हफ्ते बाद यह फिर

2:51

हुआ। इस बार राजेश चार दिन तक उसी अवस्था

2:54

में रहा और इस बार जब वह होश में आया तो

2:58

उसने कुछ ऐसा कहा जिसने उसके माता-पिता को

3:01

हिला दिया। राजेश ने अपनी मां से कहा कि

3:04

उसे एक जगह दिखाई देती है जहां बहुत सारे

3:06

बच्चे हैं और वे सब रो रहे हैं। उसने कहा

3:10

कि वहां अंधेरा है और एक आदमी है जो

3:13

बच्चों को देख रहा है। राजेश के शब्द इतने

3:16

स्पष्ट और विस्तृत थे कि लक्ष्मी को लगा

3:19

यह कोई सपना नहीं बल्कि कुछ और है। नारायण

3:22

पिल्लई ने तय किया कि अब उन्हें किसी

3:25

अंग्रेज डॉक्टर को दिखाना चाहिए। वे राजेश

3:28

को लेकर बंबई के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सक

3:31

डॉक्टर अलेक्जेंडर मैकेंजी के पास गए।

3:34

डॉक्टर मैकेंजी ने राजेश की जांच की और

3:37

कोई शारीरिक समस्या नहीं पाई। उन्होंने

3:40

कहा कि यह शायद कोई मानसिक विकार है और

3:43

उन्होंने बच्चे को कुछ दवाइयां दी। लेकिन

3:46

दवाइयों का कोई असर नहीं हुआ। मार्च के

3:49

अंत तक राजेश को यह दौरे पांच बार पड़

3:52

चुके थे और हर बार जब वह होश में आता तो

3:56

वह उस अंधेरी जगह के बारे में और विस्तार

4:00

से बताता। उसने कहा कि वहां एक कमरा है

4:03

जहां दीवारों पर अजीब निशान बने हैं। उसने

4:06

कहा कि बच्चे वहां किसी का इंतजार कर रहे

4:08

हैं और सबसे भयावह बात यह थी कि राजेश ने

4:12

कहा कि वह आदमी अब उसे भी देख सकता है।

4:15

अप्रैल में जब राजेश को छठा दौरा पड़ा तो

4:18

कुछ और भी हुआ। इस बार जब वह उस अवस्था

4:21

में था तो उसके मुंह से आवाजें निकलनी

4:24

शुरू हुई। लेकिन यह आवाजें राजेश की नहीं

4:27

थी। यह किसी और की आवाजें थी। कभी किसी

4:30

लड़की की, कभी किसी छोटे बच्चे की। और वे

4:33

सब एक ही चीज कह रहे थे। हमें बाहर

4:35

निकालो, हमें बचाओ। लक्ष्मी पिल्लई इतनी

4:38

डर गई कि उसने पूरे घर में दिए जलवा दिए

4:41

और पंडित जी को बुलाकर पूजा करवाई। नारायण

4:44

पिल्लई ने इस बार बंबई मेडिकल कॉलेज के

4:47

डीन डॉ. जेम्स रदरफोर्ड को एक पत्र लिखा।

4:50

उन्होंने पूरी स्थिति विस्तार से बताई और

4:53

मदद मांगी। डॉक्टर रदरफोर्ड एक अनुभवी

4:56

चिकित्सक थे और उन्होंने अपने करियर में

4:59

कई असामान्य मामले देखे थे। लेकिन जब

5:02

उन्होंने नारायण का पत्र पढ़ा तो उन्हें

5:05

भी यह मामला असाधारण लगा। उन्होंने तय

5:08

किया कि वे खुद राजेश को देखेंगे और यदि

5:11

जरूरी हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती

5:14

करेंगे। मई के पहले सप्ताह में डॉक्टर

5:16

रदरफोर्ड राजेश से मिलने पिल्लई परिवार के

5:19

घर गए। उनके साथ उनके सहायक डॉक्टर

5:22

श्रीनिवास अय्यर भी थे जो मनोविज्ञान में

5:25

विशेषज्ञ थे। जब डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश

5:28

को देखा तो पहली नजर में बच्चा बिल्कुल

5:31

सामान्य लग रहा था। वह खेल रहा था और

5:34

बातें कर रहा था। लेकिन जब डॉक्टर अय्यर

5:36

ने राजेश से उन दौरों के बारे में पूछा तो

5:39

बच्चे की आंखों में एक अजीब सी दूरी आ गई।

5:42

राजेश ने डॉक्टरों को बताया कि जब वह उस

5:44

जगह जाता है तो उसे लगता है जैसे वह अपने

5:48

शरीर से बाहर है। उसने कहा कि वह जगह एक

5:51

बड़ी इमारत के नीचे है। वहां सीढ़ियां हैं

5:54

जो नीचे जाती हैं और फिर एक लंबा गलियारा

5:58

है। गलियारे के दोनों तरफ कमरे हैं और हर

6:01

कमरे में बच्चे हैं। राजेश ने यह भी कहा

6:04

कि वह आदमी अब उससे बात करने की कोशिश कर

6:06

रहा है। वह चाहता है कि राजेश उसके पास

6:10

आए। डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश के

6:12

माता-पिता से कहा कि वे बच्चे को अस्पताल

6:15

में भर्ती करना चाहते हैं ताकि उसकी

6:17

निगरानी की जा सके। नारायण और लक्ष्मी

6:20

राजी हो गए क्योंकि अब उनके पास कोई और

6:23

विकल्प नहीं था। 10 मई 1921 को राजेश

6:27

पिल्लई को बंबई मेडिकल कॉलेज के

6:29

न्यूरोलॉजी विभाग में भर्ती किया गया।

6:32

अस्पताल में पहले तीन दिन राजेश को कोई

6:35

दौरा नहीं पड़ा। डॉक्टरों ने उसकी पूरी

6:37

शारीरिक जांच की। खून की जांच, मूत्र की

6:40

जांच सभी रिपोर्ट सामान्य आई। चौथे दिन

6:44

सुबह 5:00 बजे जब नर्स मैरी डिसूजा ने

6:47

राजेश के कमरे में झांका तो उसने देखा कि

6:49

बच्चा बिस्तर पर सीधा बैठा हुआ है और उसकी

6:52

आंखें खुली हैं। नर्स ने जब राजेश को

6:55

हिलाया तो कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने

6:58

तुरंत ड्यूटी डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर पी

7:01

के मेनन ने जब राजेश को देखा तो उन्हें

7:04

लगा कि बच्चा किसी तरह की कैटाटॉनिक

7:06

अवस्था में है। नाड़ी धीमी थी, सांस हल्की

7:10

थी और शरीर का तापमान गिरा हुआ था। डॉक्टर

7:13

मेनन ने तुरंत डॉक्टर रदरफोर्ड को सूचना

7:15

भेजी। जब तक डॉक्टर रदरफोर्ड पहुंचे तब तक

7:18

राजेश 3 घंटे से उसी अवस्था में था।

7:22

डॉक्टर रदरफोर्ड ने राजेश की विस्तृत जांच

7:24

की। उन्होंने बच्चे की पलकों को छुआ।

7:27

आंखों में रोशनी डाली। कानों के पास तेज

7:30

आवाज की लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

7:32

यह ऐसा था जैसे राजेश वहां था लेकिन वहां

7:36

नहीं था। डॉक्टर रदरफोर्ड ने तय किया कि

7:38

वे इस पूरे दौरे को दर्ज करेंगे। उन्होंने

7:42

नर्स डिसूजा को कहा कि वे हर 5 मिनट में

7:44

राजेश की नाड़ी, सांस और तापमान नोट करें।

7:48

दोपहर 12:00 बजे के करीब राजेश के मुंह से

7:51

आवाजें निकलनी शुरू हुई। लेकिन यह राजेश

7:53

की आवाज नहीं थी। यह किसी बहुत छोटी बच्ची

7:56

की आवाज थी। वह मराठी में कुछ कह रही थी।

8:00

डॉक्टर अय्यर जो मराठी समझते थे, उन्होंने

8:03

ध्यान से सुना। बच्ची कह रही थी, मुझे

8:06

यहां से निकालो। मुझे घर जाना है। मेरी आई

8:08

मुझे ढूंढ रही होगी। डॉक्टर अय्यर ने

8:11

तुरंत एक नोटबुक निकाली और सब कुछ लिखना

8:13

शुरू किया। आवाज लगभग 10 मिनट तक आती रही।

8:17

फिर अचानक रुक गई। कुछ मिनटों की चुप्पी

8:20

के बाद फिर से आवाज आई। इस बार यह किसी

8:23

लड़के की आवाज थी। वह गुजराती में कुछ कह

8:26

रहा था। डॉक्टर रदरफोर्ड ने एक गुजराती

8:30

भाषी नर्स को बुलाया। नर्स रुक्मणी पटेल

8:33

ने सुना और अनुवाद किया। लड़का कह रहा था

8:36

मैं अंधेरे में हूं। मुझे रोशनी नहीं दिख

8:38

रही। कोई मुझे सुन नहीं रहा। यह सिलसिला

8:41

शाम 6:00 बजे तक चलता रहा। इस दौरान कुल

8:44

सात अलग-अलग आवाजें आई। हर आवाज एक अलग

8:48

बच्चे की थी। कुछ मराठी में बोल रहे थे,

8:50

कुछ गुजराती में और एक हिंदी में। सभी मदद

8:54

मांग रहे थे। सभी डरे हुए थे। सभी कह रहे

8:57

थे कि वे किसी अंधेरी जगह में फंसे हैं।

9:00

शाम 6:20 पर राजेश अचानक सामान्य हो गया।

9:03

उसने आंखें झपकाई। चारों तरफ देखा और रोने

9:07

लगा। उसकी मां जो पूरे समय बाहर इंतजार कर

9:10

रही थी, दौड़ कर आई और राजेश को गले लगा

9:14

लिया। बच्चा कांप रहा था और रो रहा था। जब

9:17

डॉक्टर रदरफोर्ड ने उससे पूछा कि क्या हुआ

9:20

था? तो राजेश ने कहा कि उस आदमी ने उसे वे

9:24

सब बच्चे दिखाए। उसने कहा कि वह आदमी

9:27

चाहता है कि राजेश उनके बारे में लोगों को

9:30

बताएं। डॉक्टर रदरफोर्ड अब गंभीरता से

9:33

परेशान थे। यह कोई साधारण मानसिक विकार

9:36

नहीं था। उन्होंने अपने करियर में ऐसा कुछ

9:40

नहीं देखा था। उन्होंने तय किया कि वे इस

9:43

मामले को और गहराई से जांचेंगे। उन्होंने

9:46

राजेश के द्वारों के बारे में विस्तृत

9:48

नोट्स बनाए और बच्चे द्वारा कही गई हर बात

9:51

को दर्ज किया। अगले कुछ दिनों में डॉक्टर

9:54

अय्यर ने राजेश से लंबी बातचीत की।

9:57

उन्होंने बच्चे से उस जगह के बारे में

9:59

विस्तार से पूछा। राजेश ने बताया कि वह

10:03

इमारत बहुत पुरानी है और पत्थर की बनी है।

10:06

उसने कहा कि नीचे जाने वाली सीढ़ियां

10:08

गोलाकार हैं और दीवारों पर नमी है।

10:11

गलियारे में मशालें जल रही हैं और एक अजीब

10:14

सी बदबू आ रही है। राजेश ने यह भी कहा कि

10:17

वह आदमी हमेशा एक लंबे काले कोट में रहता

10:21

है और उसका चेहरा छाया में रहता है।

10:24

डॉक्टर अय्यर ने राजेश से पूछा कि क्या वह

10:27

उन बच्चों में से किसी को पहचानता है?

10:29

राजेश ने कहा नहीं लेकिन उनमें से कुछ ने

10:33

अपने नाम बताए हैं। उसने कुछ नाम गिनाए

10:36

अनीता रघुनाथन, विजय पवार, तारा देसाई,

10:40

मुकेश शर्मा यह सब छ से 10 साल के बीच के

10:43

बच्चे थे। डॉक्टर रदरफोर्ड के मन में एक

10:46

विचार आया। उन्होंने तय किया कि वे इन

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नामों की जांच करेंगे। उन्होंने अपने

10:51

सहायक को बंबई पुलिस में भेजा और पूछा कि

10:54

क्या पिछले कुछ वर्षों में इन नामों के

10:57

कोई बच्चे लापता हुए हैं? दो दिन बाद जो

11:00

जानकारी आई वह चौंकाने वाली थी। अनीता

11:03

रघुनाथन नाम की 7 साल की एक लड़की 1918

11:08

में दादर इलाके से लापता हुई थी। विजय

11:11

पवार नाम का 8 साल का लड़का 1919 में

11:15

माहिम से गायब हुआ था। तारा देसाई नाम की

11:18

6 साल की लड़की 1917 में गिरगांव से लापता

11:22

हुई थी। और मुकेश शर्मा नाम का 9 साल का

11:25

लड़का 1920 में बांद्रा से गायब हो गया

11:29

था। चारों मामलों में पुलिस कोई सुराग

11:31

नहीं खोज पाई थी और मामले अनसुलझे रह गए

11:34

थे। जब डॉक्टर रदरफोर्ड ने यह जानकारी

11:38

देखी तो उनकी रीढ़ में सर्दी दौड़ गई। यह

11:40

सब केवल संयोग नहीं हो सकता था। किसी तरह

11:44

राजेश उन बच्चों के बारे में जानता था जो

11:46

सच में लापता थे। लेकिन कैसे? राजेश एक छ

11:50

साल का बच्चा था जो किधई नगर से बाहर बहुत

11:53

कम गया था। उसे इन बच्चों के बारे में

11:55

कैसे पता चल सकता था? डॉक्टर रदरफोर्ड ने

11:58

तुरंत बंबई पुलिस के इंस्पेक्टर रमेश

12:01

चंद्रन को बुलाया। इंस्पेक्टर चंद्रन एक

12:04

अनुभवी पुलिस अधिकारी थे और लापता बच्चों

12:07

के मामलों में उनकी विशेष रुचि थी। जब

12:10

डॉक्टर रदरफोर्ड ने उन्हें पूरी स्थिति

12:12

बताई तो इंस्पेक्टर चंद्रन पहले तो यकीन

12:15

नहीं कर पाए। लेकिन जब उन्होंने डॉक्टरों

12:18

के नोट्स देखे और राजेश के बयानों को पढ़ा

12:21

तो वे गंभीर हो गए। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

12:24

कहा कि वे राजेश से मिलना चाहते।

12:27

21 मई को इंस्पेक्टर चंद्रन बंबई मेडिकल

12:31

कॉलेज पहुंचे। उनके साथ कांस्टेबल नटराजजन

12:34

भी थे। जब इंस्पेक्टर चंद्रन ने राजेश से

12:36

बात की तो बच्चा पहले तो डर गया। लेकिन

12:39

डॉक्टर अय्यर ने उसे समझाया कि इंस्पेक्टर

12:42

साहब उन बच्चों की मदद करना चाहते हैं।

12:45

राजेश ने इंस्पेक्टर चंद्रन को वही सब

12:47

बताया जो उसने डॉक्टरों को बताया था।

12:50

लेकिन इस बार उसने कुछ नई जानकारियां भी

12:53

दी। उसने कहा कि वह आदमी बच्चों को कहीं

12:55

और ले जाता है। उसने कहा कि एक और जगह है

12:59

जहां और भी बच्चे हैं। राजेश ने बताया कि

13:02

वह आदमी कभी-कभी बच्चों से बातें करता है

13:05

और उन्हें कुछ सिखाता है। लेकिन राजेश

13:08

नहीं समझ पाया कि वह क्या सिखा रहा है।

13:10

इंस्पेक्टर चंद्र ने राजेश से पूछा कि

13:13

क्या वह उस इमारत के बारे में कुछ और बता

13:16

सकता है जो उसे पहचानने में मदद करे।

13:19

राजेश ने आंखें बंद की और सोचने लगा। फिर

13:23

उसने कहा कि इमारत के बाहर एक बड़ा पत्थर

13:26

का दरवाजा

13:28

और उस पर कुछ निशान बने हैं। उसने कहा कि

13:31

दरवाजे के ऊपर एक प्रतीक है जो एक आंख

13:34

जैसा दिखता है। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

13:37

राजेश को कागज और पेंसिल दी और कहा कि वह

13:40

उस प्रतीक को बनाए। राजेश ने ध्यान से एक

13:43

चिन्ह बनाया। यह एक आंख थी जिसके चारों

13:46

तरफ तीन गोलाकार रेखाएं थी। इंस्पेक्टर

13:50

चंद्रन ने जब यह चिन्ह देखा तो उन्हें कुछ

13:52

याद आया। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह

13:55

प्रतीक पहले कहीं देखा है लेकिन उन्हें

13:58

याद नहीं आया। रहा कहां? इंस्पेक्टर

14:01

चंद्रन पुलिस स्टेशन वापस गए और अपनी

14:03

पुरानी फाइलों में खोजने लगे। दो दिन बाद

14:06

उन्हें वह मिल गया जो वे ढूंढ रहे थे।

14:09

1914 में बंबई के फोर्ट इलाके में एक

14:13

पुरानी इमारत की खुदाई के दौरान एक भूमिगत

14:16

कक्ष मिला था। उस कक्ष के दरवाजे पर यही

14:18

प्रतीक बना था। उस समय पुरातत्व विभाग ने

14:22

उस जगह की जांच की थी और कहा था कि यह

14:25

किसी पुराने धार्मिक संप्रदाय का स्थान हो

14:27

सकता है। लेकिन कोई विशेष खोज नहीं हुई थी

14:31

और उस जगह को फिर से बंद कर दिया गया था।

14:34

इंस्पेक्टर चंद्रन ने तुरंत उस इमारत का

14:36

पता लगाया। वह जगह अब एक गोदाम के नीचे थी

14:40

जो बल्लाड स्टेट में था। उन्होंने गोदाम

14:43

के मालिक श्री हरिहरण नायर से संपर्क किया

14:46

और उन्हें बताया कि वे उस भूमिगत हिस्से

14:50

की जांच करना चाहते हैं। श्री नायर ने कहा

14:53

कि उन्हें उस भूमिगत हिस्से के बारे में

14:55

पता नहीं था और वे गोदाम खरीदने के बाद

14:58

कभी नीचे नहीं गए। 24 मई को इंस्पेक्टर

15:01

चंद्रन अपनी टीम के साथ उस गोदाम पहुंचे।

15:03

उनके साथ कांस्ट्टेबल नटराजजन कांस्टेबल

15:07

रमन और सब इंस्पेक्टर अब्दुल करीम थे।

15:10

गोदाम के अंदर एक कोने में एक पुराना

15:12

लकड़ी का दरवाजा था जो बंद था और जिस पर

15:15

धूल और मकड़ी के जाले थे। जब उन्होंने वह

15:18

दरवाजा खोला तो नीचे जाती हुई पत्थर की

15:20

सीढ़ियां दिखाई दी। पुलिस टीम ने लाल अटेन

15:23

जलाई और नीचे उतरना शुरू किया। सीढ़ियां

15:26

गोलाकार थी बिल्कुल वैसी ही जैसा राजेश ने

15:29

बताया था। दीवारें नम थी और एक अजीब सी

15:33

बदबू आ रही थी। लगभग 50 सीढ़ियां उतरने के

15:36

बाद वे एक लंबे गलियारे में पहुंचे।

15:39

गलियारे की दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

15:42

कुछ चित्र, कुछ प्रतीक जो किसी अज्ञात

15:46

भाषा में लगते थे। गलियारे के दोनों तरफ

15:48

कमरे थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने पहले कमरे

15:51

का दरवाजा खोला। कमरा छोटा था और बिल्कुल

15:54

खाली। लेकिन दीवारों पर खरोचे थी। जब

15:58

उन्होंने लाल अटेन की रोशनी दीवार पर डाली

16:01

तो उन्हें कुछ शब्द दिखाई दिए जो किसी ने

16:03

नाखूनों से लिखे थे। वे शब्द मराठी में थे

16:06

और लिखा था मदद करो मुझे बचाओ। दूसरे कमरे

16:11

में भी वही स्थिति थी। खरोचे शब्द और

16:14

दीवारों पर छोटे हाथों के निशान। तीसरे

16:17

कमरे में पुलिस को कुछ कपड़े के टुकड़े

16:19

मिले जो बच्चों के कपड़ों के लगते थे।

16:22

चौथे कमरे में उन्हें एक छोटी सी जूती

16:25

मिली जो लड़की की थी। इंस्पेक्टर चंद्रन

16:28

की टीम ने पूरे गलियारे की जांच की। कुल

16:32

10 कमरे थे। हर कमरे में कुछ ना कुछ मिला

16:36

जो बताता था कि वहां बच्चे रहे थे या रखे

16:39

गए थे। आखिरी कमरे में उन्हें कुछ ऐसा

16:41

मिला जिसने उन्हें हिला दिया। दीवार पर एक

16:44

सूची बनी थी नामों की सूची और उनमें से

16:47

कुछ नाम वही थे जो राजेश ने बताए थे।

16:50

अनीता, विजय, तारा, मुकेश। गलियारे के अंत

16:54

में एक और दरवाजा था। यह दरवाजा बाकी

16:57

दरवाजों से अलग था। यह लोहे का बना था और

17:00

इस पर वही प्रतीक बना था जो राजेश ने

17:02

बनाया था। वह आंख तीन गोलाकार रेखाओं से

17:06

घिरी हुई। इंस्पेक्टर चंद्रन ने दरवाजा

17:08

खोलने की कोशिश की लेकिन वह बंद था।

17:12

उन्होंने जोर लगाया लेकिन दरवाजा नहीं

17:14

खुला। सब इंस्पेक्टर करीम ने कहा कि शायद

17:17

कोई ताला है या कोई तंत्र है जिससे यह

17:21

खुलता है। उन्होंने दरवाजे की पूरी जांच

17:23

की। दरवाजे के बीचोंबीच उस प्रतीक के नीचे

17:27

एक छोटा सा गड्ढा था। कांस्टेबल नटराजजन

17:30

ने अपनी उंगली उस गड्ढे में डाली और कुछ

17:33

दबाया। अंदर से एक क्लिक की आवाज आए और

17:37

दरवाजा थोड़ा सा खुल गया। जब पुलिस टीम ने

17:41

वह दरवाजा पूरी तरह खोला तो उन्हें एक

17:44

बड़ा कक्ष दिखाई दिया। यह कक्ष बाकी कमरों

17:47

से बहुत बड़ा था। बीच में एक गोलाकार

17:50

पत्थर का चबूतरा था। चबूतरे के चारों तरफ

17:53

वही अजीब प्रतीक बने थे। दीवारों पर

17:56

मशालों के लिए जगह थी लेकिन मशाल नहीं थी।

18:00

कमरे के एक कोने में एक मेज थी और उस पर

18:02

कुछ किताबें रखी थी। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

18:05

उन किताबों को उठाया। वे बहुत पुरानी थी

18:09

और उन पर धूल जमी थी। किताबें किसी अजीब

18:13

भाषा में लिखी थी जो उन्हें समझ नहीं आई।

18:16

लेकिन एक किताब में कुछ चित्र थे। वे

18:19

चित्र भयावह थे। उनमें बच्चों को दिखाया

18:22

गया था जो किसी अनुष्ठान में भाग ले रहे

18:24

थे। चित्रों में एक आदमी भी था जो लंबे

18:27

कोट में था और जिसका चेहरा छाया में था।

18:30

मेज की दराज में इंस्पेक्टर चंद्रन को एक

18:33

डायरी मिली। डायरी अंग्रेजी में लिखी थी।

18:37

पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था डॉक्टर

18:40

विलियम थर्नटन। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

18:43

डायरी के कुछ पन्ने पलटे। डायरी में अजीब

18:45

प्रविष्टियां थी। एक जगह लिखा था मैंने आज

18:49

पांचवें विषय पर प्रयोग पूरा किया। परिणाम

18:51

संतोषजनक नहीं। विषय ने प्रतिरोध दिखाया।

18:55

एक और जगह लिखा था संप्रदाय के बड़े लोग

18:58

कोलकाता से आ रहे हैं। वे प्रगति देखना

19:00

चाहते हैं। मुझे अगले महीने तक 10 और विषय

19:03

चाहिए। इंस्पेक्टर चंद्रन ने जब यह पढ़ा

19:06

तो उन्हें समझ आ गया कि यहां कुछ बहुत

19:09

भयानक हुआ था। विषय का मतलब बच्चे थे और

19:12

प्रयोग का मतलब वह नहीं जानना चाहते थे।

19:15

इंस्पेक्टर चंद्रन ने अपनी टीम को कहा कि

19:18

वे सब कुछ सबूत के तौर पर इकट्ठा करें।

19:21

उन्होंने उस पूरी जगह की तस्वीरें ली।

19:24

किताबें, डायरी सब कुछ अपने साथ ले गए। जब

19:27

वे ऊपर आए तो शाम हो चुकी थी। सबकी हालत

19:30

खराब थी। वे सब चुप थे क्योंकि उन्होंने

19:33

जो देखा था वह उनके दिमाग से निकल नहीं

19:35

रहा था। इंस्पेक्टर चंद्रन सीधे बंबई

19:38

मेडिकल कॉलेज गए और डॉक्टर रदरफोर्ड को सब

19:41

कुछ बताया। उन्होंने डायरी दिखाई, किताबें

19:44

दिखाई और बताया कि उन्हें नीचे क्या मिला।

19:48

डॉक्टर रदरफोर्ड हैरान थे। उन्होंने कभी

19:50

सोचा नहीं था कि राजेश जो कुछ कह रहा था,

19:53

वह सच हो सकता है। अगले दिन इंस्पेक्टर

19:56

चंद्रन ने उस डॉक्टर विलियम थर्नटन के

19:59

बारे में जानकारी खोजनी शुरू की। उन्होंने

20:01

बंबई के ब्रिटिश रिकॉर्ड खंगाले। उन्हें

20:04

पता चला कि डॉक्टर विलियम थर्नटन एक

20:07

अंग्रेज चिकित्सक थे जो 19 100 में बंबई

20:11

आए थे। वे किसी शोध परियोजना पर काम कर

20:15

रहे थे जो बाल मनोविज्ञान से संबंधित थी।

20:18

लेकिन 1914 में अचानक उनका नाम सभी

20:21

रिकॉर्ड से गायब हो गया। कोई मृत्यु

20:24

प्रमाण पत्र नहीं था। कोई प्रस्थान

20:26

रिकॉर्ड नहीं था। डॉक्टर थार्नटन बस गायब

20:29

हो गए थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने और खोजबीन

20:32

की। उन्हें पुराने अखबारों में एक छोटी सी

20:35

खबर मिली जो 1913 में छपी थी। खबर में

20:38

लिखा था कि फोर्ट इलाके में एक रहस्यमय

20:42

संगठन की गतिविधियों की जांच हो रही है।

20:45

खबर में संगठन का नाम नहीं था लेकिन कहा

20:48

गया था कि यह संगठन गुप्त अनुष्ठान करता

20:51

है और इसके सदस्य बंबई के कुछ प्रभावशाली

20:55

लोग हैं। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस खबर

20:57

लिखने वाले पत्रकार को ढूंढने की कोशिश

21:00

की। उन्हें पता चला कि वह पत्रकार श्री

21:03

कृष्ण राव पांडे थे जो अब रिटायर हो चुके

21:06

थे और पुणे में रह रहे थे। इंस्पेक्टर

21:08

चंद्रन ने श्री पांडे को एक पत्र लिखा और

21:11

पूछा कि क्या वे उस संगठन के बारे में कुछ

21:14

और बता सकते हैं। 10 दिन बाद श्री पांडे

21:17

का जवाब आया। उन्होंने लिखा कि 1913 में

21:21

उन्हें एक सूत्र से खबर मिली थी कि बंबई

21:24

में एक गुप्त संप्रदाय सक्रिय है जो खुद

21:27

को द आर्डर ऑफ द एटरर्नल आई कहता है। यह

21:31

संप्रदाय मानता था कि बच्चों के मन में

21:33

अलौकिक शक्तियां होती हैं और उन शक्तियों

21:36

को कुछ खास अनुष्ठानों से जागृत किया जा

21:39

सकता है। श्री पांडे ने लिखा कि उनके

21:42

सूत्र ने बताया था कि इस संप्रदाय के

21:45

सदस्य बच्चों का अपहरण करते थे और उन पर

21:49

प्रयोग करते थे। लेकिन जब श्री पांडे ने

21:52

यह खबर छापी तो उन्हें धमकियां मिलनी शुरू

21:55

हो गई और उनके संपादक ने उन्हें कहा कि वे

21:58

इस विषय पर और कुछ ना लिखें। श्री पांडे

22:01

ने यह भी लिखा कि उनके सूत्र ने बताया था

22:04

कि संप्रदाय का मुख्यालय फोर्ट इलाके में

22:07

किसी पुरानी इमारत के नीचे था और संप्रदाय

22:10

का नेता एक अंग्रेज डॉक्टर था जिसका नाम

22:13

उन्हें याद नहीं लेकिन 1914 में अचानक सब

22:18

कुछ शांत हो गया। लापता बच्चों की खबरें

22:20

आनी बंद हो गई और संप्रदाय के बारे में

22:23

कोई और जानकारी नहीं मिली। इंस्पेक्टर

22:26

चंदन ने जब यह पत्र पढ़ा तो सारी पहेली

22:29

अपनी जगह बैठने लगी। डॉक्टर विलियम

22:31

थार्नटन द आर्डर ऑफ द इटरनल आई के नेता

22:35

थे। वे बच्चों का अपहरण करते थे और उन पर

22:38

अनुष्ठान और प्रयोग करते थे। 1914 में

22:41

शायद पुलिस उनके करीब पहुंच गई और उन्हें

22:44

अपना ठिकाना छोड़ना पड़ा। लेकिन फिर क्या

22:47

हुआ? क्या वे पकड़े गए? क्या वे भाग गए?

22:50

और सबसे बड़ा सवाल वे बच्चे कहां गए जो उस

22:53

भूमिगत जगह में थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

22:56

तय किया कि वे उस जगह की फिर से पूरी तरह

22:58

जांच करेंगे। 6 जून को वे फिर से उस गोदाम

23:02

पहुंचे। इस बार उनके साथ पुरातत्व विभाग

23:05

के एक विशेषज्ञ डॉक्टर सुब्रमण्यम अय्यर

23:08

भी थे। डॉक्टर अय्यर ने उस भूमिगत कक्ष की

23:12

दीवारों पर बने प्रतीकों और चित्रों का

23:14

अध्ययन किया। उन्होंने कहा कि यह प्रतीक

23:17

किसी प्राचीन गढ़ परंपरा से संबंधित लगते

23:20

हैं जो शायद तांत्रिक अनुष्ठानों में

23:23

इस्तेमाल होते थे। डॉक्टर अय्यर ने उस

23:26

बड़े कक्ष में बीच में बने चबूतरे की भी

23:29

जांच की। उन्होंने कहा कि यह चबूतरा शायद

23:32

किसी अनुष्ठान के लिए इस्तेमाल होता था।

23:35

चबूतरे के बीच में एक छोटा सा गड्ढा था।

23:38

जब उन्होंने उस गड्ढे की मिट्टी निकाली तो

23:41

नीचे कुछ हड्डियों के टुकड़े मिले। डॉक्टर

23:44

अय्यर ने कहा कि यह हड्डियां जानवरों की

23:46

लग रही है, लेकिन पूरी जांच के लिए इन्हें

23:49

प्रयोगशाला भेजना होगा। इंस्पेक्टर चंद्रन

23:52

ने उस पूरी जगह को फिर से खंगालना शुरू

23:55

किया। उन्हें उस बड़े कक्ष की एक दीवार

23:58

में एक छिपा हुआ दरवाजा मिला। यह दरवाजा

24:01

इतनी चालाकी से बनाया गया था कि पहली बार

24:04

में दिखता ही नहीं था। जब उन्होंने उस

24:06

दरवाजे को खोला तो उन्हें एक संकरा रास्ता

24:09

मिला जो और नीचे जाता था। यह रास्ता बहुत

24:12

संकरा था और छत इतनी नीची थी कि उन्हें

24:15

झुक कर चलना पड़ा। लगभग 20 मीटर चलने के

24:18

बाद रास्ता एक और कक्ष में खुल गया। यह

24:21

कक्ष पहले वाले कक्ष से भी बड़ा था और जो

24:25

उन्होंने यहां देखा वह इतना भयावह था कि

24:28

सब इंस्पेक्टर करीम को उल्टी हो गई। कक्ष

24:31

की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

24:34

बच्चों के नाम और हर नाम के साथ एक तारीख

24:37

थी। सबसे पुराना नाम 1907 का था और सबसे

24:41

नया 1914 का। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उन

24:45

नामों को गिनने की कोशिश की। कम से कम 200

24:48

नाम थे। कक्ष के एक कोने में लकड़ी के

24:51

बक्से रखे थे। जब इंस्पेक्टर चंद्रन ने एक

24:54

बक्सा खोला तो उसमें बच्चों के कपड़े थे।

24:57

जूते थे, खिलौने थे। हर चीज पर एक नाम

25:00

लिखा था। यह वही नाम थे जो दीवार पर थे।

25:04

यह एक भयानक संग्रह था। हर बच्चे की कुछ

25:07

ना कुछ निशानी यहां थी। दूसरे बक्से में

25:10

इंस्पेक्टर चंद्रन को कुछ तस्वीरें मिली।

25:13

यह तस्वीरें बच्चों की थी। कुछ तस्वीरों

25:16

में बच्चे खेल रहे थे। कुछ में वे रो रहे

25:18

थे और कुछ तस्वीरों में वे उस गोलाकार

25:21

चबूतरे के चारों तरफ खड़े थे और उनके

25:24

चेहरों पर एक अजीब सा खालीपन था। तीसरे

25:27

बक्से में कुछ दस्तावेज थे। यह दस्तावेज

25:30

संप्रदाय की बैठकों के रिकॉर्ड थे। हर

25:33

बैठक में यह लिखा था कि कितने सदस्य मौजूद

25:36

थे और क्या निर्णय लिए गए। एक दस्तावेज

25:40

में लिखा था कि संप्रदाय का उद्देश्य

25:42

बच्चों की चेतना को एक उच्च स्तर पर ले

25:45

जाना है ताकि वे अलौकिक संसार से संपर्क

25:48

कर सकें। एक और दस्तावेज में एक अनुष्ठान

25:51

का विवरण था। उसमें लिखा था कि बच्चों को

25:55

विशेष जड़ी बूटियों का मिश्रण दिया जाता

25:57

था। जिससे उनकी चेतना बदल जाती थी। फिर

26:01

उन्हें उस गोलाकार चबूतरे पर लिटाया जाता

26:03

था और संप्रदाय के सदस्य उनके चारों तरफ

26:07

खड़े होकर विशेष मंत्रों का जाप करते थे।

26:10

इंस्पेक्टर चंद्रन के हाथ कांप रहे थे जब

26:13

वे यह दस्तावेज पढ़ रहे थे। उन्हें समझ आ

26:16

गया था कि यहां क्या हुआ था। डॉक्टर

26:19

थार्नटन और उनका संप्रदाय बच्चों को अपहरण

26:22

कर रहे थे और उन पर भयानक प्रयोग कर रहे

26:25

थे। वे बच्चों को नशीली चीजें देते थे और

26:28

फिर उन पर मानसिक प्रयोग करते थे और अगर

26:32

बच्चे उन प्रयोगों में मर जाते या पागल हो

26:35

जाते तो उनके बारे में कोई सवाल नहीं

26:37

उठाता क्योंकि वे गरीब परिवारों से थे।

26:40

इंस्पेक्टर चंद्रन ने उन सभी दस्तावेजों

26:43

को इकट्ठा किया और अपने साथ ले गए। जब वे

26:46

ऊपर आए तो उन्होंने तय किया कि अब इस

26:50

मामले को उच्च अधिकारियों तक पहुंचाना

26:52

होगा। अगले दिन उन्होंने मुंबई के पुलिस

26:55

कमिश्नर सर चार्ल्स टेबोट से मुलाकात की

26:58

और पूरी स्थिति बताई। सर टेबोट हैरान थे

27:02

लेकिन उन्होंने इंस्पेक्टर चंद्रन को कहा

27:04

कि वे इस मामले में बहुत सावधानी से काम

27:07

करें क्योंकि अगर संप्रदाय के सदस्य वाकई

27:10

प्रभावशाली लोग थे तो यह बहुत संवेदनशील

27:13

मामला हो सकता है। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

27:16

डॉक्टर थार्नटन के बारे में और जानकारी

27:18

जुटाने के लिए लंदन में ब्रिटिश पुलिस को

27:20

एक तार भेजा। दो हफ्ते बाद जवाब आया। लंदन

27:24

पुलिस ने बताया कि डॉक्टर विलियम थर्नटन

27:26

का जन्म 1970 में लंदन में हुआ था। वे

27:30

एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी से चिकित्सा की

27:33

पढ़ाई किए थे। लेकिन उन्हें वहां से निकाल

27:35

दिया गया था क्योंकि उन्होंने अनैतिक

27:38

प्रयोग किए थे। 1906 में वे भारत आ गए और

27:42

उसके बाद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं

27:45

थी। जून के आखिरी हफ्ते में इंस्पेक्टर

27:48

चंद्रन को एक और चौंकाने वाली जानकारी

27:51

मिली। उन्हें पता चला कि 1914 में कोलकाता

27:56

में भी एक ऐसी ही भूमिगत जगह मिली थी जहां

27:59

बच्चों को रखा जाता था। वह मामला भी

28:03

रहस्यमय तरीके से बंद कर दिया गया था।

28:06

इंस्पेक्टर चंद्रन ने कोलकाता पुलिस से

28:08

संपर्क किया और उस मामले की फाइल मंगवाई।

28:11

जब फाइल आई तो इंस्पेक्टर चंद्रन को पता

28:14

चला कि कोलकाता की उस जगह में भी वही

28:18

प्रतीक था द एटरनल आई और वहां भी बच्चों

28:21

के नाम दीवारों पर लिखे थे। कोलकाता पुलिस

28:24

ने उस समय कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया

28:27

था लेकिन सभी को कुछ हफ्तों बाद रिहा कर

28:30

दिया गया था। फाइल में यह भी लिखा था कि

28:33

गिरफ्तार लोगों में से एक ने बयान दिया था

28:36

कि संप्रदाय के अलग-अलग शहरों में कई

28:39

ठिकाने हैं। मुंबई के अलावा कोलकाता,

28:41

मद्रास और लाहौर में भी। इंस्पेक्टर

28:44

चंद्रन को अब लगने लगा था कि यह कोई छोटा

28:47

मामला नहीं है। यह एक बहुत बड़ा नेटवर्क

28:50

था जो पूरे भारत में फैला हुआ था और इस

28:53

नेटवर्क के पीछे कुछ बहुत ताकतवर लोग थे

28:56

जो अपनी पहचान छिपाए रखने में सफल रहे थे।

28:59

इसी बीच बंबई मेडिकल कॉलेज में राजेश की

29:03

हालत और बिगड़ती जा रही थी। उसे अब रोज

29:06

दौरे पड़ने लगे थे और हर दौरे में वह और

29:09

भयानक चीजें बताता था। उसने कहा कि वह

29:12

आदमी अब उससे बात कर रहा है। वह चाहता है

29:15

कि राजेश उसके पास आए। राजेश ने यह भी कहा

29:18

कि वह देख सकता है कि वह आदमी अब भी जीवित

29:22

है और वह अब भी बच्चों को ढूंढ रहा है।

29:25

डॉक्टर रदरफोर्ड बहुत चिंतित थे। उन्होंने

29:28

राजेश को हर संभव इलाज दिया लेकिन कुछ काम

29:31

नहीं कर रहा था। राजेश दिन बदिन कमजोर

29:34

होता जा रहा था। वह खाना पीना छोड़ चुका

29:38

था। वह बस अपने बिस्तर पर लेटा रहता और

29:41

कभी-कभी अपने आप से बातें करता। जुलाई के

29:45

दूसरे हफ्ते में राजेश को एक बहुत लंबा

29:47

दौरा पड़ा जो पूरे 18 घंटे तक चला। इस

29:50

दौरे में राजेश के मुंह से ना जाने कितनी

29:53

आवाजें निकली। बच्चों की आवाजें, औरतों की

29:56

आवाजें और एक गहरी आवाज जो किसी बूढ़े

30:00

आदमी की थी। वह आवाज अंग्रेजी में कुछ कह

30:02

रही थी। डॉक्टर रदरफोर्ड ने ध्यान से

30:05

सुना। वह आवाज कह रही थी द वर्क मस्ट

30:09

कंटिन्यू द चिल्ड्रन आर द की काम जारी

30:13

रहना चाहिए बच्चे ही कुंजी है जब राजेश

30:16

होश में आया तो वह बहुत डरा हुआ था उसने

30:19

डॉक्टर रदरफोर्ड से कहा कि वह आदमी उसे

30:22

पकड़ना चाहता है उसने कहा कि वह अब भी

30:25

वहां है उस अंधेरी जगह में और वह इंतजार

30:28

कर रहा है। राजेश ने यह भी कहा कि वह आदमी

30:32

अकेला नहीं है। उसके साथ और भी लोग हैं जो

30:34

उसकी मदद करते हैं। डॉक्टर रदरफोर्ड ने

30:37

तुरंत इंस्पेक्टर चंद्रन को बुलाया और

30:39

राजेश की नई बातें बताई। इंस्पेक्टर

30:42

चंद्रन ने कहा कि शायद राजेश सही कह रहा

30:46

है। शायद संप्रदाय के कुछ सदस्य अब भी

30:49

सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि वे इस बारे

30:51

में जांच करेंगे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

30:54

अपनी टीम को उन लोगों की जांच करने के लिए

30:57

कहा जो 1914 के आसपास उस इमारत के आसपास

31:01

रहते थे। उन्हें कुछ लोग मिले जिन्होंने

31:04

बताया कि उस समय अक्सर रात में उस इमारत

31:07

से अजीब आवाजें आती थी। कुछ लोगों ने यह

31:10

भी कहा कि उन्होंने देखा था कि कुछ सफेदपश

31:14

लोग रात में उस इमारत में जाते थे। एक

31:16

बूढ़ी औरत जिसका नाम सुलोचना बाई था। उसने

31:20

बताया कि उसकी पोती 1912 में गायब हो गई

31:23

थी। उसने कहा कि उसकी पोती एक दिन खेलने

31:26

गई थी और फिर कभी वापस नहीं आई। पुलिस ने

31:29

खोजा लेकिन कुछ नहीं मिला। सुलोचना बाई ने

31:33

यह भी कहा कि उसे हमेशा शक था कि उसकी

31:37

पोती का गायब होना उस इमारत से जुड़ा है।

31:40

क्योंकि जिस दिन उसकी पोती गायब हुई उसी

31:44

दिन उसने देखा था कि एक काली गाड़ी उस

31:47

इलाके में घूम रही थी। इंस्पेक्टर चंद्रन

31:49

ने सुलोचना बाई से उसकी पोती का नाम पूछा।

31:53

उसने कहा कि उसका नाम गीता था। जब

31:55

इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस भूमिगत कक्ष की

31:58

दीवार पर लिखे नामों की सूची देखी तो

32:01

उसमें गीता का नाम भी था। सुलोचना बाई को

32:04

जब यह पता चला तो वह फूट-फूट कर रोने लगी।

32:07

उसे अपनी पोती का सच जानने में 9 साल लग

32:11

गए थे। अगस्त आ गया था और राजेश की हालत

32:14

बहुत खराब हो गई थी। वह अब ज्यादातर समय

32:18

बेहोश ही रहता था और जब भी होश आता तो वह

32:21

चिल्लाता था कि वह आदमी उसके पास आ रहा

32:24

है। डॉक्टर रदरफोर्ड और उनकी टीम ने हर

32:27

संभव कोशिश की लेकिन कुछ काम नहीं कर रहा

32:30

था। राजेश के माता-पिता पूरे समय अस्पताल

32:33

में ही रहने लगे थे। लक्ष्मी पिल्लई दिन

32:36

रात अपने बेटे के पास बैठी रहती थी और

32:39

प्रार्थना करती रहती थी। 15 अगस्त की रात

32:43

को कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको हिला। दिया

32:46

राजेश को फिर से एक दौरा पड़ा लेकिन इस

32:49

बार कुछ अलग था। राजेश के शरीर में अजीब

32:52

तरह की ऐंठन आने लगी। उसके मुंह से झाग

32:55

निकलने लगा। डॉक्टर रदरफोर्ड और नर्स

32:58

डिसूजा ने तुरंत उसे संभाला। उन्होंने

33:00

दवाइयां दी लेकिन कुछ असर नहीं हुआ। अचानक

33:03

राजेश का शरीर बिल्कुल शांत हो गया। उसकी

33:06

सांस रुक गई। डॉक्टर रदरफोर्ड ने तुरंत

33:09

उसके दिल की धड़कन चेक की। कोई धड़कन नहीं

33:12

थी। उन्होंने तुरंत राजेश के सीने पर दबाव

33:15

डालना शुरू किया। नर्स डिसूजा ने मुंह से

33:18

सांस देनी शुरू की। लगभग 5 मिनट तक वे

33:21

कोशिश करते रहे और फिर अचानक राजेश ने एक

33:24

लंबी सांस ली और उसकी आंखें खुल गई। लेकिन

33:27

जो आंखें खुली वे राजेश की आंखें नहीं

33:30

लगती थी। वे बिल्कुल खाली थी। कोई भावना

33:34

नहीं, कोई पहचान नहीं। राजेश ने डॉक्टर

33:36

रदरफोर्ड की तरफ देखा और फिर एक आवाज

33:39

निकली जो राजेश की नहीं थी। यह एक बूढ़े

33:42

आदमी की आवाज थी। वह अंग्रेजी में बोल रहा

33:45

था। उसने कहा योर इंटरफेरेंस इज फटाइल्ड

33:49

आर्डर विल नेवर डाई एस लॉन्ग एस डेयर आर

33:52

चिल्ड्रन डेयर इज होप फॉर द ग्रेट

33:54

अवेकनिंग। तुम्हारा हस्तक्षेप बेकार है।

33:57

संप्रदाय कभी नहीं मरेगा। जब तक बच्चे हैं

34:00

महान जागरण की उम्मीद है। डॉक्टर रदरफोर्ड

34:03

के रोंगटे खड़े हो गए। यह आवाज किसकी थी?

34:06

क्या यह डॉक्टर थटन थे? लेकिन कैसे? यह सब

34:09

कैसे संभव था? उन्होंने राजेश को हिलाया।

34:12

राजेश की आंखें बंद हो गई और वह फिर से

34:14

बेहोश हो गया। इस बार वह तीन दिन तक बेहोश

34:18

रहा। 18 अगस्त को राजेश होश में आया।

34:22

लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। वह बात

34:24

नहीं कर रहा था। वह किसी को पहचान नहीं

34:27

रहा था। यहां तक कि उसने अपनी मां को भी

34:30

नहीं पहचाना। डॉक्टर रदरफोर्ड ने उसकी

34:32

जांच की। शारीरिक रूप से राजेश ठीक था

34:36

लेकिन मानसिक रूप से वह बिल्कुल खाली हो

34:38

गया था। ऐसा लगता था जैसे राजेश का मन

34:41

कहीं और चला गया हो और सिर्फ उसका शरीर

34:45

यहां बचा हो। लक्ष्मी पिल्लई टूट गई। उसने

34:48

अपने बेटे को खो दिया था। हालांकि राजेश

34:51

जीवित था लेकिन जो राजेश था वह अब नहीं रह

34:54

गया था। नारायण पिल्लई ने राजेश को घर ले

34:57

जाने का फैसला किया। डॉक्टर रदरफोर्ड ने

35:00

कहा कि अब वे कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने

35:03

राजेश के इलाज के लिए कुछ दवाइयां दी और

35:06

कहा कि शायद समय के साथ राजेश ठीक हो जाए।

35:10

22 अगस्त को राजेश को अस्पताल से छुट्टी

35:13

मिल गई। पिल्लई परिवार अपने बेटे को लेकर

35:17

घर वापस चला गया। लेकिन वह घर अब पहले

35:20

जैसा नहीं था। वहां कोई हंसी नहीं थी। कोई

35:23

खुशी नहीं थी। राजेश पूरे दिन एक कोने में

35:26

बैठा रहता था और दीवार को घूरता रहता था।

35:29

इंस्पेक्टर चंद्रन ने अपनी जांच जारी रखी।

35:33

उन्होंने मद्रास और लाहौर पुलिस को भी

35:35

पत्र लिखे और पूछा कि क्या उनके इलाकों

35:38

में भी कोई ऐसी जगह है जो संप्रदाय से

35:41

जुड़ी हो? मद्रास पुलिस ने जवाब दिया कि

35:45

1910 में उन्हें एक संदिग्ध जगह के बारे

35:48

में जानकारी मिली थी। लेकिन जब तक वे वहां

35:51

पहुंचे तब तक वह जगह खाली हो चुकी थी।

35:55

लाहौर से कोई जवाब नहीं आया। सितंबर में

35:57

इंस्पेक्टर चंद्रन को एक चौंकाने वाली

36:00

सूचना मिली। उन्हें पता चला कि पुणे में

36:03

एक बच्चा गायब हुआ है जिसकी उम्र 7 साल

36:07

है। बच्चे के माता-पिता ने पुलिस में

36:09

रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इंस्पेक्टर चंद्र

36:12

ने तुरंत पुणे पुलिस से संपर्क किया।

36:15

मामले की विस्तृत जानकारी मांगी। पुणे

36:18

पुलिस ने बताया कि बच्चे का नाम अर्जुन

36:21

देश पांडे है और वह दो दिन पहले अपने घर

36:24

के पास खेलते समय गायब हो गया। कुछ लोगों

36:27

ने देखा था कि एक काली गाड़ी उस इलाके में

36:30

घूम रही थी। इंस्पेक्टर चंद्रन को लगा कि

36:33

यह वही तरीका है जो संप्रदाय इस्तेमाल

36:36

करता था। उन्होंने तुरंत पुणे जाने का

36:39

फैसला किया। 3 सितंबर को इंस्पेक्टर

36:42

चंद्रन और कांस्टेबल नटराजजन पुणे पहुंचे।

36:46

उन्होंने स्थानीय पुलिस से मुलाकात की और

36:49

मामले की जांच शुरू की। उन्होंने अर्जुन

36:51

के माता-पिता से बात की। अर्जुन की मां

36:54

सुधा देशपांडे रो रही थी और उनके पति

36:57

प्रकाश देश पांडे बहुत परेशान थे।

37:00

उन्होंने बताया कि अर्जुन एक बहुत ही शांत

37:03

और समझदार बच्चा था। वह अकेले कहीं नहीं

37:07

जाता था। इंस्पेक्टर चंद्रन ने उस इलाके

37:10

में पूछताछ की। उन्हें एक दुकानदार मिला

37:13

जिसने बताया कि उसने एक काली गाड़ी देखी

37:16

थी जो धीरे-धीरे उस गली में घूम रही थी।

37:21

उसने यह भी कहा कि गाड़ी में दो आदमी थे

37:24

जो बच्चों को देख रहे थे। दुकानदार ने उस

37:27

समय इसे संदिग्ध नहीं माना था। लेकिन अब

37:30

जब बच्चा गायब हो गया तो उसे लगा कि शायद

37:33

वही लोग थे। इंस्पेक्टर चंद्रन ने पुणे

37:36

पुलिस से कहा कि वे उस काली गाड़ी की

37:39

जानकारी निकाले। उन्होंने यह भी कहा कि वे

37:42

पुणे में किसी भी पुरानी इमारत की जांच

37:45

करें जो संप्रदाय का ठिकाना हो सकती है।

37:48

पुणे पुलिस ने अगले कुछ दिनों में कई

37:51

जगहों की तलाशी ली लेकिन कुछ नहीं मिला।

37:54

10 सितंबर को अर्जुन का शव पुणे से 20

37:58

किलोमीटर दूर एक सूखी नदी में मिला। शव की

38:02

हालत बहुत खराब थी। डॉक्टरों ने जांच के

38:04

बाद बताया कि अर्जुन को कोई नशीला पदार्थ

38:07

दिया गया था और फिर उसकी मौत हो गई। यह भी

38:10

पता चला कि अर्जुन के शरीर पर कुछ अजीब

38:13

निशान थे जो किसी अनुष्ठान के हो सकते थे।

38:16

इंस्पेक्टर चंद्रन को यकीन हो गया कि

38:19

संप्रदाय अब भी सक्रिय है। वे अब भी

38:22

बच्चों को अपहरण कर रहे हैं और उन पर

38:25

प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अब सवाल यह था

38:28

कि वे लोग कौन हैं और वे कहां छिपे हुए

38:31

हैं? इंस्पेक्टर चंद्रन बंबई वापस आ गए।

38:34

उन्होंने अपनी रिपोर्ट पुलिस कमिश्नर सर

38:36

टेबोट को दी। सर टेबोट ने कहा कि यह मामला

38:40

बहुत गंभीर है और इसे उच्च स्तर पर जांच

38:43

की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वे इस मामले

38:46

को ब्रिटिश भारत सरकार के गृह विभाग को

38:48

भेजेंगे। अक्टूबर में एक विशेष जांच टीम

38:52

बनाई गई जिसमें बंबई, मद्रास और कोलकाता

38:55

के पुलिस अधिकारी शामिल थे। इस टीम का काम

38:58

था डार्डर ऑफ द एटरर्नल आई के बचे हुए

39:02

सदस्यों को खोजना और उन्हें पकड़ना। लेकिन

39:05

यह काम आसान नहीं था। संप्रदाय के सदस्य

39:08

बहुत सावधान थे और उन्होंने अपनी पहचान

39:11

बहुत अच्छी तरह से छिपाई थी। नवंबर में

39:14

जांच टीम को एक बड़ी कामयाबी मिली। उन्हें

39:17

एक व्यक्ति मिला जो पहले संप्रदाय का

39:20

सदस्य था, लेकिन अब वह संप्रदाय छोड़ चुका

39:23

था। उसका नाम दिनकर राव था और वह अब एक

39:26

छोटे से गांव में रह रहा था। जब पुलिस ने

39:29

उससे पूछताछ की तो पहले तो वह कुछ नहीं

39:31

बोला लेकिन जब उसे डॉक्टर थर्नटन की डायरी

39:35

दिखाई गई तो वह टूट गया और सब कुछ बताने

39:38

लगा। दिनकर राव ने बताया कि वह 1911 में

39:42

संप्रदाय में शामिल हुआ था। उस समय उसे

39:46

नहीं पता था कि संप्रदाय क्या करता है।

39:49

उसे बताया गया था कि यह एक धार्मिक संगठन

39:52

है जो बच्चों की आध्यात्मिक शक्तियों को

39:55

जागृत करता है। लेकिन जब उसने असली सच्चाई

39:58

देखी तो वह हैरान रह गया। उसने देखा कि

40:01

डॉक्टर थर्नेटन बच्चों को नशीली चीजें

40:03

देते थे और फिर उन पर भयानक प्रयोग करते

40:07

थे। कुछ बच्चे उन प्रयोगों में मर जाते थे

40:10

और कुछ पागल हो जाते थे। दिनकर राव ने यह

40:13

भी बताया कि संप्रदाय में बहुत सारे

40:15

प्रभावशाली लोग थे। वकील, व्यापारी,

40:18

सरकारी अधिकारी और यहां तक कि कुछ अंग्रेज

40:21

भी। इन लोगों का मानना था कि बच्चों के मन

40:24

में अलौकिक शक्तियां होती हैं और उन

40:27

शक्तियों को जागृत करके वे किसी उच्च

40:29

सत्ता से संपर्क कर सकते हैं। डॉक्टर

40:32

थार्नटन इस विचार के मुख्य प्रचारक थे।

40:36

दिनकर राव ने बताया कि 1914 में जब पुलिस

40:39

उनके करीब आने लगी तो संप्रदाय ने अपना

40:42

ठिकाना बदल लिया। डॉक्टर थार्नटन गायब हो

40:45

गए और संप्रदाय के बाकी सदस्य अलग-अलग

40:48

जगहों पर चले गए। दिनकर राव ने कहा कि

40:52

उसने उसी समय संप्रदाय छोड़ दिया क्योंकि

40:54

वह अब और नहीं कर सकता था। जांच टीम ने

40:58

दिनकर राव से पूछा कि क्या वह बाकी

41:00

सदस्यों के नाम बता सकता है? दिनकर राव ने

41:04

कुछ नाम बताए। इनमें से कुछ लोग अब मर

41:07

चुके थे, लेकिन कुछ अब भी जीवित थे। जांच

41:10

टीम ने तुरंत उन लोगों की जांच शुरू की।

41:12

दिसंबर में पुलिस ने तीन लोगों को

41:15

गिरफ्तार किया जो संप्रदाय के पुराने

41:17

सदस्य थे। उनमें से एक रमेश कुलकर्णी नाम

41:21

का व्यक्ति था, जो एक वकील था। दूसरा था

41:24

कर्नल जेम्स मैकग्रेगर, जो एक रिटायर्ड

41:27

ब्रिटिश अधिकारी था। और तीसरा था शंकर

41:30

नायर जो एक व्यापारी था। तीनों ने शुरू

41:34

में सब कुछ इंकार किया लेकिन जब उन्हें

41:36

सबूत दिखाए गए तो वे टूट गए। रमेश

41:40

कुलकर्णी ने बताया कि संप्रदाय अब भी

41:43

सक्रिय है। लेकिन अब वे बहुत सावधानी से

41:45

काम करते हैं। उन्होंने कहा कि डॉक्टर

41:48

थार्नटन 1916 में मर गए थे। लेकिन उनके

41:52

बाद संप्रदाय का नेतृत्व किसी और ने संभाल

41:55

लिया था। रमेश ने उस व्यक्ति का नाम नहीं

41:58

बताया। कर्नल मैग्रेगर ने कहा कि संप्रदाय

42:02

का मानना है कि बच्चे एक महान जागरण के

42:04

लिए जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि संप्रदाय

42:07

का लक्ष्य एक ऐसी दुनिया बनाना है जहां

42:10

चुनिंदा लोग अलौकिक शक्तियों को नियंत्रित

42:13

कर सकें और बच्चे इस प्रक्रिया में एक

42:16

माध्यम है। शंकर नायर ने बताया कि

42:19

संप्रदाय के अब पूरे देश में छोटे-छोटे

42:22

समूह हैं जो गुप्त रूप से काम करते हैं।

42:26

उन्होंने यह भी कहा कि संप्रदाय के पास

42:28

बहुत पैसा है और बहुत ताकतवर लोगों का

42:31

समर्थन है। इसलिए उन्हें पकड़ना बहुत

42:33

मुश्किल है। जांच टीम ने तीनों को जेल में

42:37

डाल दिया और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

42:40

लेकिन जल्द ही कुछ अजीब होने लगा। रमेश

42:44

कुलकर्णी के वकील ने अदालत में ऐसे सबूत

42:48

पेश किए जो उन सभी सबूतों को कमजोर कर रहे

42:51

थे जो पुलिस के पास थे। कर्नल मैग्रेगर के

42:54

लिए लंदन से एक बहुत बड़ा वकील आया जिसने

42:57

कहा कि कर्नल पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद

43:00

है और शंकर नायर को अचानक जमानत मिल गई।

43:04

इंस्पेक्टर चंद्रन को लगने लगा कि कोई

43:06

बहुत ताकतवर व्यक्ति इन लोगों की मदद कर

43:09

रहा है। उन्होंने इस बारे में अपने वरिष्ठ

43:12

अधिकारियों से बात कि लेकिन उन्हें कोई

43:14

संतोषजनक जवाब नहीं मिला। जनवरी 1922 में

43:19

अदालत ने फैसला सुनाया। तीनों आरोपियों को

43:22

सबूतों की कमी के कारण रिहा कर दिया गया।

43:26

इंस्पेक्टर चंद्रन टूट गए। उन्होंने इतनी

43:28

मेहनत की थी, इतने सबूत जुटाए थे, लेकिन

43:32

सब बेकार हो गया। उन्होंने पुलिस कमिश्नर

43:35

से मुलाकात की और कहा कि यह सब गलत है।

43:38

लेकिन पुलिस कमिश्नर ने कहा कि अब वे कुछ

43:41

नहीं कर सकते। अदालत का फैसला आ गया है और

43:45

उसे मानना होगा। इंस्पेक्टर चंद्रन ने

43:48

मामले की फाइल बंद कर दी। लेकिन उनके मन

43:51

में हमेशा यह सवाल रहा कि वे लोग कौन थे

43:54

जिन्होंने इन आरोपियों को बचाया और क्या

43:57

संप्रदाय अब भी सक्रिय है? फरवरी में

44:00

इंस्पेक्टर चंद्रन को पता चला कि राजेश

44:03

पिल्लई की हालत और खराब हो गई है। वह अब

44:06

बिस्तर से उठ भी नहीं पाता। डॉक्टर

44:08

रदरफोर्ड ने कहा कि राजेश का मानसिक

44:11

संतुलन पूरी तरह से खत्म हो चुका है।

44:14

इंस्पेक्टर चंद्रन राजेश से मिलने गए। जब

44:18

उन्होंने राजेश को देखा तो उनकी आंखों में

44:20

आंसू आ गए। वह छ साल का बच्चा जो पहले

44:23

इतना चंचल था अब एक खाली खोल बनकर रह गया

44:27

था। मार्च में एक और बच्चा लापता हुआ। इस

44:31

बार सूरत में और फिर अप्रैल में कानपुर

44:34

में। इंस्पेक्टर चंद्रन को लगने लगा कि

44:37

संप्रदाय अब फिर से सक्रिय हो रहा है।

44:40

उन्होंने फिर से जांच शुरू करनी चाही

44:42

लेकिन उन्हें रोक दिया गया। उन्हें कहा

44:44

गया कि वे दूसरे मामलों पर ध्यान दें। मई

44:48

में इंस्पेक्टर चंद्रन को बंबई से बाहर

44:51

तबादला कर दिया गया। उन्हें एक छोटे से

44:53

शहर में भेज दिया गया। उन्हें लगा कि यह

44:56

तबादला इसलिए हुआ है ताकि वे इस मामले को

44:59

छोड़ दें। लेकिन इंस्पेक्टर चंद्रन ने हार

45:02

नहीं मानी। उन्होंने एक निजी डायरी रखनी

45:05

शुरू की जिसमें वे इस मामले से जुड़ी सभी

45:08

जानकारियां लिखते रहे। जून में राजेश

45:11

पिल्लई की मौत हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि

45:14

उसकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। लेकिन

45:17

डॉक्टर रदरफोर्ड को पता था कि सच क्या है।

45:20

राजेश उस भयानक अनुभव से उभर नहीं पाया।

45:24

उसका मन उस अंधेरी जगह में ही फंस गया था

45:27

और अंत में उसने लड़ना छोड़ दिया। राजेश

45:30

की मौत के बाद डॉक्टर रदरफोर्ड ने उसके

45:33

पूरे मामले की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार

45:35

की। उन्होंने उस रिपोर्ट में सब कुछ लिखा।

45:38

राजेश के दौरे, उसके द्वारा बताए गए नाम व

45:41

भूमिगत जगह संप्रदाय सब कुछ उन्होंने उस

45:44

रिपोर्ट को बंबई मेडिकल कॉलेज के

45:47

आर्काइव्स में रख दिया ताकि भविष्य में

45:50

अगर कोई इस तरह का मामला आए तो उसे इससे

45:53

मदद मिल सके। जुलाई में दिनकर राव की भी

45:56

मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि वह आत्महत्या

45:59

थी। लेकिन जो लोग इस मामले को जानते थे

46:01

उन्हें शक था। दिनकर राव ने संप्रदाय के

46:04

खिलाफ गवाही दी थी। शायद इसका बदला लिया

46:07

गया। समय बीतता गया। 1922 के बाद के सालों

46:11

में कभी कभार बच्चे लापता होते रहे। कभी

46:14

बंबई में, कभी मद्रास में, कभी कोलकाता

46:17

में। लेकिन हर बार मामला अनसुलझा रह जाता।

46:21

पुलिस को कोई सुराग नहीं मिलता और

46:23

धीरे-धीरे लोग भूल जाते। 1950 में

46:26

इंस्पेक्टर रमेश चंद्रन रिटायर हो गए।

46:30

उन्होंने अपनी पूरी डायरी अपने एक

46:32

विश्वसनीय जूनियर इंस्पेक्टर विनोद मेहता

46:35

को दे दी और कहा कि अगर कभी वे इस मामले

46:38

को सुलझाने का मौका पाए तो इस डायरी से

46:41

मदद मिलेगी। 1957 में डॉक्टर जेम्स

46:45

रदरफोर्ड की मौत हो गई। उनकी मौत से पहले

46:49

उन्होंने राजेश पिल्लई के मामले की फाइल

46:52

अपने एक शिष्य डॉक्टर प्रकाश शनोई को दे

46:54

दी और कहा कि इस मामले को कभी भुलाया नहीं

46:57

जाना चाहिए। समय और बीतता गया। भारत आजाद

47:02

हुआ। नए जमाने आए। शहर बदले, लोग बदले

47:06

लेकिन कुछ चीजें नहीं बदली। बच्चे अब भी

47:08

गायब होते रहे। कभी-कभी कुछ अजीब निशान

47:11

मिलते पुराने प्रतीक जो किसी को समझ नहीं

47:14

आते। आज भी बंबई जिसे अब मुंबई कहते हैं

47:18

कि पुरानी इमारतों के नीचे वे अंधेरे

47:21

गलियारे हैं। आज भी कभी-कभी कोई। पुरानी

47:24

इमारत तोड़ी जाती है तो नीचे कोई अजीब जगह

47:27

मिलती है। दीवारों पर खरोचे मिलती हैं।

47:30

बच्चों के कपड़ों के पुराने टुकड़े मिलते

47:33

हैं और कभी-कभी वह प्रतीक मिलता है वह आंख

47:37

तीन गोलाकार रेखाओं से घिरी हुई। पुलिस हर

47:40

बार जांच करती है और हर बार कहती है कि यह

47:43

कोई पुरानी जगह है शायद 100 साल पुरानी और

47:47

फिर मामला बंद हो जाता है। लेकिन जो लोग

47:49

जानते हैं वे चुप रहते हैं क्योंकि कुछ

47:52

सच्चाइयां इतनी भयानक होती हैं कि उन्हें

47:56

बोला नहीं जा सकता। राजेश पिल्लई के मामले

47:59

की फाइल अब भी बंबई मेडिकल कॉलेज के

48:02

आर्काइव्स में है। वह फाइल धूल से भरी है

48:05

और उस पर मकड़ी के जाले लगे हैं। कोई उसे

48:08

पढ़ता नहीं। कोई उसे जानता नहीं। लेकिन वह

48:11

वहां है साक्ष्य के रूप में, गवाही के रूप

48:14

में। उस बच्चे की याद के रूप में जिसने एक

48:17

ऐसी दुनिया देखी जो किसी को नहीं देखनी

48:20

चाहिए। और कभी-कभी देर रात जब शहर सो जाता

48:24

है तो पुरानी इमारतों के नीचे से अजीब

48:28

आवाजें आती हैं। बच्चों के रोने की

48:30

आवाजें, मदद मांगने की आवाजें लेकिन कोई

48:34

सुनता नहीं या शायद लोग सुनना नहीं चाहते।

48:37

इंस्पेक्टर चंद्रन की डायरी में आखिरी

48:39

पन्ने पर लिखा है मुझे यकीन है कि डी

48:42

आर्डर ऑफ द एटरनल आई अब भी कहीं ना कहीं

48:46

सक्रिय है। वे लोग अभी भी वही काम कर रहे

48:49

हैं जो डॉक्टर थर्नाटन करते थे और जब तक

48:52

कोई उन्हें रोकता नहीं तब तक बच्चे गायब

48:55

होते रहेंगे। भगवान हमारी रक्षा करे क्या

48:59

इंस्पेक्टर चंद्रन सही थे? क्या ड आर्डर

49:01

ऑफ एटरर्नल आई अब भी मौजूद है? यह सवाल

49:04

अनुत्तरित है। लेकिन जो पक्की बात है वह

49:07

यह कि राजेश पिल्लई ने कुछ ऐसा देखा था जो

49:10

उसे नहीं देखना चाहिए था और उसने उस

49:13

अंधेरे का सामना किया जो आज भी कहीं छिपा

49:16

बैठा है। कुछ रहस्य कभी सुलझते नहीं। कुछ

49:20

सच्चाइयां हमेशा अंधेरे में ही रहती हैं

49:22

और कुछ बच्चे कभी घर वापस नहीं आते। राजेश

49:26

पिल्लई का मामला आज भी भारत के सबसे

49:28

रहस्यमय और भयावह मामलों में से एक है। वह

49:32

बच्चा जिसे विज्ञान कभी समझ नहीं पाया। वह

49:35

बच्चा जिसने एक ऐसी दुनिया की झलक देखी

49:38

जहां बुराई का कोई अंत नहीं है। वह बच्चा

49:42

जिसकी आत्मा शायद आज भी उस अंधेरी जगह में

49:44

भटक रही है। उन सब बच्चों के साथ जो कभी

49:48

घर नहीं लौटे। अगर आप कभी मुंबई की पुरानी

49:51

इमारतों के पास से गुजरे और आपको नीचे से

49:54

कोई अजीब आवाज सुनाई दे तो रुकिएगा मत।

49:57

चलते रहिएगा क्योंकि कुछ चीजें जाननी नहीं

50:00

चाहिए। कुछ दरवाजे खोलने नहीं चाहिए और

50:03

कुछ आवाजें सुननी नहीं चाहिए। राजेश

50:05

पिल्लई की कहानी हमें याद दिलाती है कि इस

50:09

दुनिया में अंधेरा बहुत गहरा है और

50:11

कभी-कभी वह अंधेरा किसी मासूम बच्चे को

50:14

अपने में खींच लेता है। हम सिर्फ

50:17

प्रार्थना कर सकते हैं कि ऐसा दोबारा ना

50:20

हो और हम उम्मीद कर सकते हैं कि जो बच्चे

50:23

उस अंधेरे में खो गए हैं वे अब शांति में

50:26

हैं। इस कहानी के अंत में केवल एक ही बात

50:29

कही जा सकती है कि अपने बच्चों की रक्षा

50:31

कीजिए। उन पर नजर रखिए और सबसे जरूरी

50:36

ईश्वर और यीशु मसीह में विश्वास रखिए

50:39

क्योंकि वही सच्चा प्रकाश है जो हर अंधेरे

50:42

को दूर कर सकता है। वही एकमात्र शक्ति है

50:46

जो बुराई से हमारी रक्षा कर सकती है।

50:49

राजेश पिल्लई की आत्मा को शांति मिले और

50:52

उन सभी बच्चों को शांति मिले जो कभी घर

50:55

नहीं लौटे। आमीन।

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