Complete Indian Polity Like Never Before! AI Animation Crash Course for SSC CGL, SSC CHSL, UPSC 2026
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एडवांस्ड इंडियन माइंड लेकर आया है
जो खासतौर पर आप जैसे स्टूडेंट्स के लिए
है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर
रहे हैं। मतलब अगर आप एसएससी, रेलवे,
यूपीएससी या पुलिस जैसे एग्जाम्स का सोच
रहे हैं तो यह आपके लिए ही है। और हां,
इसकी विश्वसनीयता की चिंता बिल्कुल मत
कीजिएगा क्योंकि इसका सारा [संगीत] कंटेंट
वजीरामैन रवि, दृष्टि आईएएस और एम
लक्ष्मीकांत की किताब जैसे टॉप सोर्सेस को
मिलाकर बनाया गया है। दूसरी बात यह सीरीज
भारतीय राजनीति का पूरा [संगीत] का पूरा
सिलेबस कवर करती है और सीखने को आसान
बनाने के लिए पूरे सब्जेक्ट को [संगीत] 27
मुख्य टॉपिक्स में बांट दिया गया है और
आखिर में आपको एक अंदाजा देने के लिए बता
दूं कि इसमें आपको सब कुछ मिलेगा। संविधान
कैसे बना? हमारे मौलिक अधिकार क्या हैं?
और नागरिकता जैसे बेसिक कांसेप्ट से लेकर
सरकार की पूरी बनावट [संगीत]
जैसे राष्ट्रपति, संसद यानी लोकसभा,
राज्यसभा और सुप्रीम कोर्ट कैसे काम करते
हैं। यहां तक कि चुनाव आयोग और यूपीएससी
जैसे जरूरी संस्थानों के बारे में भी बात
करेंगे। तो संक्षेप में यह सीरीज
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भारतीय
राजनीति के हर जरूरी पहलू को समझने का एक
सेंट्रलाइज्ड और भरोसेमंद जरिया है।
एक हजारे जैसा है। [हंसी]
हां। और हमारा मकसद सिर्फ इस सिलेबस को
पढ़ना नहीं है बल्कि इसके पीछे जो लॉजिक
है उसे समझना है।
सही कहा। और इसे समझना सिर्फ परीक्षा के
लिए नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक होने
के लिए भी बहुत जरूरी।
इस ऑपरेटिंग सिस्टम की बुनियाद से शुरू
करते हैं भारत का संविधान।
तो आज हम भारतीय राज व्यवस्था से जुड़े एक
दस्तावेज पर एक गहरी नजर डालने वाले हैं।
जी।
विषय है भारत के संविधान का निर्माण।
अब जब हम संविधान कहते हैं तो अक्सर दिमाग
में एक एक भारीभरकम कानून की किताब की
तस्वीर आती है।
बिल्कुल बिल्कुल।
लेकिन ये सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज तो है
नहीं। यह एक नए राष्ट्र की उम्मीदों, उसके
सपनों और कह सकते हैं कि उसकी आत्मा का
प्रतिबिंब है।
बिल्कुल सही कहा आपने। किसी भी देश का
संविधान सिर्फ नियमों का संग्रह नहीं
होता।
ये उस देश की राजनीतिक [संगीत] और सामाजिक
सोच का आईना होता है। हमारे श्रोत इसे
सर्वोच्च महान ग्रंथ कहते हैं।
अच्छा।
जो सिर्फ शासन चलाने का तरीका नहीं बताता
बल्कि यह भी तय करता है कि देश किस दिशा
में मतलब किन मूल्यों पर आगे बढ़ेगा। तो
इसका मकसद एक खास तरह की राजनीतिक
संस्कृति को जन्म देना था।
जी हां, एक ऐसी संस्कृति जो लोकतंत्र,
न्याय और बराबरी पर आधारित हो।
और ये जरूरत महसूस क्यों हुई? मेरा मतलब
है कई देशों में तो अलिखित संविधान भी
होते हैं। भारत को एक इतने बड़े लिखित
संविधान की क्या जरूरत आन पड़ी?
देखिए यहां पर भारत का जो संदर्भ है उसे
समझना जरूरी है।
हम
सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद जब देश
आजाद हो रहा था तो वो सिर्फ एक राजनीतिक
आजादी नहीं थी। सही बात है।
वो एक सामाजिक और आर्थिक बदलाव की भी
शुरुआत थी। सदियों पुरानी रूढ़ियां,
जमींदारी प्रथा, [संगीत] छुआछूत जैसी मतलब
इतनी सारी समस्याओं से जूझते हुए एक
आधुनिक राष्ट्र बनाना था।
और इसके लिए सिर्फ वादे काफी नहीं थे।
बिल्कुल नहीं। इसके लिए ठोस [संगीत] लिखित
गारंटी की जरूरत थी। एक ऐसा दस्तावेज जो
हर नागरिक को भरोसा दिलाए कि नए भारत में
उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
यानी ये सिर्फ सरकार बनाने का मैनुअल नहीं
बल्कि समाज बदलने का एक रोड मैप था। ठीक
और इस विशाल काम को करने के लिए [संगीत]
एक संविधान सभा यानी कॉन्स्टिटुएंट
असेंबली बनाई गई।
जी जिसकी नीव जुलाई 1946 में कैबिनेट मिशन
की सिफारिशों पर रखी गई।
कि भारतीय ही अपने देश का भविष्य तय करने
जा रहे थे।
और यह सभा आप कह सकती हैं कि उस वक्त के
हिंदुस्तान का एक छोटा रूप थी। इसमें कुल
389 सदस्य तय किए गए थे।
389
हां, यह संख्या ही बताती है कि यह काम
कितने बड़े पैमाने पर होने वाला था। कोशिश
यह थी कि देश के हर कोने हर समुदाय की
आवाज को इसमें जगह मिले।
389 सदस्य यह तो आज की संसद के सदस्यों से
भी ज्यादा हैं। लेकिन ये आए कहां से थे?
क्या इन्हें मतलब जनता ने सीधे चुना था?
नहीं। उस वक्त सीधे चुनाव कराना संभव नहीं
था। इसलिए एक मिलाजुला मॉडल अपनाया गया।
अच्छा वो कैसे?
ज्यादातर सदस्य करीब 292 वो ब्रिटिश भारत
के प्रांतों की विधानसभाओं से चुने गए थे।
ठीक है।
93 सीटें देसी रियासतों के लिए रखी गई थी।
जिनके प्रतिनिधि राजा महाराजाओं द्वारा
मनोनीत किए जाने थे और चार सदस्य दिल्ली
अजमेर मारवाड़ जैसे चीफ कमिश्नर क्षेत्रों
से थे।
दिलचस्प बात यह है कि यह सीटें मनमाने ढंग
से नहीं बांटी गई। इसका आधार जनसंख्या थी।
जी मोटे तौर पर हर 10 लाख लोगों पर एक
[संगीत] प्रतिनिधि।
ये उस दौर में एक कमाल का लोकतांत्रिक
सिद्धांत था।
हां और सिर्फ इतना ही नहीं ये भी ध्यान
रखा गया कि मुख्य समुदायों को सही
प्रतिनिधित्व मिले। मतलब
मतलब सीटों को [संगीत] मुस्लिम, सिख और
सामान्य जिसमें बाकी सब आते थे इन
श्रेणियों में भी बांटा गया था। यह उस समय
की राजनीतिक हकीकत को स्वीकार करने जैसा
[संगीत] था ताकि किसी को यह ना लगे कि
उनकी अनदेखी हो रही है।
तो अब यह सभा बन चुकी है जिसमें पूरे देश
से लोग आ गए हैं। काम शुरू होता है। 9
दिसंबर 1946 को पहली बैठक हुई।
जी।
उस दिन दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल का
माहौल कैसा रहा होगा?
माहौल में उत्साह [संगीत] तो था लेकिन एक
एक बड़ी चिंता भी थी। मुस्लिम लीग ने इस
पहली बैठक का बहिष्कार कर दिया था।
ओहो
वो एक अलग संविधान सभा और पाकिस्तान की
मांग पर अड़े थे। तो शुरुआत ही एक तरह के
अधूरेपन [संगीत] के सास के साथ हुई। उस
दिन सभा में सिर्फ 211 सदस्य ही मौजूद थे।
[संगीत]
यानी एकता की कोशिशों पर बंटवारे का साया
पहले दिन से ही मंडरा रहा था। तो इस पहली
कुछ हद तक अधूरी बैठक की अध्यक्षता किसने
की? एक परंपरा होती है कि [संगीत] जब तक
कोई स्थाई अध्यक्ष नहीं चुना जाता तब तक
सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य को अस्थाई
अध्यक्ष बनाया जाता है।
अच्छा
उस हिसाब से डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा को
यह सम्मान मिला लेकिन ये एक काम चलाऊ
व्यवस्था थी।
हम
दो दिन बाद ही 11 दिसंबर को सभा ने अपना
स्थाई अध्यक्ष चुन लिया। डॉ. राजेंद्र
प्रसाद।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का चुनाव एक अहम मोड़
रहा होगा।
बिल्कुल। उन्हें एक ऐसी सभा को संभालना था
जिसमें सैकड़ों अलग-अलग विचार और हित टकरा
रहे थे। उनकी शांत और सबको साथ लेकर चलने
वाली छवि ने इसमें जरूर मदद की होगी।
निश्चित रूप से वो एक सर्वमान्य नेता थे
जिनका सम्मान हर पक्ष करता था। सभा को एक
स्थिर नेतृत्व मिल गया था। लेकिन अब बड़ा
सवाल यह था कि ठीक है हम संविधान बनाने
बैठे हैं। पर इस संविधान का दर्शन क्या
होगा? इसकी आत्मा क्या होगी? और यहीं पर
पंडित जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य
प्रस्ताव यानी ऑब्जेक्टिव रेजोल्यूशन की
भूमिका आती है।
जी हां, [संगीत] 13 दिसंबर 1946 को
उन्होंने इसे सभा के सामने रखा।
यह महज एक प्रस्ताव नहीं था। यह एक तरह से
भावी संविधान का घोषणापत्र था।
आपने बिल्कुल सही शब्द इस्तेमाल किया
घोषणापत्र। इस प्रस्ताव ने ही वह दिशा तय
की जिस पर संविधान को चलना था।
क्या था इस प्रस्ताव में?
इसमें कहा गया कि भारत एक संपूर्ण [संगीत]
प्रभुत्व संपन्न गणराज्य होगा। यह अपने
सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और
राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करेगा। विचार,
अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की
स्वतंत्रता देगा। अल्पसंख्यकों, [संगीत]
पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों के हितों की
रक्षा करेगा।
यानी यह वो वादे थे जिन्हें बाद में
संविधान की प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों
में ढाला गया।
बिल्कुल। यह वो ध्रुव तारा था जिसे देखकर
संविधान निर्माण का जहाज आगे बढ़ा। तो अब
हमारे पास एक दर्शन है, एक दिशा है। लेकिन
इन ऊंचे-ऊंचे आदर्शों को कानून की भाषा
में कैसे बदला जाए? यह तो बहुत ही पेचीदा
काम होगा।
और इसी पेचीदा काम को करने के लिए अलग-अलग
समितियां बनाई गई।
अच्छा, कमिटीज़
जी।
कोई समिति मौलिक अधिकारों पर काम कर रही
थी, तो कोई केंद्र और राज्यों के बीच
शक्तियों के बंटवारे पर। सरदार पटेल
प्रांतीय संविधान और मौलिक अधिकारों की
समिति देख रहे थे तो नेहरू संघ की
शक्तियों से जुड़ी समिति के [संगीत]
अध्यक्ष थे। काम को छोटे-छोटे हिस्सों में
बांट दिया गया था।
और इन सब में सबसे मशहूर और सबसे
महत्वपूर्ण समिति थी प्रारूप [संगीत]
समिति यानी ड्राफ्टिंग कमेटी।
हां, जिसकी अध्यक्षता कर रहे थे डॉ.
भीमराव अंबेडकर।
जी हां, इस समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को
हुआ यानी आजादी के ठीक बाद। इसका काम था
बाकी सभी समितियों की सिफारिशों को मिलाकर
[संगीत] संविधान का पहला मसौदा मतलब
ड्राफ्ट तैयार करना।
यह एक बेहद मुश्किल और बारीक काम था।
बहुत ज्यादा डॉ. अंबेडकर और उनकी सात
सदस्यों की टीम ने दुनिया भर के संविधानों
का अध्ययन किया और भारत की जरूरतों के
हिसाब से एक ढांचा [संगीत] तैयार किया।
यह जानना दिलचस्प है कि इस समिति में
सिर्फ कानूनी दिग्गज थे। डॉक्टर अंबेडकर,
के एम मुंशी, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
जी यह सब अपने समय के चोटी के वकील और
विद्वान थे।
शायद इसीलिए हमारा संविधान इतना विस्तृत
और सटीक है।
इसका एक असर यह हुआ कि संविधान की भाषा
बहुत कानूनी और स्पष्ट बनी। हर चीज को
परिभाषित करने की कोशिश की गई ताकि भविष्य
में कोई भ्रम ना रहे।
लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कुछ
लोगों को यह बहुत जटिल लगता है। पर उस
वक्त की जरूरत यही थी कि हर अधिकार और हर
कर्तव्य को साफ-साफ लिख दिया जाए। इसी
असाधारण योगदान की वजह से डॉक्टर अंबेडकर
को भारतीय संविधान का जनक कहा जाता है।
तो एक तरफ यह संविधान बनाने का बौद्धिक
काम चल रहा था जो सालों तक चलना था। लेकिन
देश तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो चुका था।
हां। देश को चलाने के लिए एक सरकार भी तो
चाहिए थी। यह दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ
कैसे चलें?
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है।
संविधान सभा सिर्फ संविधान नहीं बना रही
थी।
अच्छा।
वो देश की पहली संसद के तौर पर भी काम कर
रही थी।
और
और इसी में से देश की पहली अंतरिम सरकार
बनी थी जिसके मुखिया [संगीत]
जवाहरलाल नेहरू थे।
प्रधानमंत्री के बराबर की भूमिका में?
हां। उन्हें कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष
कहा जाता था। और उनके मंत्रिमंडल में उस
दौर के सभी बड़े चेहरे शामिल थे। सरदार
वल्लभ भाई पटेल गृह मंत्री थे।
जिनके कंधों पर 500 से ज्यादा रियासतों को
भारत में मिलाने की भारी जिम्मेदारी थी।
बलदेव सिंह रक्षा मंत्री थे। डॉ. राजेंद्र
प्रसाद खाद्य और कृषि मंत्री।
और यह मंत्रिमंडल सिर्फ कांग्रेस का नहीं
था। इसमें मुस्लिम लीग के सदस्य भी थे।
जैसे लियाकत अली खान वित्त मंत्री थे।
जोगेंद्रनाथ मंडल को विधिमंत्री बनाया गया
था। तो यह उस समय की मिलीजुली राजनीतिक
तस्वीर को दिखाता है।
जी हालांकि यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला
और बंटवारे के साथ खत्म हो गया। लेकिन यह
दिखाता है कि कोशिश सबको साथ लेकर चलने की
थी।
चलिए वापस संविधान की कहानी पर आते हैं।
प्रारूप [संगीत] समिति ने अपना मसौदा
तैयार कर लिया। फिर क्या हुआ? क्या उसे
सीधे लागू कर दिया गया?
नहीं नहीं। यहीं से तो असली लोकतांत्रिक
प्रक्रिया शुरू हुई।
कैसे?
उस मसौदे को जनता के सामने रखा गया।
अखबारों में छापा गया। आम [संगीत] लोगों,
विद्वानों, संस्थाओं से सुझाव मांगे गए।
हजारों संशोधन के प्रस्ताव आए।
हजारों
जी। उन पर संविधान सभा में महीनों तक बहस
चली। एक-एक शब्द एक-एक कॉमा पर
तर्क-वितर्क हुए।
जैसे किन मुद्दों पर?
अरे, हर मुद्दे पर चाहे वो राष्ट्रपति के
अधिकार हो या नागरिकों के कर्तव्य या फिर
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल हो।
हर चीज पर बहुत गहरी बहस [संगीत] हुई। यह
बहसें ही तो लोकतंत्र की जान है।
बिल्कुल।
आज भी जब हम संविधान सभा की बहसों को
पढ़ते हैं तो पता चलता है कि हमारे
संस्थापकों की सोच कितनी गहरी और दूरदर्शी
थी।
बिल्कुल। और इन सारी बहसों, संशोधनों और
तीन बार के विस्तृत रीडिंग के बाद आखिरकार
वो दिन आया 26 नवंबर 1949। [संगीत]
इस दिन संविधान का अंतिम प्रारूप स्वीकार
कर लिया गया।
जी। यह एक ऐतिहासिक पल था। उस दिन सभा में
मौजूद 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर
किए। हमारा संविधान बनकर तैयार हो गया था।
और इसी वजह से हम 26 नवंबर को हर साल
संविधान दिवस के रूप में मनाते हैं।
सही बात है।
लेकिन यहां एक सवाल उठता है।
अगर संविधान 26 नवंबर 1949 को तैयार हो
गया था, तो उसे पूरी तरह लागू करने के लिए
26 जनवरी 1950 तक यानी 2 महीने का इंतजार
क्यों किया गया? इसकी एक बहुत ही दिलचस्प
और भावनात्मक वजह है।
बताइए।
बात 1929 की है। जब लाहौर में कांग्रेस का
अधिवेशन हुआ था। वहां पंडित नेहरू की
अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव
पास हुआ। और तय किया गया कि 26 जनवरी 1930
को पूरे देश में पहला स्वतंत्रता दिवस
मनाया जाएगा।
ओहो तो ये तारीख आजादी के आंदोलन की यादों
से जुड़ी हुई थी।
जी। उस दिन के बाद से हर साल 26 जनवरी को
आजादी के दीवाने यह दिन मनाते थे, तिरंगा
फहराते थे। [संगीत]
अच्छा तो मतलब यह तारीख पहले से ही
महत्वपूर्ण थी।
बहुत ज्यादा।
जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो निर्माताओं
को लगा कि इस ऐतिहासिक तारीख को हमेशा के
लिए अमर कर देना चाहिए। इसीलिए उन्होंने
तय किया कि भले ही कुछ प्रावधान तुरंत
लागू हो जाए लेकिन संविधान को पूरी तरह से
26 जनवरी को ही लागू किया जाएगा। कमाल है।
इस तरह उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की
विरासत को गणतंत्र की नीव से जोड़ दिया।
हम
और 26 जनवरी 1950 को भारत एक संप्रभु
गणराज्य बन गया।
ये सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था।
ये इतिहास को सम्मान देने का एक तरीका था।
जी।
तो इस पूरे प्रक्रिया का अंतिम दिन कौन
[संगीत] सा था?
संविधान सभा की आखिरी बैठक 24 जनवरी 1950
को हुई।
अच्छा। लागू होने से दो दिन पहले
हां। यह एक तरह से विदाई समारोह जैसा था।
सदस्यों ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को
अपनाया और सबसे महत्वपूर्ण बात इसी दिन
संविधान सभा ने सर्वसम्मति से डॉ.
राजेंद्र प्रसाद को स्वतंत्र भारत का पहला
राष्ट्रपति चुना।
और 2 दिन बाद उन्होंने राष्ट्रपति पद की
शपथ ली।
बिल्कुल। तो कुल 2 साल, 11 महीने और 18
दिन। इस सफर में हमने देखा कि कैसे एक
बिखरे हुए गुलाम देश के प्रतिनिधियों ने
साथ बैठकर बहस करके असहमत होकर [संगीत] और
फिर सहमत होकर दुनिया का सबसे बड़ा लिखित
संविधान तैयार किया।
यह सिर्फ एक दस्तावेज बनाने की कहानी नहीं
है।
यह एक राष्ट्र [संगीत] के बनने की कहानी
है।
यह सफर वाकई असाधारण था। हमने देखा कि
कैसे अलग-अलग समितियां बनी। कैसे नेहरू के
आदर्शों को अंबेडकर की [संगीत] कानूनी
भाषा मिली और कैसे पटेल ने देश को एक
सूत्र में पिरोने का काम किया। हम
यह सब हमें एक जरूरी सवाल पर सोचने को
मजबूर करता है। किसी देश के बुनियादी
दस्तावेज को बनाने की प्रक्रिया जिसमें
इतनी बहसें, इतने समझौते और इतने अलग-अलग
वर्गों का प्रतिनिधित्व शामिल हो। हां, वो
प्रक्रिया दशकों बाद भी उस दस्तावेज की
ताकत और वैधता को कैसे जिंदा रखती है?
शायद जवाब इसी प्रक्रिया की समावेशी भावना
में छिपा है।
हम भारतीय संविधान पर एक गहरी चर्चा करने
वाले हैं। वो इसकी कुछ बहुत ही दिलचस्प
विशेषताओं को [संगीत] सामने रखते हैं। तो
आज हमारा मिशन सिर्फ यह जानना नहीं है कि
इसमें क्या लिखा है बल्कि यह समझना है कि
इसे ऐसा क्यों बनाया गया। मतलब वो क्या
चीज है जो इसे दुनिया के बाकी संविधानों
से इतना अलग इतना अनूठा बनाती है?
यह एक बहुत जरूरी सवाल है क्योंकि देखिए
संविधान सिर्फ नियमों की एक किताब तो है
नहीं। वो किसी भी देश के आदर्शों और उसकी
आत्मा का आईना होता है और भारतीय संविधान
की आत्मा को समझने के लिए हमें इसकी बनावट
की कुछ परतों को खोल कर देखना होगा। तो
चलिए शुरू करते हैं। इस दस्तावेज को पढ़ते
हुए जो पहली चीज दिमाग पर असर करती है वो
है इसका आकार। यह दुनिया का सबसे लंबा
लिखित संविधान है। मतलब इतना ज्यादा
विस्तृत क्यों बनाया गया इसे? कोई खास वजह
थी इसके पीछे?
बिल्कुल। इसकी लंबाई के पीछे एक तो भारत
की जो विशाल विविधता है वो एक बड़ा कारण
है।
और साथ ही हमारे संविधान निर्माताओं ने
दुनिया भर के कई संविधानों को बहुत गहराई
से परखा। जैसे ब्रिटेन से संसदीय प्रणाली
ली, अमेरिका से मौलिक अधिकार, आयरलैंड से
नीति निर्देशक सिद्धांत।
अच्छा तो बहुत जगहों से प्रेरणा ली गई।
हां, बहुत जगहों से उन्होंने हर जगह से
बेहतरीन चीजों को लेकर भारत के जरूरतों के
हिसाब से ढाला। हम्म।
इसीलिए कुछ लोग मजाक में इसे उधार का थैला
भी कहते हैं।
हां, [संगीत] बोरोड कॉन्स्टिट्यूशन ये
टर्म मैंने सुना है।
पर असल में यह दुनिया भर के सबसे अच्छे
विचारों का एक संगम है।
तो यह उधार लेना भी अपने आप में एक अनूठी
सोच को दिखाता है। मतलब यह किसी एक
विचारधारा से बंधा नहीं है। बल्कि एक
व्याहारिक दस्तावेज है। एक और पहलू जो
ध्यान खींचता है वो है इसका लचीलापन और
कठोरता का मिश्रण।
हां। यह थोड़ा विरोधाभासी सा लगता है और
यही संतुलन इसकी असली ताकत है। देखिए
संविधान के कुछ हिस्सों को बदलना संसद के
लिए आसान है। जैसे किसी राज्य का नाम
बदलना लेकिन जो इसकी मूल संरचना है
जैसे लोकतंत्र [संगीत] या पंथनिरपेक्षता।
बिल्कुल उस मूल संरचना को बदलना लगभग
नामुमकिन है और यही चीज इसे एक जीवित
दस्तावेज बनाती है जो समय के साथ बदल तो
सकता है लेकिन अपनी पहचान नहीं खोता। इसी
तरह का दोहरापन तो शासन प्रणाली में भी
है। है ना? संघात्मक भी और एकात्मक भी। यह
सुनने में थोड़ा जटिल लगता है। इसे आसान
भाषा में कैसे समझे?
इसे ऐसे समझिए कि सामान्य दिनों में राज्य
सरकारें अपने मामलों में स्वतंत्र रूप से
काम करती हैं। पुलिस, स्वास्थ्य ये सब। यह
हुआ संघात्मक ढांचा। लेकिन अगर देश में
कोई राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति आ जाए
तो [संगीत] सारी शक्तियां केंद्र सरकार के
हाथ में आ जाती हैं। तब वो एकात्मक रूप ले
लेता है। यह देश की सुरक्षा और एकता के
लिए एक बहुत जरूरी प्रावधान है।
अच्छा [संगीत] यह तो बनावट की बात हुई। पर
किसी भी संविधान की असली पहचान तो उसकी
आत्मा यानी उसकी प्रस्तावना से होती है।
इसकी शुरुआत ही हम भारत के लोग से होती
है। यह बहुत शक्तिशाली शब्द है। पर क्या
यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक बयान है या इसका
कोई कानूनी महत्व भी है?
पहले इसे सिर्फ एक परिचय ही माना जाता था।
लेकिन अब इसका बहुत गहरा कानूनी महत्व है।
यह शब्द यह स्थापित करते हैं कि सत्ता का
अंतिम स्रोत जनता है। किसी राजा या बाहरी
शक्ति ने हमें यह संविधान नहीं दिया। जैसा
कि प्रख्यात विशेषज्ञ एन ए पालकीवाला कहते
थे, प्रस्तावना संविधान का परिचय पत्र है।
यह बताती है कि [संगीत] संविधान का लक्ष्य
क्या है? न्याय, स्वतंत्रता, समानता। यहां
एक बात पढ़कर मुझे बहुत हैरानी हुई।
दस्तावेज में लिखा है कि समाजवादी और
पंथनिरपेक्ष यह शब्द शुरू से प्रस्तावना
में थे ही नहीं। इन्हें 1976 में जोड़ा
गया।
हां, यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। इन्हें
4 संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। उस समय के
राजनैतिक और सामाजिक माहौल में सरकार इन
मूल्यों पर और जोर देना चाहती थी। लेकिन
इससे भी ज्यादा जरूरी बात हुई थी 1973 में
केशवानंद भारती मामले में। उस केस में
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि
प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है
और संसद इसकी मूल संरचना को नहीं बदल
सकती। इस एक फैसले ने प्रस्तावना को सिर्फ
भूमिका से उठाकर संविधान की नींव बना
दिया। तो कुल मिलाकर संविधान हमें मौलिक
अधिकार देता है। एकल नागरिकता देता है और
वोट देने का सार्वभौमिक अधिकार देता है।
यह हर नागरिक को बराबर बनाता है। चाहे
उसकी जाति, धर्म या लिंग कुछ भी हो। और यह
सब जानने के बाद एक सवाल मन में आता है।
संविधान नागरिकों को इतने सारे अधिकार और
सुरक्षा देता है। पर इसके बदले में वह एक
नागरिक से सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की
क्या अपेक्षा रखता है?
तो एक सवाल जो अक्सर उठता है वो यह है कि
क्या भारतीय संविधान पूरी तरह से एक मौलिक
दस्तावेज है या फिर यह दुनिया भर के जो
सबसे बेहतरीन विचार थे उनका एक कह सकते
हैं एक संग्रह है।
आज हमारे पास जो नोट्स हैं वो इसी सवाल की
परतों को खोलते हैं और ऐसा लगता है कि
हमारे संविधान निर्माता कुछ एकदम नया
बनाने की कोशिश नहीं कर रहे थे।
नहीं बिल्कुल नहीं। बल्कि दुनिया भर के
संविधानों से [संगीत] सबसे अच्छे हिस्से
लेकर भारत के लिए एक मजबूत ढांचा बना रहे
थे।
बिल्कुल और देखिए इस ढांचे की जो नींव थी
मतलब इसका जो एक तरह से कंकाल था वो तो
पहले से ही मौजूद था 1935 के भारत शासन
अधिनियम में।
अच्छा
तो उनका काम था इस कंकाल पर एक शरीर और एक
आत्मा देना जिसके लिए उन्होंने वाकई पूरी
दुनिया की तरफ देखा। यह एक बहुत ही अहम
बात है। तो चलिए इसी ढांचे से शुरू करते
हैं। सबसे पहले सरकार की संरचना मतलब यह
जो हमारी संसदीय प्रणाली है इसका विचार
कहां से आया?
देखिए ये जो पूरी संसदीय व्यवस्था है,
कानून बनाने की प्रक्रिया और एकल
नागरिकता।
हां।
ये सारी मुख्य विशेषताएं ब्रिटेन से ली गई
हैं।
हम
यह हमारे शासन का बुनियादी ढांचा है एक
तरह से।
ये तो हुई सरकार की बात। लेकिन नागरिकों
के अधिकार वो भी तो बहुत ही ज्यादा
महत्वपूर्ण है।
बहुत ज्यादा और उसके लिए संविधान
निर्माताओं ने संयुक्त राज्य अमेरिका की
ओर देखा। हमारे जो मौलिक अधिकार हैं
फंडामेंटल राइट्स
हां फंडामेंटल राइट्स [संगीत] हमारी
प्रस्तावना का विचार और सबसे जरूरी
न्यायिक पुनरवलोकन। हम
मतलब जुडिशियल रिव्यू यह सब अमेरिका से
लिया गया है।
जुडिशियल रिव्यु मतलब न्यायपालिका के पास
यह शक्ति है कि वह संसद के बनाए कानूनों
की भी समीक्षा कर सकती है।
बिल्कुल अगर वो कानून संविधान के खिलाफ हो
तो ये व्यवस्था और अधिकारों के बीच एक
बहुत जरूरी संतुलन बनाता है।
सही है। और केंद्र राज्य संबंधों के बारे
में क्या? मतलब ये जो संघात्मक व्यवस्था
है, इसका आईडिया कहां से आया?
इसके लिए कनाडा की ओर देखा गया। एक ऐसा
फेडरल सिस्टम जहां केंद्र मजबूत हो।
अच्छा।
और केंद्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति का
जो प्रावधान है वो भी वहीं से प्रेरित है।
लेकिन राज्यों को भी तो कुछ शक्तियां दी
गई हैं।
हां बिल्कुल। और उसके लिए ऑस्ट्रेलिया से
समवर्ती सूची यानी कॉनकरेंट लिस्ट का
विचार लिया गया।
मतलब जिस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून
बना सकते हैं।
सही।
ये तो वाकई बहुत दिलचस्प होता जा [संगीत]
रहा है। पर संविधान सिर्फ कानूनों का
ढांचा तो नहीं होता। है ना? हम्म।
उसमें कुछ दार्शनिक आदर्श भी होते हैं।
आपने बिल्कुल सही पकड़ा। यही तो संविधान
की आत्मा है।
जैसे हमारी प्रस्तावना में स्वतंत्रता,
समता और बंधुता के विचार।
हां, यह आदर्श फ्रांस से लिए गए हैं।
फ्रांसीसी क्रांति से।
वाह। हम इसी तरह जो मौलिक कर्तव्य हैं और
न्याय का आदर्श है वो पूर्व सोवियत संघ से
प्रेरित है और राज्य के नीति निर्देशक
तत्व मतलब डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स
वो आयरलैंड से
वो आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं जो
सरकार के लिए एक गाइड की तरह काम करते
हैं।
तो यह सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं
बल्कि एक तरह का नैतिक रोड मैप भी है।
आखिर में आपातकाल या संविधान में बदलाव
जैसी प्रक्रियाओं के बारे में क्या मतलब
भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी?
हां उसकी भी तैयारी की गई। आपातकाल के जो
प्रावधान है वह जर्मनी के वाइमर संविधान
से प्रेरित हैं।
और संविधान में संशोधन की प्रक्रिया जो
शायद सबसे जरूरी है
वो दक्षिण अफ्रीका से ली गई है। यही चीज
हमारे संविधान को एक जीवंत दस्तावेज बनाती
है। पत्थर की लकीर नहीं।
तो इसका मतलब यह हुआ है कि जब कुछ लोग इसे
उधार का थैला कहते हैं
तो वो शायद पूरी तस्वीर नहीं देख रहे।
बिल्कुल सही। यह उधार लेना नहीं था। यह
दुनिया भर के अनुभवों से सीखना था और उन
विचारों को भारतीय परिस्थितियों के हिसाब
से ढालना था।
मतलब यह संविधान सभा के व्यावहारिक
दृष्टिकोण को दिखाता है।
हां बिल्कुल उन्होंने एक ऐसा ढांचा बनाने
की कोशिश की जो एक इतने विविध राष्ट्र के
लिए काम कर सके। एक मजबूत [संगीत] और
लचीला ढांचा और यह आज हमें एक बहुत ही
महत्वपूर्ण सवाल पर छोड़ जाता है। हम
यह देखते हुए कि जब से यह विचार [संगीत]
लिए गए थे तब से दुनिया और भारत कितना बदल
गया है। आज के समय में इनमें से कौन सी
विशेषता सबसे अधिक दबाव में है और कौन सी
सबसे मजबूत साबित हुई।
हमारे सामने जो स्रोत हैं, वह भारतीय
संविधान की उस चीज पर हैं जिसके बारे में
हम सब ने स्कूल में पढ़ा तो है लेकिन शायद
ही कभी इतनी गहराई से सोचा हो। मैं बात कर
रहा हूं अनुसूचियों की या जिन्हें हम
शेड्यूल्स कहते हैं।
हां, अक्सर लगता है कि ये संविधान के आखिर
में दी गई कोई बोरिंग सी लिस्ट होगी।
बिल्कुल। [संगीत] कुछ तकनीकी जानकारी जो
शायद बस वकीलों के काम की हो। को जब मैंने
खंगाला तो एक बात साफ हो गई। यह सिर्फ
लिस्ट नहीं है।
नहीं बिल्कुल नहीं।
यह तो हमारे देश का ऑपरेटिंग सिस्टम है।
बिल्कुल सही पकड़ा आपने। अगर संविधान को
भारत का हार्डवेयर माने तो अनुसूचियां वो
सॉफ्टवेयर और कोड है जो बताती है कि यह
देश असल में चलेगा कैसे?
मतलब शक्तियों का बंटवारा, अधिकारों की
सीमाएं, देश का नक्शा।
सब कुछ सब कुछ यहीं विस्तार से बताया गया
है। इन्हें अगर मुख्य संविधान में ही डाल
देते तो वो बहुत ही ज्यादा मतलब भारीभरकम
हो जाता। तो आज हमारा मिशन है भारतीय
संविधान के इस ऑपरेटिंग सिस्टम को डिकोड
करना। तो चलिए इसमें गहराई से उतरते हैं
और देखते हैं कि इन 12 अनुसूचियों में
क्या खास है।
चलिए शुरू करते हैं।
अच्छा तो पहली अनुसूची यह तो सुनने में
बहुत सीधी साधी लगती है।
हां, बस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों
की एक लिस्ट।
तो [संगीत] क्या इसका महत्व सिर्फ इतना ही
है या इसमें कोई और गहरी बात छुपी है?
आपका सवाल बहुत अच्छा है। देखिए यह सिर्फ
एक लिस्ट नहीं बल्कि भारत की अखंडता का एक
कानूनी दस्तावेज है।
अच्छा
सोचिए इसके बिना भारत की कोई कानूनी सीमा
ही नहीं होगी। जब भी कोई नया राज्य बनता
है जैसे तेलंगाना बना
हम
या हाल ही में जम्मू कश्मीर और लद्दाख को
केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। बिल्कुल
या फिर दमनदीव और दादरा नगर हवेली का विलय
हुआ तो सबसे पहला बदलाव इसी लिस्ट में
होता है।
यह एक जीती जागती बदलती हुई [संगीत] सूची
है जो भारत के राजनीतिक नक्शे को परिभाषित
करती है। समझ गए? तो ये देश का एक तरह से
आधिकारिक मैप है जो लगातार अपडेट होता
रहता है। चलिए अब दूसरी और तीसरी अनुसूची
पर आते हैं।
ये दोनों बड़े-बड़े सरकारी पदों पर बैठे
लोगों से जुड़ी हैं। [संगीत] एक में उनके
वेतन और भत्ते हैं और दूसरे में उनकी शपथ।
यह थोड़ा प्रशासनिक सा लगता है।
ऊपरी तौर पर तो लगता है लेकिन इसके पीछे
का सिद्धांत बहुत गहरा है। दूसरी अनुसूची
जो है वो राष्ट्रपति, राज्यपाल, जजों और
सीएजी जैसे पदों के वेतन तय करती है।
हां। और ऐसा करके वह उनकी वित्तीय
स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। इसका मतलब
यह है कि उनका वेतन किसी की मर्जी पर
निर्भर नहीं है ताकि वे बिना किसी डर या
पक्षपात [संगीत]
के अपना काम कर सकें।
मतलब एक तरह की आर्थिक इम्युनिटी।
बिल्कुल आप ऐसा कह सकती हैं।
लेकिन एक सवाल उठता है क्या कभी इस पर बहस
नहीं होती कि [संगीत] इन पदों पर वेतन और
भत्ते जरूरत से ज्यादा हैं? बहस तो होती
है और यह सब संसद द्वारा कानून बनाकर ही
तय किए जाते हैं। लेकिन मूल विचार यही है
कि इन पदों की गरिमा और स्वतंत्रता बनी
रहे।
अच्छा।
और इसी से जुड़ती है तीसरी अनुसूची यानी
शपथ। यह सिर्फ एक रस्म नहीं है। यह एक
सार्वजनिक प्रतिज्ञा [संगीत] है कि पद पर
बैठा व्यक्ति संविधान के प्रति वफादार
रहेगा।
एक वचन। हां, जब कोई मंत्री या जज शपथ
लेता है तो वह लाखों लोगों के सामने देश
के कानून को बनाए रखने का वचन दे रहा होता
है। ये दोनों अनुसूचियां मिलकर अधिकार और
कर्तव्य दोनों का संतुलन बनाती है।
अधिकार और कर्तव्य का संतुलन बहुत खूब। अब
चौथी अनुसूची जो राज्यसभा में सीटों के
बंटवारे से जुड़ी है।
हां।
लोकसभा में तो आबादी के हिसाब से सीटें तय
होती हैं। तो यहां अलग से व्यवस्था क्यों
की गई?
क्योंकि भारत एक संघ [संगीत] है। एक
यूनियन ऑफ स्टेट्स। चौथी अनुसूची हमारे
संघीय ढांचे की आत्मा है।
आत्मा
कैसे?
देखिए लोकसभा लोगों का प्रतिनिधित्व करती
है। है ना? लेकिन राज्यसभा राज्यों का
करती है।
यह सुनिश्चित करता है कि उत्तर प्रदेश
जैसे बड़े राज्य अपनी आबादी के दम पर छोटे
राज्यों जैसे सिक्किम या गोवा की आवाज को
दबा ना दें।
अच्छा तो सबको बराबर का मौका मिले।
बिल्कुल। हर राज्य को यहां प्रतिनिधित्व
मिलता है जिससे केंद्र सरकार की शक्तियों
पर एक अंकुश लगता है। यह असल में राज्यों
की परिषद है।
तो यह तो हो गई देश की बाहरी रूपरेखा। अब
आगे बढ़ते हैं। भारत की असली खूबसूरती तो
इसकी विविधता में है। संविधान बनाने वालों
ने यह कैसे सुनिश्चित किया कि कुछ विशेष
आदिवासी क्षेत्रों की अपनी अलग पहचान बनी
रहे।
बिल्कुल सही सवाल। और यहीं पर पांचवी और
छठी अनुसूचियां तस्वीर में आती हैं।
अच्छा। आप इन्हें हमारे संविधान के विशेष
सॉफ्टवेयर ड्राइवर्स की तरह समझ सकती हैं
जो भारत की अनूठी विविधता को संभालने के
लिए ही बनाए गए हैं।
पांचवी अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और
जनजातियों के प्रशासन की बात करती है।
इसका ठीक-ठीक मतलब क्या है?
इसका मतलब है कि देश के [संगीत] कई
हिस्सों में जहां आदिवासी आबादी ज्यादा
है, वहां सामान्य प्रशासनिक कानून पूरी
तरह से लागू नहीं होते।
क्यों नहीं होते? क्योंकि इन क्षेत्रों की
अपनी विशिष्ट संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था
और पारंपरिक कानून होते हैं। पांचवी
अनुसूची राज्यपाल को विशेष शक्तियां देती
है ताकि वो इन क्षेत्रों की सुरक्षा कर
सके।
मतलब वो संसदीय राज्य के कानून को रोक
सकते हैं।
रोक सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं
ताकि उन समुदायों का शोषण ना हो और उनका
विकास उनकी अपनी शर्तों पर हो। और छठी
अनुसूची तो और भी खास है। इसमें सिर्फ चार
राज्यों का जिक्र है। असम, मेघालय,
त्रिपुरा और मिजोरम।
हां।
इन चारों में ऐसा क्या अलग है?
यहां की जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक
संदर्भ और भी ज्यादा विशिष्ट है। इसलिए
यहां एक कदम और आगे जाकर स्वायत्त जिला
परिषदों यानी ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट
काउंसिल्स का गठन किया गया है।
स्वायत्त जिला परिषदें।
हां, यह परिषदें एक तरह की मिनी सरकारें
हैं।
मिनी सरकारें।
बिल्कुल। इन्हें अपनी जमीन, जंगल, स्थानीय
रीति-रिवाज, शादी, तलाक और संपत्ति जैसे
मामलों पर कानून बनाने का अधिकार है। यह
अपनी अदालतें भी चला सकती हैं।
वाह, यह तो सच में जबरदस्त है।
यह दिखाता है कि हमारा संविधान कितना
लचीला है।
अब आते हैं उस हिस्से पर जो शायद सबसे
ज्यादा चर्चित और विवादास्पद है। सातवीं
अनुसूची
हम शक्तियों का बंटवारा।
केंद्र और राज्यों के बीच। इसे देखकर तो
ऐसा लगता है जैसे घर के बंटवारे का कागज
हो। संघ सूची, राज्य सूची, [संगीत]
समवर्ती सूची यह सब इतना साफ-साफ क्यों
लिखना पड़ा?
क्योंकि संविधान बनाने वाले किसी भी तरह
के भ्रम या टकराव की गुंजाइश नहीं छोड़ना
चाहते थे। सातवीं अनुसूची सिर्फ विषयों का
बंटवारा नहीं है। यह भारत के संघीय ढांचे
की सबसे बड़ी बहस का मैदान है।
अच्छा। यहीं केंद्र और राज्यों के बीच
शक्ति का असली संतुलन तय होता है। संघ
सूची में करीब 100 विषय हैं। जैसे रक्षा,
विदेश मामले, मुद्रा, रेलवे, जनगणना।
हां, यह सब वो मामले हैं जिन पर पूरे देश
में एक ही कानून होना चाहिए। ऐसा तो नहीं
हो सकता कि पंजाब की अपनी सेना हो और केरल
की अपनी करेंसी।
बिल्कुल। फिर आती है राज्य सूची जिसमें
करीब 61 विषय हैं। पुलिस, जन स्वास्थ्य,
कृषि, स्थानीय शासन। यह वो विषय हैं जो
सीधे तौर पर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी
से जुड़े हैं।
हां और हर राज्य की जरूरतें इनमें अलग-अलग
होती हैं। मुंबई की पुलिसिंग की चुनौतियां
छत्तीसगढ़ के किसी गांव से बहुत अलग
होंगी।
लेकिन मैंने पढ़ा कि इसमें पहले 66 विषय
थे। अब 61 रह गए। ये पांच विषय कहां गए?
यहीं पर कहानी दिलचस्प होती है। 1976 में
4 सेकंड संशोधन के जरिए पांच विषय राज्य
सूची से निकालकर समवर्ती सूची में डाल दिए
गए। और कौन से विषय थे ये?
इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे शिक्षा, वन और
नापतौल। यह एक बहुत बड़ा बदलाव था जिसने
शक्ति के संतुलन को केंद्र की तरफ झुका
दिया।
और यही हमें तीसरी सूची पर लाता है यानी
समवर्ती सूची जहां केंद्र और राज्य दोनों
कानून बना सकते हैं।
हां, इसे आप एक साझा रसोई की तरह समझिए।
जहां केंद्र और राज्य दोनों अपनी-अपनी
रेसिपी से खाना बना सकते हैं।
साझा रसोई अच्छा उदाहरण [संगीत] है।
इसमें शिक्षा, बिजली, शादी, तलाक, मजदूर
यूनियन जैसे करीब 52 विषय हैं। लेकिन एक
पेंच है।
पेंच? वो क्या? अगर इस साझा रसोई में किसी
एक डिश को लेके दोनों में असहमति हो जाए
मतलब दोनों के कानून में टकराव हो तो
ज्यादातर मामलों में केंद्र की रेसिपी को
ही प्राथमिकता दी जाती है। [संगीत]
तो मतलब केंद्र का पलड़ा भारी रहता है।
चलिए अब आठवीं अनुसूची पर चलते हैं जो
भारत की भाषाओं से जुड़ी है।
हां, यह हमारे देश की सांस्कृतिक समृद्धि
का आईना है।
इसमें 22 मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं।
लेकिन मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि जब
संविधान बना था तब इसमें सिर्फ 14 भाषाएं
थी।
हां और यह दिखाता है कि भाषा सिर्फ संवाद
का माध्यम नहीं बल्कि पहचान का प्रतीक है।
समय के साथ कई भाषा आंदोलनों के बाद और
भाषाओं को इसमें जोड़ा गया।
कब कब हुआ यह?
1967 में सिंधी को जोड़ा गया। फिर 1992
में एक [संगीत] साथ तीन भाषाओं कंकणी,
मणिपुरी और नेपाली को शामिल किया गया।
और फिर 2003 में भी कुछ भाषाएं जुड़ी।
हां। 2003 में बोडो, डोगरी, मैथिली और
संथाली को जोड़ा गया।
लेकिन किसी भाषा के आठवीं अनुसूची में
होने से फर्क क्या पड़ता है?
बहुत फर्क पड़ता है। इसे एक तरह का वीआईपी
स्टेटस समझिए। इन भाषाओं को सरकारी
प्रोत्साहन मिलता है। साहित्य अकादमी
इन्हें मान्यता देती है और अखिल भारतीय
सेवाओं की परीक्षा इन भाषाओं में दी जा
सकती है।
अच्छा इसीलिए दूसरी भाषाएं भी इसमें शामिल
होना चाहती हैं।
बिल्कुल यही वजह है कि आज भी भोजपुरी,
राजस्थानी, तुडु जैसी कई भाषाओं को इसमें
शामिल करने की जोरदार मांग होती रहती है।
बहुत दिलचस्प। अब हम उन अनुसूचियों पर आते
हैं जो संविधान के सिस्टम अपडेट्स की तरह
[संगीत] हैं।
या पैचेस कह सकते हैं।
हां पैचेस। यह मूल संविधान में नहीं थी।
नौवीं अनुसूची तो पहले ही संशोधन 1951 में
आ गई थी। भूमि सुधार से जुड़ी हुई।
इसके पीछे का संदर्भ समझना बहुत जरूरी है।
आजादी के बाद सरकार जमींदारी खत्म करके
जमीन का समान बंटवारा करना चाहती थी। हम्।
लेकिन जमींदार लोग संपत्ति के मौलिक
अधिकार का हवाला देकर इन कानूनों को कोर्ट
में चुनौती दे रहे थे।
तो सरकार ने क्या किया?
जादुई बक्से में डाल दिया ताकि [संगीत]
अदालतें इनकी समीक्षा ना कर सकें।
एक कानूनी कवच की तरह। लेकिन हमारे
स्रोतों में एक तारीख का जिक्र है। 24
अप्रैल 1973।
हां, बहुत महत्वपूर्ण तारीख है ये। कहा
गया है कि इस तारीख के बाद इस बक्से में
डाले गए कानूनों की समीक्षा हो सकती है।
यह तारीख इतनी खास क्यों है?
यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे
बड़ा दिन है। इसी दिन केशवानंद भारती
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के
मूल ढांचे का सिद्धांत दिया।
मूल ढांचा या बेसिक स्ट्रक्चर। हां कोर्ट
ने कहा कि संसद [संगीत]
संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन
उसकी नीव उसके मूल ढांचे को नहीं बदल सकती
और न्यायिक समीक्षा को मूल ढांचे का
हिस्सा माना गया।
तो इसका मतलब
इसका मतलब कि इस तारीख के बाद नौवीं
अनुसूची के कवच में भी एक छेद हो गया। अब
अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता
है तो चाहे वह नौवीं अनुसूची में ही क्यों
ना हो अदालत उसकी जांच कर सकती है।
कमाल है मतलब कोई भी कानून पूरी तरह से
न्यायिक जांच से परे नहीं है। अब दसवीं
अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून
हां राजनीति की दुनिया का एक बहुत ही
चर्चित विषय है।
आयाराम गया राम की कहानी भी तो इसी से
जुड़ी है। है ना?
हां बिल्कुल। यह कहानी हरियाणा के एक
विधायक गया लाल की है। जिन्होंने 1967 में
एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली थी।
एक ही दिन में तीन बार
हां 80 के दशक तक यह आयाराम गया राम की
राजनीति एक राष्ट्रीय समस्या बन गई थी।
चुने हुए विधायक और सांसद अपनी मर्जी से
या लालच में पार्टियां बदल लेते थे जिससे
सरकारें गिर जाती थी।
और लोगों के वोट का अपमान होता था।
[संगीत]
बिल्कुल। इसी को रोकने के लिए 1985 में
52वें संशोधन के जरिए 10वीं अनुसूची जोड़ी
गई।
तो क्या यह कानून पूरी तरह सफल रहा है? आज
भी तो हम दलबदल की खबरें सुनते हैं।
देखिए इसने व्यक्तिगत [संगीत] दलबदल पर तो
काफी हद तक रोक लगाई है लेकिन राजनीति ने
इसके भी तोड़ निकाल लिए हैं।
जैसे
जैसे एक साथ बड़ी संख्या में विधायकों का
इस्तीफा देना ताकि दलबदल कानून लागू ही ना
हो। तो लड़ाई अभी भी जारी है। लेकिन यह
अनुसूची एक बहुत महत्वपूर्ण कदम था।
और आखिर में 11वीं और 12वीं अनुसूचियां।
लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ
बिल्कुल। इन्हें 1993 में 73वें और 74वें
संशोधन से जोड़ा गया। यह पंचायत और नगर
पालिकाओं से जुड़ी हैं।
और यह दोनों अनुसूचियां सत्ता को दिल्ली
और राज्यों की राजधानियों [संगीत] से
निकालकर गांव और मोहल्ले तक ले जाने की एक
क्रांतिकारी कोशिश थी। 11वीं अनुसूची
पंचायतों को 29 विषय देती है। कृषि, पीने
का पानी, ग्रामीय सड़कें और 12वीं अनुसूची
नगरपालिकाओं को 18 विषय।
हां, जैसे शहरी योजना, साफ सफाई, सड़कें
और पुल।
तो इन्होंने सिर्फ विषय ही दिए हैं।
नहीं, सिर्फ विषय नहीं दिए बल्कि पंचायतों
और नगर पालिकाओं को एक संवैधानिक दर्जा
दिया। इससे पहले यह राज्य सरकारों की दया
पर निर्भर थी।
अच्छा। अब इनके चुनाव कराना और इन्हें फंड
देना एक संवैधानिक बाध्यता है। यह
लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की
दिशा में मील का पत्थर है।
तो आज इन 12 अनुसूचियों को समझने के बाद
यह साफ हो गया है कि यह सिर्फ एक परिशिष्ट
नहीं है।
नहीं बिल्कुल नहीं।
यह संविधान की कार्यप्रणाली का ब्लूप्रिंट
है। देश के नक्शे से लेकर सत्ता के
बंटवारे, भाषा की पहचान और गांव की पंचायत
तक सब कुछ इनमें विस्तार से लिखा है।
बिल्कुल। यह अनुसूचियां दिखाती हैं कि
हमारा संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं है।
खासकर वो अनुसूचियां जिन्हें बाद में
जोड़ा गया वो साबित करती हैं कि यह एक
जीवंत दस्तावेज है।
हां जो समय और समाज की जरूरतों के हिसाब
से खुद को ढालता है।
बिल्कुल विकसित होता है।
वाह आज तो संविधान का एक पूरा नया पहलू
समझ में आया। यह बातचीत वाकई बहुत शानदार
रही।
शुक्रिया।
और जाते-जाते सुनने वालों के लिए एक सवाल
छोड़ जाता हूं। जिस तरह जमींदारी, दलबदल
और पंचायती राज जैसी चुनौतियों से निपटने
के [संगीत] लिए नई अनुसूचियां जोड़ी गई,
हम्।
तो भविष्य की कौन सी नई सामाजिक, तकनीकी
या आर्थिक चुनौतियां [संगीत] हो सकती हैं
जिनके लिए हमें संविधान में इसी तरह के नए
ढांचे की जरूरत पड़े। क्या डाटा
प्राइवेसी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या
जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों के लिए
[संगीत] एक दिन 13वीं अनुसूची की जरूरत
होगी? सोचिएगा जरूर।
आज हम जिस स्रोत सामग्री [संगीत] की
पड़ताल कर रहे हैं वो भारत के राजनीतिक
नक्शे के बनने और बदलने की एक पूरी कहानी
[संगीत] है।
जी
हम देखेंगे कि आजादी के बाद से हमारे
राज्यों की सीमाएं और मतलब उनकी संख्या
क्यों और कैसे बदलती रही?
बिल्कुल। जी
संविधान भारत को राज्यों का संघ कहता है।
पर यह संघ यह हमेशा से वैसा नहीं था जैसा
आज दिखता है। चलिए इस दिलचस्प सफर को
समझते हैं।
हां। और इसकी बुनियाद हमें मिलती है
संविधान के पहले ही [संगीत] भाग में
अनुच्छेद एक से चार तक।
अच्छा।
अनुच्छेद एक तो साफ-साफ कहता है। इंडिया
यानी भारत राज्यों का एक संघ होगा। पर जो
असली ताकत है वो अनुच्छेद
[संगीत]
तीन में है।
हां यहीं से बात असल में दिलचस्प हो जाती
है। अनुच्छेद तीन संसद को इतनी शक्ति देता
है कि वो किसी भी राज्य की सहमति के बिना
उसकी सीमाएं बदल सकती है।
उसे तोड़ के नया राज्य बना सकती है या फिर
या उसका नाम तक बदल सकती है।
यस।
ये सोचना भी कमाल है कि संविधान बनाने
वालों ने कितनी दूर की सोची होगी।
और यह अधिकार बहुत जल्दी जरूरी भी साबित
हुआ। देखिए आजादी के बाद सैकड़ों रियासतों
और ब्रिटिश प्रांतों को जोड़कर एक देश तो
बना लिया गया था पर असली चुनौती थी
उन्हें एक तार्किक आधार पर संगठित करना
बिल्कुल और वो आधार बना भाषा
हां भाषाई राज्यों की मांग तो बहुत जोर
पकड़ रही थी उस वक्त और इसका पहला बड़ा
नतीजा था आंध्र प्रदेश का बनना
सही
और इसी के बाद शायद दिसंबर 1953 में फजल
अली आयोग का गठन हुआ था है ना
सही कहा और इसी आयोग की सिफारिशों पर 1956
56 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ और
इससे 14 राज्य और छह केंद्र शासित प्रदेश
बने। यह एक बहुत बड़ा मोड़ था।
मतलब सरकार ने एक तरह से मान लिया था कि
भारत की एकता सिर्फ प्रशासनिक नक्शे से
नहीं बल्कि लोगों की भाषा और संस्कृति को
सम्मान देने से मजबूत होगी।
जी।
तो 1956 के कानून ने कह सकते हैं एक
दरवाजा खोल दिया। इसके बाद तो जैसे
बदलावों की एक लहर सी आ गई। 1960 में
बॉम्बे राज्य का बंटवारा हुआ।
हां। मराठी बोलने वालों के लिए महाराष्ट्र
और गुजराती बोलने वालों के लिए गुजरात और
यह पैटर्न 60 के दशक में चलता रहा।
भाषा एक बड़ी राजनैतिक [संगीत]
ताकत बन चुकी थी।
बिल्कुल। 1963 में नागालैंड और फिर 1966
में पंजाब का बंटवारा होकर हरियाणा का
बनना यह सब इसी का नतीजा था।
मतलब आजादी के लगभग 20 साल बाद भी देश का
नक्शा लगातार बदल रहा था। लेकिन एक सवाल
है साल 2000 में जब छत्तीसगढ़, उत्तरांचल
और झारखंड बने तब तो वजह भाषा नहीं थी।
यह बहुत अच्छा सवाल है।
तो क्या यहां से राज्यों के बनने का कारण
बदलने लगा था?
हां, कह सकते हैं। [संगीत] साल 2000 के
पुनर्गठन ने दिखाया कि अब प्राथमिकता बदल
रही थी। अब वजह थी बेहतर प्रशासन,
क्षेत्रीय विकास
और स्थानीय आकांक्षाएं। हां, बड़े राज्यों
के कुछ पिछड़े इलाकों को लगा कि अलग राज्य
बनकर ही उनका विकास हो सकता है। और फिर
2014 में हमने इसी कड़ी में तेलंगाना को
बनते देखा।
और अब आते हैं सबसे हालिया और शायद सबसे
बड़े बदलाव पर। जम्मू कश्मीर। स्रोतों के
मुताबिक अनुच्छेद 370 इसे एक विशेष दर्जा
देता था।
हां। और 1957 से तो इसका अपना अलग संविधान
भी था। और इससे जुड़ा था अनुच्छेद 35 ए जो
स्थाई नागरिकों को कुछ खास अधिकार देता
था।
जी जमीन और नौकरियों में खास अधिकार देता
था और यह व्यवस्था दशकों तक चली।
लेकिन 5 अगस्त 2019 को सब कुछ बदल गया।
संसद में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक
लाया गया और राष्ट्रपति के आदेश से
अनुच्छेद [संगीत] 370 के ज्यादातर
प्रावधान और 35 ए को खत्म कर दिया गया। तो
इस बंटवारे का नतीजा यह निकला कि 31
अक्टूबर 2019 से जम्मू कश्मीर का राज्य का
दर्जा वो खत्म हो गया और इसे दो केंद्र
शासित प्रदेशों में बांट दिया गया।
कौन-कौन से?
पहला जम्मू और कश्मीर जहां अपनी विधानसभा
होगी और दूसरा लद्दाख जो बिना विधानसभा के
रहेगा और सीधे केंद्र के अधीन होगा।
तो आज की हमारी इस चर्चा से साफ है कि
भारत का राजनीतिक नक्शा कभी पत्थर की लकीर
नहीं रहा है।
नहीं बिल्कुल नहीं। संवैधानिक प्रावधानों,
भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक जरूरतों ने
इसे लगातार गाड़ा है।
सही कहा। श्रोत यही दिखाते हैं कि यह एक
जीवित, एक गतिशील प्रक्रिया है और यह हमें
सोचने पर मजबूर करता है जैसे-जैसे भारत की
आर्थिक और सामाजिक जरूरतें बदलेंगी, क्या
भविष्य में हमें देश के आंतरिक नक्शे में
और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं?
नागरिकता
ये शब्द सुनने में कितना सीधा लगता है ना।
पर जब हम इसकी कहानी में उतरते हैं तो पता
चलता है कि ये कितनी उलझी हुई है।
हां बिल्कुल। ये सिर्फ एक कानूनी शब्द
नहीं है। यह किसी की [संगीत] पहचान है।
उसके अधिकार हैं और इस देश के साथ उसका एक
रिश्ता है। और यह रिश्ता ये कहानी समय के
साथ लगातार बदली है।
तो आज हमारी यही कोशिश रहेगी कि हम इसी
कहानी की परतों को खोलें। हम भारतीय
संविधान और खासकर 1955 के नागरिकता
अधिनियम के आधार पर यह समझने की कोशिश
करेंगे कि भारत का नागरिक बनने के रास्ते
क्या थे और क्या है
और साथ ही किन वजहों से यह नागरिकता खत्म
भी हो सकती है और समय के साथ इन कानूनों
में इतने बड़े बदलाव क्यों और कैसे हुए?
तो चलिए इस गहरी पड़ताल को शुरू करते हैं।
तो सबसे पहले बुनियाद की बात करते हैं। जब
भारत का संविधान बना तो ये कैसे तय किया
गया कि कौन भारतीय है? इसकी रूपरेखा क्या
थी?
देखिए संविधान का भाग दो मतलब अनुच्छेद
पांच से 11 इसी पर है। पर दिलचस्प बात यह
है कि संविधान ने सिर्फ एक ढांचा दिया।
उसने हर नियम नहीं बनाया।
अच्छा।
हां, उसने एक नींव रखी और नियम बनाने का
काम संसद पर छोड़ दिया। लेकिन एक बहुत
बड़ी बात जो संविधान ने तय की वो थी एकल
नागरिकता।
एकल नागरिकता। इसका मतलब क्या हुआ? आसान
शब्दों में।
इसका सीधा सा मतलब है कि आप सिर्फ और
सिर्फ भारत के नागरिक हैं। आप किसी राज्य
के नागरिक नहीं हैं। जैसे आप पंजाबी या
बंगाली हो सकते हैं पर आप पंजाब [संगीत]
या बंगाल के नागरिक नहीं हैं।
जैसे कि अमेरिका में होता है जहां राज्य
और देश की दोहरी नागरिकता होती है।
बिल्कुल। भारत में आपकी पहचान [संगीत]
सिर्फ भारतीय है।
ओके। तो संविधान ने सिद्धांत दे दिए और
बाकी का काम संसद ने किया और यहीं से 1955
का नागरिकता अधिनियम आता है ना।
एकदम सही पकड़ा आपने। इसी अधिनियम ने वो
पांच रास्ते बताए [संगीत] जिनसे कोई भारत
का नागरिक बन सकता था। पहला और सबसे कह
सकते हैं स्वाभाविक तरीका है जन्म के आधार
पर।
जन्म से मतलब अगर कोई भारत में पैदा हुआ
हो।
हां। 1955 का कानून कहता था कि 26 जनवरी
1950 के बाद भारत की जमीन पर पैदा हुआ कोई
[संगीत] भी बच्चा जन्म से भारत का नागरिक
होगा। इसे जस सोली कहते हैं यानी धरती का
[संगीत] कानून।
यह तो बहुत सीधा साधा नियम लगता है।
था बस इसमें एक छोटा सा अपवाद था कि यह
विदेशी राजनायिकों या फिर दुश्मन देश के
नागरिकों के बच्चों पर लागू नहीं होता था।
ठीक है। और दूसरा तरीका था वंश का। वो
क्या था? वह उन बच्चों के लिए था जो भारत
के बाहर पैदा हुए। कानून के मुताबिक अगर
[संगीत] बच्चे का जन्म विदेश में हुआ है
लेकिन जन्म के समय उसका पिता भारत का
नागरिक है तो वो बच्चा भी भारतीय नागरिकता
का हकदार होगा।
एक मिनट सिर्फ पिता मां के भारतीय होने से
नागरिकता नहीं मिलती थी।
शुरुआती कानून में यही था जी। उस समय के
सामाजिक नजरिए में शायद पिता की नागरिकता
को ही आधार माना गया था।
हम्म।
हालांकि ये एक तरह का भेदभाव था जिसे बाद
में सुधारा गया। उस पर हम आगे बात करेंगे।
ठीक है। तो जन्म और वंश के अलावा और क्या
रास्ते थे?
दूसरा बड़ा रास्ता था पंजीकरण यानी
रजिस्ट्रेशन। [संगीत]
यह उन लोगों के लिए था जो भारतीय मूल के
थे। मतलब जिनका भारत से कोई नाता था पर वो
विदेश में बस गए थे।
तो उनके लिए वापसी का रास्ता आसान रखा गया
था।
बहुत आसान। शर्त बस इतनी थी कि आवेदन करने
से पहले सिर्फ 6 महीने भारत में रहना
जरूरी था।
क्या सिर्फ 6 महीने? आज के दौर में तो ये
यकीन करना मुश्किल है।
बिल्कुल। उस समय का विचार ही यही था कि जो
भी भारतीय मूल के लोग हैं उनके लिए रास्ते
खुले रखे जाएं। देश का मिजाज बहुत समावेशी
था। लेकिन जैसा हम देखेंगे यह सोच ज्यादा
दिन नहीं चली।
और एक और तरीका था देशीयकरण। यह किन लोगों
के लिए था?
देशीकरण या नेचुरलाइजेशन। उन लोगों के लिए
है जिनका भारत से कोई पारिवारिक नाता नहीं
है। पर वो भारत को अपना घर बनाना चाहते
हैं।
जैसे कोई विदेशी कलाकार या वैज्ञानिक
हां बिल्कुल। जो सालों भारत में रहे, यहां
की संस्कृति में रच बस गए और अब यहीं का
नागरिक बनना चाहते हैं। कानून उन्हें एक
रास्ता देता है पर कुछ शर्तों के साथ।
क्या शर्तें थी?
जैसे कि उन्हें अपने देश की नागरिकता
[संगीत] छोड़नी होगी और भारत में एक एक
निश्चित समय तक रहना होगा।
और एक पांचवा तरीका भी था। है ना?
जी। वो था किसी नए इलाके का भारत में
शामिल हो जाना। मतलब अगर भविष्य में कोई
नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है तो
सरकार तय करेगी कि वहां के लोगों को
नागरिकता कैसे दी जाएगी।
तो 1955 का कानून काफी खुला और एक तरह से
स्वागत करने वाला दस्तावेज लगता है।
लेकिन फिर कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है।
1986 का संशोधन। उसने क्या बदल दिया?
1986 का संशोधन सिर्फ एक कानूनी बदलाव
[संगीत] नहीं था। वो उस दौर की राजनीतिक
और सामाजिक चिंताओं को दिखाता है। खासकर
असम जैसे राज्यों में।
हां, वहां अवैध प्रवासन को लेकर बड़े
आंदोलन चल रहे थे।
बिल्कुल। लोगों में अपनी पहचान और
संसाधनों को लेकर एक डर था और उसी के जवाब
में सरकार ने नागरिकता [संगीत]
के नियमों को सख्त कर दिया।
कितना सख्त?
वो जो पंजीकरण वाली शर्त थी ना, सिर्फ 6
महीने रहने की,
हां।
उसे बढ़ाकर सीधा 5 साल कर दिया गया। 6
महीने से सीधा 5 साल यह तो जमीन आसमान का
फर्क है।
जी और ये सख्ती सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी।
देशकरण के लिए भी जो निवास की अवधि पहले 5
साल थी [संगीत] उसे बढ़ाकर 10 साल कर दिया
गया।
बाप रे मतलब साफ संकेत था कि अब भारत आसान
नागरिकता को लेकर बहुत सर्क हो गया है।
बिल्कुल।
और वो वंश वाले नियम में भी तो एक बड़ा
बदलाव आया था जहां पहले सिर्फ पिता की
नागरिकता गिनी जाती थी। हां वो एक बहुत
जरूरी और सकारात्मक बदलाव था। 1992 में
कानून बदला गया और ये कहा गया कि 10
दिसंबर 1992 के बाद विदेश में जन्मे किसी
बच्चे को नागरिकता तब मिलेगी जब उसके
माता-पिता में से कोई भी एक यानी माता या
पिता भारत का नागरिक हो।
इसने कानून को लैंगिक रूप से बराबर बनाया।
हां और यह बदलते हुए समाज की सोच को भी
दिखाता है।
तो हमने देखा कि कानून कैसे धीरे-धीरे
सख्त होता गया। लेकिन 2019 में जो बदलाव
आया नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए
उसने तो पूरी बहस का रुख ही मोड़ दिया।
सीएए हां सीधे तौर पर 1955 के कानून में
एक नया अध्याय जोड़ता है। इसका मुख्य
प्रावधान यह है कि यह तीन पड़ोसी देशों से
आए छह विशेष धार्मिक समुदायों के लोगों को
नागरिकता देने की प्रक्रिया को आसान बनाता
है।
वो तीन देश हैं अफगानिस्तान, बांग्लादेश
और पाकिस्तान और छह समुदाय
हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई।
तो कानून यह मानता है कि इन समुदायों के
लोग इन तीन देशों से धार्मिक उत्पीड़न की
वजह से भारत आए हैं।
जी और इसीलिए उन्हें अवैध प्रवासी नहीं
माना जाएगा बल्कि नागरिकता के लिए योग्य
समझा जाएगा।
इसमें एक कट ऑफ तारीख भी है जो बहुत
महत्वपूर्ण है। है ना?
हां। शर्त यह है कि इन लोगों ने 31 दिसंबर
2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश
किया हो। जो इस तारीख के बाद आए हैं वे इस
कानून के दायरे में नहीं आते। [संगीत] और
यह कानून नागरिकता पाने की प्रक्रिया को
आसान कैसे बनाता है?
यह देशकरण की शर्त को बहुत कम कर देता है।
जहां आमतौर पर भारत में 11 साल रहने की
शर्त होती है, इन छह समुदायों के लिए इस
अवधि को घटाकर सिर्फ 5 साल कर दिया गया
है।
लेकिन इसमें एक और दिलचस्प बात यह है कि
यह कानून पूरे देश पर एक जैसा लागू नहीं
होता।
यह एक बेहद जरूरी पहलू है। यह कानून
संविधान की छठी अनुसूची में शामिल आदिवासी
[संगीत] क्षेत्रों में लागू नहीं होता।
जैसे
असम, मेघालय और मिजोरम के बड़े हिस्से।
हां। और इसके अलावा यह इनर लाइन परमिट
वाले राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम
और नागालैंड में भी लागू नहीं होता।
ऐसा क्यों? [संगीत] ऐसा इन क्षेत्रों की
जो खास सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय पहचान
है उसे सुरक्षित रखने के लिए किया गया है।
तो नागरिकता मिलना एक बात है। पर क्या यह
छीनी भी जा सकती है? ये तो सुनने में बहुत
बड़ा कदम लगता है।
हां, यह बहुत बड़ा कदम है और इसके आधार
बहुत स्पष्ट और गंभीर हैं। ऐसा नहीं हो
सकता कि किसी छोटी-मोटी गलती पर किसी की
नागरिकता चली जाए।
तो क्या तरीके हैं इसके?
कानून में तीन मुख्य तरीके बताए गए हैं।
पहला है परित्याग। मतलब आप खुद ही अपनी
मर्जी से भारतीय नागरिकता छोड़ दें।
ठीक है। यह तो अपनी मर्जी की बात हुई।
दूसरा है पर्यावसान। यह एक सीधा साधा नियम
है। भारत दोहरी नागरिकता की इजाजत नहीं
देता।
मतलब एक मयान में दो तलवारें नहीं।
बिल्कुल। तो जिस पल आप किसी और देश के
नागरिक बने, उसी पल आपकी भारतीय नागरिकता
अपने आप खत्म हो जाती है।
ओके। ये दोनों तो व्यक्ति की अपनी मर्जी
से जुड़े हैं। लेकिन तीसरा तरीका ज्यादा
गंभीर लगता है। वंचित किया जाना। हां, यह
वो स्थिति है जब सरकार किसी व्यक्ति से
[संगीत] उसकी नागरिकता छीन सकती है और
इसके आधार भी उतने ही गंभीर हैं जैसे अगर
किसी ने धोखाधड़ी या झूठे दस्तावेजों के
आधार पर नागरिकता ली हो
या फिर देश के साथ गद्दारी की हो
जी यह तो समझ आता है लेकिन इसमें एक बहुत
ही अजीब शर्त है जो लोगों को चौंका सकती
है।
वो क्या है? अगर किसी व्यक्ति को पंजीकरण
[संगीत] या देशीयकरण से नागरिकता मिली है
और नागरिकता मिलने के 5 साल के अंदर ही
उसे किसी दूसरे देश में 2 साल या उससे
ज्यादा की जेल हो जाए
तो भारत सरकार उसकी नागरिकता रद्द कर सकती
है?
हां, कर सकती है।
और कुछ और भी असाधारण स्थितियां हैं।
हां, कानून के कुछ ऐसे कोने हैं जिनके
बारे में ज्यादा बात नहीं होते। जैसे किसी
भारतीय महिला या पुरुष द्वारा किसी विदेशी
से शादी करके वहां की नागरिकता ले लेना या
फिर कुछ बहुत ही निजी स्थितियां जैसे
पागलपन या सन्यास लेने पर भी नागरिकता
खत्म हो सकती है।
सन्यास लेने पर
जी यह कानूनी प्रावधान है। हालांकि इनका
इस्तेमाल न के बराबर होता है।
वाकई ये काफी पेचीदा है। अब एक और विषय पर
आते हैं जो लाखों भारतीयों से जुड़ा है।
एनआरआई, पीआईओ, ओसीआई यह शब्द हम अक्सर
सुनते हैं। लेकिन इनमें फर्क क्या है?
इन तीनों में अंतर समझना बहुत जरूरी है।
सबसे पहले बात करते हैं एनआरआई यानी
अनिवासी भारतीय की। यह भारतीय नागरिक ही
हैं।
मतलब उनके पास भारतीय पासपोर्ट है।
भारतीय पासपोर्ट है। भारत में वोट डालने
का हक है। वो बस काम, पढ़ाई या [संगीत]
किसी और वजह से एक तय समय से ज्यादा भारत
से बाहर रह रहे हैं। वो पूरी तरह से
भारतीय [संगीत] हैं।
ठीक है। तो एनआरआई भारतीय नागरिक हैं जो
विदेश में रहते हैं। फिर पीआईओ और ओसीआई
कौन है?
देखिए पीआईओ यानी पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन।
हम्म।
ये वो लोग थे जो भारत के नागरिक नहीं है।
[संगीत] लेकिन उनकी जड़े भारत से जुड़ी थी।
मतलब उनके माता-पिता या दादा-दादी कभी
भारत के [संगीत] नागरिक थे।
थे। मतलब अब ये नहीं है।
हां। अब पीआईओ कार्ड योजना को ओसीआई में
ही मिला दिया गया है।
तो अब सारा जोर ओसीआई पर है।
तो ये ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया क्या है?
[संगीत] क्या ये एक तरह की दोहरी नागरिकता
है?
ये सबसे बड़ा भ्रम है।
नहीं। ओसीआई दोहरी नागरिकता बिल्कुल नहीं
है।
इसे आप भारतीय मूल के लोगों के लिए एक यूं
समझिए एक लाइफ टाइम वीजा है।
अच्छा एक गोल्डन टिकट जैसा।
हां कह सकते हैं। ओसीआई कार्ड धारक भारत
में वोट नहीं दे सकते, [संगीत] चुनाव नहीं
लड़ सकते या सरकारी नौकरी नहीं कर सकते।
वो भारत के नागरिक नहीं है।
तो फिर इस ओसीआई कार्ड का फायदा क्या है?
इसके फायदे बहुत हैं। वो जीवन भर बिना
वीजा के भारत आ जा सकते हैं।
उन्हें यहां जमीन खरीदने, व्यापार करने और
पढ़ाई करने में लगभग वैसी ही सहूलियतें
मिलती है जैसी एनआरआई को मिलती हैं।
तो ओसीआई एक तरह से भारत का अपने प्रवासी
समुदाय को यह कहने का तरीका है कि आप
हमारे नागरिक नहीं हैं। पर आपके लिए
दरवाजे हमेशा खुले हैं।
बिल्कुल। तो कुल मिलाकर भारत की नागरिकता
की कहानी एक सीधी रेखा में तो बिल्कुल
नहीं चली है। 1955 में एक समावेशी और खुली
शुरुआत हुई।
हां। लेकिन फिर समय और चुनौतियों के साथ
नियम बदलते गए। ज्यादा परिभाषित और सख्त
होते गए। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे
एक देश अपनी सीमाओं और अपनी पहचान को
परिभाषित करता है। जन्म के सीधे साधे नियम
से लेकर 1986 में नियमों के सख्त होने तक
और फिर 2019 में कुछ खास समूहों के लिए
विशिष्ट प्रावधानों तक यह एक बहुत ही
गतिशील कानूनी ढांचा रहा है। हमने समझा कि
नागरिकता कैसे मिलती है, कैसे खत्म हो
सकती है और भारत अपने विशाल प्रवासी
समुदाय से ओसीआई जैसी योजनाओं के जरिए
कैसे जुड़ा रहता है? ये एक जटिल लेकिन
आकर्षक विषय है।
इन सभी कानूनी प्रावधानों, तारीखों और
शर्तों को समझने के बाद एक सवाल आगे की
सोच के लिए जरूर उठता है।
वो क्या है? हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे
हैं जहां डिजिटल पहचान, ऑनलाइन [संगीत]
समुदाय यह सब शायद राष्ट्रीय सीमाओं जितने
ही महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। हम
लोग एक देश में बैठकर दूसरे देश के लिए
काम करते हैं। [संगीत] उनकी पहचान के कई
स्तर हैं। ऐसे में सवाल यह है कि भविष्य
में कानूनी दस्तावेजों और पासपोर्ट से परे
एक नागरिक होने का असली मतलब क्या होगा?
क्या हमारी पहचान सिर्फ हमारे देश से
जुड़ी रहेगी या इसके और भी मायने होंगे?
यह एक विचार है जिस पर शायद हम सबको सोचना
चाहिए।
हमारा विषय है भारतीय संविधान का वो
हिस्सा जिससे अक्सर इसकी [संगीत] आत्मा
कहा जाता है। मौलिक अधिकार
बिल्कुल और हमारे पास जो स्रोत हैं वो इन
अधिकारों की नींव इनके मतलब और इनकी जो
ताकत है उस पे बहुत गहराई से रोशनी डालते
हैं।
और ये सिर्फ कानूनी बातें नहीं है। है ना?
यह वो गारंटी है जो संविधान हर भारतीय
नागरिक को देता है।
हां कि आप इज्जत और आजादी के साथ जी सकते
हैं और कोई भी सरकार मतलब कोई भी आपसे यह
छीन नहीं सकती।
बिल्कुल क्योंकि हमारी इस बातचीत का मकसद
यही समझना है कि ये अधिकार सिर्फ किताबों
में लिखे शब्द नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा
की जिंदगी का एक तरह से सुरक्षा कवच कैसे
हैं? चलिए शुरू करते हैं।
तो सबसे पहली और आकर्षक बात [संगीत] जो
हमारे स्रोत बताते हैं वो यह है कि इन
अधिकारों को संविधान का मैग्नाकार्टा कहा
जाता है। ये ये एक बहुत बड़ा तमगा है।
इसका असल में क्या मतलब है?
देखिए इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार अपनी
मनमानी नहीं कर सकती। ये अधिकार सरकार की
ताकत पर एक ब्रेक की तरह काम करते हैं।
संविधान के भाग तीन [संगीत] में अनुच्छेद
12 से 35 तक यह अधिकार दिए गए हैं और
इन्हें मौलिक या फंडामेंटल इसलिए कहते हैं
क्योंकि अगर सरकार इनका उल्लंघन करती है
तो कोई भी नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट जा
सकता है।
मतलब ये सरकार के खिलाफ नागरिकों को मिले
हैं।
एकदम सही।
ये जानना भी काफी दिलचस्प है कि क्या ये
अधिकार शुरू से ऐसे ही थे? श्रोत बताते
हैं कि पहले सात मौलिक अधिकार थे। अब छह
हैं।
हां, यह बहुत बड़ा और विवादास्पद बदलाव
था।
संपत्ति का अधिकार कभी मौलिक हुआ करता था।
जी। शुरुआत में अनुच्छेद 31 के तहत
संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था।
लेकिन आजादी के बाद सरकार को जमींदारी
खत्म करने और जमीन का सामान बंटवारा करने
जैसे बड़े सामाजिक सुधार करने थे।
और यह अधिकार आड़े आ रहा था।
हां। क्योंकि लोग अपनी जमीन देने से मना
कर देते थे। इसी टकराव के चलते 1978 में
44वें संविधान संशोधन के जरिए इसे मौलिक
अधिकारों की सूची से हटा दिया गया।
तो अब इसका क्या स्टेटस है? मतलब क्या अब
ये कोई अधिकार ही नहीं है?
नहीं अधिकार तो है लेकिन अब ये अनुच्छेद
300 के तहत सिर्फ एक कानूनी अधिकार है।
मौलिक नहीं। अच्छा मतलब
मतलब यह कि सरकार जनहित के लिए किसी की
संपत्ति ले तो सकती है लेकिन एक उचित
कानूनी प्रक्रिया के तहत और उचित मुआवजा
देकर आपकी संपत्ति आपसे यूं ही नहीं छीनी
जा सकती।
समझ गया और इन अधिकारों की मांग भी जैसा
कि श्रोत बताते हैं रातोंरात नहीं हुई थी।
इनकी जड़े तो हमारे स्वतंत्रता संग्राम
में है।
बिल्कुल। 1925 के एनी बेसेंट के बिल से
लेकर 1928 की नेहरू रिपोर्ट तक हर जगह
इनकी झलक मिलती है और 1931 का कराची
अधिवेशन तो इस मामले में एक मील का पत्थर
था
जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की थी।
हां उसमें कांग्रेस ने बाकायदा एक
घोषणापत्र में इन अधिकारों की मांग की
जिसका ड्राफ्ट जवाहरलाल नेहरू ने तैयार
किया था। इससे पता चलता है कि हमारे
स्वतंत्रता सेनानियों का विज़न कितना साफ
था
कि आजाद भारत की बुनियाद नागरिक अधिकारों
पर ही रखी जाएगी।
बिल्कुल। तो चलिए आज जो छह अधिकार हमें
मिले हैं उन पर आते हैं। पहला स्तंभ है
समता का अधिकार। हां, अनुच्छेद 14 से 18
तक। और यह सिर्फ एक लाइन नहीं है। यह
समानता का एक पूरा पैकेज है। सबसे पहले तो
अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के सामने सब
बराबर है।
कोई कितना भी अमीर हो या ताकतवर कानून
सबके लिए एक है।
फिर आती है सामाजिक बराबरी। अनुच्छेद 15
कहता है कि किसी भी नागरिक के साथ धर्म,
जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर
भेदभाव नहीं किया जा सकता। दुकानों,
होटलों, कुओं मतलब किसी भी सार्वजनिक जगह
पर जाने से किसी को रोका नहीं जा सकता।
और सरकारी नौकरियों में भी बराबरी का
मौका।
जी वो अनुच्छेद 16 है और अनुच्छेद 17 तो
छुआछू जैसी सामाजिक कुप्रथा को एक दंडनीय
अपराध घोषित करके जड़ से खत्म करता है।
इसमें एक और दिलचस्प बात है उपाधियों के
अंत की। अनुच्छेद 18 मतलब अब कोई राजा
साहब या राय बहादुर नहीं बन सकता।
हां। ताकि समाज में बनावटी भेदभाव पैदा ना
हो। तो एक बार जब संविधान ने यह तय कर
दिया कि सब नागरिक बराबर हैं तो अगला सवाल
था इस बराबरी का फायदा क्या? अगर नागरिक
आजादी ना हो।
और यहीं से आता है दूसरा सबसे मजबूत स्तंभ
स्वतंत्रता का अधिकार।
अनुच्छेद 19 से 22 तक। और अनुच्छेद 19 तो
अपने आप में एक मिनी संविधान जैसा लगता
है। इसमें छह तरह की आजादियां हैं।
यह आजादियां लोकतंत्र की धड़कन है। आपको
बोलने की, अपनी बात रखने की आजादी है। इसी
में प्रेस की आजादी और सूचना पाने का
अधिकार भी छिपा है।
और शांति से इकट्ठा होने की आजादी भी।
बिना हथियारों के आप संघ या संगठन बना
सकते हैं। आप देश में कहीं भी घूम सकते
हैं और कहीं भी बस सकते हैं। और आखिर में
आप अपनी मर्जी का कोई भी व्यापार या पेशा
चुन सकते हैं।
वाह और हमारे स्रोत में कमाल की बात यह भी
है कि आज जो हम इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं
वो अधिकार भी अनुच्छेद 19 में ही छिपा है।
बिल्कुल ये न्यायिक व्याख्या का एक
बेहतरीन उदाहरण है। समय के साथ संविधान
कैसे खुद को ढालता है। मतलब जब हम आज सोशल
मीडिया पर कुछ पोस्ट करते हैं तो हम असल
में उसी मौलिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे
हैं।
हां अब इसी में आगे है अनुच्छेद 20 जो
अपराधियों के अधिकारों की बात करता है।
सुनने में अजीब लगे लेकिन यह बहुत जरूरी
है।
क्या है वो अधिकार?
तीन बातें हैं। एक गुनाह की एक ही सजा
मिलेगी। सजा उसी कानून के हिसाब से मिलेगी
[संगीत] जो गुनाह के वक्त लागू था। और
किसी को भी खुद के खिलाफ गवाही देने के
लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। और फिर आता
है अनुच्छेद 21 [संगीत]
प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार। यह
शायद सबसे ज्यादा चर्चित और सबसे ताकतवर
अधिकार है।
यकीनन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्याख्या
करते हुए इसके दायरे को बहुत बड़ा कर दिया
है। इसका मतलब सिर्फ जिंदा रहना नहीं
बल्कि गरिमा के साथ सम्मान के साथ जीना
है।
और इसी में वो निजता का अधिकार भी आता है
ना। राइट टू प्राइवेसी। हां 2017 में जब
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार
एक मौलिक अधिकार है तो उसने एक झटके में
डिजिटल दुनिया में हमारी आजादी की परिभाषा
बदल दी।
इसका मतलब है कि अब सरकार या कोई कंपनी
हमारी निजी जानकारी के साथ मनमानी नहीं कर
सकती। बिल्कुल और सिर्फ यही नहीं स्वच्छ
पर्यावरण का अधिकार, सोने का अधिकार यह सब
इसी अनुच्छेद 21 की छत्रछाया में आते हैं।
और शिक्षा का अधिकार
वो भी बाद में अनुच्छेद 21 क जोड़ा गया जो
छ से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और
अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।
हम और इस स्वतंत्रता के अधिकार में आखिरी
चीज है अनुच्छेद 22 जो गिरफ्तारी से बचाता
है।
हां, यह मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगाता
है। अगर किसी को गिरफ्तार किया जाता है,
तो उसे वजह बतानी होगी। 24 घंटे के अंदर
मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा और
अपनी पसंद का वकील करने का हक देना होगा।
यहीं पर एक बहुत गंभीर और
उलझावा कांसेप्ट आता है निवारक निरोध यानी
प्रिवेंटिव डिटेंशन। यह सुनने में ही
विरोधाभासी लगता है कि किसी को अपराध करने
से पहले ही गिरफ्तार कर लिया जाए। यह एक
असाधारण शक्ति है जो सरकार को मिली है और
यह अनुच्छेद 22 का ही एक हिस्सा है। इसका
[संगीत] मकसद सजा देना नहीं है।
तो फिर क्या है?
इसका मकसद है देश की सुरक्षा या सार्वजनिक
व्यवस्था को खतरे से बचाने के लिए किसी को
अपराध करने से रोकना। लेकिन इसके दुरुपयोग
को रोकने के लिए सख्त नियम है।
जैसे
किसी को अनिश्चित काल के लिए तो नहीं रखा
जा सकता। नहीं बिल्कुल नहीं। सरकार किसी
को भी सिर्फ 3 महीने तक इस कानून के तहत
हिरासत में रख सकती है। अगर इससे ज्यादा
समय के लिए रखना है तो एक सलाहकार बोर्ड
से मंजूरी लेनी पड़ती है जिसमें हाई कोर्ट
के जज होते हैं।
अच्छा तो इस पे भी एक चेक और बैलेंस है।
बिल्कुल।
ठीक है। तो समानता और स्वतंत्रता के बाद
तीसरा अधिकार आता है शोषण के विरुद्ध
अधिकार। अनुच्छेद 23 और 24। यह मानवीय
गरिमा को पक्का करता है। अनुच्छेद 23
इंसानों की खरीदफरोख्त, बेगारी और जबरन
मजदूरी पर रोक लगाता है। और अनुच्छेद 24,
बाल मजदूरी पर।
खासकर 14 साल से कम उम्र के बच्चों को
खतरनाक जगहों पर काम करने से रोकता है।
जी, कारखानों या खदानों में
इसके बाद आता है भारत जैसे विविधता वाले
देश के लिए बेहद जरूरी अधिकार, धार्मिक
स्वतंत्रता का अधिकार। अनुच्छेद 25 से 28
तक [संगीत]
यह भारत के सेकुलर ताने-बाने की गारंटी
है। यह हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, उस
पर अमल करने और उसका प्रचार करने की आजादी
देता है।
और धार्मिक संस्थाएं बनाने का भी हक देता
है।
हां। और यह भी कहता है कि सरकार जनता के
टैक्स का पैसा किसी एक धर्म को बढ़ावा
देने पर खर्च नहीं कर सकती और सरकारी
स्कूलों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी
जाएगी।
सही। [संगीत] और फिर अल्पसंख्यकों के लिए
खास अधिकार हैं संस्कृति और शिक्षा संबंधी
अधिकार।
हां, अनुच्छेद 29 और 30 यह भारत की
विविधता को सहेजने के लिए है। यह कहता है
कि जिन नागरिकों की अपनी अलग भाषा, लिपि
या संस्कृति है, उन्हें उसे बचाने का पूरा
हक है।
और वे अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान भी खोल
सकते हैं
और उन्हें चला भी सकते हैं।
और अब हम आते हैं उस अधिकार पर जिसके बिना
यह सारे अधिकार शायद बेईमानी हो जाते।
जिसे डॉ. अंबेडकर ने संविधान की आत्मा और
हृदय कहा था।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32
डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि अगर कोई
मुझसे पूछे कि संविधान का सबसे महत्वपूर्ण
अनुच्छेद कौन सा है? तो मैं इसी का नाम
लूंगी क्योंकि यह वो चाबी है जो बाकी सारे
अधिकारों के दरवाजे खोलती है।
यह खुद एक मौलिक अधिकार है जो हमें अपने
दूसरे मौलिक अधिकारों को लागू करवाने का
अधिकार देता है।
बिल्कुल। अगर आपके किसी भी मौलिक अधिकार
का हनन होता है तो आप सीधे सुप्रीम कोर्ट
जा सकते हैं [संगीत]
और यहीं पर रिट की भूमिका आती है। ये पांच
तरह के हथियार हैं जो सुप्रीम कोर्ट और
हाई कोर्ट इस्तेमाल करते हैं। इन्हें अगर
आसान भाषा में समझना हो तो
इन्हें हम अदालत के ब्रह्मास्त्र कह सकते
हैं। पहला है बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी
हैवियस कॉरपस।
इसका क्या मतलब है? सोचिए पुलिस किसी को
उठा ले और बताए ही नहीं कि वो कहां है। यह
रिट कोर्ट का वो आदेश है जो कहता है जिस
व्यक्ति को आपने हिरासत में लिया है उसे
तुरंत मेरे सामने पेश करो।
यह [संगीत] तो बहुत जरूरी है।
हां यह किसी को गैरकानूनी तरीके से गायब
होने से बचाने की सबसे बड़ी गारंटी है।
और दूसरा
दूसरा है परमादेश मेंस। इसका मतलब है हम
आदेश देते हैं। यह कोर्ट का किसी सरकारी
अफसर को यह कहना है कि तुम अपना वो काम
करो जो तुम्हें कानूनन करना चाहिए और तुम
नहीं कर रहे हो। अच्छा और बाकी तीन
तीसरा है प्रतिषेध प्रोहिबिशन जो एक
सीनियर कोर्ट का जूनियर कोर्ट को आदेश है
कि रुको यह मामला तुम्हारे अधिकार क्षेत्र
से बाहर है।
चौथा है उत्प्रेषण सर शोरारी जो कहता है
यह मामला हमारे पास भेज दो।
और पांचवा
पांचवा है अधिकार प्रीक्षा को वारंटो मतलब
किस अधिकार से? जब कोई व्यक्ति गलत तरीके
से कोई सरकारी पद हासिल कर लेता है तो
कोर्ट उससे पूछती है कि तुम इस कुर्सी पर
किस हग से बैठे हो?
यह तो सच में बहुत ताकतवर उपकरण हैं।
लेकिन एक सवाल उठता है क्या यह अधिकार
हमेशा हर हाल में लागू रहते हैं या इन्हें
कभी निलंबित भी किया जा सकता है? नहीं यह
असीमित नहीं है। राष्ट्रीय आपातकाल जैसी
विशेष स्थिति में इन्हें निलंबित भी किया
जा सकता है। देश की सुरक्षा सर्वोपरि है।
लेकिन
एक बहुत बड़ा लेकिन है यहां।
हां, एक बहुत बड़ा लेकिन है। 1978 के
44वें संशोधन के बाद यह तय हो गया कि चाहे
कुछ भी हो जाए अनुच्छेद [संगीत]
20 और अनुच्छेद 21 को कभी निलंबित नहीं
किया जा सकता।
अपराधों में संरक्षण और जीवन का अधिकार।
यह [संगीत] यह नागरिक आजादी की एक बहुत
बड़ी जीत थी।
हमारे स्रोतों में कुछ बहुत जरूरी अदालती
मामलों का भी जिक्र है जिन्होंने इन
अधिकारों की कहानी को पूरी तरह बदल दिया।
खासकर संसद की शक्ति और मौलिक अधिकारों के
बीच का जो टकराव था।
यह समझना सबसे जरूरी है। आजादी के बाद एक
बड़ा सवाल था। क्या संसद मौलिक अधिकारों
को बदल सकती है?
हां।
पहले शंकरी प्रसाद केस में 1952 में
सुप्रीम कोर्ट ने कहा हां संसद संविधान
में कुछ भी बदल सकती है मौलिक अधिकार भी।
फिर,
फिर गोलकनाथ केस आया 1969 में। कोर्ट अपनी
ही बात से पलट गया और कहा, नहीं, मौलिक
अधिकार पवित्र है। संसद इन्हें छू भी नहीं
सकती।
तो ये तो एक सीधा टकराव हो गया संसद और
सुप्रीम कोर्ट के बीच। इसका हल कैसे
निकला?
इसका हल निकला 1973 के केशवानंद भारती केस
में, जो भारतीय न्यायपालिका का शायद सबसे
बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है।
इसमें क्या होना?
यहां सुप्रीम कोर्ट ने एक कमाल का संतुलन
बनाया। 13 जजों की बेंच ने कहा हां संसद
संविधान में संशोधन कर सकती है मौलिक
अधिकारों में भी
लेकिन
लेकिन वो इसकी आत्मा को नहीं बदल सकती।
[संगीत] इसी आत्मा को मूल ढांचा या बेसिक
स्ट्रक्चर कहा गया।
ये मूल ढांचा क्या है? इसे कहीं लिखा गया
है?
नहीं। कोर्ट ने इसे पूरी तरह परिभाषित
नहीं किया है। लेकिन समय-समय पर बताया है
कि इसमें क्या-क्या शामिल है। जैसे
लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता,
कानून का शासन, शक्तियों का बंटवारा और
हां नागरिकों के मौलिक अधिकार।
तो यह एक तरह की लक्ष्मण रेखा है।
बिल्कुल। जिसने यह तय कर दिया कि कोई भी
सरकार बहुमत के दम पर तानाशाही तरीके से
संविधान के इन मूल सिद्धांतों को खत्म
नहीं कर सकती। इस एक फैसले ने भारतीय
लोकतंत्र को बचाया है।
तो आज की इस गहरी बातचीत से यह साफ है कि
मौलिक अधिकार सिर्फ कुछ नियम नहीं है
बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की नींव के
पत्थर हैं और अनुच्छेद 32 के जरिए इन्हें
लागू कराने की जो शक्ति हमें मिली है वही
इन्हें असल में मौलिक बनाती है।
और केशवानंद भारती केस ने यह पक्का कर
दिया कि इन अधिकारों की आत्मा को कभी
मिटाया नहीं जा सकता। मूल ढांचे की
अवधारणा ने संसद की संशोधन शक्ति पर एक
ऐसी लगाम लगा दी है जो इन अधिकारों की
हमेशा रक्षा करती है।
यह पूरी चर्चा एक बहुत विचारणीय प्रश्न
छोड़ जाती है। जैसा कि हमने देखा कि 2017
में निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार बना
जो आज के डिजिटल युग में बेहद जरूरी है।
इसे देखते हुए भविष्य में और कौन सा
अधिकार मौलिक माना जा सकता है?
जिसके बारे में संविधान निर्माताओं ने
शायद सोचा भी ना हो। हां, क्या इंटरनेट से
ना जोड़े जाने का अधिकार यानी राइट टू बी
डिस्कनेक्टेड या शायद एक साफ और स्वस्थ
पर्यावरण का अधिकार को भी इतनी ही मजबूती
से मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाना
चाहिए? इस पर सोचना दिलचस्प होगा।
हम भारतीय नागरिक होने के एक ऐसे पहलू पर
बात करेंगे जो जो अक्सर सुर्खियों से दूर
रहता है। हमारे मौलिक कर्तव्य हमारे पास
जो स्रोत है वे इसी विषय पर एक विस्तृत
अध्याय है और हमारा मिशन यह समझना है कि
जब हम हमेशा अपने अधिकारों की बात करते
हैं तो इन कर्तव्यों की कहानी क्या है और
हमारी नागरिकता में इनकी जगह क्या है?
बिल्कुल ये एक तरह से सिक्के का दूसरा
पहलू है। हम सब मौलिक अधिकारों [संगीत] को
लेकर बहुत जागरूक हैं और और होना भी
चाहिए। लेकिन हमारे स्रोत बताते हैं कि
संविधान निर्माताओं ने या यूं कहें कि बाद
में [संगीत] संविधान में संशोधन करने
वालों ने महसूस किया कि अधिकारों और
जिम्मेदारियों के बीच एक संतुलन होना
चाहिए
और यही संतुलन हमारी चर्चा का केंद्र है
क्योंकि हमारे स्रोतों में पहली ही बात जो
मुझे चौंकाती है वो यह है कि यह कर्तव्य
यह हमेशा से संविधान का हिस्सा थे ही
नहीं। तो सवाल उठता है कि इन्हें क्यों और
कैसे जोड़ा गया? और सबसे बड़ा सवाल जिसका
जवाब हर कोई जानना चाहता है। अगर कोई इन
कर्तव्यों को नहीं मानता तो होता क्या है?
यह सभी बहुत जरूरी [संगीत] सवाल हैं और
इनके जवाब हमें सिर्फ एक नागरिक के तौर पर
नहीं बल्कि एक समाज के तौर पर भी अपनी
पहचान समझने [संगीत] में मदद करते हैं।
तो चलिए यहीं से शुरू करते हैं। ये मौलिक
कर्तव्य आए कहां से? अगर ये संविधान की
मूल किताब में नहीं थे तो ये ये अचानक
1976 में कैसे प्रकट हो गए? अचानक शब्द
यहां बिल्कुल [संगीत] सही बैठता है। जब
1950 में संविधान लागू हुआ तो उसमें केवल
मौलिक अधिकार थे। कर्तव्य [संगीत] नहीं।
हमारे श्रोत बताते हैं कि इसकी प्रेरणा
पूर्व सोवियत संघ यानी रूस के संविधान से
ली गई जहां नागरिक के अधिकारों के साथ-साथ
उनके कर्तव्यों पर बहुत जोर दिया जाता था।
यह विचार था कि नागरिकता सिर्फ लेने का
नाम नहीं बल्कि कुछ [संगीत] देने का भी
नाम है।
अच्छा तो यह एक बाहरी प्रेरणा थी। लेकिन
भारत में इसे लाने की जरूरत क्यों महसूस
हुई? क्या देश में ऐसा माहौल बन गया था कि
लोगों को उनकी जिम्मेदारियों की याद
दिलानी पड़ी?
आप कह सकती हैं इमरजेंसी के दौर के बाद
सरदार स्वर्ण सिंह समिति का गठन किया गया
था। उन्हें [संगीत] यह काम दिया गया कि वह
इस बात पर विचार करें कि क्या संविधान में
मौलिक कर्तव्यों को शामिल करना चाहिए।
समिति ने इसकी पुरजोर सिफारिश की और उनका
मानना था कि सिर्फ अधिकारों की बात करना
देश को एक तरह से असंतुलित कर रहा है।
और फिर 42वां संविधान संशोधन हुआ जिसे
मिनी कॉन्स्टिट्यूशन भी कहा जाता है।
1976 में इसी संशोधन के जरिए संविधान में
एक नया हिस्सा जोड़ा गया। भाग फोर ए और एक
नया अनुच्छेद 51 ए [संगीत] जिसमें इन 10
कर्तव्यों को रखा गया। 11वां बाद में
जोड़ा गया जिस पर हम आगे बात करेंगे।
ठीक है? तो अब सबसे बड़े सवाल पर आते हैं।
मान लीजिए कोई इन कर्तव्यों का पालन नहीं
करता तो क्या उस पर कोई कानूनी कारवाई हो
सकती है? क्या इन्हें अदालत में इनफोर्स
करवाया जा सकता है?
और यहीं पर कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता
है। स्रोत बिल्कुल साफ कहते हैं [संगीत]
कि यह गैर न्यायोचित हैं। यानी
नॉनजस्टिसिएबल। हां, नॉन जस्टिशबल। मतलब
इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू नहीं
किया जा सकता। [संगीत] आप किसी को अदालत
में सिर्फ इसलिए नहीं घसीट सकते कि उसने
किसी मौलिक कर्तव्य का उल्लंघन किया है।
तो फिर इनका फायदा क्या है? अगर यह सिर्फ
कागज पर लिखी अच्छी बातें हैं जिन्हें कोई
मानने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नहीं
है।
यहीं पर हमें कानूनी और संवैधानिक महत्व
[संगीत] के बीच का फर्क समझना होगा। श्रोत
इन्हें एक मूल्यवान दिशा दर्शन कहते हैं।
इसका मतलब है कि यह एक तरह का नैतिक कंपास
[संगीत] है। जब संसद कोई कानून बनाती है
या जब सुप्रीम कोर्ट किसी कानून की
व्याख्या करता है तो वह इन कर्तव्यों को
ध्यान [संगीत] में रख सकते हैं। यह बताते
हैं कि एक आदर्श भारतीय नागरिक को कैसा
होना चाहिए।
मतलब यह सीधे तौर पर कानून नहीं है। पर यह
कानून बनाने और उसे समझने की प्रक्रिया को
प्रभावित करते हैं। एक तरह से यह
राष्ट्रीय चरित्र की परिभाषा है।
आपने बिल्कुल सही समझा। यह एक नैतिक और
नागरिक संहिता है जो हमें याद दिलाती है
कि एक जिम्मेदार नागरिक से क्या उम्मीद की
जाती है।
यह तो बहुत दिलचस्प है। तो फिर इस नैतिक
कंपस में [संगीत] क्या-क्या शामिल है?
सबसे पहले कौन से कर्तव्य आते हैं? स्रोत
के हिसाब से पहला समूह सीधे राष्ट्र और
उसके आदर्शों से जुड़ा है।
हां, यह वो बुनियाद है जिस पर नागरिक और
राष्ट्र का रिश्ता खड़ा होता है। पहला
कर्तव्य कहता है कि संविधान का पालन करें
और उसके आदर्शों, संस्थाओं, [संगीत]
राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर
करें।
यह तो काफी सीधा और सरल लगता है। झंडे को
सलाम करना, राष्ट्रगान पर खड़े होना।
लेकिन क्या इसमें आदर्शों और संस्थाओं का
जिक्र इसे और गहरा नहीं बना देता?
बिल्कुल यही इसकी खूबसूरती है। यह सिर्फ
प्रतीकों के सम्मान की [संगीत] बात नहीं
है। जब हम संविधान के आदर्शों की बात करते
हैं तो इसका मतलब है लोकतंत्र,
धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय,
स्वतंत्रता।
स्वतंत्रता। वो सारे मूल्य जिन पर हमारा
देश बना है। और संस्थाओं का आदर यानी
संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग जैसी
संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना। तो यह सिर्फ
एक प्रतीकात्मक काम नहीं बल्कि [संगीत] एक
वैचारिक प्रतिबद्धता है।
अगला कर्तव्य देश की संप्रभुता, एकता और
अखंडता की रक्षा करने की बात करता है।
मुझे लगता है यह एक ऐसा कर्तव्य है जो हर
नागरिक से एक [संगीत] सिपाही होने की
उम्मीद करता है बिना वर्दी के। बहुत अच्छी
उपमा है। यह कर्तव्य हमें बताता है कि देश
की एकता सिर्फ सीमाओं पर सेना का काम नहीं
है। यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। इसका
मतलब है अलगाववादी विचारों का विरोध करना,
समाज को धर्म या जाति के नाम पर तोड़ने
वाली बातों से दूर रहना और देश की एकता को
मजबूत करना। तीसरा कर्तव्य थोड़ा
काव्यात्मक लगता है। स्वतंत्रता के लिए
हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने
वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए
रखना। मुझे लगता है कई लोग इसे सिर्फ
गांधी जी और अहिंसा से जोड़कर देखते
होंगे। पर क्या इसका दायरा उससे भी बड़ा
है? सपना यह सभी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन
के उच्च आदर्श हैं। यह कर्तव्य हमें अपने
इतिहास की उस वैचारिक [संगीत] समृद्धि को
याद रखने और उसे अपने जीवन में उतारने के
लिए कहता है।
और इसी से जुड़ा चौथा कर्तव्य है देश की
रक्षा करें और आवाहन किए जाने पर राष्ट्र
की सेवा के लिए तैयार रहें। क्या इसका
मतलब अनिवार्य सैन्य सेवा से है?
नहीं। हमारे स्रोत यह साफ करते हैं कि
इसका दायरा बहुत व्यापक है। आवाहन किए
जाने का मतलब किसी भी राष्ट्रीय संकट से
हो सकता है। जैसे किसी बाढ़ या भूकंप जैसी
प्राकृतिक आपदा [संगीत] के समय राहत
कार्यों में मदद करना या किसी महामारी के
दौरान एक जिम्मेदार नागरिक की तरह नियमों
[संगीत] का पालन करना और दूसरों की सहायता
करना। यह राष्ट्र सेवा का एक व्यापक रूप
है।
तो यह पहले चार कर्तव्य एक नागरिक के तौर
पर हमारी राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित
करते हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।
संविधान हमसे सिर्फ एक अच्छे नागरिक ही
नहीं बल्कि एक अच्छे इंसान और पड़ोसी होने
की भी उम्मीद करता है।
बिल्कुल। और यहीं पर संविधान एक सामाजिक
दस्तावेज के रूप में उभरता है जो सिर्फ
सरकार चलाने के नियम नहीं बताता बल्कि
समाज [संगीत] को दिशा भी दिखाता है।
पांचवा कर्तव्य शायद इसका सबसे बड़ा
उदाहरण है। यह कहता है कि धर्म, भाषा,
प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव
[संगीत] से परे भारत के सभी लोगों में
समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का
निर्माण करें। और इसी में एक और लाइन है
जो बहुत शक्तिशाली है। उन प्रथाओं का
त्याग करें जो [संगीत] स्त्रियों के
सम्मान के विरुद्ध है।
यह अनुच्छेद का दिल है ऐसा मैं मानता हूं।
भ्रात्व यानी भाईचारा यह शब्द हमारी
प्रस्तावना [संगीत] में भी है। यह कहता है
कि हमारी पहली पहचान भारतीय है और जो
दूसरा हिस्सा है स्त्रियों के सम्मान के
विरुद्ध प्रथाओं का त्याग। यह 1976 के
हिसाब से एक एक क्रांतिकारी कदम था। यह
बात शक्तिशाली तो है लेकिन शायद सबसे
मुश्किल भी क्योंकि स्त्रियों के सम्मान
के विरुद्ध प्रथाओं की परिभाषा को लेकर ही
समाज में अक्सर मतभेद होता है। संविधान
यहां नागरिक से एक बहुत बड़ी सामाजिक
जिम्मेदारी लेने को कह रहा है कि वह अपने
आसपास हो रहे गलत के खिलाफ आवाज उठाए।
सही कहा आपने। यह निष्क्रिय रहने की इजाजत
नहीं देता। यह हमसे एक सक्रिय सामाजिक
[संगीत] सुधारक बनने की अपेक्षा करता है।
यह कहता है कि आप दहेज प्रथा, बाल विवाह
या किसी भी ऐसी परंपरा को सिर्फ इसलिए
नहीं मान सकते कि वह सदियों से चली आ रही
है। अगर वह स्त्री के सम्मान के खिलाफ है
तो उसका त्याग करना आपका कर्तव्य है। और
इसी सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करता है
छठा कर्तव्य जो हमारी सामासिक संस्कृति
यानी कॉम्पोजिट कल्चर की गौरवशाली परंपरा
को समझने और उसे बचाने की बात करता है। यह
सामासिक संस्कृति क्या है?
सामासिक संस्कृति का मतलब है भारत की
मिलीजुली विरासत। वो संस्कृति जो [संगीत]
एक धारा से नहीं बल्कि हजारों धाराओं के
मिलने से बनी है। इसमें वेदों का ज्ञान भी
है और सूफी संतों की शायरी भी। इसमें
अजंता एलोरा की कला भी है और मुगल
वास्तुकला भी। यह कर्तव्य हमें याद दिलाता
है कि भारत की असली पहचान किसी एक रंग में
नहीं बल्कि इंद्रधनुष की तरह सभी रंगों के
मेल में है। यह कट्टरता और संकीर्ण सोच के
खिलाफ एक संवैधानिक [संगीत]
संदेश है।
अब कुछ ऐसे कर्तव्यों की बात करते हैं जो
हमें एक आधुनिक और प्रगतिशील समाज बनाने
की दिशा दिखाते हैं। इनमें से सातवां
कर्तव्य तो ऐसा है जो आज की तारीख में
शायद सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है।
आप पर्यावरण की बात कर रही हैं?
जी। यह कहता है कि प्राकृतिक पर्यावरण की
जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव
हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा
प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें। यह
सोचना [संगीत] भी कमाल है कि 1976 में जब
दुनिया में क्लाइमेट चेंज की इतनी बातें
नहीं होती थी, तब हमारे संविधान में इसे
एक मौलिक कर्तव्य बनाया गया।
यह वास्तव में बहुत दूरदर्शी था। इसने
पर्यावरण संरक्षण को हर नागरिक की
व्यक्तिगत जिम्मेदारी बना दिया। यह कहता
है कि सिर्फ सरकार नीतियां नहीं बनाएगी
बल्कि आप और [संगीत] मैं भी अपने ग्रह के
प्रति जवाबदेह हैं। आज जब हम वायु,
प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ
रहे हैं तो यह कर्तव्य हमें रास्ता दिखाता
है।
मुझे आठवां कर्तव्य हमेशा से बहुत आकर्षक
लगा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और
ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास
करना क्योंकि यह बाकी कर्तव्यों से अलग
[संगीत] है। यह किसी बाहरी चीज जैसे झंडे
या पर्यावरण के बारे में नहीं है बल्कि यह
हमारे सोचने के तरीके को बदलने की बात कर
रहा है। [संगीत] यह तो एक तरह से मानसिक
क्रांति का आह्वान है।
बिल्कुल और आज के दौर में जब WhatsApp और
सोशल मीडिया पर हर तरह की गलत जानकारी और
अफवाहएं फैल जाती हैं, यह कर्तव्य और भी
जरूरी हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का
मतलब सिर्फ लैब में काम करना नहीं है।
बल्कि यह सवाल पूछना है [संगीत] कि जो खबर
मेरे पास आई है, उसका सोर्स क्या है? क्या
इसका कोई सबूत है? यह हमें एक बेहतर
ज्यादा जागरूक डिजिटल [संगीत] सिटीजन
बनाता है। यह अंधविश्वास और रूढ़िवाद पर
तर्क और ज्ञान की जीत का आहान है।
और इसी सोच से जुड़ा है नोवा कर्तव्य।
सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और
हिंसा से दूर रहें। यह बहुत बुनियादी बात
लगती है। लेकिन हम अक्सर विरोध प्रदर्शनों
में बसों को जलते हुए या सरकारी इमारतों
को नुकसान पहुंचाते हुए देखते हैं।
यह बुनियादी है। लेकिन हम इसकी अहमियत भूल
जाते हैं। यह कर्तव्य हमें याद दिलाता है
कि वह बस, वो ट्रेन, वो पार्क किसी सरकार
का नहीं बल्कि हमारा है। हम अपने ही टैक्स
के पैसों से बनी संपत्ति को नुकसान पहुंचा
रहे होते हैं। और हिंसा से दूर रहना तो
हमारे स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र
था। यह गांधीवादी आदर्शों को संवैधानिक
[संगीत] कर्तव्य का रूप देता है।
और फिर आता है दवां कर्तव्य जो कहता है कि
व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी
क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का
निरंतर प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर
प्रगति की नई ऊंचाइयों को छू सके। इसकी
भाषा थोड़ी जटिल है।
हां, लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा और सुंदर
है। इसका सीधा सा मतलब है कि आप जो भी
करें अपना बेस्ट दें। चाहे आप एक छात्र
हो, एक किसान हो, [संगीत] एक वैज्ञानिक
हो, एक खिलाड़ी हो या एक कलाकार। क्योंकि
जब हर कोई अपना काम बेहतरीन तरीके से
करेगा तो देश अपने आप आगे बढ़ेगा। यह
व्यक्तिगत उत्कृष्टता को राष्ट्रीय प्रगति
से जोड़ता है।
इस पूरी सूची में एक कर्तव्य ऐसा है जो
मूल सूची में नहीं था। हम
इसे बाद में जोड़ा गया और आज यह शायद सबसे
महत्वपूर्ण [संगीत]
कर्तव्यों में से एक है।
जी हां, यह 11वां और सबसे नया मौलिक
कर्तव्य है जो शिक्षा से जुड़ा है।
यह कहता है कि माता-पिता या संरक्षक का यह
कर्तव्य होगा कि वे छ से 14 वर्ष तक की
आयु वाले अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को
शिक्षा के अवसर प्रदान करें।
इसे 86वें संविधान संशोधन 2002 के जरिए
जोड़ा गया था। यह वही संशोधन है जिसने
शिक्षा को छ से 14 साल के बच्चों के लिए
एक मौलिक अधिकार बनाया था। तो यहां पर
अधिकार और कर्तव्य का वह संतुलन जिसकी हम
बात कर रहे थे एकदम [संगीत] साफ दिखता है।
बच्चे का अधिकार और माता-पिता का कर्तव्य
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते
हैं।
बिल्कुल यह एक शानदार उदाहरण है। एक तरफ
राज्य का यह दायित्व है कि वह बच्चों को
मुफ्त शिक्षा दें जो कि अनुच्छेद 21 क के
तहत उनका मौलिक अधिकार है। वहीं दूसरी तरफ
यह संशोधन माता-पिता या अभिभावकों पर यह
कर्तव्य डालता है कि वे यह सुनिश्चित
[संगीत] करें कि बच्चा स्कूल तक पहुंचे।
यह शिक्षा को एक साझा जिम्मेदारी बनाता
है। राज्य की भी और परिवार की भी।
तो इस पूरी चर्चा को समेटे तो हम [संगीत]
कह सकते हैं कि मौलिक कर्तव्य सिर्फ एक
सूची नहीं है बल्कि यह एक आईना है जो हमें
दिखाते हैं कि एक भारतीय नागरिक होने का
मतलब क्या है? यह हमें याद दिलाते हैं कि
अधिकार हमें शक्ति देते [संगीत] हैं लेकिन
कर्तव्य हमें दिशा देते हैं।
आपने बिल्कुल सही कहा और भले यह कानूनी
रूप से बाध्यकारी ना हो इनका [संगीत]
नैतिक और सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा है। यह
उस आदर्श नागरिक की तस्वीर पेश [संगीत]
करते हैं जिसकी हमारा संविधान कल्पना करता
है। एक ऐसा नागरिक जो जागरूक, जिम्मेदार,
तर्कसंगत, दयालु और राष्ट्र निर्माण में
एक सच्चा भागीदार हो। यह हमें सिर्फ
अधिकार मांगने वाला नहीं बल्कि
जिम्मेदारियां निभाने वाला नागरिक बनने के
[संगीत] लिए प्रेरित करते हैं।
इन कर्तव्यों पर इतनी गहराई से बात करने
के बाद एक सवाल मेरे मन में आ रहा है और
हम चाहेंगे कि हमारे श्रोता इस पर सोचें।
स्रोत हमें बताते हैं कि यह कर्तव्य
कानूनी तौर पर लागू नहीं किए जा सकते हैं।
पर सोचिए [संगीत] अगर भविष्य में इनमें से
किसी एक कर्तव्य को जैसे पर्यावरण की
रक्षा या वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा
देना कानूनी तौर पर लागू करने योग्य बना
दिया जाए और इसके उल्लंघन पर सजा का
प्रावधान कर दिया जाए तो हमारे समाज और
हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसका क्या
असर पड़ेगा? अधिकार और कर्तव्य के बीच का
यह नाजुक संतुलन कैसे बदलेगा?
किसी भी देश का संविधान उसकी एक तरह से
रूल बुक होता है। क्या कर सकते हैं? क्या
नहीं?
लेकिन सोचिए अगर संविधान में एक विश लिस्ट
भी हो। सरकार के लिए एक नैतिक कंपास जो
बताएं कि एक आदर्श देश [संगीत] कैसा दिखना
चाहिए। और भारतीय संविधान में ठीक यही चीज
है। इन्हें कहते हैं राज्य के नीति
निर्देशक तत्व या डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स
ऑफ स्टेट पॉलिसी। ये मतलब कानून नहीं है
बल्कि एक सपना है एक बेहतर भारत बनाने का
रोड मैप।
तो आज हम इसी रोड मैप को थोड़ा गहराई से
समझने की कोशिश करेंगे। हमारे पास जो
स्रोत हैं वो बताते हैं कि यह सिद्धांत
संविधान के भाग चार में है। अनुच्छेद 36
से 51 तक और एक दिलचस्प बात यह भी है कि
ये आईडिया आयरलैंड के संविधान से लिया गया
है।
हम्म लेकिन इसमें एक बड़ा पेच है।
बिल्कुल और वो पेच ये है कि आप इन
सिद्धांतों को लेकर अदालत नहीं जा सकते।
मतलब अगर सरकार इनमें से कोई वादा कह सकते
हैं, पूरा ना करें तो आप उस पर मुकदमा
नहीं कर सकते। जैसा कि आप मौलिक अधिकारों
के हनन पर कर सकते हैं।
हां बिल्कुल। तो फिर सवाल यही उठता है कि
इनका फायदा क्या है? अगर ये सिर्फ कागज पर
लिखी अच्छी बातें हैं जिन्हें लागू करने
की कोई कानूनी मजबूरी नहीं तो क्या ये एक
तरह के खोखले वादे नहीं है?
हम्म। एक बहुत जरूरी सवाल है।
चलिए इसी सवाल की तह तक जाते हैं और इन
सिद्धांतों का असली मतलब खोजते हैं। ठीक
है? है तो चलिए इसे खोल कर देखते हैं।
हमारे स्रोत बताते हैं कि इन सिद्धांतों
का सबसे बड़ा लक्ष्य है एक कल्याणकारी
राज्य बनाना। एक वेलफेयर स्टेट।
सही कहा।
अनुच्छेद 38 साफ-साफ कहता है कि राज्य का
काम है लोगों का कल्याण करना और सामाजिक,
आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करना।
यह सुनने में बहुत बड़ा और आदर्शवादी लगता
है।
लगता है पर इसे जमीन पर कैसे उतारा जाए यह
भी बताया गया है।
अनुच्छेद 39 इसी विज़न को हकीकत में बदलने
के लिए कुछ ठोस निर्देश देता है और इसमें
कुछ बहुत ही क्रांतिकारी विचार हैं।
जैसे कि [संगीत] जैसे समान कार्य के लिए
समान वेतन का सिद्धांत और यह सिर्फ
पुरुषों और महिलाओं के लिए नहीं है। यह हर
तरह की असमानता को खत्म करने की दिशा में
एक बहुत बड़ा कदम है। अच्छा।
स्रोत में अनुच्छेद 39 में एक और बात पर
बहुत जोर है कि देश के जो संसाधन है मतलब
धन और संपत्ति उनका बंटवारा ऐसा हो कि
फायदा कुछ ही लोगों के हाथ में ना रह जाए।
हां कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक
पहुंचे।
तो क्या यह उसी समाजवादी सोच को नहीं
दिखाता जिसके बारे में हम अक्सर सुनते
हैं?
बिल्कुल। यह उसी समाजवादी संकल्पना का एक
संवैधानिक आधार है। इसका मतलब यह नहीं है
कि सरकार सब की संपत्ति छीन लेगी जैसा कुछ
लोग समझते हैं। इसका मतलब है कि सरकार की
आर्थिक नीतियां ऐसी हों जो असमानता को कम
करें और इसी अनुच्छेद में मुफ्त कानूनी
सहायता की बात भी है।
हम यह बहुत गहरी बात है।
बहुत
इसका मतलब है कि न्याय सिर्फ अमीरों के
लिए नहीं होना चाहिए। अगर किसी के पास
वकील करने के पैसे नहीं है तो यह सरकार का
कर्तव्य है कि वह मदद दे। तो, एक तरफ तो
यह सिद्धांत बड़े आर्थिक विज़न [संगीत] की
बात करते हैं। लेकिन हमारे स्रोत यह भी
दिखाते हैं कि यह आम नागरिक की रोजमर्रा
की जिंदगी तक पहुंचते हैं।
हां, और यही तो इनकी खूबसूरती है।
अनुच्छेद 41, 42 और 43 को हमें एक साथ
देखना चाहिए। यह एक तरह से भारत के
कामगारों के लिए एक अधिकारों का घोषणापत्र
है।
अच्छा। अनुच्छेद 41 कहता है कि राज्य कुछ
विशेष परिस्थितियों में जैसे बुढ़ापा,
बीमारी या बेरोजगारी उसमें लोगों को काम,
शिक्षा और सरकारी सहायता पाने में मदद
करेगा।
एक मिनट, यहां काम पाने का अधिकार की बात
की गई है। लेकिन यह तो मौलिक अधिकार नहीं
है। तो क्या यह एक खाली वादा नहीं है। अगर
सरकार हर किसी को नौकरी नहीं दे सकती, तो
इस लाइन का असल मतलब क्या है? यह एक बहुत
जरूरी सवाल है और यहीं इन निदेशक तत्वों
का असली सार छिपा है। यह अधिकार की गारंटी
नहीं है। यह एक निर्देश है। संविधान सरकार
से यह नहीं कह रहा कि हर किसी को सरकारी
नौकरी दो। वो शायद संभव भी ना हो। हम
वो कह रहा है कि अपनी नीतियां ऐसी बनाओ
जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो। मनरेगा
जैसी योजनाएं [संगीत] इसी सिद्धांत की एक
मिसाल है।
अच्छा। जहां सरकार काम की गारंटी देने की
कोशिश करती है।
यह एक लक्ष्य है। कोई कानूनी वादा नहीं।
समझ गया? तो ये एक दिशा है। मंजिल की
गारंटी नहीं।
और अनुच्छेद 42 और 43 में क्या है?
अनुच्छेद 42 काम की मानवीय दशाओं की बात
करता है। मतलब काम करने की जगह सुरक्षित
और स्वस्थ हो और खासतौर पर महिलाओं के लिए
प्रसूति सहायता यानी मेटरनिटी रिलीफ का
प्रावधान करने का निर्देश देता है।
[संगीत] और इसी के आधार पर बाद में कानून
भी बने हैं।
हां, मेटरनिटी बेनिफिट एक्ट जैसे कानून
यहीं से आए और अनुच्छेद 43 सिर्फ न्यूनतम
मजदूरी की नहीं बल्कि निर्वाह मजदूरी की
बात [संगीत] करता है।
निर्वाह मजदूरी
यानी इतनी मजदूरी कि एक इंसान और उसका
परिवार सिर्फ जिंदा ना रहे बल्कि सम्मान
से जी सके।
तो यह तो हुई आर्थिक न्याय की बात,
[संगीत] कामगारों के सम्मान की बात। लेकिन
हमारे श्रोत बताते हैं कि संविधान बनाने
वाले यह भी जानते थे कि सिर्फ पैसे से
समाज नहीं बदलता। इसके लिए गहरे सामाजिक
सुधारों की भी जरूरत [संगीत] है।
बिल्कुल और यह इस रोड मैप का अगला और शायद
सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ाव है। अब जब आप
रोटी, कपड़ा और मकान की बात कर लेते हैं,
तो आपको समाज के ताने-बाने को भी देखना
पड़ता है। और यहीं पर अनुच्छेद 44 सामने
आता है।
यानी सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल
संहिता, यूनिफार्म सिविल कोड। यह तो हमारे
देश के सबसे ज्यादा बहस वाले मुद्दों में
से एक है।
हमेशा से रहा है। श्रोत बताते हैं कि
संविधान सभा में भी इस पर बहुत बहस हुई
थी।
तो इसे मौलिक अधिकारों की तरह अनिवार्य
क्यों नहीं बनाया गया? इसे निर्देशक
तत्वों में क्यों रखा गया?
यह एक बहुत ही कह सकते हैं समझदारी भरा
राजनीतिक कदम था। एक तरह का समझौता।
संविधान बनाने वालों में एक बड़ा वर्ग था
जो इसे एक आधुनिक और सेुलर देश की निशानी
मानता था। लेकिन साथ ही कई धार्मिक
समुदायों की तरफ से इसका कड़ा विरोध भी
था।
हम जो अपने पर्सनल लॉ को बनाए रखना चाहते
थे।
सही कहा। तो इसे निदेशक तत्वों में डालकर
संविधान निर्माताओं ने भविष्य के भारत के
लिए एक आदर्श तो तय कर दिया, लेकिन इसे
तुरंत लागू करके देश को बांटने का जोखिम
नहीं उठाया। उन्होंने यह फैसला आने वाली
पीढ़ियों पर छोड़ दिया। यह वाकई दिलचस्प
है। अच्छा सामाजिक सुधार की इस कड़ी में
शिक्षा की क्या भूमिका है?
शिक्षा को तो नींव माना गया है। अनुच्छेद
45 कहता है कि राज्य छ साल तक के सभी
बच्चों की देखभाल और मुफ्त और अनिवार्य
शिक्षा के लिए अवसर देगा। दिलचस्प बात यह
है कि पहले यह 14 साल तक के बच्चों के लिए
था।
हां, लेकिन फिर 86वें संशोधन के बाद
शिक्षा का अधिकार तो मौलिक अधिकार बन गया।
बिल्कुल। और इस अनुच्छेद का रूप बदल गया।
यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे एक
निदेशक तत्व समय के साथ एक शक्तिशाली
मौलिक अधिकार में बदल सकता है।
और क्या इन सिद्धांतों में समाज के उन
वर्गों के लिए कुछ खास है जिन्हें
ऐतिहासिक रूप से पीछे छोड़ दिया गया
कि वो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित
जनजातियों और दूसरे कमजोर वर्गों के
शैक्षिक और आर्थिक हितों का विशेष ध्यान
रखेगा
और उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से
बचाएगा। हां ये सिर्फ एक सामान्य निर्देश
नहीं है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि
हमारे समाज में ऐतिहासिक रूप से अन्याय
हुआ है और उसे ठीक करने के लिए विशेष
प्रयासों की जरूरत है। आरक्षण जैसी
नीतियां अपनी ताकत एक तरह से इसी अनुच्छेद
से पाती हैं।
तो हमने आर्थिक और सामाजिक न्याय [संगीत]
की बात कर ली। लेकिन एक अच्छे जीवन के लिए
और क्या जरूरी है? हमारे स्रोत बताते हैं
कि संविधान निर्माता स्वास्थ्य और
पर्यावरण जैसे मुद्दों को लेकर भी बहुत
सजग थे।
हां, उनका जो दृष्टिकोण था वो बहुत समग्र
था। अनुच्छेद 47 लोगों के पोषण स्तर, जीवन
स्तर और जन स्वास्थ्य को सुधारने को राज्य
का प्राथमिक कर्तव्य मानता है। इसी
अनुच्छेद में नशीले पेय और हानिकारक दवाओं
पर प्रतिबंध लगाने की बात भी कही गई है।
अच्छा तो देश के कई राज्यों में जो
शराबबंदी के कानून हैं, वह यहीं से
प्रेरणा लेते हैं।
बिल्कुल।
और पर्यावरण आज यह दुनिया का इतना बड़ा
मुद्दा है। लेकिन क्या दशकों पहले संविधान
में इसके बारे में सोचा गया था? यह
संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता का सबसे
बड़ा प्रमाण है। अनुच्छेद 48 में साफ तौर
पर पर्यावरण के संरक्षण और सुधार और वन
[संगीत] और वन्य जीवों की रक्षा करने की
बात कही गई है। यह सोचना कमाल का है कि
उन्होंने 1970 के [संगीत] दशक में ही इसे
संविधान में जोड़ दिया था।
जब दुनिया में पर्यावरण को लेकर आज ऐसी
चिंता नहीं थी।
बिल्कुल नहीं थी। इसी अनुच्छेद ने भारत
में पर्यावरण से जुड़े कानूनों की नींव
रखी। तो इसी से जुड़ा एक और अनुच्छेद है
अनुच्छेद 48 जिसमें कृषि और पशुपालन को
बढ़ावा देने और गोवध पर रोक की बात है। यह
भी काफी विवादित रहा है।
हां, यह अनुच्छेद आर्थिक और सामाजिक दोनों
पहलुओं को छूता है। एक [संगीत] तरफ यह
कृषि को आधुनिक बनाने की बात करता है तो
दूसरी तरफ गाय और दूसरे दुधारू पशुओं के
वध पर रोक लगाने का निर्देश देता है। यह
भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ से
जुड़ा एक संवेदनशील पहलू है। हम और इस पर
अक्सर बहस होती है कि यह एक आर्थिक
निर्देश है या धार्मिक
सही है।
इन सब के अलावा क्या हमारी ऐतिहासिक धरोहर
के बारे में भी कुछ कहा गया है?
जरूर अनुच्छेद 19 कहता है कि राष्ट्रीय
महत्व के सभी स्मारकों, जगहों और चीजों की
रक्षा करना राज्य का दायित्व है। तो यह
सिद्धांत सिर्फ भविष्य बनाने की बात नहीं
करते बल्कि हमारे अतीत को सहेजने का भी
निर्देश देते हैं।
ठीक है? तो यह सारे सिद्धांत सरकार को
बताते हैं कि उसे देश के अंदर क्या करना
है। लेकिन सरकार के कामकाज के तरीके और
दुनिया के साथ [संगीत] भारत के रिश्ते के
बारे में यह क्या कहते हैं?
यहां दो बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद हैं।
पहला है अनुच्छेद 50 जो कहता है कि
न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा
जाना चाहिए।
इसे सरल भाषा में समझाएंगी। [संगीत]
इन्हें अलग रखने की जरूरत क्यों है? इसका
मतलब है कि इंसाफ करने वाली संस्थाएं यानी
अदालतें और सरकार चलाने वाली संस्थाएं
यानी मंत्री और अधिकारी एक दूसरे से
स्वतंत्र हो। सोचिए अगर जज को अपना फैसला
सुनाने से पहले किसी मंत्री से पूछना पड़े
तो क्या कभी निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा?
नहीं कभी नहीं।
यह सिद्धांत लोकतंत्र की नींव है। यह
सुनिश्चित करता है कि कानून का राज चले
किसी व्यक्ति का नहीं। और दूसरा अनुच्छेद
वो है अनुच्छेद 51 जो भारत की विदेश नीति
का आधार है। यह कहता है कि राज्य
अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा
देगा। राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और
सम्मानजनक संबंध बनाए रखेगा
और अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत से
सुलझाने की कोशिश करेगा। बिल्कुल वसुदेव
कुटुंबकम यानी पूरी दुनिया एक परिवार है
कि जो भारतीय भावना है यह उसका संवैधानिक
प्रतिबिंब है।
तो हमने देखा कि राज्य के नीति निर्देशक
तत्व असल में भारतीय संविधान की आत्मा
[संगीत] का एक बहुत अहम हिस्सा हैं। यह
समान वेतन से लेकर ग्राम पंचायतों,
पर्यावरण संरक्षण से लेकर अंतरराष्ट्रीय
शांति तक हर पहलू को छूते हैं। यह सरकार
के लिए एक नैतिक दिशा निर्देशक की तरह
हैं।
बिल्कुल। और अब हम उस सवाल पर वापस आते
हैं जो हमने शुरू में उठाया था कि अगर यह
कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है तो इनका
महत्व क्या है? इनका महत्व का नहीं बल्कि
राजनीतिक और नैतिक है। कोई भी सरकार इनकी
पूरी तरह से अनदेखी नहीं कर सकती। क्योंकि
चुनाव के समय जनता इन्हीं पैमानों पर उनके
काम को तौलती है। यह वो आईना है जिसमें हर
सरकार को अपनी शक्ल देखनी पड़ती है।
यह सिद्धांत हमें याद दिलाते हैं कि आजादी
का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से छुटकारा पाना
नहीं था। उसका असली मतलब था हर नागरिक के
लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित
करना।
सही कहा। यह वो वादे हैं जो संविधान ने
भारत के लोगों से किए हैं। कुछ पूरे हो गए
जैसे शिक्षा का अधिकार या पंचायती राज।
कुछ पर काम चल रहा है और कुछ अभी भी एक
दूर का सपना लगते हैं। लेकिन यह रोड मैप
हमारे पास है जो हमें हमेशा याद दिलाता है
कि हमें जाना कहां है।
इस पूरी चर्चा से एक विचार मन में आता है।
स्रोत यह साफ करते हैं कि यह सिद्धांत
कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है ताकि
सरकारें अपनी क्षमता, अपने संसाधन और उस
समय की जरूरतों के हिसाब से इन्हें लागू
कर सकें। तो क्या यही लचीलापन इनकी सबसे
बड़ी ताकत है? अगर इन्हें मौलिक अधिकारों
की तरह सख्त और बाध्यकारी बना दिया जाता
तो क्या हमारा देश इतने अलग-अलग विचारों
और प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ पाता? एक
मार्गदर्शक सिद्धांत की असली ताकत शायद
उसके लचीलेपन में ही है ना कि उसकी सख्ती
में। इस पर सोचना दिलचस्प होगा।
[संगीत]
[संगीत]
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