चार लोगों की चिंता करना छोड़ो खुश रहोगे || Arjun inspire || Best motivation video
FULL TRANSCRIPT
याद रखना जो इंसान तुम्हारे बुरे वक्त में
तुम्हारे साथ खड़ा रहता है वही वास्तव में
तुम्हारा है। बाकी तो सब अपनेपन का अभिनय
करने वाले किरदार हैं। जो परिस्थिति बदलते
ही चेहरे बदल लेते हैं। लोग तब तक साथ
चलते हैं जब तक तुम्हारे हाथ में कुछ देने
को होता है। पर जब तुम्हारे हाथ खाली हो
जाते हैं तो वे तुम्हारी परछाई से भी दूर
भागते हैं। सच्चाई यही है कि इस संसार में
सब लेनदेन के रिश्ते हैं। जब तक तुम उनके
काम के हो तब तक सब तुम्हारे अपने लगते
हैं। पर जब देने की बारी आती है तो भीड़
में खड़े वही लोग आंखें चुराने लगते हैं।
श्री कृष्ण कहते हैं कभी किसी को इतना
महत्व मत दो कि वह तुम्हें महत्व देना ही
भूल जाए क्योंकि जब तुम किसी को अपने जीवन
का केंद्र बना देते हो तो तुम्हारी अहमियत
उसकी नजर में धीरे-धीरे मिटने लगती है।
सम्मान देना अच्छा है। लेकिन इतना नहीं कि
सामने वाला उसे तुम्हारी कमजोरी समझने
लगे। कभी-कभी सीमाएं भी जरूरी होती हैं
क्योंकि हद से ज्यादा इज्जत भी अपमान में
बदल जाती है। जीवन में संतुलन जरूरी है।
ना किसी को अपना सब कुछ बनाओ ना किसी को
अपना कुछ भी ना समझो। जो तुमसे प्रेम करता
है, वह तुम्हें हर परिस्थिति में समझेगा।
लेकिन जो सिर्फ तुम्हारे सुख में साथ है,
वह तुम्हारे दुख के समय सिर्फ तमाशा
देखेगा।
लोगों की बातें बहुत मीठी होती हैं, लेकिन
सच्चाई हमेशा कड़वी होती है। कोई कहेगा
हमें याद करना जब तकलीफ हो, लेकिन जब
तकलीफ सच में आती है, तो वही लोग सबसे
पहले गायब हो जाते हैं। यही दुनिया है
यहां लोग शब्दों से नहीं स्वार्थ से जुड़े
होते हैं। और यही वह पल होता है जब इंसान
समझता है कि जीवन में अपने सिर्फ वही हैं
जो बिना बोले तुम्हारे साथ खड़े रहते हैं।
जिन्हें तुम्हारे दर्द की कहानी सुनने की
नहीं बल्कि तुम्हारे आंसू रोकने की परवाह
होती है। पर याद रखना अपने भी बदल जाते
हैं। कभी-कभी वही लोग जो तुम्हें
मुस्कुराने की वजह देते हैं वही तुम्हारे
आंसुओं की वजह बन जाते हैं। यही संसार है
मोह, माया और अपनों के छलावे का। तुम
जितना इस संसार से लगाव रखोगे, उतना ही
दर्द महसूस करोगे। क्योंकि दुख वहीं से
शुरू होता है जहां अपनापन शुरू होता है।
यह मेरा है। वह मेरा अपना है। यही वे शब्द
हैं जिनसे पीड़ा की जड़े पनपती हैं। और
यही कारण है कि भगवान ने कहा संसार के मोह
में मत उलझो। मुझ में भक्त इ करो। जो
भक्ति में खो जाता है, वह दुखों से मुक्त
हो जाता है। क्योंकि जो भगवान को अपना मान
लेता है, उसे फिर किसी अपने के खोने का डर
नहीं रहता।
डर डर वही सबसे बड़ी बेड़ी है जो मनुष्य
की आत्मा को जकड़ देती है। जिस दिन तुम
डरना छोड़ दोगे, उसी दिन तुम्हारा जन्म
नया होगा। क्योंकि जो आत्मा है वह अमर है।
ना उसे कोई जला सकता है, ना मार सकता है,
ना मिटा सकता है।
तो फिर किस बात का भय? कौन तुम्हें हरा
सकता है? जब तुम्हारे भीतर स्वयं परमात्मा
का अंश है। डर केवल भ्रम है जो बुद्धि को
कुंद करता है और आत्मा की शक्ति को भूलने
पर मजबूर करता है। गीता में श्री कृष्ण
कहते हैं सच्चाई यह है कि जो अपने कर्म को
निडरता से करता है, वही इस संसार में अमृत
को छूता है। कायर लोग भाग जाते हैं। लेकिन
जो सच्चे होते हैं, वे अपने भय को जीतकर
कर्म की राह पर बढ़ते हैं। क्योंकि कर्म
ही धर्म है और धर्म के मार्ग पर चलने वाला
कभी अकेला नहीं होता। वह जानता है कि
परिणाम ईश्वर के हाथ में है और उसे बस
अपना कर्तव्य निभाना है।
आज के समय में इंसान को तलवार से नहीं
शब्दों से घायल किया जाता है। कितनी अजीब
बात है जुबान छोटी होती है। पर यह किसी की
पूरी जिंदगी बदल सकती है। कहते हैं, अगर
द्रोपदी के मुख से वह एक वचन अंधे का
पुत्र भी अंधा ना निकला होता, तो शायद
महाभारत का युद्ध ही नहीं होता। एक शब्द
ने घर जला दिया। रिश्ते तोड़ दिए और युगों
तक चलने वाली द्वेष की आग जला दी। कभी-कभी
चुप रह जाना बोलने से कहीं ज्यादा ताकतवर
होता है। क्योंकि शस्त्र केवल शरीर को
घायल करता है। पर शब्द आत्मा को जला देते
हैं। आज इंसान को इंसान से नहीं उसकी वाणी
से डर लगता है। कितनी बार हम सोचते हैं कि
कोई हमारा नहीं रहा। पर सच्चाई यह है कि
हमारे शब्द ही हमसे हमारे अपने छीन लेते
हैं। बोलने से पहले अगर इंसान एक क्षण रुक
जाए अपने शब्दों का वजन तौल ले तो न जाने
कितनी नफरतें कभी जन्म ही ना ले।
लेकिन आज कौन सोचता है? आज तो हर कोई अपनी
बात मनवाने में लगा है। हर कोई दूसरे की
चुप्पी को कमजोरी समझता है। लोग समझ नहीं
पाते कि बोलने से बड़ा त्याग होता है ना
बोलना और फिर यही नासमझी एक नई आग जन्म
देती है। वही आग जो महाभारत में थी वही आग
आज हमारे बीच जल रही है। घर-घर में,
रिश्तों में, दफ्तरों में हर जगह एक छोटी
सी बात बड़े-बड़े युद्धों का कारण बन जाती
है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं, अब जरा
इस युग को देखो। यहां इंसान इंसान का सबसे
बड़ा दुश्मन बन चुका है। कहीं कोई किसी का
व्यापार छीन रहा है। कहीं किसी की मेहनत,
किसी का हक, किसी की इज्जत खा रहा है। यह
कलयुग वही है जिसकी चेतावनी दी गई थी।
जहां इंसान ही इंसान को निगल रहा है।
कितना अजीब है ना जो दुखी है उसे और दुख
दो। जो खुश है उसे गिरा दो। जो आगे बढ़े
उसे रोक दो। यही रिवाज बन चुका है। हर
चेहरा मुस्कुरा रहा है। लेकिन भीतर से हर
कोई घायल है। हर कोई किसी और की तकलीफ
देखकर सुकून ढूंढता है। अब रिश्ते मतलब से
बने हैं। दोस्तियां फायदे से जुड़ी हैं।
भक्ति भी प्रदर्शन बन चुकी है। और
इंसानियत वह तो जैसे इतिहास की किताबों
में दब चुकी है। कभी एक भिखारी था। प्यास
से तड़पता हुआ बस एक गिलास पानी मांग रहा
था। सेठ के घर के बाहर खड़े होकर उसने
कहा, "मुझे बस पानी दे दो। मेरे प्राण
निकल रहे हैं।" पर सेठ ने कहा, अभी आदमी
नहीं है। जब आदमी आएगा तब मिलेगा। भिखारी
ने फिर विनती की, तुम ही आदमी बन जाओ से।
ठ जी बस एक क्षण के लिए इंसान बन जाओ।
लेकिन आज के युग में इंसान बनने के लिए भी
कोई तैयार नहीं। हर कोई किसी और के आने का
इंतजार करता है। पर खुद एक कदम नहीं
बढ़ाता। हर कोई चाहता है कि दूसरा अच्छा
बने। पर खुद को बदलने की हिम्मत किसी में
नहीं। यही तो इस युग की सबसे बड़ी विडंबना
है। सबको इंसान चाहिए पर कोई इंसान बनना
नहीं चाहता। हम सब किसी ना किसी रूप में
वही सेठ हैं जो पानी देने की जगह इंतजार
करते हैं। जो माफी मांगने की जगह दूसरों
की गलतियां गिनते हैं। और फिर जब जीवन
जवाब देता है तब हम कहते हैं क्यों मेरे
साथ? पर जवाब साफ है। कर्मों का फल कभी
गलत नहीं होता। हमारे शब्द, हमारे कर्म,
हमारा व्यवहार सब लौट कर आते हैं। जैसे
बछड़ा सैकड़ों गायों में अपनी मां को ढूंढ
लेता है, वैसे ही हमारे कर्म भी हमें ढूंढ
ही लेते हैं।
श्री कृष्ण कहते हैं, कभी सोचा है? कितनी
बार हम अपने ही दिल के खिलाफ जाकर किसी को
माफ कर देते हैं। इस उम्मीद में कि शायद
वह बदल जाएगा। पर जो इंसान बार-बार वही
गलती करे, वह गलती नहीं कर रहा होता, वह
अपनी आदत निभा रहा होता है। कभी किसी को
इतना भी माफ मत करो कि वह तुम्हारे दर्द
को तुम्हारी कमजोरी समझ ले। माफ करना एक
गुण है, लेकिन हर बार माफ करना मूर्खता
है। क्योंकि जहां सीमाएं खत्म होती हैं,
वहीं से आत्मसम्मान की मृत्यु शुरू होती
है। युधिष्ठिर ने भी यही किया था।
उन्होंने बार-बार दुर्योधन को माफ किया और
हर बार बदले में मिला अपमान, छल और कष्ट।
कभी-कभी विनम्रता भी तब तक अच्छी लगती है
जब तक सामने वाला उसकी कदर करे। वरना वही
विनम्रता धीरे-धीरे आत्मतोड़क बन जाती है।
लोग कहते हैं माफ करने से मन हल्का हो
जाता है। पर अगर वही इंसान बार-बार वही
घाव दे रहा हो तो वह माफी नहीं आत्मघात
है। क्योंकि किसी को बार-बार मौका देना
मतलब अपने ही दर्द को बार-बार बुलावा
देना। याद रखो किसी की आदत को सुधारने की
जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है। कभी-कभी दूर
हो जाना, चुप रह जाना और खुद को बचा लेना
ही सबसे बड़ी समझदारी है। क्योंकि माफी तब
तक अच्छी लगती है जब तक वह आत्मसम्मान के
ऊपर ना चढ़ जाए। कभी किसी से इतना मत
जुड़ो कि वह तुम्हें तोड़कर चला जाए और
तुम उसे फिर भी सही ठहराओ क्योंकि प्यार,
दया, क्षमा सब वहीं तक अच्छे हैं। जहां तक
वह तुम्हें कमजोर ना बना दे। जो बार-बार
तुम्हें चोट पहुंचाए, वह तुम्हारा
इम्तिहान नहीं ले रहा। वह तुम्हारा
इस्तेमाल कर रहा है। और फिर जीवन यही
सिखाता है। कभी-कभी ना कहना सबसे बड़ा
प्रेम होता है खुद के प्रति। माफ करो
लेकिन भूलो मत सजग रहो पर द्वेष मत पालो
क्योंकि सतर्कता ही वह कवच है जो इंसान को
बार-बार टूटने से बचाता है। जैसे-जैसे यह
समझ आती है जीवन की दूसरी सच्चाई सामने
आती है। मृत्यु का भय नहीं बल्कि जीवन की
अस्थिरता ही सबसे बड़ी सीख है। जो पैदा
हुआ है उसे एक दिन जाना ही है। यह शरीर
किराए का घर है और हम बस थोड़े दिनों के
मेहमान है। यहां जो भी है, वह सब बदल
जाएगा। पर आत्मा वह कभी नहीं मरती। फिर
क्यों डरते हो? जिसे टाला नहीं जा सकता
उसके बारे में चिंता क्यों करते हो? जो
होना है वह होकर रहेगा। और जो नहीं होना
उसके लिए चिंता करना। बस खुद को थकाना है।
श्री कृष्ण कहते हैं कर्म करो पर फल की
चिंता मत करो क्योंकि जीवन का सौंदर्य इसी
में है कि हम अपना धर्म निभाएं। परिणाम
चाहे जैसा हो। कर्म ही पूजा है और निष्ठा
ही सच्चा धर्म। कभी-कभी संकट जब जीवन में
आता है तो वह हमें तोड़ने नहीं आता। वह
हमें परखने आता है। जैसे आग सोने को तपाती
है, वैसे ही कठिनाइयां इंसान को खरा बनाती
हैं। क्रोध, लालच और मोह। यह तीन द्वार
नरक के हैं। जो इनसे बच गया, वह अपने भीतर
प्रकाश पा गया। लेकिन जो इनसे हार गया, वह
अपने ही जीवन की अंधेरी गलियों में खो
गया। कभी अपने कर्मों से भागो मत क्योंकि
कर्म ही वह दर्पण है जिसमें आत्मा अपना
असली चेहरा देखती है। जो धर्म के मार्ग पर
चलता है उसे डरने की नहीं बल्कि अटल रहने
की जरूरत होती है। सच को स्वीकार कर लेना
ही सबसे बड़ी समझदारी है। क्योंकि झूठ को
सच मानकर जीना एक धीमा जहर है जो
धीरे-धीरे आत्मा को खत्म करता है। कभी-कभी
जिंदगी सिखाती नहीं सीधे गिरा देती है
ताकि इंसान समझे कि बीता हुआ वक्त वापस
नहीं आता। जो चला गया उसे पकड़ने की कोशिश
मत करो क्योंकि जो बीत गया वह तुम्हारे
जीवन का हिस्सा नहीं रहा। अब वह तुम्हारी
कहानी का सिर्फ एक अध्याय है जिसे पढ़कर
आगे बढ़ना है। कितने लोग हैं जो अपने बीते
कल में ही उलझे रहते हैं। कभी किसी के
धोखे में, कभी किसी के वादे में, कभी किसी
के शब्दों के बोझ में दबे हुए। लेकिन यह
भूल जाते हैं कि जो गया वह गया उसे याद
रखकर सिर्फ आज को जलाया जा सकता है। जिया
नहीं जा सकता। समझदार लोग वे नहीं जो कभी
नहीं रोए बल्कि वे हैं जो आंसू पोंछ कर
मुस्कुराना सीख गए। क्योंकि जो कल तुम्हें
तोड़ गया उसे पकड़ कर बैठने का मतलब है
अपने आज को बर्बाद करना।
लोग हमेशा दूसरों को दोष देते हैं। उसने
धोखा दिया। उसकी वजह से मैं टूटा। उस
इंसान ने मेरी जिंदगी बिगाड़ दी। पर
सच्चाई यह है जिसने तुम्हारे साथ गलत किया
वह अपना कर्म कर गया। अब तुम्हारा कर्म है
कि तुम उसे भुलाकर आगे बढ़ो क्योंकि जो
इंसान अपने कल में जीता है वह कभी अपने आज
को नहीं पा सकता। श्री कृष्ण कहते हैं हर
इंसान के जीवन में एक समय आता है जब उसे
अपने अतीत के बोझ को उतारना पड़ता है। तब
जाकर एहसास होता है असली सुकून किसी और
में नहीं अपने भीतर है। जो अतीत को ढोते
हैं, वह वर्तमान की सुंदरता महसूस नहीं कर
पाते। कभी खुद से पूछो कितनी बार तुमने
अपने कल को याद करके आज मुस्कुराने के
मौके गवाए हैं। कितनी बार तुमने पुराने
जख्म को कुरेद कर नए घाव बना लिए हैं।
जीवन कहता है जो हुआ उसे छोड़ दो क्योंकि
तुम उसे बदल नहीं सकते।
लेकिन आज को सुंदर बनाना तुम्हारे हाथ में
है। बीते समय का बोझ उतार दो क्योंकि तुम
वह नहीं हो जो पहले थे। हर दिन एक नया
अवसर है। हर सुबह एक नई शुरुआत है। जिंदगी
तब खिलती है जब तुम भूलना सीख जाते हो।
कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पीछे देखना
छोड़ना पड़ता है। क्योंकि जब तक नजर पीछे
अटकी रहेगी कदम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अतीत
की जंजीरों में जकड़ा इंसान कभी स्वतंत्र
नहीं हो सकता। और स्वतंत्रता का असली अर्थ
है जो बीत गया उसे मुस्कुराकर अलविदा
कहना। और जब तुम छोड़ना सीख जाते हो तब
जीवन एक और रहस्य खोलता है। कई बार नया
आरंभ करने के लिए पुराने को पूरी तरह
मिटाना पड़ता है। कभी-कभी कुछ टूटने पड़ते
हैं ताकि कुछ नया बन सके। याद रखो कृष्ण
ने भी कुंती से कहा था अधर्म बढ़ गया था
इसलिए पुराने का अंत आवश्यक था ताकि नया
युग जन्म ले सके। जैसे खंडहर में नया महल
नहीं बन सकता वैसे ही पुराने दुखों के ढेर
पर नई खुशी का घर नहीं बसाया जा सकता।
गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कभी-कभी जा
अधे इवन को भी पुनर्निर्माण चाहिए। पुराने
रिश्ते, पुरानी सोच, पुराने डर, पुराना
दर्द सब कुछ मिटाना पड़ता है। क्योंकि नया
तभी जन्म लेता है जब पुराना पूरी तरह
समाप्त होता है। एक इमारत जब कमजोर हो
जाती है तो उसे मरम्मत नहीं ध्वस्त करना
पड़ता है। वैसे ही जब तुम्हारा जीवन
पुराने दर्दों से भर जाए तो उसे मरम्मत
नहीं। एक नई शुरुआत की आवश्यकता होती है
और नई शुरुआत का पहला कदम है अतीत से
मुक्ति ना शिकायत ना पश्चाताप सिर्फ
स्वीकार क्योंकि जिस दिन तुम स्वीकार कर
लेते हो कि जो हुआ वह होना ही था उसी दिन
से तुम्हारा पुनर्जन्म शुरू हो जाता है
जीवन कोई बंद किताब नहीं हर दिन एक नया
पन्ना है बस लिखना तुम्हारे हाथ में है
क्या उसमें दर्द लिखोगे या नई रोशनी की
शुरुआत कभी-कभी जीवन में सबसे मीठे शब्द
वही लोग बोलते हैं जिनके दिल में तुम्हारे
लिए जहर पलता है। वे मुस्कुराते हैं।
तुम्हें गले लगाते हैं पर पीठ पीछे वही
तुम्हारा संसार तोड़ते हैं। ऐसे लोग उस
घड़ी की तरह होते हैं जिसके मुख पर अमृत
लगा होता है। पर भीतर हर टिक टिक में जहर
छिपा होता है। वे तुम्हारे सामने प्रेम का
अभिनय करते हैं। पर उनकी नजरों में
ईर्ष्या और छल झलकता है। कभी पहचानने की
कोशिश करो उन चेहरों को जो रोशनी में
तुम्हारे साथ दिखते हैं। पर अंधेरे में
तुम्हारा रास्ता काटते हैं। हर अपनापन
सच्चा नहीं होता। हर मुस्कान विश्वास नहीं
होती। कई बार तो वही हाथ तुम्हें चोट
पहुंचाते हैं जो कभी तुम्हें संभालने का
वादा करते हैं। इसलिए जीवन का सबसे कठिन
सबक यही है। हर किसी को दिल में जगह मत
दो। क्योंकि सब तुम्हारे अपने नहीं होते।
श्री कृष्ण कहते हैं कुछ लोग सिर्फ तब तक
तुम्हारे होते हैं जब तक उन्हें तुमसे कोई
काम होता है। जैसे ही स्वार्थ खत्म होता
है उनका चेहरा भी बदल जाता है। इसलिए उन
लोगों को जहर की तरह छोड़ दो जो अपनेपन का
दिखावा करें पर भीतर से तुम्हें तोड़ते
जाएं। समझदार वही है जो लोगों को नहीं
उनकी नियत को पढ़ता है। क्योंकि जो सामने
मीठा बोले यह जरूरी नहीं कि वह सच्चा भी
हो। कभी-कभी सच्चाई के सबसे खतरनाक दुश्मन
वही होते हैं जो प्रेम का मुखौटा पहन कर
आते हैं। लेकिन जिंदगी यहीं रुकती नहीं
क्योंकि जो कुछ भी होता है वह बिना किसी
कारण के नहीं होता। हर घटना, हर दर्द, हर
ठोकर में कोई ना कोई रहस्य छिपा होता है।
कभी कुछ गलत इसलिए नहीं होता कि भगवान ने
हमें सजा दी बल्कि इसलिए होता है क्योंकि
वह हमें कुछ सिखाना चाहते हैं। एक मां थी
ग्रीप पर सच्चे दिल वाली। उसके बच्चे की
एक उंगली किसी दुर्घटना में कट गई। वह दिन
रात भगवान को कोसती रही। क्यों मेरे बच्चे
के साथ ऐसा हुआ? क्यों उसके हाथ से वह
उंगली छीन ली? लेकिन एक दिन जब उस गांव
में एक मायावी राक्षस आया जो बच्चों की
बलि देकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहता था तो
उसने उस बच्चे को भी पकड़ लिया। जब वह बलि
चढ़ाने ही वाला था तभी उसे अपने गुरु की
शर्त याद आई जिस बच्चे की बलि देनी है
उसका हर अंग पूर्ण होना चाहिए। लेकिन उस
बच्चे की उंगली कटी हुई थी। इसलिए वह उसे
जीवित छोड़ने पर मजबूर हो गया और उस दिन
उस मां की आंखों से आंसू नहीं कृतजता के
मोती गिरे। उसे एहसास हुआ जो उसे
दुर्भाग्य लगा था। वह दरअसल ईश्वर की कृपा
थी। कभी-कभी भगवान हमें तोड़ते हैं ताकि
वे हमें बचा सके। कभी वे कुछ छीनते हैं
ताकि हमें किसी और बड़े नुकसान से बचाया
जा सके। हर दर्द के पीछे कोई वरदान छिपा
होता हैबस देखने की दृष्टि चाहिए। श्री
कृष्ण कहते हैं अगर हम हर घटना को शांति
से देखें तो समझ आएगा कि कुछ भी व्यर्थ
नहीं होता। हर बुरा वक्त हर कार्य असफलता
किसी ना किसी अच्छे की नींव रखती है। जो
आज तुम्हें रुला रहा है वही कल तुम्हें
संभालेगा। पर जब हम अपने कर्म में अभिमान
जोड़ देते हैं तब उसका अर्थ मिट जाता है
क्योंकि जो भलाई हम दिखावे से करते हैं वह
कर्म नहीं प्रदर्शन बन जाता है। सच्चा
कर्म वही है जो निस्वार्थ हो जिसमें मैंने
किया की भावना ना हो। क्योंकि करने वाले
हम नहीं वह परमात्मा है जो हमें माध्यम
बनाता है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि
मैं नहीं वही कराता है तब उसके भीतर से
अहंकार मिट जाता है और जहां अहंकार नहीं
होता वहीं से शांति का जन्म होता है।
ज्ञान वही है जो बुद्धि को प्रकाश देता है
जो अंधकार से बाहर लाता है। इसलिए ज्ञान
अर्जित करते रहो और बांटते रहो क्योंकि जो
ज्ञान बांटता है, वह ईश्वर के सबसे निकट
होता है। कर्म करो पर फल की इच्छा मत रखो
क्योंकि जो फल के लिए कर्म करता है, वह
अपने कर्म में बांध जाता है। मेरा तेरा
अपना पराया सारे भ्रम मिटा दो। फिर देखना
तुम्हें हर दिशा में ईश्वर ही नजर आएगा।
गीता में श्री कृष्ण कहते हैं जीवन में
सबसे बड़ा उपहार धन नहीं स्वास्थ्य है।
सबसे बड़ी संपत्ति सोना नहीं संतोष है। और
सबसे सच्चा संबंध खून का नहीं वफादारी का
होता है। जिसे छल की आदत है उसका अंत
हमेशा पश्चाताप में होता है। क्योंकि छल
एक रण है जो लौटता जरूर है। कभी किसी और
के हाथों कभी अपने ही कर्मों से। जीवन को
सच्चाई से जीना सीखो। आज नहीं तो कल झूठ
का पर्दा गिर ही जाता है। सच्चा सुख,
सच्चा सुकून उसी को मिलता है जो भीतर से
सच्चा होता है। क्योंकि जब मन शांत होता
है तभी जीवन सुगंधित बनता है। उपवास केवल
अन्न का नहीं होना चाहिए बल्कि लालच का,
घृणा का, चुगली का, क्रोध का उन गंदे
विचारों का जो आत्मा को भीतर से मैला कर
देते हैं। जिस दिन तुम अपने मन से इन सब
का उपवास रख लोगे उस दिन तुम्हें किसी
तीर्थ की जरूरत नहीं पड़ेगी। यदि तुम्हारा
संकल्प पवित्र है और पराक्रम सच्चे कर्म
में लगा है तो भाग्य भी तुम्हारे कदम
चूमेगा।
भाग्य का इंतजार मत करो। कर्मों का तूफान
खड़ा करो। दरवाजे अपने आप खुल जाएंगे।
क्रोध की अवस्था में मन अंधा हो जाता है।
अंधे मन में भ्रम जन्म लेता है और भ्रम
बुद्धि को नष्ट कर देता है। जब बुद्धि
नष्ट होती है तो मनुष्य अपने ही पतन का
कारण बन जाता है। जैसे पानी अपनी मर्यादा
छोड़कर बाढ़ बनता है वैसे ही वाणी अपनी
मर्यादा छोड़ दे तो सर्वनाश निश्चित है।
इसलिए बोलो तो सोचकर, चलो तो संभलकर और
भरोसा करो तो समझकर। क्योंकि इस कलयुग में
ना मौसम पर भरोसा है, ना इंसानों पर दोनों
किसी भी पल बदल सकते हैं। श्री कृष्ण कहते
हैं कभी-कभी सबसे मीठे बोल वही कहते हैं
जिनके दिल में सबसे गहरी जलन होती है।
बाहर वाले तो तुम्हारी सफलता से खुश होते
हैं। पर जो अपने कहलाते हैं वही सबसे
ज्यादा जलते हैं। कभी गौर किया है? जब तुम
गिरते हो तो सब सहानुभूति जताते हैं और जब
उठते हो तो वही चेहरे उदास हो जाते हैं।
कई बार दुनिया तुम्हारी तारीफ करेगी पर घर
के भीतर तुम्हारी कीमत कोई नहीं समझेगा
क्योंकि जो तुम्हारे सबसे करीब हैं वही
तुम्हें सबसे दूर देखना चाहते हैं।
दुर्योधन भी तो यही करता था। पांडवों की
हर सफलता उसकी जलन बन जाती थी। वह हर संभव
कोशिश करता था उन्हें नीचे गिराने की,
उन्हें दुखी करने की और वही जलन, वही
ईर्ष्या महाभारत के युद्ध की जड़ बन गई।
एक ऐसा युद्ध जिसने हजारों जिंदगियां निगल
ली। रिश्ते जब दिखावे में जीने लगते हैं
तो विनाश निश्चित होता है। जो तुम्हारे
सामने मिठास दिखाते हैं वे पीठ पीछे अक्सर
विष उगलते हैं। इसलिए हर अपने को परखो हर
मुस्कान के पीछे का सच पहचानो। हर वह हाथ
जो तुम्हें थामे वह हमेशा तुम्हारा हो ऐसा
जरूरी नहीं। समय से बड़ा कोई गुरु नहीं।
जो उसका सम्मान नहीं करता वह जीवन के अर्थ
से अनजान रह जाता है। समय ही असली पूंजी
है। इसे निरर्थक कार्यों में खो दोगे तो
जीवन की सबसे बड़ी हानि करोगे। जो समय को
साध लेता है, वह जीवन को दिशा देता है। जो
उसे व्यर्थ करता है, वह खुद अपनी मंजिल खो
देता है। समय एक नदी की तरह है। वह एक ही
बार बहती है। जो बह गया वह लौट कर नहीं
आता। इसलिए उसे थामो नहीं। उसके साथ बहो
क्योंकि उसी में जीवन की असली यात्रा छिपी
है। तुम किसी का सहारा बनो या किसी का
आसरा मांगो। इस दुनिया में सब कुछ बदल
जाता है। लोग कहते हैं हम हमेशा साथ
रहेंगे। लेकिन समय का पहला झोंका ही
सच्चाई खोल देता है। जब जीवन के अंधेरे
मोड़ पर तुम अकेले खड़े होते हो तब समझ
आता है कि अपनेपन के सारे वादे कितने
खोखले थे। जो लोग मुस्कान के वक्त सबसे
आगे खड़े थे। वही दुख के वक्त तुम्हें
पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। जोरों
पर ताकत आजमाना। कमीने लोगों की निशानी
होती है। मुसीबत में साथ देने वाले को,
मुसीबत में साथ छोड़ने वाले को और मुसीबत
में डालने वाले को कभी मत भूलना।
अपने चेहरे पर सदा एक प्यारी सी मुस्कान
रखिए ताकि जो भी व्यक्ति आपको देखे वह भी
खुश हो जाए। जब आपको हराने के लिए लोग
परिश्रम और प्रयास करने के बजाय पीठ पीछे
साजिश करें तो समझ लीजिए आपकी मेहनत सफल
हुई है। इस दुनिया में लोगों के सबसे बड़े
दुख का कारण यही है कि वे सोचते हैं दिमाग
उनके पास ज्यादा है और धन दूसरों के पास
ज्यादा है। जिंदगी में जीत और हार हमारी
सोच बनाती है। जो मान लेता है वह हार जाता
है और जो ठान लेता है वह जीत जाता है।
जिंदगी में भरोसा सब पर करें लेकिन कभी भी
किसी के भरोसे ना रहे। गजब की एकता दिखाते
हैं लोग। जिंदा इंसान को गिराने में और
मरे हुए को उठाने में। नियत और परिणाम।
इंसान घाटा और मुनाफा देखकर सिद्धांतों का
ढोंग करता है। चाय में मक्खी गिरे तो चाय
फेंकता है। घी में गिरे तो मक्खी फेंकता
है। सही फैसले लेना अनुभव से आता है। और
अनुभव गलत फैसले लेने से आता है। जिंदगी
का नियम सीधा बोले, सच बोले और मुंह पर
बोले। जो अपने होंगे वह समझ जाएंगे और जो
नाम के होंगे वह दूर हो जाएंगे। इंसान
ख्वाहिशों से बंधा हुआ एक जिद्दी परिंदा
है। यह उम्मीदों से ही घायल है और
उम्मीदों पर ही जिंदा है। एक तरफ नफरत है
जिसे पल भर में महसूस कर लिया जाता है और
एक तरफ प्रेम है जिसका यकीन दिलाने में
पूरी जिंदगी निकल जाती है। एक समय था जब
मंत्र काम करते थे। उसके बाद वक्त आया जब
तंत्र काम करने लगे। फिर समय आया जिसमें
यंत्र काम करने लगे। लेकिन आज के समय में
सिर्फ षड्यंत्र काम करते हैं।
इंसान की फितरत
किसी के साथ हम वक्त को भूल जाते हैं और
कोई वक्त के साथ हमें भूल जाता है और यही
जिंदगी है। इंसान दौलत कमाने के लिए सेहत
खो देता है और सेहत को वापस पाने के लिए
दौलत खो देता है। जीता ऐसे है जैसे कभी
मरेगा ही नहीं। और मर ऐसे जाता है जैसे
कभी जिया ही नहीं। आपके पास जो कुछ भी है
उसमें खुश रहना सीखिए। क्योंकि कितने ही
लोग उतनी ही उम्मीद पर जिंदा हैं जितना आप
पाकर भी शर्मिंदा हैं। इंसान बहुत लालची
होता है। वह अपने बच्चों को सब कुछ देना
चाहता है और अपने मां-बाप का सब कुछ लेना
चाहता है।
जिंदगी भी कितना ई अजीब है। आराम छोड़ना
पड़ता है आराम पाने के लिए। जीवन का एक ही
नियम है जो भाग्य में है वह भाग कर आएगा
और जो भाग्य में नहीं है वह आकर भी भाग
जाएगा। दुआ कभी साथ नहीं छोड़ती और बद्दुआ
कभी पीछा नहीं छोड़ती। आप जो देंगे वही
लौट कर आता है। फिर चाहे वह इज्जत हो या
धोखा। सोच और नजरिए का फर्क ही तो है। खुश
होना है तो तारीफ सुनिए और बेहतर होना है
तो निंदा क्योंकि लोग आपसे नहीं आपकी
स्थिति से हाथ मिलाते हैं। कोयल अपनी भाषा
बोलती है इसलिए आजाद रहती है। लेकिन तोता
हमेशा दूसरों की भाषा बोलता है। इसीलिए वह
जीवन भर पिंजरे में रहता है। फर्क सिर्फ
सोच का होता है। सीढ़ियां वही रहती हैं।
बस किसी के लिए ऊपर जाती हैं। तो किसी के
लिए नीचे सही हमेशा सही रहेगा। भले ही हर
कोई उसके खिलाफ हो और गलत हमेशा गलत
रहेगा। भले ही हर कोई उसके साथ हो। जो लोग
मन में उतरते हैं उन्हें संभाल कर रखिए और
जो लोग मन से उतरते हैं उनसे संभल कर
रहिए। सत्य की इच्छा होती है कि सभी उसे
जान लें और असत्य को हमेशा भय रहता है कि
कोई उसे पहचान ना ले। जुबान और शब्द सबके
पास होते हैं। पर जो अपने लिए जीते हैं,
वे कह देते हैं और जो अपनों के लिए जीते
हैं, वे सह लेते हैं। यह बात याद रखना
दुनिया की नजरों में अच्छा बनने से अच्छा
है कि आप अपनी नजर में सच्चे बने रहो
क्योंकि दुनिया की नजरें हर पल बदलती हैं।
लेकिन आत्मा की नजर सदा स्थिर रहती है।
आंखों से जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं
होता। कितनी बार ऐसा होता है कि किसी की
मुस्कान के पीछे पीड़ा होती है। किसी के
शब्दों के पीछे छल होता है। इसलिए हर बात
पर तुरंत विश्वास मत करो। अनुभव को अपना
मार्गदर्शक बनाओ ना कि दिखावे को। सच्चाई
कभी जल्दी दिखाई नहीं देती। लेकिन जब
सामने आती है तो सब भ्रम मिटा देती है। और
जब भी जीवन में कठिनाई आए हिम्मत मत हारो।
मुश्किल वक्त का एक ही मंत्र है। यह भी
गुजर जाएगा क्योंकि जीवन में हर तूफान के
बाद सवेरा आता है। जब लगता है कि अब सब
खत्म हो गया है। वहीं से एक नई शुरुआत
होती है। एक राजा ने अपने गुरु से यही
पूछा था। अगर कभी जीवन में सबसे बुरा वक्त
आ जाए तो मैं क्या करूं? गुरु ने उसे एक
ताबीज दिया और कहा जब लगे कि अब कुछ अच्छा
नहीं हो सकता तब इसे खोलना। वक्त बदला
राजपाट छिन गया दुख का पहाड़ टूट पड़ा
राजा ने ताबीज खोला उसमें लिखा था यह समय
भी गुजर जाएगा वह वाक्य ही उसकी शक्ति बन
गया उसने अपनी हार को अंत नहीं एक परीक्षा
समझा और वही राजा जिसने सब कुछ खो दिया था
कुछ समय बाद सब कुछ वापस पा गया यही जीवन
का सबसे गहरा सत्य है कोई भी स्थिति स्थाई
नहीं होती ना खुशी सदा रहती है ना दुख ना
सफलता स्थाई है ना असफलता इसलिए जब जीवन
कठिन हो तो टूटना मत क्योंकि हर कठिनाई
तुम्हें किसी नई मंजिल के लिए तैयार कर
रही होती है। पुराने समय की बात है। एक
राजा था शासन सम्मान वैभव सब कुछ उसके पास
था। परंतु एक दिन उसकी जिंदगी में ऐसा
समाचार आया जिसने उसकी नींद छीन ली।
गुप्तचरों ने बताया कि पड़ोसी राज्य केवल
तीन दिनों के भीतर उस पर आक्रमण करने वाला
है। वह राज्य इतना विशाल और शक्तिशाली था
कि उसका सामना करना लगभग असंभव लग रहा था।
राजा का चेहरा पीला पड़ गया। मन भय से भर
गया और उसने तत्काल सभा बुलाई। सभा में
सभी मौन थे। भय ऐसा था कि शब्द भी कांपने
लगे थे। तभी उसके एक बुद्धिमान मंत्री ने
कहा महाराज जब मृत्यु निश्चित है तो
कायरता से क्यों मरे? जब अंत तय है तो सिर
झुकाकर क्यों जिए? चलिए इससे पहले कि वे
हम पर हमला करें। हम स्वयं उन पर आक्रमण
करें। विजय की संभावना कम है। परंतु
प्रयास ना करने से बेहतर है संघर्ष करना।
राजा हतप्रबद्ध था। उसने पूछा हमारी सेना
छोटी है। हम उनका सामना कैसे कर पाएंगे?
मंत्री मुस्कुराया और बोला महाराज वे
तैयार नहीं है। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति
है। जो डर के बिना कदम बढ़ाता है वही
इतिहास लिखता है। राजा ने निर्णय ले लिया।
सेना को आदेश दिया गया। नागरिकों ने भी
हथियार उठा लिए। अब केवल एक ही लक्ष्य था
जीत या मृत्यु यात्रा शुरू हुई और जैसे ही
वे सीमा के पुल पर पहुंचे राजा ने कहा इस
पुल को जला दो। सेना अचंभित रह गई। किसी
ने पूछा महाराज अगर हम हार गए तो वापस
कैसे लौटेंगे?
राजा ने दृढ़ स्वर में कहा हमारे पास अब
कोई रास्ता नहीं है सिवाय आगे बढ़ने के।
पीछे लौटना मृत्यु है और आगे बढ़ना जी्हा
जीवन। जब इंसान के पास वापसी का कोई मार्ग
नहीं बचता तभी वह अपनी असली ताकत पहचानता
है। सेना ने पूरी शक्ति से युद्ध किया।
शरीर थक गए पर आत्मा नहीं टूटी। परिणाम
वही हुआ जो असंभव लगता था। छोटी सी सेना
ने विशाल राज्य को हरा दिया। क्योंकि जब
पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं होता तब आगे
बढ़ने का हर कदम जीत बन जाता है। जब तुम
दृढ़ निश्चय से किसी कार्य को करते हो तो
सारा ब्रह्मांड तुम्हारी सहायता के लिए
तत्पर हो जाता है। दृढ़ संकल्प वही जादू
है जो असंभव को संभव बनाता है। जीवन में
अगर कभी परिस्थितियां तुम्हारे खिलाफ हो
तो घबराना मत। क्योंकि कठिनाई का अर्थ यह
नहीं कि तुम्हारा अंत आ गया है। इसका अर्थ
यह है कि तुम्हें अपनी अगली ऊंचाई पर
पहुंचना है। हर संघर्ष के पीछे कोई नई
शुरुआत छिपी होती है। हर हार के पीछे कोई
नई जीत की तैयारी होती है। और जब भगवान
कहते हैं कि हर मनुष्य में तीन गुण होते
हैं सतत्व, रज और तम तो उसका अर्थ यही है
कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है। हर
इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती
हैं। लेकिन फर्क बस इतना है कि तुम किसे
मजबूत करते हो अपनी अच्छाई को या अपनी
बुराई को। श्री कृष्ण कहते हैं अगर तुम
चाहो तो सबसे दुष्ट व्यक्ति में भी कोई ना
कोई भलाई देख सकते हो। और अगर चाहो तो
सबसे पवित्र आत्मा में भी कोई कमी ढूंढ
सकते हो। यह दृष्टिकोण का खेल है। जैसा
तुम सोचते हो, वैसा ही तुम्हारा संसार बन
जाता है। इसलिए अगर तुम्हें लगता है कि
तुम में कुछ कमियां हैं, तो जान लो कि वही
तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं।
क्योंकि जो व्यक्ति अपनी कमजोरियों को
स्वीकार करता है, वही सच में बदल सकता है।
जो अपनी गलतियों से भागता है, वह वहीं रुक
जाता है। लेकिन जो अपने दोषों को देखता
है, उन्हें सुधारता है, वह निरंतर
ऊंचाइयां छूता है। दुनिया की बातों की
चिंता मत करो। लोग तुम्हारे बारे में जो
सोचेंगे, वह उनके विचार हैं। तुम्हारी
हकीकत नहीं। दुनिया हमेशा वही देखती है जो
उसे दिखता है। पर ईश्वर वही देखता है जो
तुम्हारे भीतर चल रहा है। इसलिए अपने भीतर
की आग को बुझने मत दो। अगर लोग तुम्हारी
आलोचना करें, तुम्हारी कमियां गिनाएं तो
मुस्कुरा दो। क्योंकि लोग केवल उन्हीं को
गिराने की कोशिश करते हैं जो उनसे ऊंचे
होते हैं। जो चीजें तुम्हारे नियंत्रण में
हैं। बस उन पर ध्यान दो। बाकी को ईश्वर पर
छोड़ दो। अपने कर्मों को सुधारो। अपने
विचारों को ऊंचा रखो और फिर देखो कैसे
जीवन खुद तुम्हारे सामने झुकता चला जाएगा।
जब इंसान भीतर से शांत होता है, तभी वह
सच्ची खुशी को महसूस कर पाता है। बाहर से
मुस्कुराना आसान है, लेकिन भीतर की
मुस्कान वही समझ सकता है जिसने अपने मन को
जीत लिया हो। लोग दिखावे की खुशियों में
उलझ जाते हैं। बड़ी गाड़िया है। हां।
आलीशान मकान, नाम, शोहरत पर। अंदर का
खालीपन उन्हें चैन से जीने नहीं देता।
असली अमीरी वही है जहां मन संतुष्ट हो।
आत्मा प्रसन्न हो और भीतर एक गहरा सुकून
महसूस हो। क्योंकि जिसने अपने मन पर
नियंत्रण पा लिया उसने पूरी दुनिया को जीत
लिया। हम जीवन भर बाहरी चीजों के पीछे
भागते हैं। यह मिलेगा तो खुश रहूंगा। वह
मिलेगा तो सुकून मिलेगा। लेकिन सच्चाई यह
है कि यह सब अस्थाई है। जैसे ही हमें कुछ
मिलता है, मन तुरंत अगली चीज की ओर भागता
है। इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जब तक
इच्छाएं खत्म नहीं होंगी, तब तक शांति भी
नहीं मिलेगी। इसलिए जो व्यक्ति अपनी
इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेता है वही सच्ची
प्रसन्नता का स्वाद चखता है। जो सुख और
दुख दोनों में समान रहता है वही भीतर से
मजबूत बनता है। क्योंकि जो इंसान
परिस्थितियों के साथ नहीं डगमगाता वही
जीवन के असली अर्थ को समझ पाता है। बाहरी
चीजें बदलती रहती हैं। आज पास हैं कल नहीं
होंगी। पर जो भीतर की स्थिरता पा लेता है
उसका सुख कोई नहीं छीन सकता। तान लोग
तुम्हारे बारे में सोचते रहेंगे। यही उनका
काम है। पर तुम अपने जीवन को इतना
अर्थपूर्ण बना दो कि उनके शब्द भी
तुम्हारी कहानी सुनाने लगे। क्योंकि सबसे
बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग? और सबसे बड़ी
आजादी अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मित्रता
यह शब्द जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा
अर्थ अपने भीतर समेटे हुए है। क्योंकि हर
कोई जो मुस्कुराकर पास आता है, वह अपना
नहीं होता और जो खामोश रहकर भी साथ देता
है, वही असली मित्र कहलाता है। जीवन में
सच्ची मित्रता वही है जहां दिलों के बीच
कोई स्वार्थ नहीं होता। कोई दिखावा नहीं
होता। बस एक विश्वास होता है कि चाहे
परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों ना हो यह
इंसान मेरे साथ खड़ा रहेगा। महाभारत में
ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां दोस्ती ने
युद्ध की दिशा बदल दी। कभी कर्ण जैसा
मित्र जिसने दुर्योधन का साथ आखिरी सांस
तक निभाया और कभी श्री कृष्ण जैसे मित्र
जिन्होंने पांडवों को अंधेरे में भी
प्रकाश दिखाया। दोनों ने अपना वचन निभाया।
एक ने सांसों तक निष्ठा दिखाई। दूसरे ने
धर्म के लिए सत्य का साथ दिया। मगर फर्क
बस इतना था कि एक ने अपनी मित्रता को
अहंकार की नींव पर रखा और दूसरे ने अपनी
मित्रता को सत्य और धर्म की शक्ति पर।
इसलिए मित्र चुनना आसान है पर मित्रता
निभाना कठिन है। हर कोई आपकी हंसी में साथ
देगा। पर वही सच्चा मित्र है जो आपके आंसू
में आपका हाथ थामेगा। कुछ लोग मित्रता के
नाम पर फायदा उठाते हैं। कुछ सिर्फ अपने
मतलब तक रहते हैं। लेकिन जो व्यक्ति बिना
किसी उम्मीद के आपके साथ खड़ा रहता है,
वही परमात्मा का भेजा हुआ साथी होता है।
सच्चा मित्र वह होता है जो आपकी
अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान करें और
आपकी असफलता में भी आपके भीतर की ताकत
देखे। जीवन में ऐसे लोगों से दूरी बनाए
रखना ही समझदारी है जो आपके विश्वास के
बदले चाल चलते हैं जो मुस्कान के पीछे
स्वार्थ छिपाते हैं क्योंकि झूठी मित्रता
इंसान को भीतर से तोड़ देती है और सच्ची
मित्रता उसे हर तूफान में मजबूत बना देती
है। मित्र वो नहीं जो हर वक्त पास रहे।
मित्र वह है जो वक्त से भी ज्यादा
भरोसेमंद निकले। और फिर आती है बात संतुलन
की क्योंकि जीवन का हर रिश्ता हर भावना हर
निर्णय तभी सुंदर लगता है जब उसमें संतुलन
हो। किसी चीज की भी अति विनाश की जड़ है।
अति प्रेम भी दुख देता है। अति घृणा भी मन
को कड़वाहट से भर देती है। के है इ बोलना
रिश्तों को तोड़ देता है। अति चुप रहना
दिलों को तोड़ देता है। हर चीज में मधुरता
तभी है जब उसमें सीमा हो। बहुत मीठा झर बन
जाता है। बहुत कड़वा दिल को जला देता है।
बहुत आराम शरीर को जकड़ देता है। बहुत
मेहनत थका देती है। बहुत उम्मीदें निराशा
देती हैं। और बहुत त्याग कभी-कभी आत्मा को
खाली कर देता है। इसीलिए संतुलन ही जीवन
का सबसे बड़ा ज्ञान है। संतुलन ही वह कला
है जो आपको ना गिरने देती है ना बहकने
देती है। पापा आप संतुलन खो देते हैं तभी
जीवन डगमगाने लगता है और जब भीतर का
संतुलन जाग जाता है तब सुखदख दोनों एक
समान लगने लगते हैं। इसीलिए ना तो किसी से
इतना प्यार करो कि खुद को खोदो और ना किसी
से इतनी नफरत कि खुद के भीतर की शांति मर
जाए। क्योंकि इंसान तब तक अधूरा है जब तक
वह खुद के भीतर का संतुलन नहीं पा लेता।
मित्रता में भी, प्रेम में भी, कर्म में
भी, संतुलन ही परम नियम है। जो इसे समझ
गया वह जीवन में कभी नहीं टूटता और जो इसे
भूल गया उसके पास सब
कुछ होते हुए भीतर खालीपन रह जाता है।
गीता में श्री कृष्ण कहते हैं वही शक्ति
है जो हर इंसान के भाग्य की दिशा तय करती
है। क्योंकि जो बोओगे वही काटोगे। कर्म का
नियम इतना सटीक है कि वह ना समय देखता है
ना परिस्थिति बस अवसर देखकर लौट आता है और
जो भी फल देना हो दे जाता है। इंसान यह
सोचकर बुराई कर बैठता है कि उसे कोई देख
नहीं रहा। पर वह भूल जाता है कि ऊपर वाला
सब देख रहा है। उसकी अदालत में ना गवाहों
की जरूरत होती है ना सबूतों की। वहां
सिर्फ कर्मों की गूंज सुनाई देती है और
उसका न्याय देर से सही पर जरूर होता है।
जिसने अपने माता-पिता की सेवा की होती है,
जिसने अपने बुजुर्गों का आदर किया होता
है, उसके जीवन में एक अदृश्य आशीर्वाद साथ
चलता है। वह चाहे संघर्ष में हो या
समृद्धि में नेक अद्भुत सुरक्षा उसे घेरे
रहती है। पर भी जिसने अपने ही मां-बाप को
दुख दिया, जिन्होंने उनके आशीर्वाद को
ठुकराया, उसके घर में सुख टिकता नहीं।
उसके जीवन में चैन ठहरता नहीं। क्योंकि
कर्म की किताब में सब कुछ लिखा जाता है हर
अच्छा काम, हर बुरा व्यवहार।
एक समय की बात है। एक गरीब आदमी किनारे
बैठा अपनी रोजी के लिए मछलियां पकड़ रहा
था। सूरज की धूप में तपते हुए भी उसके
चेहरे पर सुकून था क्योंकि वह मेहनत ईमान
से कर रहा था। उधर पास ही एक अमीर सेठ
बैठा था। उसके पास सोना था, धन था पर
धैर्य नहीं था। जब उसने उस गरीब के हाथ
में एक ताजा मछली देखी तो उसके मन में
लालच जाग उठा। उसने मछली छीन ली। अपनी
ताकत दिखाई और गरीब को नीचा दिखाकर चला
गया। पर वह नहीं जानता था कि उसने सिर्फ
एक मछली नहीं छीनी। उसने किसी मेहनतकश की
मेहनत छीन ली थी और प्रकृति ऐसे कर्मों को
कभी माफ नहीं करती।
मछली ने उसके अंगूठे को काटा और उसी क्षण
उसका पतन शुरू हुआ। एक छोटा सा घाव उसके
जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गया। घाव सड़ता
गया और हर बार डॉक्टर का यही फैसला अब यह
काटना पड़ेगा। उसके कर्मों की गूंज जैसे
तैसे लौट रही थी। पहले अंगूठा गया फिर
कलाई फिर पूरा हाथ। आखिर में उसे समझ आया
कि यह बीमारी नहीं यह उसके कर्मों का
परिणाम है। कितना विचित्र है ना। इंसान
सोचता है कि बुराई का कोई असर नहीं होगा।
वह दूसरों को दर्द देकर भूल जाता है। पर
वही दर्द एक दिन उसे ढूंढता हुआ लौट आता
है और तब कोई भी उसे बचा नहीं पाता।
कर्मों की सजा से ना राजा बचता है ना रंक।
कर्म वही है जो जीवन के हर पड़ाव पर हमारी
परछाई की की। तरह साथ चलता है। जब उस सेठ
ने अपने सारे हाथ गमवा दिए। तब उसे एहसास
हुआ कि धन से बढ़कर कुछ और भी है न्याय।
वह दौड़कर उस गरीब आदमी के पैरों में सिर
झुका कर रो पड़ा। बोला, "मुझे माफ कर दे।
तूने मेरे साथ क्या किया? गरीब
मुस्कुराया। हाथ जोड़कर बोला, "मैं किया।"
बस ऊपर वाले से कहा, "हा थाहे प्रभु, इसने
मुझे अपनी ताकत दिखाई है।" अब तू अपनी
ताकत दिखा। और फिर वह एक ऐसा सबक बन गया
जो हर इंसान को याद रखना चाहिए। कर्म चाहे
छोटा हो या बड़ा उसका हिसाब तय है। वह
हमें वैसे ही ढूंढ लेता है जैसे बछड़ा
सैकड़ों गायों में अपनी मां को ढूंढ लेता
है। हम चाहे जहां भाग जाए जो भी बन जाए
अपने कर्मों के परिणाम से कभी नहीं बच
सकते। कभी सोचा है शब्द कितने हल्के लगते
हैं ना। लेकिन जब यही शब्द किसी के दिल को
चीर देते हैं तो मन के भीतर ऐसी चोट लगती
है जो दिखाई नहीं देती बस महसूस होती है।
जीवन कोई खेल नहीं जहां धोखे से जीतने
वाला हमेशा जीतता रहे।
यहां हर चाल, हर झूठ, हर स्वार्थ का हिसाब
बड़े सटीक तरीके से लिया जाता है। जो
ज्ञानी होते हैं, वे ना जीवन के लिए शोक
करते हैं और ना मृत्यु के लिए। वे जानते
हैं कि जन्म और मृत्यु केवल शरीर के स्तर
पर हैं। आत्मा तो सदा अजर अमर है। इसलिए
जो अपने कर्तव्यों को निष्ठा और ईमानदारी
से निभाता है वही सच्चा तपस्वी है। धर्म
का पालन करना सत्य पर टिके रहना और अपने
कर्म में पूर्णता लाना यही मनुष्य का सबसे
बड़ा धर्म है। गीता में श्री कृष्ण कहते
हैं जब भी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो कि
तुम्हारे पास कोई नहीं तब याद रखना तुम इस
दुनिया में अकेले आए थे और अकेले ही
जाओगे। यह जीवन एक यात्रा है जिसमें साथ
देने वाले बहुत मिलेंगे पर अंत तक साथ कोई
नहीं जाएगा। मां-बाप तक जो तुम्हें जन्म
देते हैं, एक दिन तुम्हें छोड़कर चले जाते
हैं। तो फिर दूसरों से क्या उम्मीद करना?
यदि कोई तुम्हारा साथ छोड़ दे तो याद रखना
वह ईश्वर सदा तुम्हारे साथ है। वह कभी
तुम्हें नहीं छोड़ता क्योंकि वह तुम्हारे
भीतर ही है। श्री कृष्ण ने कहा था चाहे
कोई मुझ पर विश्वास करे या ना करे मैं
उसका साथ कभी नहीं छोड़ता क्योंकि यह सब
मेरी ही संताने हैं। मनुष्य ईश्वर का ही
अंश है। और जब तुम अपने भीतर उस ईश्वर को
महसूस करने लगो तब अकेलापन मिट जाता है।
तब समझ आता है कि असली संगत बाहर नहीं
भीतर है। अकेलापन तब तक लगता है जब तक
इंसान खुद को दूसरों से जोड़ता है। जैसे
ही वह खुद से जुड़ जाता है, वह पूर्ण हो
जाता है। कभी डरना नहीं, कभी खुद को छोटा
मत समझना। डरना हो तो सिर्फ गलत इंसान के
साथ रहने से डरना चाहिए। क्योंकि गलत साथ
वह जहर है जो धीरे-धीरे आत्मा को खोखला कर
देता है। अकेले रहना बेहतर है बजाय उन
लोगों के साथ रहने के जो तुम्हारी शांति
छीन लें। कहावत है समथिंग इज बेटर देन
नथिंग। लेकिन उससे भी सच्ची बात है। नथिंग
इज बेटर दन नॉनसेंस। मतलब यह है कि अगर
संगत बेकार हो तो अकेले रहना ही बेहतर है
क्योंकि अकेलापन तुम्हें खुद से मिलवाता
है। तुम्हें मजबूत बनाता है। तुम्हें
ईश्वर के करीब लाता है। कभी भी अपने धन,
अपने पद या अपनी शक्ति का अभिमान नहीं
करना चाहिए। अभिमान वह विष है जो
धीरे-धीरे आत्मा को जला देता है। मनुष्य
की दृष्टि को अंधा कर देता है और अंततः
उसे उसी मिट्टी में मिला देता है जिससे वह
बना है। दुर्योधन भी इसी घमंड में डूबा
हुआ था। उसे लगता था कि उसके पास भीष्म
पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान
योद्धा हैं तो पांडवों को वह क्षण भर में
मिटा देगा। लेकिन अहंकार कभी भी किसी का
नहीं होता। वह जिस हृदय में प्रवेश करता
है, पहले उसे भीतर से खोखला कर देता है।
दुर्योधन के पास सब कुछ, था धन, बल, पद,
सत्ता लेकिन विनम्रता नहीं थी और यही उसकी
सबसे बड़ी हार थी। जो व्यक्ति अपने
सामर्थ्य का उपयोग दूसरों को नीचा दिखाने
में करता है, वह धीरे-धीरे अपना ही पतन
बुला लेता है। क्योंकि ईश्वर हर घमंडी को
वही दिखाता है, जो उसने कभी सोचा भी नहीं
होता।
जीवन में चाहे जितनी भी सफलता मिल जाए,
जितनी भी ऊंचाई छू लो, लेकिन उस ऊंचाई का
अहंकार मत पा लो। क्योंकि जो ऊंचाई अहंकार
से मिली है, वह एक दिन उसी अभिमान के बोझ
से गिर जाती है। कितने लोग हैं इस संसार
में जो अपने पैसे या पद के घमंड में
दूसरों को तुच्छ समझते हैं। दूसरों के
आत्मसम्मान को रौंद देते हैं। लेकिन समय
जब पलटता है ना तो वही लोग जिन्हें कभी
झुका दिया गया था, सिर उठाकर खड़े हो जाते
हैं और वही घमंडी लोग सिर झुका देते हैं।
यही जीवन का संतुलन है। यहां किसी का
अहंकार स्थाई नहीं होता। आज के युग में
सच्चाई यह भी है कि अगर आप बहुत ज्यादा
अच्छे बन जाओ तो दुनिया आपको कमजोर समझ
लेती है। पांडवों ने धर्म का पालन किया।
सत्य का साथ दिया लेकिन बदले में उन्हें
अपमान, वनवास और संघर्ष मिला। उनका राजपाट
छीन गया। उनकी पत्नी का अपमान हुआ क्योंकि
उन्होंने अच्छाई को अपनी कमजोरी बना लिया
था। दुनिया अब वैसी नहीं रही जैसी पहले
थी। अब अच्छाई को परखा नहीं जाता।
इस्तेमाल किया जाता है। अगर आप बहुत
ज्यादा लोगों के लिए अच्छा करते हैं तो
वही लोग आपके सबसे पहले विरोधी बनते हैं।
जितना आप किसी के लिए झुकते हैं, उतना ही
वह आपको गिराने की कोशिश करता है। यही आज
की सच्चाई है। अच्छा बनो, लेकिन भोला मत
बनो। अपनी आत्मा में सच्चे रहो, लेकिन
दूसरों के छल को पहचानना भी सीखो। दुनिया
में जो दुख हम समझते हैं वे केवल अस्थाई
स्थितियां हैं। कोई व्यापार में घाटा खा
ले तो वह सोचता है कि उसका जीवन खत्म हो
गया। कोई प्रेम में असफल हो जाए तो उसे
लगता है कि अब जीने का कोई अर्थ नहीं। कोई
अपनों को खो दे तो उसे लगता है कि सब कुछ
खत्म हो गया। लेकिन श्री कृष्ण कहते हैं
हे मनुष्य तेरा जीवन केवल इन घटनाओं का
नाम नहीं है। तू इन सब परिस्थितियों से
ऊपर है क्योंकि तू आत्मा है और आत्मा को
कोई हानि नहीं पहुंचा सकता। यह शरीर तो
नश्वर है। यह टूटेगा बीमार होगा। एक दिन
मिट्टी में मिल जाएगा। लेकिन जो आत्मा है
वह अनादि है। अविनाशी है। वह कभी नहीं
मरती। जब तक हम खुद को केवल इस शरीर तक
सीमित मानते रहेंगे तब तक हम हर छोटी बड़ी
घटना में दुखी होते रहेंगे। लेकिन जैसे ही
हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हम आत्मा हैं
और भगवान के अंश हैं, तब कोई भी बाहरी दुख
हमें भीतर से तोड़ नहीं सकता। कृष्ण यह भी
कहते हैं असली दुख तब शुरू होता है जब तू
अपना ध्यान बाहर की चीजों पर रखता है और
भीतर की आवाज को अनसुना करता है। जब तू
लोगों की राय को अपने जीवन का आधार बना
लेता है। जब तू उनके शब्दों से अपना सुखदख
तय करने लगता है, तब तू अपने आप से दूर हो
जाता है। लोग क्या कहेंगे? यह डर इंसान को
धीरे-धीरे खा जाता है। यह डर भी ईश्वर से
दूरी का ही एक रूप है। क्योंकि जिसने
कृष्ण को अपनाया, वह कभी लोगों के शब्दों
से नहीं डगमगाता। जीवन के असली दुख का एक
और कारण है। अपेक्षाएं। जब हम उम्मीदें
लगाते हैं तो हम अपने सुख का नियंत्रण
दूसरों के हाथ में दे देते हैं। और जब वे
उम्मीदें टूटती हैं तो हम टूट जाते हैं।
लेकिन अगर हम अपनी उम्मीद केवल श्री कृष्ण
पर रखें तो यह दुख कभी जन्म ही नहीं लेगा।
क्योंकि कृष्ण कभी अपनी वचन भंग नहीं
करते। वे कहते हैं हे भक्त मैं कभी
तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा। बस तुम मुझे
याद रखना। मैं हर स्थिति में तुम्हें थामे
रखूंगा। दुख का एक और गहरा रूप है।
अकेलापन। यह ऐसा दर्द है जो बाहर से दिखाई
नहीं देता। लेकिन भीतर से आत्मा को चीर
देता है। लोग भीड़ में रहते हुए भी अकेले
महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने उस साथी
को भुला दिया है जो जन्म जन्मांतर से उनके
साथ है। श्री कृष्ण। अगर कोई यह समझ ले कि
वह चाहे जहां भी हो, चाहे जैसे भी हालात
हो, कृष्ण हमेशा उसके साथ हैं, तो अकेलापन
कभी महसूस नहीं होगा। जितना हम माया में
फंसते जाते हैं, उतना हम कृष्ण से दूर
होते जाते हैं और यही दूरी हमें असली दुख
देती है। इसलिए संत और महापुरुष हमेशा
कहते हैं नाम जपो, भजन करो, कथा सुनो
क्योंकि इन सब में मन को वह शांति मिलती
है जो दुनिया की कोई चीज नहीं दे सकती।
मनुष्य के जीवन में जो चीज सबसे अधिक चोट
पहुंचाती है, वह है अपने होने का कारण भूल
जाना। हम इस धरती पर केवल खाने, सोने,
कमाने और नाम कमाने के लिए नहीं आए हैं।
श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं, हे
अर्जुन तू कर्म कर लेकिन फल की आसक्ति मत
रख। असली दुख तब होता है जब हम कर्म तो
करते हैं लेकिन उसे भगवान को अर्पित नहीं
करते और परिणाम से अपने सुखदख को बांध
लेते हैं। जब परिणाम हमारे अनुसार नहीं
आता तो हम टूट जाते हैं। लेकिन सोचो अगर
हर परिणाम को हम ईश्वर की इच्छा मान ले तो
टूटने का सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि तब
हम समझेंगे कि जो हुआ वह भगवान की योजना
के अनुसार हुआ और उनकी योजना हमेशा हमारे
भले के लिए होती है। जीवन का असली दुख यह
भी है कि मनुष्य अपनी तुलना दूसरों से
करता है। किसी के पास अधिक धन है तो
ईर्ष्या होती है। किसी की शादी पहले हो गई
तो हीन भावना होती है। कोई और अधिक सफल है
तो हम खुद को कमतर समझने लगते हैं। लेकिन
कृष्ण कहते हैं हे मनुष्य मैंने तुझे
अद्वितीय बनाया है। तेरी राह अलग है। तेरे
कर्म अलग है और तेरा समय अलग है। जब तू
तुलना करता है तब तू मेरे बनाए हुए अपने
स्वरूप का अपमान करता है। यह भी एक कारण
है कि लोग अंदर से दुखी रहते हैं। वे
वर्तमान में जीना भूल गए हैं। वे या तो
अतीत के पछतावे में रहते हैं या भविष्य की
चिंता में। लेकिन कृष्ण ने गीता में कहा
तू वर्तमान क्षण में कर्म कर जो बीत गया
वह मेरे हाथ में है और जो आने वाला है वह
भी मेरे हाथ में है। जो व्यक्ति इस सत्य
को समझ लेता है उसका असली दुख समाप्त हो
जाता है। हम में से बहुत लोग सोचते हैं कि
दुख का कारण हमारे चारों ओर की
परिस्थितियां हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि
दुख का कारण हमारा दृष्टिकोण है। एक ही
परिस्थिति में कोई व्यक्ति टूट जाता है और
कोई व्यक्ति उसी परिस्थिति में और मजबूत
हो जाता है। फर्क केवल इस बात का है कि
उसकी नजर में क्या बड़ा है? समस्या या
भगवान। अगर भगवान बड़े हैं तो समस्या छोटी
लगने लगती है। श्री कृष्ण ने पांडवों को
यह बार-बार महसूस कराया। जब वे वनवास में
थे, जब उनके पास राज्य नहीं था, जब उनका
अपमान हुआ, तब भी वे टूटे नहीं क्योंकि
उनके पास कृष्ण थे। लेकिन जब दुर्योधन के
पास राज्य, शक्ति और धन सब था, तब भी वह
अंदर से बेचैन था क्योंकि उसके पास कृष्ण
नहीं थे। यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि असली
सुख भगवान के साथ है और असली दुख भगवान से
दूरी है। मनुष्य का मन हमेशा बाहरी सहारे
ढूंढता है। वह सोचता है अगर यह व्यक्ति
मेरे साथ है तो मैं सुरक्षित हूं। अगर यह
नौकरी है तो मैं निश्चिंत हूं। अगर यह
संपत्ति है तो मैं खुश हूं। लेकिन यह सभी
सहारे अस्थाई हैं। एक दिन व्यक्ति चला
जाएगा। नौकरी खत्म हो जाएगी। संपत्ति छीन
सकती है। लेकिन जो सहारा कभी नहीं टूटता,
वह है श्री कृष्ण का नाम, उनकी शरण। जो इस
सहारे को पकड़ लेता है, वह जीवन के असली
दुख से मुक्त हो जाता है। कभी-कभी ईश्वर
स्वयं हमारे जीवन से कुछ चीजें छीन लेते
हैं ताकि हम उनसे अधिक जुड़ सके। हमें
लगता है कि भगवान ने हमारे साथ अन्याय
किया लेकिन असल में यह उनका प्रेम है। वे
जानते हैं कि अगर हम इस माया में उलझे
रहेंगे तो हम उनसे दूर हो जाएंगे और यही
तो असली दुख है। हम अक्सर उन लोगों के लिए
खुद को बदलते हैं जिन्हें हमें वैसे ही
स्वीकार करना चाहिए था जैसे हम हैं। और
फिर एक दिन समझ आता है कि जो सच्चा होता
है वह बदलने को नहीं कहता। वह अपनाने को
कहता है। कभी-कभी हम खुद से भी माफी नहीं
मांग पाते क्योंकि सबसे गहरा धोखा हम
दूसरों से नहीं अपनी उम्मीदों से खाते हैं
जो बार-बार हमें उन लोगों के करीब ले जाती
हैं जो हमें नहीं समझते। जब तुम्हारी
मौजूदगी किसी को बोझ लगे और फिर भी तुम
उसे जबरदस्ती अपना बनाना चाहो तो यकीन
मानो वह प्रेम नहीं होता। वह आत्म संवेदना
की आखिरी डूबती सांस होती है। हम कई बार
इसलिए हार नहीं मानते क्योंकि हमें उम्मीद
होती है। हम इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि
हम टूटने से डरते हैं। क्योंकि किसी को
खुद से जुदा होते देखना खुद को खोने जैसा
लगता है। जो लोग यह कहकर दूर हो जाते हैं
कि तुम बदल गए हो वे अक्सर वही होते हैं
जो खुद इतने बदल जाते हैं कि तुम्हारी
स्थिरता उन्हें जंग लगने जैसी लगने लगती
है। कभी तुम किसी के लिए सब कुछ छोड़ देते
हो और फिर वही इंसान तुम्हें यूं छोड़
देता है जैसे तुम्हारे होने का कभी कोई
मतलब ही नहीं था। जब हम खुद की चुप्पियों
में डूबने लगते हैं तो बाहर का शोर सुनाई
देना बंद हो जाता है और उसी शांति में
हमें अपनी सबसे सच्ची आवाज मिलती है। कुछ
दर्द ऐसे होते हैं जो हम जिंदगी भर नहीं
भूलते। ना इसलिए कि वे बड़े थे बल्कि
इसलिए कि हमने उन्हें बिना किसी को बताए
सहा था। कभी-कभी हमें खुद को समझाना पड़ता
है कि जिसे हम सबसे ज्यादा चाहते हैं, वही
हमारे लिए ठीक नहीं है और यह बात मानना
सबसे मुश्किल होता है। हम तब टूटते हैं जब
हम अपनी पूरी नजाकत किसी के हवाले कर देते
हैं और वह उसे कांच समझकर नहीं पत्थर
समझकर तोड़ देते हैं। कभी कोई तुम्हें यह
कहे कि तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन तो उस
लेखन को गंभीरता से लेना। क्योंकि वहां से
ही उनका जाना तय हो चुका होता है। जब हर
दिन तुम्हें यह एहसास दिलाने लगे कि
तुम्हारी अहमियत बस एक सुविधा के तौर पर
है, तो समझ लो वहां तुम्हारा दिल नहीं।
सिर्फ तुम्हारा वक्त मांगा जा रहा है। कभी
तुम्हारा खामोश रहना भी चीख से ज्यादा
तकलीफ देता है और तब कोई पास ना हो तो
अकेलापन सबसे सच्चा साथी बन जाता है। कुछ
लोग हमारी जिंदगी में इसलिए आते हैं ताकि
हमें यह सिखा सकें कि हम खुद को कितना भूल
गए हैं और जब वे चले जाते हैं तब हम खुद
की तलाश शुरू करते हैं। हमने कई बार अपनों
को जाते देखा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने
उन्हें कभी रोकने की जिद नहीं की। हमें
लगा कि जो अपना होता है वह खुद रुकता है।
कभी किसी से इतनी उम्मीद मत करना कि वह
तुम्हारे टूटे हुए हिस्सों को जोड़ दे।
क्योंकि कई बार लोग उन्हीं हिस्सों को
देखकर डर जाते हैं और चले जाते हैं। जो
रिश्ते केवल तुम्हारी पहल पर टिके हैं,
वहां एक दिन थकावट आ ही जाती है। और तब
चुपचाप दूर हो जाना आत्मसम्मान की सबसे
सुंदर अभिव्यक्ति होती
UNLOCK MORE
Sign up free to access premium features
INTERACTIVE VIEWER
Watch the video with synced subtitles, adjustable overlay, and full playback control.
AI SUMMARY
Get an instant AI-generated summary of the video content, key points, and takeaways.
TRANSLATE
Translate the transcript to 100+ languages with one click. Download in any format.
MIND MAP
Visualize the transcript as an interactive mind map. Understand structure at a glance.
CHAT WITH TRANSCRIPT
Ask questions about the video content. Get answers powered by AI directly from the transcript.
GET MORE FROM YOUR TRANSCRIPTS
Sign up for free and unlock interactive viewer, AI summaries, translations, mind maps, and more. No credit card required.