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Dora-e-Quran 2026 | Juz 10 Tafseer | Surah Al-Anfal & At-Tawbah | Dr. Humaira Tariq | #ramadan

44m 14s6,866 words845 segmentsHindi

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0:00

आउज बिल्ला शैत रजीम

0:03

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

0:07

अन्साहु

0:12

व रसूल व रसूल व कुरबा व मसाब

0:19

इन तुम आमा तुम बिल वमालना

0:27

अबना यमल फुरकान यमल

0:30

ज्लाहु

0:32

अला कुल श कदीर इस तुम बिल दुनिया

0:41

अस

0:43

व तुम

0:48

व्लाहु

0:50

काफला

0:53

का मन का

0:56

मनना

0:59

इन समुरी

1:04

मना कलीला वरा

1:08

कल तुम्लाह

1:14

वला

1:16

स इनहु अलीम

1:19

सुदूर

1:23

तुम

1:25

कली

1:27

फी

1:30

फीला

1:33

अमरा कान मफला व इ्लाह तज उमूर आउजब्लाह

1:40

मिन शैतजीम बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

1:43

आज हम अल्लाह ताला के फजल करम से 10वें

1:45

पारे के हम मज़ामीन को देखेंगे। इस पारे

1:48

में सूर अल अनफाल का बकिया हिस्सा है और

1:52

सूर तौबा की 93 आयात हैं। इन दोनों सूरतों

1:56

को समझने के लिए ज्यादा बेहतर है कि हमें

1:59

सीरत तबा से आगाही हो। इसलिए अगर कोई

2:02

किताब जैसे मुस् इंसानियत है या दहीकुल

2:06

मखतूम है उसका मुतालिया कर लिया जाए तो

2:08

ज्यादा मुनासब होगा। सूर अल अनफाल की आयत

2:12

नंबर 60 है। उसके अंदर उसका तर्जुमा है कि

2:14

अल्लाह ताला फरमाते हैं और तुम लोग जहां

2:17

तक तुम्हारा बस चले ज्यादा से ज्यादा ताकत

2:20

और तैयार बंदे रहने वाले घोड़े इनके

2:22

मुकाबले के लिए मुहैया रखो ताकि इसके

2:25

जरिया से अल्लाह के और अपने दुश्मनों को

2:27

और उन दूसरे दुश्मनों को खौफजदा कर दो

2:30

जिन्हें तुम नहीं जानते मगर अल्लाह जानता

2:33

है। अल्लाह की राह में जो कुछ तुम खर्च

2:35

करोगे उसका पूरा-पूरा बदल तुम्हारी तरफ

2:37

पलटाया जाएगा और तुम्हारे साथ हरगिज़ भी

2:41

जुल्म ना होगा। यह सूर अल अनफाल की आयत

2:44

नंबर 60 और उसका तर्जमा और इस आयत मुबारका

2:48

में इस्लामी निजाम जिंदगी का वो बुनियादी

2:51

असूल बयान किया गया है जो हर दौर की उम्मत

2:55

की बका और गलबे का रास्ता दिखाता है और

2:59

इसमें यह समझाया गया तीन काम है जो हमें

3:02

समझाए गए हैं। नंबर एक कि जिहाद की तैयारी

3:05

करनी है। यानी इस आयत मुबारका में हमें यह

3:08

बात समझाई गई है कि तुम्हें ताकत और घोड़े

3:12

मतलब एक तो तुम्हारे पास ताकत होनी चाहिए

3:15

यानी तुम्हारे पास फौज तुम्हारे पास लश्कर

3:18

और असला और लश्कर को मूव करने का लेकर

3:22

चलने का जो जिहाद में जो हथियार इस्तेमाल

3:26

होते हैं वह सब होने चाहिए और इस ताकत में

3:29

बहुत बुनियादी ताकत जो है वह तुम्हारा

3:31

इत्तहाद है और इत्तहाद जो है वह ईमान ईमान

3:36

की बुनियाद पर होता है। और गोया के एक

3:39

यहां पर तैयारी की बात की गई है कि

3:41

तुम्हें जिहाद के लिए पूरी तैयारी करनी

3:43

है। और दूसरी यह बात समझाई जा रही है कि

3:47

अगर बड़ी तैयारी भी कर लो बड़ा मजबूत

3:49

तुम्हारे पास लश्कर हो और लश्कर के पास

3:53

सारा जदीद असला भी हो जिसके जरिए वह जिहाद

3:57

करें। वह सब चीजें मौजूद हो। मगर कुर्बानी

4:00

का जज्बा मौजूद ना हो तो कोई भी जिहाद,

4:03

कोई भी फौज, कोई भी लश्कर कामयाब नहीं हो

4:07

सकता। लेकिन तीसरी बात यह समझाई जा रही है

4:10

कि इन सबके लिए मुमकिन कैसे होगा? यानी

4:13

जाहिर है कि लश्कर की तैयारी के लिए, असले

4:16

की तैयारी के लिए और फिर रास्ते के सफर के

4:20

लिए सबके लिए वसाइल तो चाहिए हैं। और तमाम

4:24

वसाइल किससे आएंगे? पैसे से आएंगे। तो

4:27

इनफाक तैयारी, कुर्बानी और इनफाक इस आयत

4:31

मुबारका के तीन मौजूआत हैं। और यह आयत

4:34

मुबारका नाज़िल हुई है गज़वा तबूक के तनाज़ुर

4:37

में और गज़वा तबूक 9 हिजरी में पेश आया।

4:40

जबकि सख्त गर्मी का मौसम था। रास्ता तवील

4:46

था। क्योंकि जाहिर है मदीना मुनव्वरा से

4:49

तबूक का मकाम काफी दूर है। फासला ज्यादा

4:52

है और सख्त गर्मी और उस वक्त में जब के

4:55

कैद के बाद फसल पक के तैयार हो चुकी थी और

4:59

फसल काटने का वक्त था और ऐसे वक्त में कि

5:03

जब फसल काटने का वक्त था तो फसल काटने की

5:07

बजाय जंग के लिए जिहाद के लिए रवाना होना

5:10

यह एक बहुत बड़ा इम्तिहान था। गजवा तबूक

5:16

को जैशुल उसरा भी कहा गया है और इसलिए कि

5:19

यह तंगी के वक्त में यानी बड़ी परेशानी का

5:22

वक्त एक तो मौसम सख्त और दूसरा कहद के बाद

5:26

फसलें तैयार हुई और तीसरा एक बड़े दुश्मन

5:29

के साथ रूमी सल्तनत के साथ मुकाबला है। यह

5:33

वो लम्हा था जब ईमान सिर्फ जुबान नहीं

5:35

बल्कि अमल मांग रहा था। इस मौका पर इंफाक

5:39

की ऐसी बड़ी-बड़ी मिसालें हैं जिस पर

5:42

इंसानियत हैरान रहती है। हजरत उस्माने गनी

5:45

रज़ अल्लाहहु ताला अनो ने 300 ऊंट मुकम्मल

5:48

साजो सामान के साथ जिहाद के इस जिहादी

5:53

लश्कर के लिए डोनेट कर दिए और 1000 दीनार

5:57

नबी सल्लल्लाह अलह वसल्लम की झोली में डाल

6:00

दिए। हज़ूर सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने

6:02

फरमाया आज के बाद उस्मान को कोई चीज

6:05

नुकसान नहीं पहुंचा सकती। इसी तरह हजरत

6:08

उमरे फारूक रज़ अल्लाहहु ताला अनो अपने घर

6:11

का आधा माल ले आए और सोचा कि आज अबू बकर

6:15

सिद्दीक रज़ अल्लाहहु ताला अनो से सबकत ले

6:18

जाऊंगा और जब हजरत अबू बकर सिद्दीक रज़

6:21

अल्लाहहु ताला अनो का वक्त आया तो वो अपने

6:24

घर का सारा माल ले आए पूछा गया घर वालों

6:27

के लिए क्या छोड़ा है फरमाया अल्लाह और

6:30

उसके रसूल का नाम छोड़ आया हूं तो इसी तरह

6:33

वो सहाबा इकराम जो गरीब थे जिनके पास मालो

6:37

दौलत नहीं था, सरमाया नहीं था, कुछ देने

6:40

के लिए पास नहीं था। लेकिन वह अपनी जान

6:43

कुर्बान करने के लिए बेचैन थे। मगर कुछ दे

6:47

नहीं पा रहे थे। इसलिए आंखों से आंसू बह

6:50

रहे थे कि हम इस राह में इफाक नहीं कर पा

6:52

रहे। यही कुरानी इंफाक है। जो असल कुरान

6:57

समझा रहा है। असल दौलत क्या है? वो दिल की

7:00

दौलत है कि जिसके अंदर इंसान की मोहब्बत

7:05

मौजूद ना हो। वो राहे खुदा में खर्च करने

7:08

के लिए हर वक्त इंसान तैयार रहे। गज़वा

7:11

तबूक हमारे लिए कुछ चीजें जो समझा रहा है।

7:15

नंबर एक कि फौज की तैयारी हो, साजो सामान

7:18

हो, सफर की मशक्कत जो भी हो तो उसको

7:22

बर्दाश्त करना मोमिन का काम है। अब हर

7:25

वक्त का जिहाद फर्क है ना। उस वक्त में एक

7:29

साजो सामान वाला लश्कर चाहिए था, असला

7:32

चाहिए था। और आज किस बात की जरूरत है? आज

7:35

दुश्मन के मुकाबले के लिए इस चीज की जरूरत

7:39

है कि बहुत बड़ी तादाद पक्के और सच्चे रास

7:45

अकीदे और ईमान वाली एक पूरा का पूरा एक

7:49

बड़ी जमात हो और उसको हमें सपोर्ट करना और

7:52

ज्यादा से ज्यादा लोगों को ऐसी इज्तमाइयत

7:55

के अंदर जमात इस्लामी जैसी इज्तमाइयत के

7:58

अंदर शामिल होना और उसे कुत देना और उसको

8:02

जिस मकसद के लिए खड़ी है कि हकमियत

8:05

इलाहिया के कयाम के लिए अकामत दीन के लिए

8:08

अह ज़्यादा से ज़्यादा माल सर्फ़ करना अपना

8:11

वक़्त देना अपनी जान लगाना यानी अपनी

8:14

सलाहियतें लगाना यह बहुत जरूरी है।

8:17

क्योंकि गज़वा तबूक में जिहाद का क्या मकसद

8:20

था? अपने दीन की हिफाज़त, दुश्मन को शिकस्त

8:24

देना। अब मुसलमानों की हिफाज़त, अपने

8:27

जग्राफ़िए की हिफाज़त, अपनी सरहदों की

8:29

हिफाज़त और फिर उसके साथ-साथ यह कि जो

8:32

कुफ्र का लश्कर है, कुफ्फार हैं, उनकी जो

8:36

बातिल कुतें और मुसलमानों को जो उनसे खतरा

8:39

था, उससे महफूज़ करना था। और यही मकासद आज

8:43

के इस जम्हूरियत के दौर में जो राय आमा

8:46

यानी लॉबिंग लोगों को तैयार करना दीन

8:49

इस्लाम सब तक पहुंचाना दावत देना और दावत

8:53

देकर इस बात पर आमादा करना कि सब दीन

8:58

इस्लाम को दिल के साथ अख्तियार करें। बा

9:00

अमल मुसलमान बने और मुतहिद होकर इस जो भी

9:05

गैर इस्लामी चीजें हैं उनको खत्म कर दें।

9:08

और जो जुल्म और जबर का निजाम है उसे खत्म

9:12

करके ऐसा सिस्टम पाकिस्तान के अंदर लाया

9:15

जाए जहां पर इंसानों के मसाइल हल होते हो।

9:19

इसकी मिसाल मैं सिर्फ एक आपके सामने

9:22

रखूंगी कि देखिए हमारा जो नीचे तक का गली

9:26

मोहल्ले का मसला है, इंफ्रास्ट्रक्चर है,

9:28

वह किस हद तक मुतासिर है। गली खराब है।

9:32

सीवरेज पाइपलाइन और सीवरेज हर जगह मौजूद

9:36

नहीं। गटर के ढक्कन खुले हुए हैं और उसके

9:40

साथ-साथ यह हम देखते हैं सरकारी स्कूल

9:43

मौजूद हैं। मगर उसकी इमारतें वहां पर पानी

9:46

वहां पर वाशरूम बैतुल खला इन सारी चीजों

9:50

का इंतजाम फिर हेल्थ सेंटर हैं। जहां

9:53

हेल्थ सेंटर की बिल्डिंग्स खराब हैं।

9:55

डॉक्टर्स बहुत कम है। अदवियात नहीं है।

9:57

वैक्सीनेशन तक मौजूद नहीं है। और इसके

10:01

साथ-साथ जितना भी हादसा किसी भी तरह का

10:04

रनुमा हो जाए, कोई डिॉस्टर हो तो उससे

10:07

निपटने के लिए कुछ मौजूद नहीं। अभी हालिया

10:10

सैलाब के अंदर कितने देहात डूब गए और जब

10:14

पानी खुश हुआ तो कितनी बेशुमार लाशें जो

10:17

है वो निकली। क्यों लोगों को रेस्क्यू

10:19

करने के लिए कश्तियां मौजूद नहीं थी। यह

10:22

सब क्या यह जुल्म नहीं है? इस जुल्म के

10:25

निजाम को बदल के ऐसे हुक्मरानों को लेकर

10:28

आना जो माल को आवाम की जरूरत के लिए खर्च

10:32

करें। करप्शन पर ना लगाएं। अपनी नस्लों को

10:35

सवारने पे नहीं बल्कि जो आवाम है उनके ऊपर

10:39

खर्च करें और उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी

10:41

करें और उनकी हिफाजत करें। यही सबक हमें

10:44

गज़वा तबूक में मिलता है। जब मुसलमान एक

10:48

बड़ा लश्कर लेकर गए और तैयारी के साथ गए

10:52

तो क्या हुआ? दुश्मन घबरा गया। दुश्मन पर

10:54

रो पड़ा और रूमी बगैर लड़े वापस चले गए।

10:58

मुसलमानों को फतह नसीब हुई और बगैर किसी

11:03

नुकसान के हुई। अल्लाह ताला का वादा पूरा

11:05

हो गया। आज भी दरअसल इसी जज्बा ईमानी की

11:10

जरूरत है। तो इसलिए इस यह बहुत अहम सबक है

11:14

हमें जो इससे मिलता है। इसके बाद हम सूर

11:17

तौबा की तरफ आते हैं। सूर तौबा एक वाहिद

11:21

सूरत है जिसके आगाज में बिस्मिल्लाह नहीं

11:24

लिखी गई। क्यों नहीं लिखी गई? कि यहां पर

11:27

अल्लाह के हत्मी फैसले यानी ईने बारात

11:31

किसके साथ? अह काफिरों के साथ, मुशरिकों

11:34

के साथ जिनके साथ मुहिदे थे उनके मुहदों

11:37

से ऐराने बरात की गई है। और यह दरअसल हक

11:41

और बाततिल के आखिरी इम्तियाज की जो सूरत

11:45

है इस ये सूरत उस वक्त में नाज़िल हुई जब

11:48

इस्लाम एक रियासत बन चुका था। जजीरे अरब

11:51

में फैसला कुन मरहला आ चुका था।

11:54

मुनाफिककीन, मुशरिकन और कमजोर ईमान रखने

11:57

वालों की हकीकत जाहिर होना थी। वज़ तबूक का

12:01

मरहला भी दरपेश था। यह सूरत दरअसल इस्लामी

12:04

मुआशरे की ततहीर उम्मत की सियासी और

12:07

अखलाकी सबबंदी का ऐलान है। सूर तौबा की

12:10

अहमियत इससे अंदाजा हो सकता है कि इस्लामी

12:13

रियासत का आईनी मंशूर है। इस सूर मुबारका

12:16

के जरिए मुनाफिककीन का पूरा जो है वह राज

12:19

फाश हो गया। मुनाफिकत का पर्दा चाक हो

12:22

गया। इस सूर मुबारका में जिहाद, इनफाक और

12:25

अतात की आला तरबियत है। उम्मत को आलमी

12:28

कयादत के लिए तैयार करना मकसूद था। लिहाजा

12:32

इस सूर मुबारका के जरिए उम्मत को यह

12:35

समझाया गया है कि तुम सुपर पावर हो।

12:38

तुम्हें पूरी दुनिया की कयादत करना है।

12:40

तुम सुपर पावर बनो। इस मुकाम पर पहुंचो।

12:44

अपने पास तुम्हारे ईमान भी मजबूत हो।

12:47

तुम्हारे पास ताकत कुत भी हो। और तुम

12:49

मुतहिद भी हो। तुम्हारे पास सरमाया भी हो।

12:52

इसके लिए जान भी लगाओ, माल भी लगाओ, वक्त

12:54

भी लगाओ। और सूर तौबा का मरकजी मौजू क्या

12:58

है? मुशरिकन से ऐलान बरात किया गया है कि

13:00

अब इस्लाम महज दावत नहीं है बल्कि निजाम

13:04

अदल बन चुका है। इसलिए जिन्होंने मुहदा

13:07

तोड़ा जिन्होंने मुहदे के खिलाफ वर्जी की।

13:10

उनके साथ मुसलमानों का कोई ताल्लुक नहीं

13:13

है। उस मुहदे से ईने बारात कर दी गई है।

13:16

और साथ यह कि मुनाफिकन की मुकम्मल शिनाख्त

13:20

भी हो गई है। और जिहाद फीसला और इफाक और

13:23

अतात रसूल ये सब चीजें जो है वो इस सूर

13:26

मुबारका के अहम मौजूआत हैं जो हमें बताए

13:29

गए हैं। अब हम सूरह तौबा की आयत नंबर 16

13:34

और उसका तर्जुमा जो है वह देखते हैं कि

13:37

सूर तौबा की आयत नंबर 16 का तर्जुमा इस

13:41

तरह से है। क्या तुमने यह समझ लिया है कि

13:43

तुम यूं ही छोड़ दिए जाओगे। हालांकि अभी

13:46

अल्लाह ने यह जाहिर नहीं किया कि तुम में

13:48

से कौन इसकी राह में जिहाद करता है?

13:51

अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहहु अलैहि

13:54

वसल्लम और अहले ईमान के सिवा किसी को

13:56

राजदार नहीं बनाना। और अल्लाह तुम्हारे

13:59

आमाल से पूरी तरह बाखबर है। इस मजमून के

14:03

जरिए यह बताया गया है कि ईमान कोई दावा

14:06

नहीं है बल्कि एक इम्तिहान है। इस सूर की

14:09

यह आयत ईमान वालों को झंझोड़कर यह हकीकत

14:13

बताती है कि अल्लाह के दीन के साथ

14:15

वाबस्तगी का ऐलान आसान है। लेकिन इस ऐलान

14:20

को सच साबित करना कुर्बानी और आजमाइश

14:24

मांगता है। अल्लाह ताला साफ फरमा रहे हैं

14:27

कि तुम्हें यूं ही छोड़ नहीं दिया जाएगा।

14:30

कैसे नहीं छोड़ दिया जाएगा? तुम्हारी

14:32

आजमाइश होगी। तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी

14:35

वफादारी, तुम्हारी कुर्बानी, सब कुछ

14:38

आजमाया जाएगा। देखा जाएगा कि तुम कितने

14:42

अपने दावे में सच्चे हो। कितनी अपनी

14:45

वफादारी में सच्चे हो। जो तुम एक अहद कर

14:49

बैठे हो, जो तुम दावा कर रहे हो, जो तुम

14:52

ऐलान कर रहे हो। क्या जब वक्त आया है तो

14:56

उसके मुताबिक तुम कुर्बानी दे सकते हो। इस

15:00

आयत मुबारका में यह भी समझाया गया है कि

15:02

राहे हक पर चलने वाला शख्स लाजमन इम्तहान

15:06

से गुजरता है। इम्तहान किस चीज का है? माल

15:10

का, जान का, ताल्लुकात का, मकाम का,

15:13

ज़ूलतों का। हर चीज परी जाती है। यह आजमाइश

15:16

इसलिए नहीं कि अल्लाह को इल्म नहीं है।

15:19

अल्लाह को इल्म है कि मैं और आप कितने

15:22

साबित कदम है। अल्लाह के इल्म में है कि

15:25

मैं और आप वक्त पढ़ने पर हक का कितना साथ

15:28

दे सकते हैं। अल्लाह के इल्म में है कि

15:31

मैं और आप अपना वक्त और माल और सलाहियतें

15:35

राय खुदा में अल्लाह के दीन को सर बुलंद

15:38

करने के लिए अल्लाह के कलमे को ऊंचा करने

15:41

के लिए कितनी लगा सकते हैं। उसके बावजूद

15:44

आजमाइश है। इसलिए आजमाइश है कि खुद इंसान

15:48

इससे गाफल है। मैं और आप गाफिल हैं। हमें

15:52

पता नहीं कि हम कितनी कुर्बानी दे सकते

15:54

हैं। लिहाजा हम पर यह वाज़ हो जाना चाहिए

15:58

कि हमारी इस्तता कितनी है। और यह वाज़ होना

16:02

किस लिए जरूरी है? ताकि हम इंप्रूव कर

16:06

सकें अपने ईमान को, अपनी इस्तकामत को,

16:09

अपनी साबत कदमी को, अपने सब्र को, अपनी

16:11

इसार को, अपनी कुर्बानी को। क्योंकि यही

16:14

वो सरमाया है जो आखिरत में हमारे काम

16:17

आएगा। बाकी सब चीजें दुनिया में बाकी रह

16:20

जाएंगी। इसलिए यह अल्लाह ताला बता रहे हैं

16:24

कि तुम्हें आजमाया जाएगा कि तुम्हें

16:26

तुम्हारा इनर, तुम्हारी सुरते हाल,

16:29

तुम्हारी हकीकत तुम पर वाज़ हो जाए और जब

16:32

वाज़ हो जाए तो तुम उसको बेहतर करने की

16:34

पूरी कोशिश करो। क्योंकि मुस्तकिल इंसान

16:37

जो है वह उसके ऊपर यह बात रहनी चाहिए कि

16:40

वह हमेशा अपने आप को पहले से बेहतर करता

16:44

रहे। हुजूर सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने

16:46

फरमाया तबाह हो गया वह शख्स जिसका आज उसके

16:49

कल से बेहतर ना हुआ तो हमें मुस्तकिल

16:51

बुनियादों पर अपनी बेहतरी की कोशिश करने

16:55

की जरूरत है। गज़ तबूक के मौका पर यही

16:58

आजमाइश सामने आई कि गर्मी की शिद्दत सफर

17:00

की मशक्कत, माल की कमी, दुश्मन की ताकत हर

17:04

चीज ने ईमान की हालत को बिल्कुल वाज़ कर

17:08

दिया। मुनाफक बहाने बनाकर पीछे रह गए।

17:10

मुख्तलिफ बहाने बनाए और मुखलिस ईमान वाले

17:13

हर कीमत पर निकल खड़े हुए। राहे हक में

17:17

साबित कदमे इसलिए जरूरी है क्योंकि हक का

17:20

रास्ता सिर्फ सच का नहीं बल्कि कुर्बानी

17:22

का रास्ता है। जो आजमाइश के वक्त डगमगा

17:25

जाए वह दावा तो रखता है मगर ईमान की रूह

17:28

से महरूम है। साबत कदमी दरअसल अल्लाह के

17:32

साथ वफादारी का ऐलान है। यह वह लम्हा होता

17:36

है जब इंसान दुनिया की सहूलतों और अल्लाह

17:40

की रजा में से किसी एक को चुनता है। तो

17:44

इसलिए यह बहुत जरूरी है कि उसकी समझ जो है

17:48

वह हमें आ जाए। हजरत अबू बकर सिद्दीक रज़

17:51

अल्लाह ताला अनो हजरत उमरे फारूक रज़

17:54

अल्लाहहु ताला अनो और हजरत उस्माने गनी रज़

17:57

अल्लाह ताला अनो और गरीब सहाबा जिनकी

18:00

आंखों से आंसू बह रहे थे वो सब हमारे लिए

18:03

नमूना है कि इसी तरह हमें अपनी जिंदगी को

18:07

आगे लेकर चलना और अपने ईमान को बढ़ाना है।

18:11

अगर आजमाइश ना हो तो फिर ईमान सिर्फ एक

18:14

ख्याल बनकर रह जाता है। आजमाइश ही है जो

18:18

इंसान के ईमान को साबित करती है। लेकिन

18:21

अगर इंसान आजमाइश के वक्त में अपना आराम,

18:25

अपनी इज्जत, अपना माल, अपनी जान हक की राह

18:28

में नहीं लगा देता तो फिर क्या है? फिर यह

18:31

आजमाइश है कि वो गोया कि इस आजमाइश में

18:34

नाकाम हो गया। अगर लगा दिया तो इसका मतलब

18:37

है कि ईमान जिंदा है। इसलिए कुरान यह कहता

18:40

है क्या तुम समझते हो कि तुम्हें यूं ही

18:43

छोड़ दिया जाएगा? मतलब तुम्हें आजमाया

18:45

नहीं जाएगा। तो यह ईमान की आजमाइश इस आयत

18:50

मुबारका में बताई गई है। और इसके बाद जो

18:54

ये सूर तौबा की आयत नंबर 19 उसके अंदर जो

18:58

है वो अल्लाह ताला क्या फरमाते हैं? क्या

19:00

तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिद

19:03

हराम की खिदमत को इस शख्स के बराबर समझ

19:06

लिया है जो अल्लाह और यौमे आखिरत पर ईमान

19:09

लाया और अल्लाह की राह में जिहाद किया। यह

19:12

दोनों अल्लाह के नजदीक बराबर नहीं हो सकते

19:15

और अल्लाह जालिम कौम को हिदायत नहीं देता।

19:18

इस मज़मून में बताया गया है कि असल में

19:21

ईमान आमाल की रूह है और ईमान ही कदर कीमत

19:25

का मयार है। इंसान जिंदगी में बहुत से काम

19:28

करता है। बहुत सारी खिदमात अंजाम देता है।

19:30

बहुत सी कुर्बानियां भी देता है। मगर

19:33

कुरान हमें क्या बताता है कि अल्लाह के

19:35

नजदीक किसी अमल की असल कदर इसके पीछे

19:38

मौजूद ईमान है। ईमान के बगैर अमले साले की

19:42

कोई हैसियत नहीं है। सूरह तौबा की यह आयत

19:45

दरअसल इसी हकीकत को बयान कर रही है कि अगर

19:48

ईमान के बगैर अमले साले होगा तो अल्लाह के

19:51

यहां मतलूब नहीं है। और ईमान ही अमले साले

19:56

को बढ़ाता भी है। जज्बा जिहाद को तेज करता

20:00

है। कुर्बानी पर आमादा करता है। मुश्किल

20:03

के वक्त में इंसान को साबत कदम रखता है।

20:06

और इस आयत में अल्लाह ताला ने यह भी बता

20:09

दिया है कि हाजियों को पानी पिलाने और

20:11

मस्जिद हराम की खिदमत जैसे अज़ीम काम बहुत

20:15

अज़म काम है यह। लेकिन इस अजीम काम को

20:18

अंजाम देने वाला शख्स भी उस शख्स के बराबर

20:21

नहीं हो सकता जो अल्लाह पर ईमान रखता है।

20:24

आखिरत पर यकीन रखता है और फिर ईमान के साथ

20:28

अल्लाह की राह में जिहाद करता है। इससे

20:31

वाज़ हुआ कि ईमान के बगैर नेकी मतलूब ही

20:34

नहीं है। और दूसरी बात जो वाज़ की वो यह कि

20:37

ईमान का तकाजा जद्दोजहद है। जिहाद है।

20:40

अल्लाह के दीन को गालिब करने की कोशिश है।

20:42

यह हर मुआशरे की जरूरत है। अहले गजा के

20:46

लिए उस वक्त यह सब कुर्बानियां मतलूब थी।

20:50

जो कुर्बानियां उन्होंने दी और दे रहे

20:52

हैं। मेरे और आपके लिए यह कुर्बानी है कि

20:55

हम अपनी कौम को जो तेजी से मगरबी तहजीब की

20:59

तरफ भाग रही है। जो तेजी से आज की नस्ल

21:02

हिंदुाना तहजीब के ज़रे असर आ रही है। जो

21:05

आज हमारे बच्चे हमारे नौजवान हमारे मर्दो

21:09

खवातीन सब किस तरह भाग रहे हैं। मादियत

21:12

परस्ती की तरफ। मादा पस्ताना जिंदगी गुजार

21:15

रहे हैं। मादियत बढ़ रही है और इंसान

21:18

दुनिया का बंदा और गुलाम होकर रह गया है।

21:20

तो हम अपनी कौम को दुनिया का बंदा और

21:23

गुलाम बनने की बजाय या दुनिया की गुलामी

21:27

और बंदगी से निकालकर अल्लाह की गुलामी और

21:30

बंदगी में दें। क्योंकि इंसान जब बंदा बन

21:33

जाता है दुनिया का तो फिर उसका ईमान खतरे

21:36

में होता है। मुसलसल कमजोर होता चला जाता

21:39

है। अल्लाह अपनी बंदगी का अपनी गुलामी का

21:42

मुतालबा करता है। तो लिहाजा हमारी

21:44

जिम्मेदारी इस मुल्क पाकिस्तान के अंदर

21:47

रहने वाली तमाम खवातीन, तमाम तालबात,

21:51

बच्चियां, नौजवान सबको अल्लाह की बंदगी की

21:55

तरफ लेकर आना है। अल्लाह की गुलामी की तरफ

21:57

लेकर आना है। क्योंकि ईमान जो है वो इंसान

22:00

की पहचान है और दरअसल यही ईमान है जो

22:04

किरदार बनाता है और जो हमारी तरजीहात को

22:07

बदल देता है कि हमारी तरजीह क्या है?

22:10

अल्लाह ताला तो यही चाहते हैं ना कि हम

22:12

दुनिया की बजाय आखिरत को तरजीह दें। तो

22:15

लिहाजा यही वो तरजीह है जो हमें कायम

22:18

करवानी है। यही आखिरत की जवाबदेही है

22:21

जिसके ऊपर हमें बात करनी है और आमादा करना

22:24

है। क्योंकि ईमान के बगैर दीन खोखला हो

22:27

जाता है। जब ईमान कमजोर हो तो दीन रस्म बन

22:30

जाता है। इबादत आदत बन जाती है और इंसान

22:34

खिदमत शोहरत के लिए करता है। इसलिए ईमान

22:37

बहुत जरूरी है। इसके बाद सूरह तौबा की आयत

22:40

नंबर 24 जो है वह यह बता रही है। इसका

22:43

तर्जुमा इस तरह से है। यह बहुत हमें

22:46

पैमाना दे रही है। आयत नंबर 24 एक

22:49

क्राइटेरिया दे रही है हमें के अल्लाह

22:52

ताला ये फरमाते हैं कि कह दीजिए कि अगर

22:54

तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे

22:56

भाई, तुम्हारी बीवियां, तुम्हारा खानदान,

22:58

वो माल जो तुमने कमाया, वो तजारत जिसके

23:00

नुकसान का तुम्हें खौफ है। वो घर जिन्हें

23:03

तुम पसंद करते हो ये सब तुम्हें अगर

23:05

अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाह वसल्लम और

23:08

उसकी राह में जिहाद से ज्यादा महबूब है तो

23:10

इंतजार करो। यहां तक कि अल्लाह अपना फैसला

23:13

ले आए। अल्लाह नाफरमान लोगों को हिदायत

23:15

नहीं देता। इस मजमून में अल्लाह और उसके

23:18

रसूल सल्लल्लाहो अलैह वही वसल्लम की

23:20

मोहब्बत को ईमान का तकाजा कहा गया है। यह

23:24

आयत ईमान का सबसे कड़ा और फैसला को मयार

23:27

पेश करती है। यह आयत हमें बताती है कि

23:29

मोहब्बत इलाही महज जुबान का दावा नहीं

23:33

बल्कि जिंदगी की सिमत तय करने वाला असूल

23:36

है। यहां पर यह समझाया गया है कि इंसानी

23:39

मोहब्बतें जो हैं, इन मोहब्बतों को अल्लाह

23:42

की वजह से कायम रखना है। इन मोहब्बतों को

23:46

अल्लाह के दीन के लिए इस्तेमाल करना है।

23:49

इन मोहब्बतों की वजह से दीन का रास्ता

23:53

खोटा नहीं करना। इन मोहब्बतों का शिकार

23:56

होकर दीन से दूर नहीं होना। मोहब्बत का

23:58

हकीकी मफूम क्या है? मोहब्बत का असल मतलब

24:02

जज्बात नहीं बल्कि तरजीह है कि जिससे

24:04

मोहब्बत होती है उसी की बात मानी जाती है।

24:07

उसके लिए कुर्बानी दी जाती है। उसके लिए

24:09

फैसला किया जाता है। अगर किसी इंसान की

24:11

जिंदगी के बड़े फैसले अल्लाह और उसके रसूल

24:14

सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मर्जी के बगैर

24:16

हो तो इसकी मोहब्बत महज अल्लाह और उसके

24:20

रसूल के साथ जो मोहब्बत का दावा है वो महज

24:23

दावा रह जाता है। मोहब्बत का तकाजा क्या

24:26

है? के अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाह

24:30

वसल्लम की मोहब्बत को अपनी जिंदगी का मरकज

24:33

बनाएं और दूसरी मोहब्बतें इसके ताबे कर

24:36

दें। सहाबा इकराम ने अपनी जिंदगियां इस

24:39

मोहब्बत के सबूत में साबित कर दी। जब

24:42

हिजरत का हुक्म आया हिजरत की तजारतें छोड़

24:45

दी। माल छोड़ दिया। फसलें छोड़ दी। मवेशी

24:49

छोड़ दिए। तजारतें छोड़ दी। खानदानों से

24:52

टकराव ले लिया। और अपने ही अजीजो अकारब को

24:55

गजवावे बदर में कत्ल किया। जानो माल

24:58

कुर्बान किया। क्योंकि उनके लिए अल्लाह और

25:00

उसके रसूल सल्लल्लाह वसल्लम की मोहब्बत

25:02

सबसे बड़ी हकीकत थी। मेरी बहुत प्यारी

25:05

बहनों और बेटियों हम भी नमाज पढ़ते हैं।

25:07

हम रोजा भी रखते हैं। मगर क्या कारोबार

25:11

में करप्शन है और हम नौकरियां करते हैं।

25:15

नौकरी में सिफारिश है। रिश्वत है। काम

25:18

बगैर पैसे लिए नहीं करना। और रिश्तेदारों

25:22

के दरमियान अदल नहीं करना। और अपने रिश्ते

25:25

को सामने रखते हुए दूसरों का हक मार देना

25:29

है। यह जुल्म है। यह ईमान के खिलाफ है। ये

25:33

सारे आमाल वो हैं जो हमारे ईमान को खा

25:36

जाते हैं। अल्लाह ताला ने यहां पर यह बात

25:38

भी हमें समझा दी कि जिस दिल में अल्लाह और

25:41

उसके रसूल की मोहब्बत सबसे बुलंद ना हो इस

25:44

दिल में ईमान मुकम्मल ही नहीं होता। तो

25:47

लिहाजा यह एक बहुत अहम हमारे लिए चैलेंज

25:50

है जिसको समझना जिस पर गौर करना हमारी

25:53

जिम्मेदारी है। इसके आगे सूर तौबा की आयत

25:57

नंबर 31 जो है और उसका तर्जुमा कि

26:01

उन्होंने अपने उलमा और राहिबों को अल्लाह

26:04

के सिवा रब बना लिया और मसीह इबने मरियम

26:07

को भी अपना रब बना लिया। हालांकि इन्हें

26:11

हुक्म सिर्फ यह दिया गया था कि एक अल्लाह

26:13

की इबादत करें। इसके सिवा कोई माबूद नहीं।

26:15

वो पाक है शर्क से जो यह करते हैं। यह आयत

26:18

हमें बताती है कि शर्क सिर्फ बुतों के

26:21

सामने झुकने का नाम नहीं बल्कि किसी इंसान

26:23

या तबके को अल्लाह के हुक्म के मुकाबले

26:26

में अख्तियार दे देना कुल अख्तियार दे

26:28

देना भी शर्क है। बल्कि बहुत बड़ा शर्क

26:31

है। यही वो फिकरी बीमारी है जो कौमों को

26:34

अंदर से खा जाती है। तो अल्लाह ताला

26:36

फरमाते हैं कि पिछली उम्मतों ने अपने उलमा

26:40

और राहिबों को रब बना लिया। यानी जो हक

26:44

अल्लाह का है हके हाकमियत वह भी किसी और

26:47

को दे दिया। अल्लाह का हक है कि वह जिसको

26:50

हलाल ठहराए। अल्लाह का हक है कि जिसको

26:52

चाहे वो हराम ठहराए। यह हक भी किसी और को

26:56

दे दिया कि हलाल और हराम का इख्तियार

26:59

ठहराने वाली भी हस्ती कोई और बना ली। तो

27:02

अल्लाह के फैसलों की बजाय दूसरों के

27:04

फैसलों को तरजीह दी। तो यही असल में मसला

27:08

है। और हमारी आजमाइश क्या है? आज यही

27:10

हमारी आजमाइश है। आज हम कुरान के मुकाबले

27:13

में रस्मो रिवाज को तरजीह देते हैं।

27:15

सियासत हो, मशत हो, समाजी दबाव ये सब हर

27:20

मामले में समाजी दबाव हमारे लिए मसला बन

27:23

जाता है। हम हक का साथ देने की बजाय समाजी

27:27

माशरती दबाव में आकर गैर हक का साथ देते

27:31

हैं। इसमें बहुत बड़ा मसला जैसे अब खानदान

27:34

है, बिरादरी है। किसी ने कोई हमारे काम आ

27:38

गया था। हमारे बड़ों के कोई काम आ गया था।

27:41

उसने फला के साथ यह किया था। जो इतनी बड़ी

27:44

अमानत हमारे पास वोट की अमानत है और जिसको

27:49

हम इख्तेदार पर लेकर आएंगे अपने वोट के

27:52

जरिए और वह अगर ऐसा करप्ट और ऐसा बेईमान

27:56

शख्स होगा और जो इंसानों पर जुल्म करता है

28:00

और जो अपनी सीट पर बैठकर लोगों का हक नहीं

28:04

देता तो जब तक वो गुनाह करता रहेगा और

28:08

उसको लाने वाले जिन्होंने उसके हक में वोट

28:12

दिया और खा वह कोई भी वजह थी, बिरादरी थी,

28:15

खानदान था, ताल्लुकदारी थी या ज़हनी

28:19

मरूबियत कह लें, कुछ भी कह लें, लेकिन

28:21

उसके गुनाहों में हिस्सादार तो वो सब लोग

28:23

होंगे जो उसे मुंतखब करके लाए थे। यहां पर

28:26

कुछ हमारी बहनें और बेटियां यह भी सोच रही

28:29

होंगी और सोचती हैं कि हम तो सियासत से

28:32

बहुत दूर रहेंगे। हम तो न्यूट्रल है। हमें

28:34

जरूरत ही नहीं। जो भी कुर्सी पर आता है,

28:36

वह अपना ही फायदा उठाता है। मेरी बहुत

28:38

प्यारी बहनों और बेटियों, न्यूट्रल होना

28:41

सबसे बड़ी मुनाफत है। इसलिए कि न्यूट्रल

28:45

तो कुछ होता ही नहीं। यह तो हो ही नहीं

28:48

सकता कि इंसान ज़हन भी रखता हो और उसका कुछ

28:50

पसंद और नापसंद ना हो। वो किसी के लिए

28:54

क्या समझता है? यानी एक इंसान है। उसको

28:56

अल्लाह ताला ने शूर दिया, समझ दी। क्या वो

28:59

अपनी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं सोचता?

29:01

क्या वह अपनी नस्लों के बारे में कुछ नहीं

29:03

सोचता? क्या वह अपने वतन के बारे में कुछ

29:06

नहीं सोचता? ऐसा तो नहीं है। क्या उसकी

29:08

कोई पसंद नहीं है या ना पसंद नहीं? ऐसा तो

29:10

है। तो इसका मतलब है कि न्यूट्रल होना

29:14

दरअसल अपने आप को धोखा देना है। अपनी कौम

29:16

को धोखा देना है। अपने नजरिए को धोखा देना

29:19

है। अपने ईमान को धोखा देना है। इसलिए

29:22

न्यूट्रल होना सबसे बुरी बात है। सोचिए कि

29:25

आपके नजदीक हक क्या है? आपके नजदीक बाततिल

29:29

क्या है? जो हक है उसका साथ दीजिए। जो

29:31

बाततिल है किसी माशती दबाव में आकर उसका

29:35

साथ नहीं दीजिए। तो इस आयत मुबारका का यह

29:38

बड़ा अहम मौजू है। सूर तौबा की आयत नंबर

29:42

31 जो है वो हमें बताती है कि दीन सिर्फ

29:44

इबादत का नाम नहीं बल्कि जिंदगी के हर

29:47

फैसले में अल्लाह को हाकम मानने का नाम

29:50

है। यानी हमारी जिम्मेदारी यही है कि

29:53

जिंदगी के हर मामले में हम अल्लाह ताला के

29:56

अहकामात को माने। इसी आयत मुबारका के

30:00

तशरीक के अंदर अदी बिन हातम ताई का वाक्या

30:03

है जो बहुत ही खूबसूरत है। इस पर हम थोड़ी

30:06

सी बात करेंगे कि अदी बिन हातम जो अरब के

30:09

सखी भी थे और सरदार भी थे। हातम ताई के

30:12

बेटे थे। वो इब्तदा में ईसाई थे और अपने

30:15

कबीले के मजहबी और सियासी पेशवा भी थे। जब

30:18

इस्लाम अरब में फैलने लगा तो अदी मदीना

30:21

आने से हिचकिचा रहे थे। आखिरकार वो हुजूर

30:23

सल्लल्लाहु अलह वसल्लम की खिदमत में हाजिर

30:25

हुए। नबी करीम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने

30:28

सूर तौबा की यह आयत तिलावत फरमाई तो अदी

30:31

ने फौरन अर्ज किया या रसूल अल्लाह हम तो

30:33

अपने उलमा और राहिबों की इबादत नहीं करते

30:35

थे। नबी सल्लल्लाह वसल्लम ने फरमाया क्या

30:37

वो तुम्हारे लिए हलाल को हराम और हराम को

30:39

हलाल नहीं कह देते थे और तुम उनकी बात मान

30:42

लेते थे। अद्दी ने जवाब दिया जी हां ऐसा

30:45

ही था। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

30:47

ने फरमाया बस यही इनकी इबादत थी। अद्दी के

30:50

दिल पर यह बात असर की। यह जुमला उनके दिल

30:53

में उतर गया। उन्होंने फ़ौरन समझ लिया कि

30:56

असल शर्क बुतपरस्ती ही नहीं है बल्कि

30:59

अख्तियार किस बात का कि शरीयत की तशरीह का

31:04

अख्तियार इंसान अपने पास ले ले। तशरी से

31:07

मुराद हलाल को हराम करने और हराम को हलाल

31:10

करने का अख्तियार अपने पास ले ले। जबकि

31:13

इस्लाम यह चाहता है कि अल्लाह का कलाम जो

31:17

है उसकी वजाहत अल्लाह का हक है। किसी चीज

31:20

को हलालो हराम करना अल्लाह के अख्तियार

31:23

में है। कोई और इस अख्तियार को नहीं ले

31:25

सकता। यह वाकया वाज़ करता है कि इबादत

31:28

सिर्फ सजदा नहीं। इबादत अतात मुतलिक का

31:31

नाम है कि ऐसी अल्लाह की अतात कि जिसके

31:34

जिस अतात में कोई और शरीक ही ना हो। कोई

31:37

और ख्याल ही ना आए। कोई और सोच ही ना हो।

31:40

कानून साजी का इख्तियार सिर्फ अल्लाह के

31:42

पास है। जो इस इख्तियार को इंसानों को

31:44

देता है, वह शर्क करता है। कानून सिर्फ

31:46

अल्लाह बना सकता है। कानून सिर्फ अल्लाह

31:49

का चलेगा। इसलिए कि अल्लाह ही हक में

31:51

मुतलक है। कुरान के मुकाबले में किसी को

31:55

हाकम नहीं माना जा सकता। शियत के खिलाफ

31:57

बने निजाम को कबूल नहीं किया जा सकता।

32:00

इसलिए कि यह हक तो है ही अल्लाह के पास।

32:03

अच्छा इसी आयते मुबारका में पीर परस्ती

32:06

औलिया परस्ती बादशाहों की गैर मशरूत अतात

32:10

और नफ्स का इत्तबा यह सारे मौजूआत भी इसी

32:12

आयते मुबारका से समझ आते हैं। यह मौजू

32:15

दरअसल अकीदा तहीद की हिफाजत का बुनियादी

32:18

बाप है। और इसी में यह बात समझाई गई है कि

32:21

इस्लाम का असल पैगाम यह है कि बंदगी सिर्फ

32:24

अल्लाह की। लेकिन तारीख गवाह है कि जब भी

32:27

कौम में इसूल से हटी वह कभी इंसानों को रब

32:30

बनाने लगी कभी इख्तेदार को कभी अपने नफ्स

32:32

को तो इस आयत मुबारका में यही बात समझाई

32:34

गई है कि उन्होंने अपने उलमा और रहबों को

32:37

अल्लाह के सिवा रब बना लिया था। ये आयत

32:39

हमें बताती है कि शर्क सिर्फ बुतों को

32:41

पूजने का नाम नहीं बल्कि किसी को अल्लाह

32:44

के हुक्म के मुकाबले में इख्तियार मुतलक

32:46

देना भी शर्क है। पीर परस्ती औलिया परस्ती

32:48

जब कोई शख्स पीर या बुजुर्ग के हर हुक्म

32:51

को बिला दलील दीन समझ ले। कुरान और सुन्नत

32:54

के खिलाफ बात को भी बरकत मान ले। अल्लाह

32:57

से मांगने के बजाय बुजुर्गों से फरियाद

32:59

करे तो वह दरअसल बंदगी का हक इंसान को दे

33:02

रहा है। यही वो रास्ता है जिसे कुरान कहता

33:05

है अरबाब दूल्लाह तय बादशाहों और ताकत की

33:10

गैर मशरूत अतात जब किसी हुक्मरान या निजाम

33:13

के फैसलों को अल्लाह के कानून पर तरजीह दी

33:16

जाए। जुल्म को मसलत के नाम पर कबूल किया

33:18

जाए। हक के मुकाबले में ताकत का साथ दिया

33:20

जाए तो फिर इख्तेदार क्या होता है? रब बन

33:24

जाता है। और यहां एक अहम मौजू रह गया। उस

33:27

पर बात करना बहुत जरूरी है। वो है नफ्स की

33:30

बंदगी। नफ़्स की बंदगी क्या है? कि जो नफ़्स

33:33

ने कहा उसे मान लिया। नफ़्स की ख्वाहिशात

33:36

के तले दब कर अल्लाह की मुखालफ़त भी कर गए।

33:39

अल्लाह के अहकामात को भी छोड़ गए। और हर

33:42

गुनाह जो इंसान कर सकता है मगलूब होकर

33:46

नफ़्स से मगूब होकर कर लिया। या यह नफ़्स

33:48

परस्ती है। इससे आगे सूर तौबा की आयत नंबर

33:50

33 है जिसके अंदर अल्लाह ताला फरमाते हैं

33:53

कि वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और

33:55

दीन हक़ के साथ भेजा ताकि इसे तमाम निजाम

33:58

हाय जिंदगी पर गालिब कर दे। खामो मुशरकों

34:01

को यह कितना ही नागवार गुजरे। इस आयत

34:03

मुबारका में यह बताया गया है कि इस्लाम

34:06

महज चंद इबादत का मजमुआ नहीं बल्कि जिंदगी

34:09

को अल्लाह के निजाम के तहत लाने का आलमी

34:12

मिशन है। सूर तौबा की आयत ऐलान करती है कि

34:14

रसूल अल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम को इसलिए

34:17

भेजा गया कि दीन हक को तमाम निजामों पर

34:19

गालिब कर दे। यही इस्लाम का सियासी अखलाकी

34:22

समाजी और दावती मंशूर है। बलबेदी दीन का

34:25

मतलब यह नहीं कि लोगों को जबरदस्ती

34:26

मुसलमान बनाया जाए। बल्कि इसका मतलब यह है

34:29

कि कानून अल्लाह का होगा। यानी यहां यह

34:31

बात फिर वाज़ कर दूं कि मुसलमान किसी को

34:35

जबर से नहीं बनाया जा सकता। लेकिन एक बात

34:38

जेहन में रहे कि इस्लाम आया ही गलबे के

34:42

लिए है। लिहाजा कानून अल्लाह का होगा और

34:44

इंसाफ अल्लाह के कानून के मुताबिक होगा और

34:48

अल्लाह ने जो अकदार दी हैं वही नाफिज

34:51

होंगी। और पूरा इंसानी मुआशरत फर्द की

34:55

जिंदगी और मुआशरती निजाम, मुआशी निजाम,

34:58

कानूनी निजाम, सियासी निजाम सब जिंदगी के

35:02

तमाम निजाम हाय हयात अल्लाह के कानून के

35:05

मुताबिक होंगे। यही गलबा दीन है। यही दावत

35:08

है जो मतलूब है। और इस दावत के लिए ही

35:12

मरजे खलायक होने की जरूरत है। इसी दावत के

35:16

लिए कुर्बानी की जरूरत है। इसी मकसद के

35:18

लिए मुसलसल जद्दोजहद की जरूरत है। गलब दीन

35:22

दरसल हुजूर सल्लल्लाह वसल्लम का मिशन है।

35:25

आपने पूरी जिंदगी इसी दीन के गलबे के लिए

35:28

लगा दी। मक्की जिंदगी और फिर मदनी जिंदगी

35:31

मुसलसल मजाहमत मुसलसल कशमकश मुसलसल

35:35

जद्दोजहद है अकीदा अकीदे की बात है अल्लाह

35:39

की वादनियत की बात है अकीदा रिसालत की और

35:42

अकीदा आखिरत अकायद की दुरुस्तगी की और

35:45

साथ-साथ यह कि जो गलत चीजें मौजूद थी उनको

35:50

बेनकाब किया और जो दुरुस्त था वो बताया

35:53

लोगों को मुतहिद किया कलमे के नीचे इकट्ठा

35:57

किया और फिर जब जरूरत पड़ी तो हिजरत की सब

36:01

माल जान अजीज अकारब सब छोड़ के हिजरत की

36:05

अजीजो कारब भी छोड़ दिए माल भी छोड़ दिया घर

36:08

भी छोड़ दिए जायदादें भी छोड़ दी खाली हाथ

36:11

मुसलमान हिजरत करके गए पहले हिजरत हबशा

36:14

फिर हिजरत मदीना और फिर मदीना मुनव्वरा

36:17

में इस्लामी रियासत कायम कर दी फिर उस

36:19

इस्लामी रियासत का दफा किया गज़ बदर है गज़

36:23

ओहद है गज़वा अज़ाब है गज़वा तबूक है और फिर

36:26

नतीजा यह निकला कि फतह मक्का मक्का फतह हो

36:30

गया और फिर नतीजा यह निकला कि दीन गालिब

36:34

हो गया। यह मिशन हजूर सल्लल्लाह वसल्लम के

36:38

साथ मुकम्मल हुआ मगर खत्म नहीं हुआ। बल्कि

36:40

आप सल्लल्लाहु वसल्लम ने यह मिशन अपनी

36:43

उम्मत के हवाले कर दिया। हर दौर के

36:45

मुसलमानों की जिम्मेदारी ठहरी कि वह

36:48

बाततिल निजामों को चैलेंज करें। कातिल

36:50

निजाम को चैलेंज करें और आवामनास को

36:53

समझाएं। लोगों को समझाएं कि गलत क्या है,

36:56

सही क्या है। अदलो इंसाफ का निजाम कायम

36:59

करें। जुल्म, इस्तसाल और फसाद का खात्मा

37:02

करें। यही जिहाद है। तो आज अगर हमारी

37:05

उम्मत के हालात को देखें तो हमारी कमजोरी

37:08

की वजह क्या है? हम नमाजें भी पढ़ते हैं।

37:10

हम रोजे भी रखते हैं। हम हज भी करते हैं।

37:12

हम उमरे भी करते हैं। हम जकात भी देते

37:14

हैं। और जब किसी पर वक्त आता है, ख्वाब वो

37:18

पाकिस्तानी हो वो किसी दुनिया के हिस्से

37:20

में रहता हो। पूरी दुनिया के अंदर हम

37:23

मुसलमानों के लिए दर्द दिल भी रखते हैं।

37:25

उनके लिए खर्च भी करते हैं। उनकी जरूरतों

37:28

को भी देखते हैं। लेकिन उसके बावजूद हम

37:30

कमजोर हैं। इसलिए कमजोर हैं कि गलबा दीन

37:34

जो मतलूब है वह हमें भूल जा। हम उसे

37:37

फरामोश कर बैठे हैं। और जब गलबे दीन का जो

37:40

फलसफा है जब हमने उसे फरामोश किया तो हम

37:44

कमजोर हो गए। हम जलील हो गए। हम रुसवा हो

37:46

गए। इसलिए गलबा दीन की कोशिश हमारे ऊपर

37:50

फर्ज है। और इस जिम्मेदारी को अदा किए

37:53

बगैर कोई भी इबादत कबूल नहीं हो सकती।

37:56

लिहाजा इस जिम्मेदारी को हमें पूरा करना

37:59

है। इस सूर तौबा की रोशनी में मुनाफकीन का

38:01

किरदार भी है जो हमें बताता है कि हमें इस

38:05

किरदार से बचना है। सूर तौबा दरअसल ईमान

38:08

और निफाक के दरमियान आखरी हद्दे फासल है।

38:10

यह सूर इस मरहले पर नाजिल हुई जब इस्लामी

38:13

मुआशरा फैसला कु मकाम पर पहुंच चुका था।

38:15

अब सिर्फ जुबान का ईमान काफी नहीं था। अब

38:17

अमल कुर्बानी और वफादारी का वक्त था। गज़ब

38:20

वो किसी आजमाइश का मैदान बना जहां मोमिन

38:23

और मुनाफिक खुलकर सामने आ गए। यह मुम सख्त

38:26

तरीन हालात में थी। शदीद गर्मी, तवील सफर,

38:29

वसाइल की किल्लत, रूमी सल्तनत जैसा अज़म

38:31

दुश्मन। अब यहां समझाया गया कि देखो सूर

38:36

तौबा की आयत नंबर 81 का तर्जुमा है। कह दो

38:38

जहन्नुम की आग इससे ज्यादा गर्म है। कि

38:40

गर्मी से डर के बैठोगे तो जहन्नुम की आग

38:42

इससे भी ज्यादा गर्म है। इंफाक की जरूरत

38:45

थी। सबा ने मतलब अल्लाह की राह में माल

38:48

लाते थे। तो यह मुनाफिक क्या करते थे?

38:50

मजाक उड़ाते थे। अमीरों के सदके को रिया

38:53

कहते थे। गरीबों के चंद खजूरों पर हंसते

38:55

थे। अल्लाह ताला ने 79 नंबर आयत में

38:58

फरमाया कि अल्लाह उनका मजाक उड़ाता है। ये

39:00

इनका तो अल्लाह उनका मजाक उड़ा रहा है।

39:03

फिर इन्होंने मस्जिद जरार भी बनाई जिसका

39:05

मकसद ही मुसलमानों के दरमियान फूट डालना

39:08

था। अल्लाह के हुक्म से उस मस्जिद को गिरा

39:10

दिया गया। उस पर भी एक मुनाफिककीन ने

39:12

फितना खड़ा किया कि देखो यह मस्जिद को

39:14

गिरा रहे हैं। लेकिन अल्लाह ने कहा कि उस

39:17

मस्जिद की बुनियाद तकवा पर नहीं रखी गई

39:21

थी। और मस्जिद नबवी की बुनियाद तकवा पर

39:23

रखी गई तो असल बात क्या है जो समझने की

39:27

है। बुनियाद ईमान और तकवा है। मस्जिद भी

39:31

अगर तकवा की बुनियाद पर नहीं रखी गई तो वह

39:34

भी गिरा दी गई। यह वाक्यात हमारे लिए

39:37

जिंदगी भर चीजों को समझने का और जो असल

39:42

क्राइटेरिया है उसको समझाने की हमें मतलब

39:45

हमें अकल समझ देता है। हमें एक पैरामीटर

39:49

देता है कि हमने किस तरह से चीजों को

39:51

देखना और कैसे उनको आगे लेकर चलना है। यह

39:54

गज़वा तबूक जिसको जैश उसरा भी कहा गया

39:57

क्योंकि इसमें तंगी थी, परेशानी थी और

40:01

बहुत बड़ी कुर्बानी थी जो दीन इस्लाम की

40:04

राह में जिसका मुतालबा था और फिर दी गई।

40:07

जब दी गई तो अल्लाह ताला ने उसका नतीजा भी

40:10

दिखा दिया कि किस तरह अल्लाह ताला ने

40:13

कामयाबो कामरान ठहराया मुसलमानों को और

40:16

रूमी बगैर लड़े वापस चले गए। रहती दुनिया

40:19

तक के लोगों को बता दिया गया कि तुम्हारे

40:22

पास ईमान है, तुम्हारे पास कुर्बानी है।

40:25

और जो वसाइल तुम्हारे पास हैं, तुमने लगा

40:27

दिए तो फिर आगे अल्लाह की ताईद, उसकी गैबी

40:33

मदद वो तुम्हारे लिए सहारा होगी और

40:36

तुम्हारे लिए राह को आसान कर देगी।

40:40

तुम्हारी मुश्किलात को खत्म कर देगी। मेरी

40:43

बहुत प्यारी बहनों यह सूर मुबारका सूर अल

40:47

अनफाल का मौजू और फिर जो सूर तौबा के

40:50

मौजूआत हैं यह हमें बहुत ही झंझोड़ने वाले

40:54

हैं समझाने वाले हैं कि तीन चीजें बहुत

40:58

जरूरी हैं। सबसे पहले अपना ईमान और फिर

41:03

कुत ताकत ताकत से मुराद ईमान की ताकत और

41:07

उसके साथ हमारे पास सलाहियतें हमारे वसाइल

41:10

यानी हमारे पास वो कंपटेंसी भी होनी चाहिए

41:13

जो इस वक्त की जरूरत है। अगर एआई का दौर

41:16

है तो हमें एआई को दीन इस्लाम के लिए

41:20

इस्तेमाल करना आना चाहिए। हमें अपने

41:23

जिस्मों को भी ताकतवर बनाना है ताकि हम

41:27

अपनी जिस्मानी ताकत भी राहे हक में लगा

41:30

सकें। हमें अपने जेहन को भी स्मार्ट और

41:33

शार्प करना है ताकि हम अपनी ज़हनी

41:35

सलाहियतों को भी ईमान के लिए लगा सकें। और

41:39

फिर एक इ्तमाई निजाम की जरूरत है। हमें

41:43

मुत्तहद होकर बहुत बड़ी तादाद में इकट्ठा

41:46

होकर इस दीन के गलबे के लिए अकामते दीन के

41:50

लिए जद्दोजहद करने की जरूरत है। आगे बढ़ने

41:53

की जरूरत है। अपनी इ्त्तिमाइयत को इस्लामी

41:56

इ्तमाइयत को कवी करने की जरूरत है। आपस

41:59

में इंतशार से बचने की जरूरत है। मुतिद

42:01

रहने की जरूरत है। और अपना मकसद, अपना

42:05

मिशन और जिस मकसद के लिए हम इस दुनिया में

42:09

आए उस मकसद को भी हमें सामने रखना है।

42:12

बीइंग अ मुस्लिम भी हमारी जिम्मेदारी है

42:14

और उसके साथ-साथ यह कि हम ऐसे मुल्क के

42:18

वासी हैं। ऐसे मुल्क के रहने वाले हैं जो

42:21

एटमी कुत है। यह तो दुश्मन के लिए एक बहुत

42:25

बड़ा थ्रेट है। तो इस कुवत को समझते हुए

42:28

तमाम पाकिस्तानियों को मुतहिद करने और

42:32

पाकिस्तान की हिफाजत करने, इसकी सरहदों की

42:35

हिफाजत करने, इसकी आईडियोलॉजी की हिफाजत

42:37

करने, इसके रहने वालों के मसाइल को हल

42:41

करके अपने मुल्क को ताकतवर और तरक्की

42:44

याफ्ता मुल्क बनाने के लिए जद्दोजहद करने

42:47

की जरूरत है। हमारा मिशन बहुत बड़ा है।

42:50

हमारा रास्ता बहुत तवील है। हमारी मंजिल

42:55

बहुत अजीम है। उसके लिए अपने आपको ईमान की

43:00

दौलत से मालामाल करने और अपने इल्म हासिल

43:04

करने, सलाहियतों को बढ़ाने और फिर मुतहिद

43:08

होकर अपनी कौम को सही रास्ते पर लाने, शरी

43:11

तौर पर अल्लाह की बंदगी में लाने की जरूरत

43:14

है। और इस मकसद के लिए दिल खोलकर इनफाक

43:18

अपना माल भी, अपनी जान भी, अपनी सलाहियतें

43:21

भी, अपना वक्त भी दीन राह में लगाने की और

43:24

जो भी इस राह में लगाया जाएगा अल्लाह के

43:27

यहां वह मकबूल होगा। इसलिए कि अल्लाह किसी

43:30

की नेकी को जाया नहीं करता। अल्लाह से

43:33

बढ़कर कोई कदर करने वाला नहीं। वो बड़ी

43:35

हस्ती है जो इंसान के छोटे से छोटे अमल की

43:39

बड़ी ही कदरदान है। अल्लाह ताला से दुआ है

43:42

कि मुझे और आपको दीन के लिए खालिस कर ले

43:45

और फिर यकीनन वो दिन भी जरूर आएगा कि जब

43:48

हम इस मुल्क पाकिस्तान को ऐसा मुल्क

43:52

देखेंगे कि जहां ना जबर होगा ना जुल्म

43:54

होगा। तमाम वसाइल सबको मिलेंगे और कोई भी

43:58

इस मुल्क में बसने वाला भूखा नहीं सोएगा

44:01

और कोई मजबूर होकर खुदकुशी करने की कोशिश

44:04

नहीं करेगा। अल्लाह ताला हमें अपने फराइज

44:06

को अदा करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

44:09

अस्सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह व बरकातहू।

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