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चार लोगों की चिंता करना छोड़ो खुश रहोगे || Arjun inspire || Best motivation video

1h 3m 3s9,286 words1,116 segmentsHindi

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0:06

याद रखना जो इंसान तुम्हारे बुरे वक्त में

0:09

तुम्हारे साथ खड़ा रहता है वही वास्तव में

0:12

तुम्हारा है। बाकी तो सब अपनेपन का अभिनय

0:16

करने वाले किरदार हैं। जो परिस्थिति बदलते

0:19

ही चेहरे बदल लेते हैं। लोग तब तक साथ

0:23

चलते हैं जब तक तुम्हारे हाथ में कुछ देने

0:26

को होता है। पर जब तुम्हारे हाथ खाली हो

0:30

जाते हैं तो वे तुम्हारी परछाई से भी दूर

0:33

भागते हैं। सच्चाई यही है कि इस संसार में

0:37

सब लेनदेन के रिश्ते हैं। जब तक तुम उनके

0:41

काम के हो तब तक सब तुम्हारे अपने लगते

0:44

हैं। पर जब देने की बारी आती है तो भीड़

0:48

में खड़े वही लोग आंखें चुराने लगते हैं।

0:51

श्री कृष्ण कहते हैं कभी किसी को इतना

0:54

महत्व मत दो कि वह तुम्हें महत्व देना ही

0:57

भूल जाए क्योंकि जब तुम किसी को अपने जीवन

1:00

का केंद्र बना देते हो तो तुम्हारी अहमियत

1:04

उसकी नजर में धीरे-धीरे मिटने लगती है।

1:07

सम्मान देना अच्छा है। लेकिन इतना नहीं कि

1:11

सामने वाला उसे तुम्हारी कमजोरी समझने

1:14

लगे। कभी-कभी सीमाएं भी जरूरी होती हैं

1:17

क्योंकि हद से ज्यादा इज्जत भी अपमान में

1:20

बदल जाती है। जीवन में संतुलन जरूरी है।

1:24

ना किसी को अपना सब कुछ बनाओ ना किसी को

1:27

अपना कुछ भी ना समझो। जो तुमसे प्रेम करता

1:31

है, वह तुम्हें हर परिस्थिति में समझेगा।

1:34

लेकिन जो सिर्फ तुम्हारे सुख में साथ है,

1:37

वह तुम्हारे दुख के समय सिर्फ तमाशा

1:40

देखेगा।

1:42

लोगों की बातें बहुत मीठी होती हैं, लेकिन

1:44

सच्चाई हमेशा कड़वी होती है। कोई कहेगा

1:48

हमें याद करना जब तकलीफ हो, लेकिन जब

1:51

तकलीफ सच में आती है, तो वही लोग सबसे

1:54

पहले गायब हो जाते हैं। यही दुनिया है

1:57

यहां लोग शब्दों से नहीं स्वार्थ से जुड़े

2:00

होते हैं। और यही वह पल होता है जब इंसान

2:03

समझता है कि जीवन में अपने सिर्फ वही हैं

2:07

जो बिना बोले तुम्हारे साथ खड़े रहते हैं।

2:11

जिन्हें तुम्हारे दर्द की कहानी सुनने की

2:13

नहीं बल्कि तुम्हारे आंसू रोकने की परवाह

2:16

होती है। पर याद रखना अपने भी बदल जाते

2:19

हैं। कभी-कभी वही लोग जो तुम्हें

2:21

मुस्कुराने की वजह देते हैं वही तुम्हारे

2:24

आंसुओं की वजह बन जाते हैं। यही संसार है

2:28

मोह, माया और अपनों के छलावे का। तुम

2:32

जितना इस संसार से लगाव रखोगे, उतना ही

2:35

दर्द महसूस करोगे। क्योंकि दुख वहीं से

2:38

शुरू होता है जहां अपनापन शुरू होता है।

2:42

यह मेरा है। वह मेरा अपना है। यही वे शब्द

2:46

हैं जिनसे पीड़ा की जड़े पनपती हैं। और

2:49

यही कारण है कि भगवान ने कहा संसार के मोह

2:53

में मत उलझो। मुझ में भक्त इ करो। जो

2:57

भक्ति में खो जाता है, वह दुखों से मुक्त

3:00

हो जाता है। क्योंकि जो भगवान को अपना मान

3:03

लेता है, उसे फिर किसी अपने के खोने का डर

3:06

नहीं रहता।

3:08

डर डर वही सबसे बड़ी बेड़ी है जो मनुष्य

3:12

की आत्मा को जकड़ देती है। जिस दिन तुम

3:14

डरना छोड़ दोगे, उसी दिन तुम्हारा जन्म

3:17

नया होगा। क्योंकि जो आत्मा है वह अमर है।

3:21

ना उसे कोई जला सकता है, ना मार सकता है,

3:24

ना मिटा सकता है।

3:27

तो फिर किस बात का भय? कौन तुम्हें हरा

3:29

सकता है? जब तुम्हारे भीतर स्वयं परमात्मा

3:32

का अंश है। डर केवल भ्रम है जो बुद्धि को

3:36

कुंद करता है और आत्मा की शक्ति को भूलने

3:39

पर मजबूर करता है। गीता में श्री कृष्ण

3:42

कहते हैं सच्चाई यह है कि जो अपने कर्म को

3:46

निडरता से करता है, वही इस संसार में अमृत

3:50

को छूता है। कायर लोग भाग जाते हैं। लेकिन

3:54

जो सच्चे होते हैं, वे अपने भय को जीतकर

3:57

कर्म की राह पर बढ़ते हैं। क्योंकि कर्म

4:00

ही धर्म है और धर्म के मार्ग पर चलने वाला

4:03

कभी अकेला नहीं होता। वह जानता है कि

4:06

परिणाम ईश्वर के हाथ में है और उसे बस

4:09

अपना कर्तव्य निभाना है।

4:14

आज के समय में इंसान को तलवार से नहीं

4:17

शब्दों से घायल किया जाता है। कितनी अजीब

4:20

बात है जुबान छोटी होती है। पर यह किसी की

4:24

पूरी जिंदगी बदल सकती है। कहते हैं, अगर

4:27

द्रोपदी के मुख से वह एक वचन अंधे का

4:30

पुत्र भी अंधा ना निकला होता, तो शायद

4:33

महाभारत का युद्ध ही नहीं होता। एक शब्द

4:36

ने घर जला दिया। रिश्ते तोड़ दिए और युगों

4:40

तक चलने वाली द्वेष की आग जला दी। कभी-कभी

4:44

चुप रह जाना बोलने से कहीं ज्यादा ताकतवर

4:48

होता है। क्योंकि शस्त्र केवल शरीर को

4:51

घायल करता है। पर शब्द आत्मा को जला देते

4:54

हैं। आज इंसान को इंसान से नहीं उसकी वाणी

4:58

से डर लगता है। कितनी बार हम सोचते हैं कि

5:02

कोई हमारा नहीं रहा। पर सच्चाई यह है कि

5:05

हमारे शब्द ही हमसे हमारे अपने छीन लेते

5:08

हैं। बोलने से पहले अगर इंसान एक क्षण रुक

5:12

जाए अपने शब्दों का वजन तौल ले तो न जाने

5:16

कितनी नफरतें कभी जन्म ही ना ले।

5:20

लेकिन आज कौन सोचता है? आज तो हर कोई अपनी

5:24

बात मनवाने में लगा है। हर कोई दूसरे की

5:27

चुप्पी को कमजोरी समझता है। लोग समझ नहीं

5:30

पाते कि बोलने से बड़ा त्याग होता है ना

5:34

बोलना और फिर यही नासमझी एक नई आग जन्म

5:38

देती है। वही आग जो महाभारत में थी वही आग

5:43

आज हमारे बीच जल रही है। घर-घर में,

5:47

रिश्तों में, दफ्तरों में हर जगह एक छोटी

5:51

सी बात बड़े-बड़े युद्धों का कारण बन जाती

5:54

है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं, अब जरा

5:57

इस युग को देखो। यहां इंसान इंसान का सबसे

6:01

बड़ा दुश्मन बन चुका है। कहीं कोई किसी का

6:04

व्यापार छीन रहा है। कहीं किसी की मेहनत,

6:08

किसी का हक, किसी की इज्जत खा रहा है। यह

6:11

कलयुग वही है जिसकी चेतावनी दी गई थी।

6:14

जहां इंसान ही इंसान को निगल रहा है।

6:17

कितना अजीब है ना जो दुखी है उसे और दुख

6:20

दो। जो खुश है उसे गिरा दो। जो आगे बढ़े

6:24

उसे रोक दो। यही रिवाज बन चुका है। हर

6:28

चेहरा मुस्कुरा रहा है। लेकिन भीतर से हर

6:30

कोई घायल है। हर कोई किसी और की तकलीफ

6:33

देखकर सुकून ढूंढता है। अब रिश्ते मतलब से

6:37

बने हैं। दोस्तियां फायदे से जुड़ी हैं।

6:40

भक्ति भी प्रदर्शन बन चुकी है। और

6:43

इंसानियत वह तो जैसे इतिहास की किताबों

6:46

में दब चुकी है। कभी एक भिखारी था। प्यास

6:50

से तड़पता हुआ बस एक गिलास पानी मांग रहा

6:53

था। सेठ के घर के बाहर खड़े होकर उसने

6:56

कहा, "मुझे बस पानी दे दो। मेरे प्राण

6:58

निकल रहे हैं।" पर सेठ ने कहा, अभी आदमी

7:02

नहीं है। जब आदमी आएगा तब मिलेगा। भिखारी

7:06

ने फिर विनती की, तुम ही आदमी बन जाओ से।

7:09

ठ जी बस एक क्षण के लिए इंसान बन जाओ।

7:14

लेकिन आज के युग में इंसान बनने के लिए भी

7:17

कोई तैयार नहीं। हर कोई किसी और के आने का

7:20

इंतजार करता है। पर खुद एक कदम नहीं

7:23

बढ़ाता। हर कोई चाहता है कि दूसरा अच्छा

7:26

बने। पर खुद को बदलने की हिम्मत किसी में

7:28

नहीं। यही तो इस युग की सबसे बड़ी विडंबना

7:32

है। सबको इंसान चाहिए पर कोई इंसान बनना

7:36

नहीं चाहता। हम सब किसी ना किसी रूप में

7:39

वही सेठ हैं जो पानी देने की जगह इंतजार

7:42

करते हैं। जो माफी मांगने की जगह दूसरों

7:45

की गलतियां गिनते हैं। और फिर जब जीवन

7:49

जवाब देता है तब हम कहते हैं क्यों मेरे

7:52

साथ? पर जवाब साफ है। कर्मों का फल कभी

7:56

गलत नहीं होता। हमारे शब्द, हमारे कर्म,

8:00

हमारा व्यवहार सब लौट कर आते हैं। जैसे

8:03

बछड़ा सैकड़ों गायों में अपनी मां को ढूंढ

8:07

लेता है, वैसे ही हमारे कर्म भी हमें ढूंढ

8:10

ही लेते हैं।

8:13

श्री कृष्ण कहते हैं, कभी सोचा है? कितनी

8:17

बार हम अपने ही दिल के खिलाफ जाकर किसी को

8:20

माफ कर देते हैं। इस उम्मीद में कि शायद

8:23

वह बदल जाएगा। पर जो इंसान बार-बार वही

8:26

गलती करे, वह गलती नहीं कर रहा होता, वह

8:30

अपनी आदत निभा रहा होता है। कभी किसी को

8:33

इतना भी माफ मत करो कि वह तुम्हारे दर्द

8:36

को तुम्हारी कमजोरी समझ ले। माफ करना एक

8:40

गुण है, लेकिन हर बार माफ करना मूर्खता

8:43

है। क्योंकि जहां सीमाएं खत्म होती हैं,

8:46

वहीं से आत्मसम्मान की मृत्यु शुरू होती

8:48

है। युधिष्ठिर ने भी यही किया था।

8:51

उन्होंने बार-बार दुर्योधन को माफ किया और

8:54

हर बार बदले में मिला अपमान, छल और कष्ट।

8:59

कभी-कभी विनम्रता भी तब तक अच्छी लगती है

9:02

जब तक सामने वाला उसकी कदर करे। वरना वही

9:06

विनम्रता धीरे-धीरे आत्मतोड़क बन जाती है।

9:10

लोग कहते हैं माफ करने से मन हल्का हो

9:14

जाता है। पर अगर वही इंसान बार-बार वही

9:17

घाव दे रहा हो तो वह माफी नहीं आत्मघात

9:21

है। क्योंकि किसी को बार-बार मौका देना

9:25

मतलब अपने ही दर्द को बार-बार बुलावा

9:28

देना। याद रखो किसी की आदत को सुधारने की

9:31

जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है। कभी-कभी दूर

9:34

हो जाना, चुप रह जाना और खुद को बचा लेना

9:38

ही सबसे बड़ी समझदारी है। क्योंकि माफी तब

9:42

तक अच्छी लगती है जब तक वह आत्मसम्मान के

9:46

ऊपर ना चढ़ जाए। कभी किसी से इतना मत

9:49

जुड़ो कि वह तुम्हें तोड़कर चला जाए और

9:52

तुम उसे फिर भी सही ठहराओ क्योंकि प्यार,

9:56

दया, क्षमा सब वहीं तक अच्छे हैं। जहां तक

10:00

वह तुम्हें कमजोर ना बना दे। जो बार-बार

10:03

तुम्हें चोट पहुंचाए, वह तुम्हारा

10:06

इम्तिहान नहीं ले रहा। वह तुम्हारा

10:08

इस्तेमाल कर रहा है। और फिर जीवन यही

10:11

सिखाता है। कभी-कभी ना कहना सबसे बड़ा

10:14

प्रेम होता है खुद के प्रति। माफ करो

10:18

लेकिन भूलो मत सजग रहो पर द्वेष मत पालो

10:22

क्योंकि सतर्कता ही वह कवच है जो इंसान को

10:25

बार-बार टूटने से बचाता है। जैसे-जैसे यह

10:29

समझ आती है जीवन की दूसरी सच्चाई सामने

10:32

आती है। मृत्यु का भय नहीं बल्कि जीवन की

10:35

अस्थिरता ही सबसे बड़ी सीख है। जो पैदा

10:39

हुआ है उसे एक दिन जाना ही है। यह शरीर

10:42

किराए का घर है और हम बस थोड़े दिनों के

10:45

मेहमान है। यहां जो भी है, वह सब बदल

10:49

जाएगा। पर आत्मा वह कभी नहीं मरती। फिर

10:52

क्यों डरते हो? जिसे टाला नहीं जा सकता

10:55

उसके बारे में चिंता क्यों करते हो? जो

10:58

होना है वह होकर रहेगा। और जो नहीं होना

11:01

उसके लिए चिंता करना। बस खुद को थकाना है।

11:05

श्री कृष्ण कहते हैं कर्म करो पर फल की

11:09

चिंता मत करो क्योंकि जीवन का सौंदर्य इसी

11:12

में है कि हम अपना धर्म निभाएं। परिणाम

11:16

चाहे जैसा हो। कर्म ही पूजा है और निष्ठा

11:20

ही सच्चा धर्म। कभी-कभी संकट जब जीवन में

11:23

आता है तो वह हमें तोड़ने नहीं आता। वह

11:27

हमें परखने आता है। जैसे आग सोने को तपाती

11:31

है, वैसे ही कठिनाइयां इंसान को खरा बनाती

11:34

हैं। क्रोध, लालच और मोह। यह तीन द्वार

11:40

नरक के हैं। जो इनसे बच गया, वह अपने भीतर

11:44

प्रकाश पा गया। लेकिन जो इनसे हार गया, वह

11:48

अपने ही जीवन की अंधेरी गलियों में खो

11:51

गया। कभी अपने कर्मों से भागो मत क्योंकि

11:55

कर्म ही वह दर्पण है जिसमें आत्मा अपना

11:58

असली चेहरा देखती है। जो धर्म के मार्ग पर

12:02

चलता है उसे डरने की नहीं बल्कि अटल रहने

12:06

की जरूरत होती है। सच को स्वीकार कर लेना

12:10

ही सबसे बड़ी समझदारी है। क्योंकि झूठ को

12:13

सच मानकर जीना एक धीमा जहर है जो

12:17

धीरे-धीरे आत्मा को खत्म करता है। कभी-कभी

12:21

जिंदगी सिखाती नहीं सीधे गिरा देती है

12:24

ताकि इंसान समझे कि बीता हुआ वक्त वापस

12:28

नहीं आता। जो चला गया उसे पकड़ने की कोशिश

12:31

मत करो क्योंकि जो बीत गया वह तुम्हारे

12:35

जीवन का हिस्सा नहीं रहा। अब वह तुम्हारी

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कहानी का सिर्फ एक अध्याय है जिसे पढ़कर

12:42

आगे बढ़ना है। कितने लोग हैं जो अपने बीते

12:46

कल में ही उलझे रहते हैं। कभी किसी के

12:48

धोखे में, कभी किसी के वादे में, कभी किसी

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के शब्दों के बोझ में दबे हुए। लेकिन यह

12:55

भूल जाते हैं कि जो गया वह गया उसे याद

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रखकर सिर्फ आज को जलाया जा सकता है। जिया

13:03

नहीं जा सकता। समझदार लोग वे नहीं जो कभी

13:06

नहीं रोए बल्कि वे हैं जो आंसू पोंछ कर

13:10

मुस्कुराना सीख गए। क्योंकि जो कल तुम्हें

13:13

तोड़ गया उसे पकड़ कर बैठने का मतलब है

13:17

अपने आज को बर्बाद करना।

13:20

लोग हमेशा दूसरों को दोष देते हैं। उसने

13:23

धोखा दिया। उसकी वजह से मैं टूटा। उस

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इंसान ने मेरी जिंदगी बिगाड़ दी। पर

13:30

सच्चाई यह है जिसने तुम्हारे साथ गलत किया

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वह अपना कर्म कर गया। अब तुम्हारा कर्म है

13:39

कि तुम उसे भुलाकर आगे बढ़ो क्योंकि जो

13:42

इंसान अपने कल में जीता है वह कभी अपने आज

13:46

को नहीं पा सकता। श्री कृष्ण कहते हैं हर

13:50

इंसान के जीवन में एक समय आता है जब उसे

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अपने अतीत के बोझ को उतारना पड़ता है। तब

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जाकर एहसास होता है असली सुकून किसी और

14:01

में नहीं अपने भीतर है। जो अतीत को ढोते

14:05

हैं, वह वर्तमान की सुंदरता महसूस नहीं कर

14:08

पाते। कभी खुद से पूछो कितनी बार तुमने

14:11

अपने कल को याद करके आज मुस्कुराने के

14:14

मौके गवाए हैं। कितनी बार तुमने पुराने

14:18

जख्म को कुरेद कर नए घाव बना लिए हैं।

14:22

जीवन कहता है जो हुआ उसे छोड़ दो क्योंकि

14:27

तुम उसे बदल नहीं सकते।

14:30

लेकिन आज को सुंदर बनाना तुम्हारे हाथ में

14:33

है। बीते समय का बोझ उतार दो क्योंकि तुम

14:37

वह नहीं हो जो पहले थे। हर दिन एक नया

14:41

अवसर है। हर सुबह एक नई शुरुआत है। जिंदगी

14:46

तब खिलती है जब तुम भूलना सीख जाते हो।

14:50

कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पीछे देखना

14:53

छोड़ना पड़ता है। क्योंकि जब तक नजर पीछे

14:56

अटकी रहेगी कदम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अतीत

15:00

की जंजीरों में जकड़ा इंसान कभी स्वतंत्र

15:03

नहीं हो सकता। और स्वतंत्रता का असली अर्थ

15:06

है जो बीत गया उसे मुस्कुराकर अलविदा

15:09

कहना। और जब तुम छोड़ना सीख जाते हो तब

15:13

जीवन एक और रहस्य खोलता है। कई बार नया

15:16

आरंभ करने के लिए पुराने को पूरी तरह

15:19

मिटाना पड़ता है। कभी-कभी कुछ टूटने पड़ते

15:23

हैं ताकि कुछ नया बन सके। याद रखो कृष्ण

15:27

ने भी कुंती से कहा था अधर्म बढ़ गया था

15:30

इसलिए पुराने का अंत आवश्यक था ताकि नया

15:34

युग जन्म ले सके। जैसे खंडहर में नया महल

15:38

नहीं बन सकता वैसे ही पुराने दुखों के ढेर

15:42

पर नई खुशी का घर नहीं बसाया जा सकता।

15:45

गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कभी-कभी जा

15:49

अधे इवन को भी पुनर्निर्माण चाहिए। पुराने

15:53

रिश्ते, पुरानी सोच, पुराने डर, पुराना

15:57

दर्द सब कुछ मिटाना पड़ता है। क्योंकि नया

16:01

तभी जन्म लेता है जब पुराना पूरी तरह

16:04

समाप्त होता है। एक इमारत जब कमजोर हो

16:08

जाती है तो उसे मरम्मत नहीं ध्वस्त करना

16:11

पड़ता है। वैसे ही जब तुम्हारा जीवन

16:14

पुराने दर्दों से भर जाए तो उसे मरम्मत

16:17

नहीं। एक नई शुरुआत की आवश्यकता होती है

16:21

और नई शुरुआत का पहला कदम है अतीत से

16:24

मुक्ति ना शिकायत ना पश्चाताप सिर्फ

16:28

स्वीकार क्योंकि जिस दिन तुम स्वीकार कर

16:31

लेते हो कि जो हुआ वह होना ही था उसी दिन

16:35

से तुम्हारा पुनर्जन्म शुरू हो जाता है

16:37

जीवन कोई बंद किताब नहीं हर दिन एक नया

16:40

पन्ना है बस लिखना तुम्हारे हाथ में है

16:43

क्या उसमें दर्द लिखोगे या नई रोशनी की

16:45

शुरुआत कभी-कभी जीवन में सबसे मीठे शब्द

16:48

वही लोग बोलते हैं जिनके दिल में तुम्हारे

16:51

लिए जहर पलता है। वे मुस्कुराते हैं।

16:54

तुम्हें गले लगाते हैं पर पीठ पीछे वही

16:57

तुम्हारा संसार तोड़ते हैं। ऐसे लोग उस

17:00

घड़ी की तरह होते हैं जिसके मुख पर अमृत

17:03

लगा होता है। पर भीतर हर टिक टिक में जहर

17:07

छिपा होता है। वे तुम्हारे सामने प्रेम का

17:10

अभिनय करते हैं। पर उनकी नजरों में

17:13

ईर्ष्या और छल झलकता है। कभी पहचानने की

17:17

कोशिश करो उन चेहरों को जो रोशनी में

17:19

तुम्हारे साथ दिखते हैं। पर अंधेरे में

17:22

तुम्हारा रास्ता काटते हैं। हर अपनापन

17:25

सच्चा नहीं होता। हर मुस्कान विश्वास नहीं

17:29

होती। कई बार तो वही हाथ तुम्हें चोट

17:32

पहुंचाते हैं जो कभी तुम्हें संभालने का

17:34

वादा करते हैं। इसलिए जीवन का सबसे कठिन

17:37

सबक यही है। हर किसी को दिल में जगह मत

17:40

दो। क्योंकि सब तुम्हारे अपने नहीं होते।

17:43

श्री कृष्ण कहते हैं कुछ लोग सिर्फ तब तक

17:46

तुम्हारे होते हैं जब तक उन्हें तुमसे कोई

17:49

काम होता है। जैसे ही स्वार्थ खत्म होता

17:52

है उनका चेहरा भी बदल जाता है। इसलिए उन

17:56

लोगों को जहर की तरह छोड़ दो जो अपनेपन का

17:59

दिखावा करें पर भीतर से तुम्हें तोड़ते

18:02

जाएं। समझदार वही है जो लोगों को नहीं

18:05

उनकी नियत को पढ़ता है। क्योंकि जो सामने

18:08

मीठा बोले यह जरूरी नहीं कि वह सच्चा भी

18:11

हो। कभी-कभी सच्चाई के सबसे खतरनाक दुश्मन

18:14

वही होते हैं जो प्रेम का मुखौटा पहन कर

18:17

आते हैं। लेकिन जिंदगी यहीं रुकती नहीं

18:20

क्योंकि जो कुछ भी होता है वह बिना किसी

18:23

कारण के नहीं होता। हर घटना, हर दर्द, हर

18:27

ठोकर में कोई ना कोई रहस्य छिपा होता है।

18:30

कभी कुछ गलत इसलिए नहीं होता कि भगवान ने

18:33

हमें सजा दी बल्कि इसलिए होता है क्योंकि

18:37

वह हमें कुछ सिखाना चाहते हैं। एक मां थी

18:40

ग्रीप पर सच्चे दिल वाली। उसके बच्चे की

18:43

एक उंगली किसी दुर्घटना में कट गई। वह दिन

18:47

रात भगवान को कोसती रही। क्यों मेरे बच्चे

18:51

के साथ ऐसा हुआ? क्यों उसके हाथ से वह

18:54

उंगली छीन ली? लेकिन एक दिन जब उस गांव

18:58

में एक मायावी राक्षस आया जो बच्चों की

19:01

बलि देकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहता था तो

19:05

उसने उस बच्चे को भी पकड़ लिया। जब वह बलि

19:08

चढ़ाने ही वाला था तभी उसे अपने गुरु की

19:11

शर्त याद आई जिस बच्चे की बलि देनी है

19:14

उसका हर अंग पूर्ण होना चाहिए। लेकिन उस

19:18

बच्चे की उंगली कटी हुई थी। इसलिए वह उसे

19:21

जीवित छोड़ने पर मजबूर हो गया और उस दिन

19:24

उस मां की आंखों से आंसू नहीं कृतजता के

19:28

मोती गिरे। उसे एहसास हुआ जो उसे

19:31

दुर्भाग्य लगा था। वह दरअसल ईश्वर की कृपा

19:35

थी। कभी-कभी भगवान हमें तोड़ते हैं ताकि

19:38

वे हमें बचा सके। कभी वे कुछ छीनते हैं

19:42

ताकि हमें किसी और बड़े नुकसान से बचाया

19:44

जा सके। हर दर्द के पीछे कोई वरदान छिपा

19:48

होता हैबस देखने की दृष्टि चाहिए। श्री

19:51

कृष्ण कहते हैं अगर हम हर घटना को शांति

19:55

से देखें तो समझ आएगा कि कुछ भी व्यर्थ

19:58

नहीं होता। हर बुरा वक्त हर कार्य असफलता

20:03

किसी ना किसी अच्छे की नींव रखती है। जो

20:06

आज तुम्हें रुला रहा है वही कल तुम्हें

20:09

संभालेगा। पर जब हम अपने कर्म में अभिमान

20:12

जोड़ देते हैं तब उसका अर्थ मिट जाता है

20:16

क्योंकि जो भलाई हम दिखावे से करते हैं वह

20:19

कर्म नहीं प्रदर्शन बन जाता है। सच्चा

20:23

कर्म वही है जो निस्वार्थ हो जिसमें मैंने

20:26

किया की भावना ना हो। क्योंकि करने वाले

20:28

हम नहीं वह परमात्मा है जो हमें माध्यम

20:32

बनाता है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि

20:36

मैं नहीं वही कराता है तब उसके भीतर से

20:40

अहंकार मिट जाता है और जहां अहंकार नहीं

20:43

होता वहीं से शांति का जन्म होता है।

20:47

ज्ञान वही है जो बुद्धि को प्रकाश देता है

20:50

जो अंधकार से बाहर लाता है। इसलिए ज्ञान

20:54

अर्जित करते रहो और बांटते रहो क्योंकि जो

20:57

ज्ञान बांटता है, वह ईश्वर के सबसे निकट

21:01

होता है। कर्म करो पर फल की इच्छा मत रखो

21:05

क्योंकि जो फल के लिए कर्म करता है, वह

21:08

अपने कर्म में बांध जाता है। मेरा तेरा

21:12

अपना पराया सारे भ्रम मिटा दो। फिर देखना

21:16

तुम्हें हर दिशा में ईश्वर ही नजर आएगा।

21:19

गीता में श्री कृष्ण कहते हैं जीवन में

21:22

सबसे बड़ा उपहार धन नहीं स्वास्थ्य है।

21:26

सबसे बड़ी संपत्ति सोना नहीं संतोष है। और

21:30

सबसे सच्चा संबंध खून का नहीं वफादारी का

21:34

होता है। जिसे छल की आदत है उसका अंत

21:38

हमेशा पश्चाताप में होता है। क्योंकि छल

21:41

एक रण है जो लौटता जरूर है। कभी किसी और

21:45

के हाथों कभी अपने ही कर्मों से। जीवन को

21:49

सच्चाई से जीना सीखो। आज नहीं तो कल झूठ

21:53

का पर्दा गिर ही जाता है। सच्चा सुख,

21:56

सच्चा सुकून उसी को मिलता है जो भीतर से

22:00

सच्चा होता है। क्योंकि जब मन शांत होता

22:03

है तभी जीवन सुगंधित बनता है। उपवास केवल

22:07

अन्न का नहीं होना चाहिए बल्कि लालच का,

22:10

घृणा का, चुगली का, क्रोध का उन गंदे

22:14

विचारों का जो आत्मा को भीतर से मैला कर

22:17

देते हैं। जिस दिन तुम अपने मन से इन सब

22:20

का उपवास रख लोगे उस दिन तुम्हें किसी

22:23

तीर्थ की जरूरत नहीं पड़ेगी। यदि तुम्हारा

22:26

संकल्प पवित्र है और पराक्रम सच्चे कर्म

22:29

में लगा है तो भाग्य भी तुम्हारे कदम

22:32

चूमेगा।

22:33

भाग्य का इंतजार मत करो। कर्मों का तूफान

22:37

खड़ा करो। दरवाजे अपने आप खुल जाएंगे।

22:41

क्रोध की अवस्था में मन अंधा हो जाता है।

22:44

अंधे मन में भ्रम जन्म लेता है और भ्रम

22:47

बुद्धि को नष्ट कर देता है। जब बुद्धि

22:50

नष्ट होती है तो मनुष्य अपने ही पतन का

22:53

कारण बन जाता है। जैसे पानी अपनी मर्यादा

22:57

छोड़कर बाढ़ बनता है वैसे ही वाणी अपनी

23:00

मर्यादा छोड़ दे तो सर्वनाश निश्चित है।

23:04

इसलिए बोलो तो सोचकर, चलो तो संभलकर और

23:07

भरोसा करो तो समझकर। क्योंकि इस कलयुग में

23:11

ना मौसम पर भरोसा है, ना इंसानों पर दोनों

23:14

किसी भी पल बदल सकते हैं। श्री कृष्ण कहते

23:18

हैं कभी-कभी सबसे मीठे बोल वही कहते हैं

23:22

जिनके दिल में सबसे गहरी जलन होती है।

23:25

बाहर वाले तो तुम्हारी सफलता से खुश होते

23:27

हैं। पर जो अपने कहलाते हैं वही सबसे

23:31

ज्यादा जलते हैं। कभी गौर किया है? जब तुम

23:34

गिरते हो तो सब सहानुभूति जताते हैं और जब

23:37

उठते हो तो वही चेहरे उदास हो जाते हैं।

23:40

कई बार दुनिया तुम्हारी तारीफ करेगी पर घर

23:43

के भीतर तुम्हारी कीमत कोई नहीं समझेगा

23:46

क्योंकि जो तुम्हारे सबसे करीब हैं वही

23:48

तुम्हें सबसे दूर देखना चाहते हैं।

23:51

दुर्योधन भी तो यही करता था। पांडवों की

23:54

हर सफलता उसकी जलन बन जाती थी। वह हर संभव

23:58

कोशिश करता था उन्हें नीचे गिराने की,

24:01

उन्हें दुखी करने की और वही जलन, वही

24:05

ईर्ष्या महाभारत के युद्ध की जड़ बन गई।

24:10

एक ऐसा युद्ध जिसने हजारों जिंदगियां निगल

24:14

ली। रिश्ते जब दिखावे में जीने लगते हैं

24:17

तो विनाश निश्चित होता है। जो तुम्हारे

24:20

सामने मिठास दिखाते हैं वे पीठ पीछे अक्सर

24:24

विष उगलते हैं। इसलिए हर अपने को परखो हर

24:29

मुस्कान के पीछे का सच पहचानो। हर वह हाथ

24:33

जो तुम्हें थामे वह हमेशा तुम्हारा हो ऐसा

24:37

जरूरी नहीं। समय से बड़ा कोई गुरु नहीं।

24:41

जो उसका सम्मान नहीं करता वह जीवन के अर्थ

24:44

से अनजान रह जाता है। समय ही असली पूंजी

24:48

है। इसे निरर्थक कार्यों में खो दोगे तो

24:52

जीवन की सबसे बड़ी हानि करोगे। जो समय को

24:55

साध लेता है, वह जीवन को दिशा देता है। जो

24:59

उसे व्यर्थ करता है, वह खुद अपनी मंजिल खो

25:02

देता है। समय एक नदी की तरह है। वह एक ही

25:06

बार बहती है। जो बह गया वह लौट कर नहीं

25:10

आता। इसलिए उसे थामो नहीं। उसके साथ बहो

25:14

क्योंकि उसी में जीवन की असली यात्रा छिपी

25:17

है। तुम किसी का सहारा बनो या किसी का

25:21

आसरा मांगो। इस दुनिया में सब कुछ बदल

25:24

जाता है। लोग कहते हैं हम हमेशा साथ

25:28

रहेंगे। लेकिन समय का पहला झोंका ही

25:32

सच्चाई खोल देता है। जब जीवन के अंधेरे

25:36

मोड़ पर तुम अकेले खड़े होते हो तब समझ

25:39

आता है कि अपनेपन के सारे वादे कितने

25:43

खोखले थे। जो लोग मुस्कान के वक्त सबसे

25:47

आगे खड़े थे। वही दुख के वक्त तुम्हें

25:50

पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। जोरों

25:54

पर ताकत आजमाना। कमीने लोगों की निशानी

25:58

होती है। मुसीबत में साथ देने वाले को,

26:01

मुसीबत में साथ छोड़ने वाले को और मुसीबत

26:03

में डालने वाले को कभी मत भूलना।

26:08

अपने चेहरे पर सदा एक प्यारी सी मुस्कान

26:11

रखिए ताकि जो भी व्यक्ति आपको देखे वह भी

26:15

खुश हो जाए। जब आपको हराने के लिए लोग

26:18

परिश्रम और प्रयास करने के बजाय पीठ पीछे

26:22

साजिश करें तो समझ लीजिए आपकी मेहनत सफल

26:25

हुई है। इस दुनिया में लोगों के सबसे बड़े

26:29

दुख का कारण यही है कि वे सोचते हैं दिमाग

26:33

उनके पास ज्यादा है और धन दूसरों के पास

26:37

ज्यादा है। जिंदगी में जीत और हार हमारी

26:42

सोच बनाती है। जो मान लेता है वह हार जाता

26:46

है और जो ठान लेता है वह जीत जाता है।

26:50

जिंदगी में भरोसा सब पर करें लेकिन कभी भी

26:55

किसी के भरोसे ना रहे। गजब की एकता दिखाते

26:59

हैं लोग। जिंदा इंसान को गिराने में और

27:03

मरे हुए को उठाने में। नियत और परिणाम।

27:07

इंसान घाटा और मुनाफा देखकर सिद्धांतों का

27:11

ढोंग करता है। चाय में मक्खी गिरे तो चाय

27:14

फेंकता है। घी में गिरे तो मक्खी फेंकता

27:17

है। सही फैसले लेना अनुभव से आता है। और

27:21

अनुभव गलत फैसले लेने से आता है। जिंदगी

27:25

का नियम सीधा बोले, सच बोले और मुंह पर

27:29

बोले। जो अपने होंगे वह समझ जाएंगे और जो

27:33

नाम के होंगे वह दूर हो जाएंगे। इंसान

27:36

ख्वाहिशों से बंधा हुआ एक जिद्दी परिंदा

27:39

है। यह उम्मीदों से ही घायल है और

27:42

उम्मीदों पर ही जिंदा है। एक तरफ नफरत है

27:45

जिसे पल भर में महसूस कर लिया जाता है और

27:48

एक तरफ प्रेम है जिसका यकीन दिलाने में

27:52

पूरी जिंदगी निकल जाती है। एक समय था जब

27:56

मंत्र काम करते थे। उसके बाद वक्त आया जब

27:59

तंत्र काम करने लगे। फिर समय आया जिसमें

28:03

यंत्र काम करने लगे। लेकिन आज के समय में

28:06

सिर्फ षड्यंत्र काम करते हैं।

28:11

इंसान की फितरत

28:14

किसी के साथ हम वक्त को भूल जाते हैं और

28:17

कोई वक्त के साथ हमें भूल जाता है और यही

28:20

जिंदगी है। इंसान दौलत कमाने के लिए सेहत

28:24

खो देता है और सेहत को वापस पाने के लिए

28:27

दौलत खो देता है। जीता ऐसे है जैसे कभी

28:30

मरेगा ही नहीं। और मर ऐसे जाता है जैसे

28:34

कभी जिया ही नहीं। आपके पास जो कुछ भी है

28:37

उसमें खुश रहना सीखिए। क्योंकि कितने ही

28:40

लोग उतनी ही उम्मीद पर जिंदा हैं जितना आप

28:44

पाकर भी शर्मिंदा हैं। इंसान बहुत लालची

28:47

होता है। वह अपने बच्चों को सब कुछ देना

28:51

चाहता है और अपने मां-बाप का सब कुछ लेना

28:54

चाहता है।

28:58

जिंदगी भी कितना ई अजीब है। आराम छोड़ना

29:02

पड़ता है आराम पाने के लिए। जीवन का एक ही

29:06

नियम है जो भाग्य में है वह भाग कर आएगा

29:10

और जो भाग्य में नहीं है वह आकर भी भाग

29:13

जाएगा। दुआ कभी साथ नहीं छोड़ती और बद्दुआ

29:17

कभी पीछा नहीं छोड़ती। आप जो देंगे वही

29:21

लौट कर आता है। फिर चाहे वह इज्जत हो या

29:24

धोखा। सोच और नजरिए का फर्क ही तो है। खुश

29:29

होना है तो तारीफ सुनिए और बेहतर होना है

29:33

तो निंदा क्योंकि लोग आपसे नहीं आपकी

29:37

स्थिति से हाथ मिलाते हैं। कोयल अपनी भाषा

29:40

बोलती है इसलिए आजाद रहती है। लेकिन तोता

29:45

हमेशा दूसरों की भाषा बोलता है। इसीलिए वह

29:48

जीवन भर पिंजरे में रहता है। फर्क सिर्फ

29:52

सोच का होता है। सीढ़ियां वही रहती हैं।

29:55

बस किसी के लिए ऊपर जाती हैं। तो किसी के

29:59

लिए नीचे सही हमेशा सही रहेगा। भले ही हर

30:03

कोई उसके खिलाफ हो और गलत हमेशा गलत

30:06

रहेगा। भले ही हर कोई उसके साथ हो। जो लोग

30:10

मन में उतरते हैं उन्हें संभाल कर रखिए और

30:14

जो लोग मन से उतरते हैं उनसे संभल कर

30:17

रहिए। सत्य की इच्छा होती है कि सभी उसे

30:20

जान लें और असत्य को हमेशा भय रहता है कि

30:24

कोई उसे पहचान ना ले। जुबान और शब्द सबके

30:28

पास होते हैं। पर जो अपने लिए जीते हैं,

30:31

वे कह देते हैं और जो अपनों के लिए जीते

30:34

हैं, वे सह लेते हैं। यह बात याद रखना

30:37

दुनिया की नजरों में अच्छा बनने से अच्छा

30:40

है कि आप अपनी नजर में सच्चे बने रहो

30:43

क्योंकि दुनिया की नजरें हर पल बदलती हैं।

30:46

लेकिन आत्मा की नजर सदा स्थिर रहती है।

30:48

आंखों से जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं

30:52

होता। कितनी बार ऐसा होता है कि किसी की

30:56

मुस्कान के पीछे पीड़ा होती है। किसी के

30:58

शब्दों के पीछे छल होता है। इसलिए हर बात

31:02

पर तुरंत विश्वास मत करो। अनुभव को अपना

31:07

मार्गदर्शक बनाओ ना कि दिखावे को। सच्चाई

31:10

कभी जल्दी दिखाई नहीं देती। लेकिन जब

31:13

सामने आती है तो सब भ्रम मिटा देती है। और

31:17

जब भी जीवन में कठिनाई आए हिम्मत मत हारो।

31:21

मुश्किल वक्त का एक ही मंत्र है। यह भी

31:24

गुजर जाएगा क्योंकि जीवन में हर तूफान के

31:27

बाद सवेरा आता है। जब लगता है कि अब सब

31:32

खत्म हो गया है। वहीं से एक नई शुरुआत

31:35

होती है। एक राजा ने अपने गुरु से यही

31:37

पूछा था। अगर कभी जीवन में सबसे बुरा वक्त

31:41

आ जाए तो मैं क्या करूं? गुरु ने उसे एक

31:44

ताबीज दिया और कहा जब लगे कि अब कुछ अच्छा

31:47

नहीं हो सकता तब इसे खोलना। वक्त बदला

31:50

राजपाट छिन गया दुख का पहाड़ टूट पड़ा

31:54

राजा ने ताबीज खोला उसमें लिखा था यह समय

31:58

भी गुजर जाएगा वह वाक्य ही उसकी शक्ति बन

32:02

गया उसने अपनी हार को अंत नहीं एक परीक्षा

32:05

समझा और वही राजा जिसने सब कुछ खो दिया था

32:09

कुछ समय बाद सब कुछ वापस पा गया यही जीवन

32:13

का सबसे गहरा सत्य है कोई भी स्थिति स्थाई

32:16

नहीं होती ना खुशी सदा रहती है ना दुख ना

32:21

सफलता स्थाई है ना असफलता इसलिए जब जीवन

32:25

कठिन हो तो टूटना मत क्योंकि हर कठिनाई

32:29

तुम्हें किसी नई मंजिल के लिए तैयार कर

32:31

रही होती है। पुराने समय की बात है। एक

32:35

राजा था शासन सम्मान वैभव सब कुछ उसके पास

32:41

था। परंतु एक दिन उसकी जिंदगी में ऐसा

32:44

समाचार आया जिसने उसकी नींद छीन ली।

32:47

गुप्तचरों ने बताया कि पड़ोसी राज्य केवल

32:51

तीन दिनों के भीतर उस पर आक्रमण करने वाला

32:53

है। वह राज्य इतना विशाल और शक्तिशाली था

32:57

कि उसका सामना करना लगभग असंभव लग रहा था।

33:01

राजा का चेहरा पीला पड़ गया। मन भय से भर

33:05

गया और उसने तत्काल सभा बुलाई। सभा में

33:08

सभी मौन थे। भय ऐसा था कि शब्द भी कांपने

33:13

लगे थे। तभी उसके एक बुद्धिमान मंत्री ने

33:16

कहा महाराज जब मृत्यु निश्चित है तो

33:19

कायरता से क्यों मरे? जब अंत तय है तो सिर

33:23

झुकाकर क्यों जिए? चलिए इससे पहले कि वे

33:26

हम पर हमला करें। हम स्वयं उन पर आक्रमण

33:29

करें। विजय की संभावना कम है। परंतु

33:33

प्रयास ना करने से बेहतर है संघर्ष करना।

33:37

राजा हतप्रबद्ध था। उसने पूछा हमारी सेना

33:41

छोटी है। हम उनका सामना कैसे कर पाएंगे?

33:45

मंत्री मुस्कुराया और बोला महाराज वे

33:48

तैयार नहीं है। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति

33:52

है। जो डर के बिना कदम बढ़ाता है वही

33:56

इतिहास लिखता है। राजा ने निर्णय ले लिया।

34:00

सेना को आदेश दिया गया। नागरिकों ने भी

34:03

हथियार उठा लिए। अब केवल एक ही लक्ष्य था

34:07

जीत या मृत्यु यात्रा शुरू हुई और जैसे ही

34:11

वे सीमा के पुल पर पहुंचे राजा ने कहा इस

34:14

पुल को जला दो। सेना अचंभित रह गई। किसी

34:18

ने पूछा महाराज अगर हम हार गए तो वापस

34:22

कैसे लौटेंगे?

34:24

राजा ने दृढ़ स्वर में कहा हमारे पास अब

34:27

कोई रास्ता नहीं है सिवाय आगे बढ़ने के।

34:30

पीछे लौटना मृत्यु है और आगे बढ़ना जी्हा

34:34

जीवन। जब इंसान के पास वापसी का कोई मार्ग

34:38

नहीं बचता तभी वह अपनी असली ताकत पहचानता

34:41

है। सेना ने पूरी शक्ति से युद्ध किया।

34:45

शरीर थक गए पर आत्मा नहीं टूटी। परिणाम

34:48

वही हुआ जो असंभव लगता था। छोटी सी सेना

34:52

ने विशाल राज्य को हरा दिया। क्योंकि जब

34:55

पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं होता तब आगे

34:58

बढ़ने का हर कदम जीत बन जाता है। जब तुम

35:02

दृढ़ निश्चय से किसी कार्य को करते हो तो

35:05

सारा ब्रह्मांड तुम्हारी सहायता के लिए

35:08

तत्पर हो जाता है। दृढ़ संकल्प वही जादू

35:12

है जो असंभव को संभव बनाता है। जीवन में

35:16

अगर कभी परिस्थितियां तुम्हारे खिलाफ हो

35:19

तो घबराना मत। क्योंकि कठिनाई का अर्थ यह

35:23

नहीं कि तुम्हारा अंत आ गया है। इसका अर्थ

35:26

यह है कि तुम्हें अपनी अगली ऊंचाई पर

35:29

पहुंचना है। हर संघर्ष के पीछे कोई नई

35:33

शुरुआत छिपी होती है। हर हार के पीछे कोई

35:36

नई जीत की तैयारी होती है। और जब भगवान

35:39

कहते हैं कि हर मनुष्य में तीन गुण होते

35:43

हैं सतत्व, रज और तम तो उसका अर्थ यही है

35:47

कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है। हर

35:50

इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती

35:53

हैं। लेकिन फर्क बस इतना है कि तुम किसे

35:57

मजबूत करते हो अपनी अच्छाई को या अपनी

36:00

बुराई को। श्री कृष्ण कहते हैं अगर तुम

36:04

चाहो तो सबसे दुष्ट व्यक्ति में भी कोई ना

36:07

कोई भलाई देख सकते हो। और अगर चाहो तो

36:10

सबसे पवित्र आत्मा में भी कोई कमी ढूंढ

36:13

सकते हो। यह दृष्टिकोण का खेल है। जैसा

36:17

तुम सोचते हो, वैसा ही तुम्हारा संसार बन

36:20

जाता है। इसलिए अगर तुम्हें लगता है कि

36:23

तुम में कुछ कमियां हैं, तो जान लो कि वही

36:27

तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं।

36:30

क्योंकि जो व्यक्ति अपनी कमजोरियों को

36:33

स्वीकार करता है, वही सच में बदल सकता है।

36:37

जो अपनी गलतियों से भागता है, वह वहीं रुक

36:40

जाता है। लेकिन जो अपने दोषों को देखता

36:44

है, उन्हें सुधारता है, वह निरंतर

36:47

ऊंचाइयां छूता है। दुनिया की बातों की

36:50

चिंता मत करो। लोग तुम्हारे बारे में जो

36:53

सोचेंगे, वह उनके विचार हैं। तुम्हारी

36:56

हकीकत नहीं। दुनिया हमेशा वही देखती है जो

37:00

उसे दिखता है। पर ईश्वर वही देखता है जो

37:04

तुम्हारे भीतर चल रहा है। इसलिए अपने भीतर

37:08

की आग को बुझने मत दो। अगर लोग तुम्हारी

37:11

आलोचना करें, तुम्हारी कमियां गिनाएं तो

37:14

मुस्कुरा दो। क्योंकि लोग केवल उन्हीं को

37:16

गिराने की कोशिश करते हैं जो उनसे ऊंचे

37:19

होते हैं। जो चीजें तुम्हारे नियंत्रण में

37:22

हैं। बस उन पर ध्यान दो। बाकी को ईश्वर पर

37:26

छोड़ दो। अपने कर्मों को सुधारो। अपने

37:29

विचारों को ऊंचा रखो और फिर देखो कैसे

37:32

जीवन खुद तुम्हारे सामने झुकता चला जाएगा।

37:35

जब इंसान भीतर से शांत होता है, तभी वह

37:38

सच्ची खुशी को महसूस कर पाता है। बाहर से

37:41

मुस्कुराना आसान है, लेकिन भीतर की

37:44

मुस्कान वही समझ सकता है जिसने अपने मन को

37:47

जीत लिया हो। लोग दिखावे की खुशियों में

37:50

उलझ जाते हैं। बड़ी गाड़िया है। हां।

37:54

आलीशान मकान, नाम, शोहरत पर। अंदर का

37:59

खालीपन उन्हें चैन से जीने नहीं देता।

38:02

असली अमीरी वही है जहां मन संतुष्ट हो।

38:05

आत्मा प्रसन्न हो और भीतर एक गहरा सुकून

38:08

महसूस हो। क्योंकि जिसने अपने मन पर

38:11

नियंत्रण पा लिया उसने पूरी दुनिया को जीत

38:14

लिया। हम जीवन भर बाहरी चीजों के पीछे

38:17

भागते हैं। यह मिलेगा तो खुश रहूंगा। वह

38:20

मिलेगा तो सुकून मिलेगा। लेकिन सच्चाई यह

38:23

है कि यह सब अस्थाई है। जैसे ही हमें कुछ

38:27

मिलता है, मन तुरंत अगली चीज की ओर भागता

38:30

है। इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जब तक

38:34

इच्छाएं खत्म नहीं होंगी, तब तक शांति भी

38:36

नहीं मिलेगी। इसलिए जो व्यक्ति अपनी

38:39

इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेता है वही सच्ची

38:42

प्रसन्नता का स्वाद चखता है। जो सुख और

38:46

दुख दोनों में समान रहता है वही भीतर से

38:49

मजबूत बनता है। क्योंकि जो इंसान

38:51

परिस्थितियों के साथ नहीं डगमगाता वही

38:54

जीवन के असली अर्थ को समझ पाता है। बाहरी

38:58

चीजें बदलती रहती हैं। आज पास हैं कल नहीं

39:02

होंगी। पर जो भीतर की स्थिरता पा लेता है

39:06

उसका सुख कोई नहीं छीन सकता। तान लोग

39:09

तुम्हारे बारे में सोचते रहेंगे। यही उनका

39:12

काम है। पर तुम अपने जीवन को इतना

39:16

अर्थपूर्ण बना दो कि उनके शब्द भी

39:19

तुम्हारी कहानी सुनाने लगे। क्योंकि सबसे

39:22

बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग? और सबसे बड़ी

39:25

आजादी अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मित्रता

39:28

यह शब्द जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा

39:32

अर्थ अपने भीतर समेटे हुए है। क्योंकि हर

39:36

कोई जो मुस्कुराकर पास आता है, वह अपना

39:40

नहीं होता और जो खामोश रहकर भी साथ देता

39:43

है, वही असली मित्र कहलाता है। जीवन में

39:47

सच्ची मित्रता वही है जहां दिलों के बीच

39:49

कोई स्वार्थ नहीं होता। कोई दिखावा नहीं

39:52

होता। बस एक विश्वास होता है कि चाहे

39:55

परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों ना हो यह

39:58

इंसान मेरे साथ खड़ा रहेगा। महाभारत में

40:01

ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां दोस्ती ने

40:04

युद्ध की दिशा बदल दी। कभी कर्ण जैसा

40:08

मित्र जिसने दुर्योधन का साथ आखिरी सांस

40:11

तक निभाया और कभी श्री कृष्ण जैसे मित्र

40:14

जिन्होंने पांडवों को अंधेरे में भी

40:16

प्रकाश दिखाया। दोनों ने अपना वचन निभाया।

40:20

एक ने सांसों तक निष्ठा दिखाई। दूसरे ने

40:24

धर्म के लिए सत्य का साथ दिया। मगर फर्क

40:27

बस इतना था कि एक ने अपनी मित्रता को

40:31

अहंकार की नींव पर रखा और दूसरे ने अपनी

40:35

मित्रता को सत्य और धर्म की शक्ति पर।

40:38

इसलिए मित्र चुनना आसान है पर मित्रता

40:41

निभाना कठिन है। हर कोई आपकी हंसी में साथ

40:45

देगा। पर वही सच्चा मित्र है जो आपके आंसू

40:49

में आपका हाथ थामेगा। कुछ लोग मित्रता के

40:52

नाम पर फायदा उठाते हैं। कुछ सिर्फ अपने

40:55

मतलब तक रहते हैं। लेकिन जो व्यक्ति बिना

40:58

किसी उम्मीद के आपके साथ खड़ा रहता है,

41:01

वही परमात्मा का भेजा हुआ साथी होता है।

41:05

सच्चा मित्र वह होता है जो आपकी

41:08

अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान करें और

41:10

आपकी असफलता में भी आपके भीतर की ताकत

41:14

देखे। जीवन में ऐसे लोगों से दूरी बनाए

41:17

रखना ही समझदारी है जो आपके विश्वास के

41:20

बदले चाल चलते हैं जो मुस्कान के पीछे

41:23

स्वार्थ छिपाते हैं क्योंकि झूठी मित्रता

41:26

इंसान को भीतर से तोड़ देती है और सच्ची

41:29

मित्रता उसे हर तूफान में मजबूत बना देती

41:33

है। मित्र वो नहीं जो हर वक्त पास रहे।

41:36

मित्र वह है जो वक्त से भी ज्यादा

41:39

भरोसेमंद निकले। और फिर आती है बात संतुलन

41:43

की क्योंकि जीवन का हर रिश्ता हर भावना हर

41:48

निर्णय तभी सुंदर लगता है जब उसमें संतुलन

41:51

हो। किसी चीज की भी अति विनाश की जड़ है।

41:55

अति प्रेम भी दुख देता है। अति घृणा भी मन

41:58

को कड़वाहट से भर देती है। के है इ बोलना

42:03

रिश्तों को तोड़ देता है। अति चुप रहना

42:06

दिलों को तोड़ देता है। हर चीज में मधुरता

42:09

तभी है जब उसमें सीमा हो। बहुत मीठा झर बन

42:13

जाता है। बहुत कड़वा दिल को जला देता है।

42:17

बहुत आराम शरीर को जकड़ देता है। बहुत

42:19

मेहनत थका देती है। बहुत उम्मीदें निराशा

42:23

देती हैं। और बहुत त्याग कभी-कभी आत्मा को

42:26

खाली कर देता है। इसीलिए संतुलन ही जीवन

42:29

का सबसे बड़ा ज्ञान है। संतुलन ही वह कला

42:33

है जो आपको ना गिरने देती है ना बहकने

42:36

देती है। पापा आप संतुलन खो देते हैं तभी

42:40

जीवन डगमगाने लगता है और जब भीतर का

42:43

संतुलन जाग जाता है तब सुखदख दोनों एक

42:47

समान लगने लगते हैं। इसीलिए ना तो किसी से

42:50

इतना प्यार करो कि खुद को खोदो और ना किसी

42:54

से इतनी नफरत कि खुद के भीतर की शांति मर

42:57

जाए। क्योंकि इंसान तब तक अधूरा है जब तक

43:01

वह खुद के भीतर का संतुलन नहीं पा लेता।

43:04

मित्रता में भी, प्रेम में भी, कर्म में

43:07

भी, संतुलन ही परम नियम है। जो इसे समझ

43:11

गया वह जीवन में कभी नहीं टूटता और जो इसे

43:15

भूल गया उसके पास सब

43:20

कुछ होते हुए भीतर खालीपन रह जाता है।

43:24

गीता में श्री कृष्ण कहते हैं वही शक्ति

43:28

है जो हर इंसान के भाग्य की दिशा तय करती

43:31

है। क्योंकि जो बोओगे वही काटोगे। कर्म का

43:36

नियम इतना सटीक है कि वह ना समय देखता है

43:39

ना परिस्थिति बस अवसर देखकर लौट आता है और

43:43

जो भी फल देना हो दे जाता है। इंसान यह

43:46

सोचकर बुराई कर बैठता है कि उसे कोई देख

43:49

नहीं रहा। पर वह भूल जाता है कि ऊपर वाला

43:52

सब देख रहा है। उसकी अदालत में ना गवाहों

43:56

की जरूरत होती है ना सबूतों की। वहां

43:59

सिर्फ कर्मों की गूंज सुनाई देती है और

44:02

उसका न्याय देर से सही पर जरूर होता है।

44:05

जिसने अपने माता-पिता की सेवा की होती है,

44:08

जिसने अपने बुजुर्गों का आदर किया होता

44:10

है, उसके जीवन में एक अदृश्य आशीर्वाद साथ

44:14

चलता है। वह चाहे संघर्ष में हो या

44:17

समृद्धि में नेक अद्भुत सुरक्षा उसे घेरे

44:20

रहती है। पर भी जिसने अपने ही मां-बाप को

44:24

दुख दिया, जिन्होंने उनके आशीर्वाद को

44:27

ठुकराया, उसके घर में सुख टिकता नहीं।

44:29

उसके जीवन में चैन ठहरता नहीं। क्योंकि

44:32

कर्म की किताब में सब कुछ लिखा जाता है हर

44:36

अच्छा काम, हर बुरा व्यवहार।

44:41

एक समय की बात है। एक गरीब आदमी किनारे

44:44

बैठा अपनी रोजी के लिए मछलियां पकड़ रहा

44:47

था। सूरज की धूप में तपते हुए भी उसके

44:50

चेहरे पर सुकून था क्योंकि वह मेहनत ईमान

44:54

से कर रहा था। उधर पास ही एक अमीर सेठ

44:58

बैठा था। उसके पास सोना था, धन था पर

45:02

धैर्य नहीं था। जब उसने उस गरीब के हाथ

45:06

में एक ताजा मछली देखी तो उसके मन में

45:09

लालच जाग उठा। उसने मछली छीन ली। अपनी

45:13

ताकत दिखाई और गरीब को नीचा दिखाकर चला

45:17

गया। पर वह नहीं जानता था कि उसने सिर्फ

45:20

एक मछली नहीं छीनी। उसने किसी मेहनतकश की

45:24

मेहनत छीन ली थी और प्रकृति ऐसे कर्मों को

45:28

कभी माफ नहीं करती।

45:31

मछली ने उसके अंगूठे को काटा और उसी क्षण

45:34

उसका पतन शुरू हुआ। एक छोटा सा घाव उसके

45:38

जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गया। घाव सड़ता

45:42

गया और हर बार डॉक्टर का यही फैसला अब यह

45:46

काटना पड़ेगा। उसके कर्मों की गूंज जैसे

45:49

तैसे लौट रही थी। पहले अंगूठा गया फिर

45:53

कलाई फिर पूरा हाथ। आखिर में उसे समझ आया

45:57

कि यह बीमारी नहीं यह उसके कर्मों का

46:00

परिणाम है। कितना विचित्र है ना। इंसान

46:04

सोचता है कि बुराई का कोई असर नहीं होगा।

46:07

वह दूसरों को दर्द देकर भूल जाता है। पर

46:10

वही दर्द एक दिन उसे ढूंढता हुआ लौट आता

46:13

है और तब कोई भी उसे बचा नहीं पाता।

46:16

कर्मों की सजा से ना राजा बचता है ना रंक।

46:20

कर्म वही है जो जीवन के हर पड़ाव पर हमारी

46:24

परछाई की की। तरह साथ चलता है। जब उस सेठ

46:28

ने अपने सारे हाथ गमवा दिए। तब उसे एहसास

46:31

हुआ कि धन से बढ़कर कुछ और भी है न्याय।

46:36

वह दौड़कर उस गरीब आदमी के पैरों में सिर

46:39

झुका कर रो पड़ा। बोला, "मुझे माफ कर दे।

46:42

तूने मेरे साथ क्या किया? गरीब

46:45

मुस्कुराया। हाथ जोड़कर बोला, "मैं किया।"

46:49

बस ऊपर वाले से कहा, "हा थाहे प्रभु, इसने

46:53

मुझे अपनी ताकत दिखाई है।" अब तू अपनी

46:56

ताकत दिखा। और फिर वह एक ऐसा सबक बन गया

47:00

जो हर इंसान को याद रखना चाहिए। कर्म चाहे

47:04

छोटा हो या बड़ा उसका हिसाब तय है। वह

47:08

हमें वैसे ही ढूंढ लेता है जैसे बछड़ा

47:11

सैकड़ों गायों में अपनी मां को ढूंढ लेता

47:14

है। हम चाहे जहां भाग जाए जो भी बन जाए

47:19

अपने कर्मों के परिणाम से कभी नहीं बच

47:22

सकते। कभी सोचा है शब्द कितने हल्के लगते

47:26

हैं ना। लेकिन जब यही शब्द किसी के दिल को

47:29

चीर देते हैं तो मन के भीतर ऐसी चोट लगती

47:33

है जो दिखाई नहीं देती बस महसूस होती है।

47:37

जीवन कोई खेल नहीं जहां धोखे से जीतने

47:41

वाला हमेशा जीतता रहे।

47:43

यहां हर चाल, हर झूठ, हर स्वार्थ का हिसाब

47:47

बड़े सटीक तरीके से लिया जाता है। जो

47:50

ज्ञानी होते हैं, वे ना जीवन के लिए शोक

47:53

करते हैं और ना मृत्यु के लिए। वे जानते

47:56

हैं कि जन्म और मृत्यु केवल शरीर के स्तर

47:59

पर हैं। आत्मा तो सदा अजर अमर है। इसलिए

48:03

जो अपने कर्तव्यों को निष्ठा और ईमानदारी

48:06

से निभाता है वही सच्चा तपस्वी है। धर्म

48:10

का पालन करना सत्य पर टिके रहना और अपने

48:13

कर्म में पूर्णता लाना यही मनुष्य का सबसे

48:17

बड़ा धर्म है। गीता में श्री कृष्ण कहते

48:20

हैं जब भी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो कि

48:23

तुम्हारे पास कोई नहीं तब याद रखना तुम इस

48:26

दुनिया में अकेले आए थे और अकेले ही

48:29

जाओगे। यह जीवन एक यात्रा है जिसमें साथ

48:33

देने वाले बहुत मिलेंगे पर अंत तक साथ कोई

48:36

नहीं जाएगा। मां-बाप तक जो तुम्हें जन्म

48:39

देते हैं, एक दिन तुम्हें छोड़कर चले जाते

48:42

हैं। तो फिर दूसरों से क्या उम्मीद करना?

48:46

यदि कोई तुम्हारा साथ छोड़ दे तो याद रखना

48:49

वह ईश्वर सदा तुम्हारे साथ है। वह कभी

48:53

तुम्हें नहीं छोड़ता क्योंकि वह तुम्हारे

48:55

भीतर ही है। श्री कृष्ण ने कहा था चाहे

48:59

कोई मुझ पर विश्वास करे या ना करे मैं

49:02

उसका साथ कभी नहीं छोड़ता क्योंकि यह सब

49:05

मेरी ही संताने हैं। मनुष्य ईश्वर का ही

49:08

अंश है। और जब तुम अपने भीतर उस ईश्वर को

49:11

महसूस करने लगो तब अकेलापन मिट जाता है।

49:15

तब समझ आता है कि असली संगत बाहर नहीं

49:19

भीतर है। अकेलापन तब तक लगता है जब तक

49:23

इंसान खुद को दूसरों से जोड़ता है। जैसे

49:26

ही वह खुद से जुड़ जाता है, वह पूर्ण हो

49:29

जाता है। कभी डरना नहीं, कभी खुद को छोटा

49:33

मत समझना। डरना हो तो सिर्फ गलत इंसान के

49:37

साथ रहने से डरना चाहिए। क्योंकि गलत साथ

49:40

वह जहर है जो धीरे-धीरे आत्मा को खोखला कर

49:44

देता है। अकेले रहना बेहतर है बजाय उन

49:49

लोगों के साथ रहने के जो तुम्हारी शांति

49:51

छीन लें। कहावत है समथिंग इज बेटर देन

49:55

नथिंग। लेकिन उससे भी सच्ची बात है। नथिंग

49:59

इज बेटर दन नॉनसेंस। मतलब यह है कि अगर

50:02

संगत बेकार हो तो अकेले रहना ही बेहतर है

50:06

क्योंकि अकेलापन तुम्हें खुद से मिलवाता

50:08

है। तुम्हें मजबूत बनाता है। तुम्हें

50:11

ईश्वर के करीब लाता है। कभी भी अपने धन,

50:14

अपने पद या अपनी शक्ति का अभिमान नहीं

50:17

करना चाहिए। अभिमान वह विष है जो

50:20

धीरे-धीरे आत्मा को जला देता है। मनुष्य

50:23

की दृष्टि को अंधा कर देता है और अंततः

50:26

उसे उसी मिट्टी में मिला देता है जिससे वह

50:29

बना है। दुर्योधन भी इसी घमंड में डूबा

50:33

हुआ था। उसे लगता था कि उसके पास भीष्म

50:36

पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान

50:40

योद्धा हैं तो पांडवों को वह क्षण भर में

50:43

मिटा देगा। लेकिन अहंकार कभी भी किसी का

50:46

नहीं होता। वह जिस हृदय में प्रवेश करता

50:49

है, पहले उसे भीतर से खोखला कर देता है।

50:52

दुर्योधन के पास सब कुछ, था धन, बल, पद,

50:57

सत्ता लेकिन विनम्रता नहीं थी और यही उसकी

51:00

सबसे बड़ी हार थी। जो व्यक्ति अपने

51:02

सामर्थ्य का उपयोग दूसरों को नीचा दिखाने

51:06

में करता है, वह धीरे-धीरे अपना ही पतन

51:09

बुला लेता है। क्योंकि ईश्वर हर घमंडी को

51:12

वही दिखाता है, जो उसने कभी सोचा भी नहीं

51:15

होता।

51:16

जीवन में चाहे जितनी भी सफलता मिल जाए,

51:19

जितनी भी ऊंचाई छू लो, लेकिन उस ऊंचाई का

51:23

अहंकार मत पा लो। क्योंकि जो ऊंचाई अहंकार

51:27

से मिली है, वह एक दिन उसी अभिमान के बोझ

51:31

से गिर जाती है। कितने लोग हैं इस संसार

51:35

में जो अपने पैसे या पद के घमंड में

51:38

दूसरों को तुच्छ समझते हैं। दूसरों के

51:41

आत्मसम्मान को रौंद देते हैं। लेकिन समय

51:44

जब पलटता है ना तो वही लोग जिन्हें कभी

51:47

झुका दिया गया था, सिर उठाकर खड़े हो जाते

51:50

हैं और वही घमंडी लोग सिर झुका देते हैं।

51:55

यही जीवन का संतुलन है। यहां किसी का

51:58

अहंकार स्थाई नहीं होता। आज के युग में

52:01

सच्चाई यह भी है कि अगर आप बहुत ज्यादा

52:04

अच्छे बन जाओ तो दुनिया आपको कमजोर समझ

52:07

लेती है। पांडवों ने धर्म का पालन किया।

52:11

सत्य का साथ दिया लेकिन बदले में उन्हें

52:14

अपमान, वनवास और संघर्ष मिला। उनका राजपाट

52:18

छीन गया। उनकी पत्नी का अपमान हुआ क्योंकि

52:22

उन्होंने अच्छाई को अपनी कमजोरी बना लिया

52:24

था। दुनिया अब वैसी नहीं रही जैसी पहले

52:28

थी। अब अच्छाई को परखा नहीं जाता।

52:31

इस्तेमाल किया जाता है। अगर आप बहुत

52:33

ज्यादा लोगों के लिए अच्छा करते हैं तो

52:36

वही लोग आपके सबसे पहले विरोधी बनते हैं।

52:39

जितना आप किसी के लिए झुकते हैं, उतना ही

52:42

वह आपको गिराने की कोशिश करता है। यही आज

52:45

की सच्चाई है। अच्छा बनो, लेकिन भोला मत

52:48

बनो। अपनी आत्मा में सच्चे रहो, लेकिन

52:52

दूसरों के छल को पहचानना भी सीखो। दुनिया

52:55

में जो दुख हम समझते हैं वे केवल अस्थाई

52:58

स्थितियां हैं। कोई व्यापार में घाटा खा

53:01

ले तो वह सोचता है कि उसका जीवन खत्म हो

53:04

गया। कोई प्रेम में असफल हो जाए तो उसे

53:07

लगता है कि अब जीने का कोई अर्थ नहीं। कोई

53:11

अपनों को खो दे तो उसे लगता है कि सब कुछ

53:14

खत्म हो गया। लेकिन श्री कृष्ण कहते हैं

53:18

हे मनुष्य तेरा जीवन केवल इन घटनाओं का

53:21

नाम नहीं है। तू इन सब परिस्थितियों से

53:24

ऊपर है क्योंकि तू आत्मा है और आत्मा को

53:27

कोई हानि नहीं पहुंचा सकता। यह शरीर तो

53:31

नश्वर है। यह टूटेगा बीमार होगा। एक दिन

53:34

मिट्टी में मिल जाएगा। लेकिन जो आत्मा है

53:37

वह अनादि है। अविनाशी है। वह कभी नहीं

53:40

मरती। जब तक हम खुद को केवल इस शरीर तक

53:44

सीमित मानते रहेंगे तब तक हम हर छोटी बड़ी

53:47

घटना में दुखी होते रहेंगे। लेकिन जैसे ही

53:50

हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हम आत्मा हैं

53:54

और भगवान के अंश हैं, तब कोई भी बाहरी दुख

53:57

हमें भीतर से तोड़ नहीं सकता। कृष्ण यह भी

54:01

कहते हैं असली दुख तब शुरू होता है जब तू

54:04

अपना ध्यान बाहर की चीजों पर रखता है और

54:07

भीतर की आवाज को अनसुना करता है। जब तू

54:11

लोगों की राय को अपने जीवन का आधार बना

54:14

लेता है। जब तू उनके शब्दों से अपना सुखदख

54:17

तय करने लगता है, तब तू अपने आप से दूर हो

54:21

जाता है। लोग क्या कहेंगे? यह डर इंसान को

54:24

धीरे-धीरे खा जाता है। यह डर भी ईश्वर से

54:28

दूरी का ही एक रूप है। क्योंकि जिसने

54:30

कृष्ण को अपनाया, वह कभी लोगों के शब्दों

54:33

से नहीं डगमगाता। जीवन के असली दुख का एक

54:37

और कारण है। अपेक्षाएं। जब हम उम्मीदें

54:41

लगाते हैं तो हम अपने सुख का नियंत्रण

54:44

दूसरों के हाथ में दे देते हैं। और जब वे

54:47

उम्मीदें टूटती हैं तो हम टूट जाते हैं।

54:50

लेकिन अगर हम अपनी उम्मीद केवल श्री कृष्ण

54:53

पर रखें तो यह दुख कभी जन्म ही नहीं लेगा।

54:57

क्योंकि कृष्ण कभी अपनी वचन भंग नहीं

54:59

करते। वे कहते हैं हे भक्त मैं कभी

55:03

तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा। बस तुम मुझे

55:06

याद रखना। मैं हर स्थिति में तुम्हें थामे

55:09

रखूंगा। दुख का एक और गहरा रूप है।

55:13

अकेलापन। यह ऐसा दर्द है जो बाहर से दिखाई

55:17

नहीं देता। लेकिन भीतर से आत्मा को चीर

55:20

देता है। लोग भीड़ में रहते हुए भी अकेले

55:23

महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने उस साथी

55:26

को भुला दिया है जो जन्म जन्मांतर से उनके

55:30

साथ है। श्री कृष्ण। अगर कोई यह समझ ले कि

55:34

वह चाहे जहां भी हो, चाहे जैसे भी हालात

55:37

हो, कृष्ण हमेशा उसके साथ हैं, तो अकेलापन

55:40

कभी महसूस नहीं होगा। जितना हम माया में

55:44

फंसते जाते हैं, उतना हम कृष्ण से दूर

55:47

होते जाते हैं और यही दूरी हमें असली दुख

55:50

देती है। इसलिए संत और महापुरुष हमेशा

55:53

कहते हैं नाम जपो, भजन करो, कथा सुनो

55:58

क्योंकि इन सब में मन को वह शांति मिलती

56:00

है जो दुनिया की कोई चीज नहीं दे सकती।

56:03

मनुष्य के जीवन में जो चीज सबसे अधिक चोट

56:06

पहुंचाती है, वह है अपने होने का कारण भूल

56:10

जाना। हम इस धरती पर केवल खाने, सोने,

56:14

कमाने और नाम कमाने के लिए नहीं आए हैं।

56:17

श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं, हे

56:20

अर्जुन तू कर्म कर लेकिन फल की आसक्ति मत

56:23

रख। असली दुख तब होता है जब हम कर्म तो

56:26

करते हैं लेकिन उसे भगवान को अर्पित नहीं

56:29

करते और परिणाम से अपने सुखदख को बांध

56:33

लेते हैं। जब परिणाम हमारे अनुसार नहीं

56:36

आता तो हम टूट जाते हैं। लेकिन सोचो अगर

56:40

हर परिणाम को हम ईश्वर की इच्छा मान ले तो

56:43

टूटने का सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि तब

56:46

हम समझेंगे कि जो हुआ वह भगवान की योजना

56:50

के अनुसार हुआ और उनकी योजना हमेशा हमारे

56:53

भले के लिए होती है। जीवन का असली दुख यह

56:57

भी है कि मनुष्य अपनी तुलना दूसरों से

57:00

करता है। किसी के पास अधिक धन है तो

57:03

ईर्ष्या होती है। किसी की शादी पहले हो गई

57:06

तो हीन भावना होती है। कोई और अधिक सफल है

57:10

तो हम खुद को कमतर समझने लगते हैं। लेकिन

57:13

कृष्ण कहते हैं हे मनुष्य मैंने तुझे

57:16

अद्वितीय बनाया है। तेरी राह अलग है। तेरे

57:19

कर्म अलग है और तेरा समय अलग है। जब तू

57:23

तुलना करता है तब तू मेरे बनाए हुए अपने

57:26

स्वरूप का अपमान करता है। यह भी एक कारण

57:29

है कि लोग अंदर से दुखी रहते हैं। वे

57:32

वर्तमान में जीना भूल गए हैं। वे या तो

57:35

अतीत के पछतावे में रहते हैं या भविष्य की

57:38

चिंता में। लेकिन कृष्ण ने गीता में कहा

57:42

तू वर्तमान क्षण में कर्म कर जो बीत गया

57:45

वह मेरे हाथ में है और जो आने वाला है वह

57:49

भी मेरे हाथ में है। जो व्यक्ति इस सत्य

57:52

को समझ लेता है उसका असली दुख समाप्त हो

57:55

जाता है। हम में से बहुत लोग सोचते हैं कि

57:59

दुख का कारण हमारे चारों ओर की

58:02

परिस्थितियां हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि

58:05

दुख का कारण हमारा दृष्टिकोण है। एक ही

58:08

परिस्थिति में कोई व्यक्ति टूट जाता है और

58:11

कोई व्यक्ति उसी परिस्थिति में और मजबूत

58:14

हो जाता है। फर्क केवल इस बात का है कि

58:17

उसकी नजर में क्या बड़ा है? समस्या या

58:20

भगवान। अगर भगवान बड़े हैं तो समस्या छोटी

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लगने लगती है। श्री कृष्ण ने पांडवों को

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यह बार-बार महसूस कराया। जब वे वनवास में

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थे, जब उनके पास राज्य नहीं था, जब उनका

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अपमान हुआ, तब भी वे टूटे नहीं क्योंकि

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उनके पास कृष्ण थे। लेकिन जब दुर्योधन के

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पास राज्य, शक्ति और धन सब था, तब भी वह

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अंदर से बेचैन था क्योंकि उसके पास कृष्ण

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नहीं थे। यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि असली

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सुख भगवान के साथ है और असली दुख भगवान से

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दूरी है। मनुष्य का मन हमेशा बाहरी सहारे

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ढूंढता है। वह सोचता है अगर यह व्यक्ति

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मेरे साथ है तो मैं सुरक्षित हूं। अगर यह

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नौकरी है तो मैं निश्चिंत हूं। अगर यह

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संपत्ति है तो मैं खुश हूं। लेकिन यह सभी

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सहारे अस्थाई हैं। एक दिन व्यक्ति चला

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जाएगा। नौकरी खत्म हो जाएगी। संपत्ति छीन

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सकती है। लेकिन जो सहारा कभी नहीं टूटता,

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वह है श्री कृष्ण का नाम, उनकी शरण। जो इस

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सहारे को पकड़ लेता है, वह जीवन के असली

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दुख से मुक्त हो जाता है। कभी-कभी ईश्वर

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स्वयं हमारे जीवन से कुछ चीजें छीन लेते

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हैं ताकि हम उनसे अधिक जुड़ सके। हमें

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लगता है कि भगवान ने हमारे साथ अन्याय

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किया लेकिन असल में यह उनका प्रेम है। वे

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जानते हैं कि अगर हम इस माया में उलझे

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रहेंगे तो हम उनसे दूर हो जाएंगे और यही

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तो असली दुख है। हम अक्सर उन लोगों के लिए

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खुद को बदलते हैं जिन्हें हमें वैसे ही

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स्वीकार करना चाहिए था जैसे हम हैं। और

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फिर एक दिन समझ आता है कि जो सच्चा होता

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है वह बदलने को नहीं कहता। वह अपनाने को

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कहता है। कभी-कभी हम खुद से भी माफी नहीं

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मांग पाते क्योंकि सबसे गहरा धोखा हम

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दूसरों से नहीं अपनी उम्मीदों से खाते हैं

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जो बार-बार हमें उन लोगों के करीब ले जाती

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हैं जो हमें नहीं समझते। जब तुम्हारी

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मौजूदगी किसी को बोझ लगे और फिर भी तुम

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उसे जबरदस्ती अपना बनाना चाहो तो यकीन

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मानो वह प्रेम नहीं होता। वह आत्म संवेदना

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की आखिरी डूबती सांस होती है। हम कई बार

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इसलिए हार नहीं मानते क्योंकि हमें उम्मीद

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होती है। हम इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि

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हम टूटने से डरते हैं। क्योंकि किसी को

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खुद से जुदा होते देखना खुद को खोने जैसा

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लगता है। जो लोग यह कहकर दूर हो जाते हैं

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कि तुम बदल गए हो वे अक्सर वही होते हैं

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जो खुद इतने बदल जाते हैं कि तुम्हारी

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स्थिरता उन्हें जंग लगने जैसी लगने लगती

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है। कभी तुम किसी के लिए सब कुछ छोड़ देते

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हो और फिर वही इंसान तुम्हें यूं छोड़

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देता है जैसे तुम्हारे होने का कभी कोई

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मतलब ही नहीं था। जब हम खुद की चुप्पियों

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में डूबने लगते हैं तो बाहर का शोर सुनाई

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देना बंद हो जाता है और उसी शांति में

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हमें अपनी सबसे सच्ची आवाज मिलती है। कुछ

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दर्द ऐसे होते हैं जो हम जिंदगी भर नहीं

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भूलते। ना इसलिए कि वे बड़े थे बल्कि

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इसलिए कि हमने उन्हें बिना किसी को बताए

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सहा था। कभी-कभी हमें खुद को समझाना पड़ता

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है कि जिसे हम सबसे ज्यादा चाहते हैं, वही

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हमारे लिए ठीक नहीं है और यह बात मानना

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सबसे मुश्किल होता है। हम तब टूटते हैं जब

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हम अपनी पूरी नजाकत किसी के हवाले कर देते

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हैं और वह उसे कांच समझकर नहीं पत्थर

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समझकर तोड़ देते हैं। कभी कोई तुम्हें यह

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कहे कि तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन तो उस

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लेखन को गंभीरता से लेना। क्योंकि वहां से

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ही उनका जाना तय हो चुका होता है। जब हर

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दिन तुम्हें यह एहसास दिलाने लगे कि

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तुम्हारी अहमियत बस एक सुविधा के तौर पर

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है, तो समझ लो वहां तुम्हारा दिल नहीं।

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सिर्फ तुम्हारा वक्त मांगा जा रहा है। कभी

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तुम्हारा खामोश रहना भी चीख से ज्यादा

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तकलीफ देता है और तब कोई पास ना हो तो

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अकेलापन सबसे सच्चा साथी बन जाता है। कुछ

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लोग हमारी जिंदगी में इसलिए आते हैं ताकि

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हमें यह सिखा सकें कि हम खुद को कितना भूल

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गए हैं और जब वे चले जाते हैं तब हम खुद

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की तलाश शुरू करते हैं। हमने कई बार अपनों

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को जाते देखा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने

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उन्हें कभी रोकने की जिद नहीं की। हमें

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लगा कि जो अपना होता है वह खुद रुकता है।

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कभी किसी से इतनी उम्मीद मत करना कि वह

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तुम्हारे टूटे हुए हिस्सों को जोड़ दे।

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क्योंकि कई बार लोग उन्हीं हिस्सों को

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देखकर डर जाते हैं और चले जाते हैं। जो

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रिश्ते केवल तुम्हारी पहल पर टिके हैं,

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वहां एक दिन थकावट आ ही जाती है। और तब

62:55

चुपचाप दूर हो जाना आत्मसम्मान की सबसे

62:59

सुंदर अभिव्यक्ति होती

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