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Complete Indian Polity Like Never Before! AI Animation Crash Course for SSC CGL, SSC CHSL, UPSC 2026

1h 40m 29s16,985 words2,487 segmentsHindi

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0:08

एडवांस्ड इंडियन माइंड लेकर आया है

0:10

जो खासतौर पर आप जैसे स्टूडेंट्स के लिए

0:12

है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर

0:14

रहे हैं। मतलब अगर आप एसएससी, रेलवे,

0:17

यूपीएससी या पुलिस जैसे एग्जाम्स का सोच

0:19

रहे हैं तो यह आपके लिए ही है। और हां,

0:22

इसकी विश्वसनीयता की चिंता बिल्कुल मत

0:24

कीजिएगा क्योंकि इसका सारा [संगीत] कंटेंट

0:26

वजीरामैन रवि, दृष्टि आईएएस और एम

0:28

लक्ष्मीकांत की किताब जैसे टॉप सोर्सेस को

0:31

मिलाकर बनाया गया है। दूसरी बात यह सीरीज

0:34

भारतीय राजनीति का पूरा [संगीत] का पूरा

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सिलेबस कवर करती है और सीखने को आसान

0:38

बनाने के लिए पूरे सब्जेक्ट को [संगीत] 27

0:40

मुख्य टॉपिक्स में बांट दिया गया है और

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आखिर में आपको एक अंदाजा देने के लिए बता

0:44

दूं कि इसमें आपको सब कुछ मिलेगा। संविधान

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कैसे बना? हमारे मौलिक अधिकार क्या हैं?

0:49

और नागरिकता जैसे बेसिक कांसेप्ट से लेकर

0:52

सरकार की पूरी बनावट [संगीत]

0:53

जैसे राष्ट्रपति, संसद यानी लोकसभा,

0:56

राज्यसभा और सुप्रीम कोर्ट कैसे काम करते

0:58

हैं। यहां तक कि चुनाव आयोग और यूपीएससी

1:01

जैसे जरूरी संस्थानों के बारे में भी बात

1:03

करेंगे। तो संक्षेप में यह सीरीज

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प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भारतीय

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राजनीति के हर जरूरी पहलू को समझने का एक

1:10

सेंट्रलाइज्ड और भरोसेमंद जरिया है।

1:12

एक हजारे जैसा है। [हंसी]

1:15

हां। और हमारा मकसद सिर्फ इस सिलेबस को

1:17

पढ़ना नहीं है बल्कि इसके पीछे जो लॉजिक

1:20

है उसे समझना है।

1:21

सही कहा। और इसे समझना सिर्फ परीक्षा के

1:23

लिए नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक होने

1:25

के लिए भी बहुत जरूरी।

1:26

इस ऑपरेटिंग सिस्टम की बुनियाद से शुरू

1:28

करते हैं भारत का संविधान।

1:38

तो आज हम भारतीय राज व्यवस्था से जुड़े एक

1:41

दस्तावेज पर एक गहरी नजर डालने वाले हैं।

1:45

जी।

1:46

विषय है भारत के संविधान का निर्माण।

1:49

अब जब हम संविधान कहते हैं तो अक्सर दिमाग

1:52

में एक एक भारीभरकम कानून की किताब की

1:55

तस्वीर आती है।

1:56

बिल्कुल बिल्कुल।

1:57

लेकिन ये सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज तो है

1:59

नहीं। यह एक नए राष्ट्र की उम्मीदों, उसके

2:03

सपनों और कह सकते हैं कि उसकी आत्मा का

2:06

प्रतिबिंब है।

2:07

बिल्कुल सही कहा आपने। किसी भी देश का

2:09

संविधान सिर्फ नियमों का संग्रह नहीं

2:12

होता।

2:13

ये उस देश की राजनीतिक [संगीत] और सामाजिक

2:15

सोच का आईना होता है। हमारे श्रोत इसे

2:18

सर्वोच्च महान ग्रंथ कहते हैं।

2:20

अच्छा।

2:20

जो सिर्फ शासन चलाने का तरीका नहीं बताता

2:22

बल्कि यह भी तय करता है कि देश किस दिशा

2:25

में मतलब किन मूल्यों पर आगे बढ़ेगा। तो

2:27

इसका मकसद एक खास तरह की राजनीतिक

2:30

संस्कृति को जन्म देना था।

2:31

जी हां, एक ऐसी संस्कृति जो लोकतंत्र,

2:34

न्याय और बराबरी पर आधारित हो।

2:36

और ये जरूरत महसूस क्यों हुई? मेरा मतलब

2:38

है कई देशों में तो अलिखित संविधान भी

2:41

होते हैं। भारत को एक इतने बड़े लिखित

2:44

संविधान की क्या जरूरत आन पड़ी?

2:46

देखिए यहां पर भारत का जो संदर्भ है उसे

2:49

समझना जरूरी है।

2:50

हम

2:50

सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद जब देश

2:53

आजाद हो रहा था तो वो सिर्फ एक राजनीतिक

2:55

आजादी नहीं थी। सही बात है।

2:57

वो एक सामाजिक और आर्थिक बदलाव की भी

3:00

शुरुआत थी। सदियों पुरानी रूढ़ियां,

3:02

जमींदारी प्रथा, [संगीत] छुआछूत जैसी मतलब

3:05

इतनी सारी समस्याओं से जूझते हुए एक

3:08

आधुनिक राष्ट्र बनाना था।

3:09

और इसके लिए सिर्फ वादे काफी नहीं थे।

3:12

बिल्कुल नहीं। इसके लिए ठोस [संगीत] लिखित

3:14

गारंटी की जरूरत थी। एक ऐसा दस्तावेज जो

3:17

हर नागरिक को भरोसा दिलाए कि नए भारत में

3:19

उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

3:21

यानी ये सिर्फ सरकार बनाने का मैनुअल नहीं

3:23

बल्कि समाज बदलने का एक रोड मैप था। ठीक

3:26

और इस विशाल काम को करने के लिए [संगीत]

3:29

एक संविधान सभा यानी कॉन्स्टिटुएंट

3:31

असेंबली बनाई गई।

3:33

जी जिसकी नीव जुलाई 1946 में कैबिनेट मिशन

3:36

की सिफारिशों पर रखी गई।

3:37

कि भारतीय ही अपने देश का भविष्य तय करने

3:40

जा रहे थे।

3:40

और यह सभा आप कह सकती हैं कि उस वक्त के

3:43

हिंदुस्तान का एक छोटा रूप थी। इसमें कुल

3:46

389 सदस्य तय किए गए थे।

3:48

389

3:49

हां, यह संख्या ही बताती है कि यह काम

3:51

कितने बड़े पैमाने पर होने वाला था। कोशिश

3:54

यह थी कि देश के हर कोने हर समुदाय की

3:56

आवाज को इसमें जगह मिले।

3:58

389 सदस्य यह तो आज की संसद के सदस्यों से

4:02

भी ज्यादा हैं। लेकिन ये आए कहां से थे?

4:05

क्या इन्हें मतलब जनता ने सीधे चुना था?

4:08

नहीं। उस वक्त सीधे चुनाव कराना संभव नहीं

4:10

था। इसलिए एक मिलाजुला मॉडल अपनाया गया।

4:13

अच्छा वो कैसे?

4:14

ज्यादातर सदस्य करीब 292 वो ब्रिटिश भारत

4:17

के प्रांतों की विधानसभाओं से चुने गए थे।

4:19

ठीक है।

4:20

93 सीटें देसी रियासतों के लिए रखी गई थी।

4:22

जिनके प्रतिनिधि राजा महाराजाओं द्वारा

4:24

मनोनीत किए जाने थे और चार सदस्य दिल्ली

4:27

अजमेर मारवाड़ जैसे चीफ कमिश्नर क्षेत्रों

4:30

से थे।

4:30

दिलचस्प बात यह है कि यह सीटें मनमाने ढंग

4:34

से नहीं बांटी गई। इसका आधार जनसंख्या थी।

4:37

जी मोटे तौर पर हर 10 लाख लोगों पर एक

4:40

[संगीत] प्रतिनिधि।

4:41

ये उस दौर में एक कमाल का लोकतांत्रिक

4:44

सिद्धांत था।

4:45

हां और सिर्फ इतना ही नहीं ये भी ध्यान

4:47

रखा गया कि मुख्य समुदायों को सही

4:50

प्रतिनिधित्व मिले। मतलब

4:51

मतलब सीटों को [संगीत] मुस्लिम, सिख और

4:54

सामान्य जिसमें बाकी सब आते थे इन

4:56

श्रेणियों में भी बांटा गया था। यह उस समय

4:59

की राजनीतिक हकीकत को स्वीकार करने जैसा

5:01

[संगीत] था ताकि किसी को यह ना लगे कि

5:03

उनकी अनदेखी हो रही है।

5:05

तो अब यह सभा बन चुकी है जिसमें पूरे देश

5:07

से लोग आ गए हैं। काम शुरू होता है। 9

5:10

दिसंबर 1946 को पहली बैठक हुई।

5:13

जी।

5:13

उस दिन दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल का

5:15

माहौल कैसा रहा होगा?

5:16

माहौल में उत्साह [संगीत] तो था लेकिन एक

5:18

एक बड़ी चिंता भी थी। मुस्लिम लीग ने इस

5:21

पहली बैठक का बहिष्कार कर दिया था।

5:23

ओहो

5:23

वो एक अलग संविधान सभा और पाकिस्तान की

5:26

मांग पर अड़े थे। तो शुरुआत ही एक तरह के

5:29

अधूरेपन [संगीत] के सास के साथ हुई। उस

5:30

दिन सभा में सिर्फ 211 सदस्य ही मौजूद थे।

5:34

[संगीत]

5:34

यानी एकता की कोशिशों पर बंटवारे का साया

5:37

पहले दिन से ही मंडरा रहा था। तो इस पहली

5:41

कुछ हद तक अधूरी बैठक की अध्यक्षता किसने

5:44

की? एक परंपरा होती है कि [संगीत] जब तक

5:46

कोई स्थाई अध्यक्ष नहीं चुना जाता तब तक

5:49

सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य को अस्थाई

5:52

अध्यक्ष बनाया जाता है।

5:53

अच्छा

5:53

उस हिसाब से डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा को

5:56

यह सम्मान मिला लेकिन ये एक काम चलाऊ

5:58

व्यवस्था थी।

5:59

हम

5:59

दो दिन बाद ही 11 दिसंबर को सभा ने अपना

6:02

स्थाई अध्यक्ष चुन लिया। डॉ. राजेंद्र

6:05

प्रसाद।

6:06

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का चुनाव एक अहम मोड़

6:08

रहा होगा।

6:09

बिल्कुल। उन्हें एक ऐसी सभा को संभालना था

6:12

जिसमें सैकड़ों अलग-अलग विचार और हित टकरा

6:14

रहे थे। उनकी शांत और सबको साथ लेकर चलने

6:18

वाली छवि ने इसमें जरूर मदद की होगी।

6:20

निश्चित रूप से वो एक सर्वमान्य नेता थे

6:23

जिनका सम्मान हर पक्ष करता था। सभा को एक

6:26

स्थिर नेतृत्व मिल गया था। लेकिन अब बड़ा

6:28

सवाल यह था कि ठीक है हम संविधान बनाने

6:32

बैठे हैं। पर इस संविधान का दर्शन क्या

6:34

होगा? इसकी आत्मा क्या होगी? और यहीं पर

6:38

पंडित जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य

6:40

प्रस्ताव यानी ऑब्जेक्टिव रेजोल्यूशन की

6:43

भूमिका आती है।

6:44

जी हां, [संगीत] 13 दिसंबर 1946 को

6:46

उन्होंने इसे सभा के सामने रखा।

6:48

यह महज एक प्रस्ताव नहीं था। यह एक तरह से

6:51

भावी संविधान का घोषणापत्र था।

6:53

आपने बिल्कुल सही शब्द इस्तेमाल किया

6:55

घोषणापत्र। इस प्रस्ताव ने ही वह दिशा तय

6:58

की जिस पर संविधान को चलना था।

7:00

क्या था इस प्रस्ताव में?

7:01

इसमें कहा गया कि भारत एक संपूर्ण [संगीत]

7:03

प्रभुत्व संपन्न गणराज्य होगा। यह अपने

7:06

सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और

7:08

राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करेगा। विचार,

7:11

अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की

7:13

स्वतंत्रता देगा। अल्पसंख्यकों, [संगीत]

7:15

पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों के हितों की

7:18

रक्षा करेगा।

7:18

यानी यह वो वादे थे जिन्हें बाद में

7:21

संविधान की प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों

7:24

में ढाला गया।

7:24

बिल्कुल। यह वो ध्रुव तारा था जिसे देखकर

7:27

संविधान निर्माण का जहाज आगे बढ़ा। तो अब

7:29

हमारे पास एक दर्शन है, एक दिशा है। लेकिन

7:32

इन ऊंचे-ऊंचे आदर्शों को कानून की भाषा

7:35

में कैसे बदला जाए? यह तो बहुत ही पेचीदा

7:37

काम होगा।

7:38

और इसी पेचीदा काम को करने के लिए अलग-अलग

7:40

समितियां बनाई गई।

7:42

अच्छा, कमिटीज़

7:44

जी।

7:44

कोई समिति मौलिक अधिकारों पर काम कर रही

7:47

थी, तो कोई केंद्र और राज्यों के बीच

7:49

शक्तियों के बंटवारे पर। सरदार पटेल

7:51

प्रांतीय संविधान और मौलिक अधिकारों की

7:54

समिति देख रहे थे तो नेहरू संघ की

7:56

शक्तियों से जुड़ी समिति के [संगीत]

7:58

अध्यक्ष थे। काम को छोटे-छोटे हिस्सों में

8:00

बांट दिया गया था।

8:01

और इन सब में सबसे मशहूर और सबसे

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महत्वपूर्ण समिति थी प्रारूप [संगीत]

8:05

समिति यानी ड्राफ्टिंग कमेटी।

8:07

हां, जिसकी अध्यक्षता कर रहे थे डॉ.

8:10

भीमराव अंबेडकर।

8:11

जी हां, इस समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को

8:15

हुआ यानी आजादी के ठीक बाद। इसका काम था

8:19

बाकी सभी समितियों की सिफारिशों को मिलाकर

8:21

[संगीत] संविधान का पहला मसौदा मतलब

8:24

ड्राफ्ट तैयार करना।

8:25

यह एक बेहद मुश्किल और बारीक काम था।

8:28

बहुत ज्यादा डॉ. अंबेडकर और उनकी सात

8:32

सदस्यों की टीम ने दुनिया भर के संविधानों

8:35

का अध्ययन किया और भारत की जरूरतों के

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हिसाब से एक ढांचा [संगीत] तैयार किया।

8:39

यह जानना दिलचस्प है कि इस समिति में

8:42

सिर्फ कानूनी दिग्गज थे। डॉक्टर अंबेडकर,

8:45

के एम मुंशी, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर

8:49

जी यह सब अपने समय के चोटी के वकील और

8:52

विद्वान थे।

8:53

शायद इसीलिए हमारा संविधान इतना विस्तृत

8:55

और सटीक है।

8:56

इसका एक असर यह हुआ कि संविधान की भाषा

8:59

बहुत कानूनी और स्पष्ट बनी। हर चीज को

9:02

परिभाषित करने की कोशिश की गई ताकि भविष्य

9:05

में कोई भ्रम ना रहे।

9:07

लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कुछ

9:10

लोगों को यह बहुत जटिल लगता है। पर उस

9:13

वक्त की जरूरत यही थी कि हर अधिकार और हर

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कर्तव्य को साफ-साफ लिख दिया जाए। इसी

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असाधारण योगदान की वजह से डॉक्टर अंबेडकर

9:21

को भारतीय संविधान का जनक कहा जाता है।

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तो एक तरफ यह संविधान बनाने का बौद्धिक

9:27

काम चल रहा था जो सालों तक चलना था। लेकिन

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देश तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो चुका था।

9:33

हां। देश को चलाने के लिए एक सरकार भी तो

9:36

चाहिए थी। यह दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ

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कैसे चलें?

9:40

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है।

9:42

संविधान सभा सिर्फ संविधान नहीं बना रही

9:45

थी।

9:45

अच्छा।

9:46

वो देश की पहली संसद के तौर पर भी काम कर

9:48

रही थी।

9:49

और

9:50

और इसी में से देश की पहली अंतरिम सरकार

9:53

बनी थी जिसके मुखिया [संगीत]

9:54

जवाहरलाल नेहरू थे।

9:56

प्रधानमंत्री के बराबर की भूमिका में?

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हां। उन्हें कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष

10:01

कहा जाता था। और उनके मंत्रिमंडल में उस

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दौर के सभी बड़े चेहरे शामिल थे। सरदार

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वल्लभ भाई पटेल गृह मंत्री थे।

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जिनके कंधों पर 500 से ज्यादा रियासतों को

10:11

भारत में मिलाने की भारी जिम्मेदारी थी।

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बलदेव सिंह रक्षा मंत्री थे। डॉ. राजेंद्र

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प्रसाद खाद्य और कृषि मंत्री।

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और यह मंत्रिमंडल सिर्फ कांग्रेस का नहीं

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था। इसमें मुस्लिम लीग के सदस्य भी थे।

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जैसे लियाकत अली खान वित्त मंत्री थे।

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जोगेंद्रनाथ मंडल को विधिमंत्री बनाया गया

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था। तो यह उस समय की मिलीजुली राजनीतिक

10:30

तस्वीर को दिखाता है।

10:31

जी हालांकि यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला

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और बंटवारे के साथ खत्म हो गया। लेकिन यह

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दिखाता है कि कोशिश सबको साथ लेकर चलने की

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थी।

10:40

चलिए वापस संविधान की कहानी पर आते हैं।

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प्रारूप [संगीत] समिति ने अपना मसौदा

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तैयार कर लिया। फिर क्या हुआ? क्या उसे

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सीधे लागू कर दिया गया?

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नहीं नहीं। यहीं से तो असली लोकतांत्रिक

10:51

प्रक्रिया शुरू हुई।

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कैसे?

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उस मसौदे को जनता के सामने रखा गया।

10:55

अखबारों में छापा गया। आम [संगीत] लोगों,

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विद्वानों, संस्थाओं से सुझाव मांगे गए।

11:01

हजारों संशोधन के प्रस्ताव आए।

11:03

हजारों

11:04

जी। उन पर संविधान सभा में महीनों तक बहस

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चली। एक-एक शब्द एक-एक कॉमा पर

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तर्क-वितर्क हुए।

11:10

जैसे किन मुद्दों पर?

11:12

अरे, हर मुद्दे पर चाहे वो राष्ट्रपति के

11:14

अधिकार हो या नागरिकों के कर्तव्य या फिर

11:17

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल हो।

11:20

हर चीज पर बहुत गहरी बहस [संगीत] हुई। यह

11:22

बहसें ही तो लोकतंत्र की जान है।

11:24

बिल्कुल।

11:25

आज भी जब हम संविधान सभा की बहसों को

11:27

पढ़ते हैं तो पता चलता है कि हमारे

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संस्थापकों की सोच कितनी गहरी और दूरदर्शी

11:32

थी।

11:33

बिल्कुल। और इन सारी बहसों, संशोधनों और

11:37

तीन बार के विस्तृत रीडिंग के बाद आखिरकार

11:40

वो दिन आया 26 नवंबर 1949। [संगीत]

11:43

इस दिन संविधान का अंतिम प्रारूप स्वीकार

11:46

कर लिया गया।

11:47

जी। यह एक ऐतिहासिक पल था। उस दिन सभा में

11:50

मौजूद 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर

11:53

किए। हमारा संविधान बनकर तैयार हो गया था।

11:56

और इसी वजह से हम 26 नवंबर को हर साल

12:00

संविधान दिवस के रूप में मनाते हैं।

12:02

सही बात है।

12:03

लेकिन यहां एक सवाल उठता है।

12:05

अगर संविधान 26 नवंबर 1949 को तैयार हो

12:08

गया था, तो उसे पूरी तरह लागू करने के लिए

12:12

26 जनवरी 1950 तक यानी 2 महीने का इंतजार

12:15

क्यों किया गया? इसकी एक बहुत ही दिलचस्प

12:17

और भावनात्मक वजह है।

12:19

बताइए।

12:20

बात 1929 की है। जब लाहौर में कांग्रेस का

12:23

अधिवेशन हुआ था। वहां पंडित नेहरू की

12:25

अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव

12:28

पास हुआ। और तय किया गया कि 26 जनवरी 1930

12:31

को पूरे देश में पहला स्वतंत्रता दिवस

12:34

मनाया जाएगा।

12:34

ओहो तो ये तारीख आजादी के आंदोलन की यादों

12:38

से जुड़ी हुई थी।

12:39

जी। उस दिन के बाद से हर साल 26 जनवरी को

12:43

आजादी के दीवाने यह दिन मनाते थे, तिरंगा

12:45

फहराते थे। [संगीत]

12:46

अच्छा तो मतलब यह तारीख पहले से ही

12:49

महत्वपूर्ण थी।

12:50

बहुत ज्यादा।

12:50

जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो निर्माताओं

12:53

को लगा कि इस ऐतिहासिक तारीख को हमेशा के

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लिए अमर कर देना चाहिए। इसीलिए उन्होंने

12:58

तय किया कि भले ही कुछ प्रावधान तुरंत

13:00

लागू हो जाए लेकिन संविधान को पूरी तरह से

13:03

26 जनवरी को ही लागू किया जाएगा। कमाल है।

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इस तरह उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की

13:08

विरासत को गणतंत्र की नीव से जोड़ दिया।

13:10

हम

13:11

और 26 जनवरी 1950 को भारत एक संप्रभु

13:14

गणराज्य बन गया।

13:15

ये सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था।

13:18

ये इतिहास को सम्मान देने का एक तरीका था।

13:20

जी।

13:20

तो इस पूरे प्रक्रिया का अंतिम दिन कौन

13:23

[संगीत] सा था?

13:23

संविधान सभा की आखिरी बैठक 24 जनवरी 1950

13:26

को हुई।

13:27

अच्छा। लागू होने से दो दिन पहले

13:29

हां। यह एक तरह से विदाई समारोह जैसा था।

13:32

सदस्यों ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को

13:35

अपनाया और सबसे महत्वपूर्ण बात इसी दिन

13:39

संविधान सभा ने सर्वसम्मति से डॉ.

13:42

राजेंद्र प्रसाद को स्वतंत्र भारत का पहला

13:44

राष्ट्रपति चुना।

13:46

और 2 दिन बाद उन्होंने राष्ट्रपति पद की

13:48

शपथ ली।

13:49

बिल्कुल। तो कुल 2 साल, 11 महीने और 18

13:53

दिन। इस सफर में हमने देखा कि कैसे एक

13:57

बिखरे हुए गुलाम देश के प्रतिनिधियों ने

13:59

साथ बैठकर बहस करके असहमत होकर [संगीत] और

14:03

फिर सहमत होकर दुनिया का सबसे बड़ा लिखित

14:06

संविधान तैयार किया।

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यह सिर्फ एक दस्तावेज बनाने की कहानी नहीं

14:10

है।

14:10

यह एक राष्ट्र [संगीत] के बनने की कहानी

14:12

है।

14:12

यह सफर वाकई असाधारण था। हमने देखा कि

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कैसे अलग-अलग समितियां बनी। कैसे नेहरू के

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आदर्शों को अंबेडकर की [संगीत] कानूनी

14:20

भाषा मिली और कैसे पटेल ने देश को एक

14:23

सूत्र में पिरोने का काम किया। हम

14:26

यह सब हमें एक जरूरी सवाल पर सोचने को

14:28

मजबूर करता है। किसी देश के बुनियादी

14:30

दस्तावेज को बनाने की प्रक्रिया जिसमें

14:32

इतनी बहसें, इतने समझौते और इतने अलग-अलग

14:36

वर्गों का प्रतिनिधित्व शामिल हो। हां, वो

14:38

प्रक्रिया दशकों बाद भी उस दस्तावेज की

14:42

ताकत और वैधता को कैसे जिंदा रखती है?

14:45

शायद जवाब इसी प्रक्रिया की समावेशी भावना

14:48

में छिपा है।

14:56

हम भारतीय संविधान पर एक गहरी चर्चा करने

14:58

वाले हैं। वो इसकी कुछ बहुत ही दिलचस्प

15:01

विशेषताओं को [संगीत] सामने रखते हैं। तो

15:03

आज हमारा मिशन सिर्फ यह जानना नहीं है कि

15:05

इसमें क्या लिखा है बल्कि यह समझना है कि

15:08

इसे ऐसा क्यों बनाया गया। मतलब वो क्या

15:11

चीज है जो इसे दुनिया के बाकी संविधानों

15:12

से इतना अलग इतना अनूठा बनाती है?

15:15

यह एक बहुत जरूरी सवाल है क्योंकि देखिए

15:18

संविधान सिर्फ नियमों की एक किताब तो है

15:21

नहीं। वो किसी भी देश के आदर्शों और उसकी

15:24

आत्मा का आईना होता है और भारतीय संविधान

15:28

की आत्मा को समझने के लिए हमें इसकी बनावट

15:31

की कुछ परतों को खोल कर देखना होगा। तो

15:34

चलिए शुरू करते हैं। इस दस्तावेज को पढ़ते

15:36

हुए जो पहली चीज दिमाग पर असर करती है वो

15:39

है इसका आकार। यह दुनिया का सबसे लंबा

15:42

लिखित संविधान है। मतलब इतना ज्यादा

15:44

विस्तृत क्यों बनाया गया इसे? कोई खास वजह

15:46

थी इसके पीछे?

15:47

बिल्कुल। इसकी लंबाई के पीछे एक तो भारत

15:50

की जो विशाल विविधता है वो एक बड़ा कारण

15:54

है।

15:55

और साथ ही हमारे संविधान निर्माताओं ने

15:58

दुनिया भर के कई संविधानों को बहुत गहराई

16:02

से परखा। जैसे ब्रिटेन से संसदीय प्रणाली

16:05

ली, अमेरिका से मौलिक अधिकार, आयरलैंड से

16:08

नीति निर्देशक सिद्धांत।

16:10

अच्छा तो बहुत जगहों से प्रेरणा ली गई।

16:12

हां, बहुत जगहों से उन्होंने हर जगह से

16:15

बेहतरीन चीजों को लेकर भारत के जरूरतों के

16:18

हिसाब से ढाला। हम्म।

16:20

इसीलिए कुछ लोग मजाक में इसे उधार का थैला

16:22

भी कहते हैं।

16:23

हां, [संगीत] बोरोड कॉन्स्टिट्यूशन ये

16:25

टर्म मैंने सुना है।

16:26

पर असल में यह दुनिया भर के सबसे अच्छे

16:28

विचारों का एक संगम है।

16:30

तो यह उधार लेना भी अपने आप में एक अनूठी

16:32

सोच को दिखाता है। मतलब यह किसी एक

16:34

विचारधारा से बंधा नहीं है। बल्कि एक

16:36

व्याहारिक दस्तावेज है। एक और पहलू जो

16:38

ध्यान खींचता है वो है इसका लचीलापन और

16:41

कठोरता का मिश्रण।

16:42

हां। यह थोड़ा विरोधाभासी सा लगता है और

16:46

यही संतुलन इसकी असली ताकत है। देखिए

16:49

संविधान के कुछ हिस्सों को बदलना संसद के

16:52

लिए आसान है। जैसे किसी राज्य का नाम

16:54

बदलना लेकिन जो इसकी मूल संरचना है

16:57

जैसे लोकतंत्र [संगीत] या पंथनिरपेक्षता।

17:00

बिल्कुल उस मूल संरचना को बदलना लगभग

17:03

नामुमकिन है और यही चीज इसे एक जीवित

17:06

दस्तावेज बनाती है जो समय के साथ बदल तो

17:09

सकता है लेकिन अपनी पहचान नहीं खोता। इसी

17:12

तरह का दोहरापन तो शासन प्रणाली में भी

17:15

है। है ना? संघात्मक भी और एकात्मक भी। यह

17:18

सुनने में थोड़ा जटिल लगता है। इसे आसान

17:20

भाषा में कैसे समझे?

17:21

इसे ऐसे समझिए कि सामान्य दिनों में राज्य

17:24

सरकारें अपने मामलों में स्वतंत्र रूप से

17:27

काम करती हैं। पुलिस, स्वास्थ्य ये सब। यह

17:30

हुआ संघात्मक ढांचा। लेकिन अगर देश में

17:33

कोई राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति आ जाए

17:36

तो [संगीत] सारी शक्तियां केंद्र सरकार के

17:38

हाथ में आ जाती हैं। तब वो एकात्मक रूप ले

17:41

लेता है। यह देश की सुरक्षा और एकता के

17:44

लिए एक बहुत जरूरी प्रावधान है।

17:46

अच्छा [संगीत] यह तो बनावट की बात हुई। पर

17:49

किसी भी संविधान की असली पहचान तो उसकी

17:51

आत्मा यानी उसकी प्रस्तावना से होती है।

17:54

इसकी शुरुआत ही हम भारत के लोग से होती

17:58

है। यह बहुत शक्तिशाली शब्द है। पर क्या

18:00

यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक बयान है या इसका

18:03

कोई कानूनी महत्व भी है?

18:05

पहले इसे सिर्फ एक परिचय ही माना जाता था।

18:07

लेकिन अब इसका बहुत गहरा कानूनी महत्व है।

18:11

यह शब्द यह स्थापित करते हैं कि सत्ता का

18:14

अंतिम स्रोत जनता है। किसी राजा या बाहरी

18:18

शक्ति ने हमें यह संविधान नहीं दिया। जैसा

18:21

कि प्रख्यात विशेषज्ञ एन ए पालकीवाला कहते

18:25

थे, प्रस्तावना संविधान का परिचय पत्र है।

18:28

यह बताती है कि [संगीत] संविधान का लक्ष्य

18:31

क्या है? न्याय, स्वतंत्रता, समानता। यहां

18:35

एक बात पढ़कर मुझे बहुत हैरानी हुई।

18:37

दस्तावेज में लिखा है कि समाजवादी और

18:40

पंथनिरपेक्ष यह शब्द शुरू से प्रस्तावना

18:43

में थे ही नहीं। इन्हें 1976 में जोड़ा

18:46

गया।

18:46

हां, यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। इन्हें

18:49

4 संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। उस समय के

18:52

राजनैतिक और सामाजिक माहौल में सरकार इन

18:54

मूल्यों पर और जोर देना चाहती थी। लेकिन

18:57

इससे भी ज्यादा जरूरी बात हुई थी 1973 में

19:00

केशवानंद भारती मामले में। उस केस में

19:03

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि

19:05

प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है

19:08

और संसद इसकी मूल संरचना को नहीं बदल

19:11

सकती। इस एक फैसले ने प्रस्तावना को सिर्फ

19:14

भूमिका से उठाकर संविधान की नींव बना

19:18

दिया। तो कुल मिलाकर संविधान हमें मौलिक

19:20

अधिकार देता है। एकल नागरिकता देता है और

19:23

वोट देने का सार्वभौमिक अधिकार देता है।

19:26

यह हर नागरिक को बराबर बनाता है। चाहे

19:29

उसकी जाति, धर्म या लिंग कुछ भी हो। और यह

19:32

सब जानने के बाद एक सवाल मन में आता है।

19:34

संविधान नागरिकों को इतने सारे अधिकार और

19:37

सुरक्षा देता है। पर इसके बदले में वह एक

19:40

नागरिक से सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की

19:42

क्या अपेक्षा रखता है?

19:52

तो एक सवाल जो अक्सर उठता है वो यह है कि

19:55

क्या भारतीय संविधान पूरी तरह से एक मौलिक

19:58

दस्तावेज है या फिर यह दुनिया भर के जो

20:02

सबसे बेहतरीन विचार थे उनका एक कह सकते

20:05

हैं एक संग्रह है।

20:06

आज हमारे पास जो नोट्स हैं वो इसी सवाल की

20:09

परतों को खोलते हैं और ऐसा लगता है कि

20:12

हमारे संविधान निर्माता कुछ एकदम नया

20:15

बनाने की कोशिश नहीं कर रहे थे।

20:16

नहीं बिल्कुल नहीं। बल्कि दुनिया भर के

20:18

संविधानों से [संगीत] सबसे अच्छे हिस्से

20:21

लेकर भारत के लिए एक मजबूत ढांचा बना रहे

20:24

थे।

20:24

बिल्कुल और देखिए इस ढांचे की जो नींव थी

20:27

मतलब इसका जो एक तरह से कंकाल था वो तो

20:29

पहले से ही मौजूद था 1935 के भारत शासन

20:32

अधिनियम में।

20:33

अच्छा

20:33

तो उनका काम था इस कंकाल पर एक शरीर और एक

20:36

आत्मा देना जिसके लिए उन्होंने वाकई पूरी

20:38

दुनिया की तरफ देखा। यह एक बहुत ही अहम

20:40

बात है। तो चलिए इसी ढांचे से शुरू करते

20:42

हैं। सबसे पहले सरकार की संरचना मतलब यह

20:46

जो हमारी संसदीय प्रणाली है इसका विचार

20:49

कहां से आया?

20:50

देखिए ये जो पूरी संसदीय व्यवस्था है,

20:52

कानून बनाने की प्रक्रिया और एकल

20:54

नागरिकता।

20:55

हां।

20:55

ये सारी मुख्य विशेषताएं ब्रिटेन से ली गई

20:58

हैं।

20:58

हम

20:58

यह हमारे शासन का बुनियादी ढांचा है एक

21:00

तरह से।

21:01

ये तो हुई सरकार की बात। लेकिन नागरिकों

21:04

के अधिकार वो भी तो बहुत ही ज्यादा

21:06

महत्वपूर्ण है।

21:06

बहुत ज्यादा और उसके लिए संविधान

21:08

निर्माताओं ने संयुक्त राज्य अमेरिका की

21:11

ओर देखा। हमारे जो मौलिक अधिकार हैं

21:13

फंडामेंटल राइट्स

21:14

हां फंडामेंटल राइट्स [संगीत] हमारी

21:16

प्रस्तावना का विचार और सबसे जरूरी

21:19

न्यायिक पुनरवलोकन। हम

21:21

मतलब जुडिशियल रिव्यू यह सब अमेरिका से

21:23

लिया गया है।

21:24

जुडिशियल रिव्यु मतलब न्यायपालिका के पास

21:27

यह शक्ति है कि वह संसद के बनाए कानूनों

21:30

की भी समीक्षा कर सकती है।

21:31

बिल्कुल अगर वो कानून संविधान के खिलाफ हो

21:34

तो ये व्यवस्था और अधिकारों के बीच एक

21:37

बहुत जरूरी संतुलन बनाता है।

21:38

सही है। और केंद्र राज्य संबंधों के बारे

21:41

में क्या? मतलब ये जो संघात्मक व्यवस्था

21:44

है, इसका आईडिया कहां से आया?

21:46

इसके लिए कनाडा की ओर देखा गया। एक ऐसा

21:48

फेडरल सिस्टम जहां केंद्र मजबूत हो।

21:50

अच्छा।

21:51

और केंद्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति का

21:53

जो प्रावधान है वो भी वहीं से प्रेरित है।

21:56

लेकिन राज्यों को भी तो कुछ शक्तियां दी

21:58

गई हैं।

21:59

हां बिल्कुल। और उसके लिए ऑस्ट्रेलिया से

22:02

समवर्ती सूची यानी कॉनकरेंट लिस्ट का

22:04

विचार लिया गया।

22:05

मतलब जिस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून

22:09

बना सकते हैं।

22:10

सही।

22:10

ये तो वाकई बहुत दिलचस्प होता जा [संगीत]

22:12

रहा है। पर संविधान सिर्फ कानूनों का

22:14

ढांचा तो नहीं होता। है ना? हम्म।

22:16

उसमें कुछ दार्शनिक आदर्श भी होते हैं।

22:19

आपने बिल्कुल सही पकड़ा। यही तो संविधान

22:21

की आत्मा है।

22:22

जैसे हमारी प्रस्तावना में स्वतंत्रता,

22:25

समता और बंधुता के विचार।

22:27

हां, यह आदर्श फ्रांस से लिए गए हैं।

22:29

फ्रांसीसी क्रांति से।

22:31

वाह। हम इसी तरह जो मौलिक कर्तव्य हैं और

22:34

न्याय का आदर्श है वो पूर्व सोवियत संघ से

22:37

प्रेरित है और राज्य के नीति निर्देशक

22:40

तत्व मतलब डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स

22:42

वो आयरलैंड से

22:42

वो आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं जो

22:44

सरकार के लिए एक गाइड की तरह काम करते

22:46

हैं।

22:46

तो यह सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं

22:49

बल्कि एक तरह का नैतिक रोड मैप भी है।

22:52

आखिर में आपातकाल या संविधान में बदलाव

22:54

जैसी प्रक्रियाओं के बारे में क्या मतलब

22:57

भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी?

22:59

हां उसकी भी तैयारी की गई। आपातकाल के जो

23:01

प्रावधान है वह जर्मनी के वाइमर संविधान

23:04

से प्रेरित हैं।

23:05

और संविधान में संशोधन की प्रक्रिया जो

23:08

शायद सबसे जरूरी है

23:09

वो दक्षिण अफ्रीका से ली गई है। यही चीज

23:12

हमारे संविधान को एक जीवंत दस्तावेज बनाती

23:14

है। पत्थर की लकीर नहीं।

23:16

तो इसका मतलब यह हुआ है कि जब कुछ लोग इसे

23:18

उधार का थैला कहते हैं

23:20

तो वो शायद पूरी तस्वीर नहीं देख रहे।

23:23

बिल्कुल सही। यह उधार लेना नहीं था। यह

23:25

दुनिया भर के अनुभवों से सीखना था और उन

23:28

विचारों को भारतीय परिस्थितियों के हिसाब

23:30

से ढालना था।

23:31

मतलब यह संविधान सभा के व्यावहारिक

23:33

दृष्टिकोण को दिखाता है।

23:35

हां बिल्कुल उन्होंने एक ऐसा ढांचा बनाने

23:38

की कोशिश की जो एक इतने विविध राष्ट्र के

23:41

लिए काम कर सके। एक मजबूत [संगीत] और

23:43

लचीला ढांचा और यह आज हमें एक बहुत ही

23:46

महत्वपूर्ण सवाल पर छोड़ जाता है। हम

23:48

यह देखते हुए कि जब से यह विचार [संगीत]

23:50

लिए गए थे तब से दुनिया और भारत कितना बदल

23:52

गया है। आज के समय में इनमें से कौन सी

23:54

विशेषता सबसे अधिक दबाव में है और कौन सी

23:57

सबसे मजबूत साबित हुई।

24:06

हमारे सामने जो स्रोत हैं, वह भारतीय

24:08

संविधान की उस चीज पर हैं जिसके बारे में

24:11

हम सब ने स्कूल में पढ़ा तो है लेकिन शायद

24:14

ही कभी इतनी गहराई से सोचा हो। मैं बात कर

24:16

रहा हूं अनुसूचियों की या जिन्हें हम

24:18

शेड्यूल्स कहते हैं।

24:20

हां, अक्सर लगता है कि ये संविधान के आखिर

24:22

में दी गई कोई बोरिंग सी लिस्ट होगी।

24:24

बिल्कुल। [संगीत] कुछ तकनीकी जानकारी जो

24:26

शायद बस वकीलों के काम की हो। को जब मैंने

24:29

खंगाला तो एक बात साफ हो गई। यह सिर्फ

24:32

लिस्ट नहीं है।

24:32

नहीं बिल्कुल नहीं।

24:34

यह तो हमारे देश का ऑपरेटिंग सिस्टम है।

24:36

बिल्कुल सही पकड़ा आपने। अगर संविधान को

24:39

भारत का हार्डवेयर माने तो अनुसूचियां वो

24:41

सॉफ्टवेयर और कोड है जो बताती है कि यह

24:44

देश असल में चलेगा कैसे?

24:46

मतलब शक्तियों का बंटवारा, अधिकारों की

24:48

सीमाएं, देश का नक्शा।

24:50

सब कुछ सब कुछ यहीं विस्तार से बताया गया

24:53

है। इन्हें अगर मुख्य संविधान में ही डाल

24:55

देते तो वो बहुत ही ज्यादा मतलब भारीभरकम

24:58

हो जाता। तो आज हमारा मिशन है भारतीय

25:00

संविधान के इस ऑपरेटिंग सिस्टम को डिकोड

25:03

करना। तो चलिए इसमें गहराई से उतरते हैं

25:05

और देखते हैं कि इन 12 अनुसूचियों में

25:08

क्या खास है।

25:08

चलिए शुरू करते हैं।

25:10

अच्छा तो पहली अनुसूची यह तो सुनने में

25:13

बहुत सीधी साधी लगती है।

25:14

हां, बस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों

25:17

की एक लिस्ट।

25:18

तो [संगीत] क्या इसका महत्व सिर्फ इतना ही

25:20

है या इसमें कोई और गहरी बात छुपी है?

25:23

आपका सवाल बहुत अच्छा है। देखिए यह सिर्फ

25:26

एक लिस्ट नहीं बल्कि भारत की अखंडता का एक

25:30

कानूनी दस्तावेज है।

25:32

अच्छा

25:32

सोचिए इसके बिना भारत की कोई कानूनी सीमा

25:36

ही नहीं होगी। जब भी कोई नया राज्य बनता

25:39

है जैसे तेलंगाना बना

25:41

हम

25:41

या हाल ही में जम्मू कश्मीर और लद्दाख को

25:44

केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। बिल्कुल

25:47

या फिर दमनदीव और दादरा नगर हवेली का विलय

25:51

हुआ तो सबसे पहला बदलाव इसी लिस्ट में

25:54

होता है।

25:54

यह एक जीती जागती बदलती हुई [संगीत] सूची

25:57

है जो भारत के राजनीतिक नक्शे को परिभाषित

26:00

करती है। समझ गए? तो ये देश का एक तरह से

26:03

आधिकारिक मैप है जो लगातार अपडेट होता

26:06

रहता है। चलिए अब दूसरी और तीसरी अनुसूची

26:10

पर आते हैं।

26:11

ये दोनों बड़े-बड़े सरकारी पदों पर बैठे

26:13

लोगों से जुड़ी हैं। [संगीत] एक में उनके

26:15

वेतन और भत्ते हैं और दूसरे में उनकी शपथ।

26:18

यह थोड़ा प्रशासनिक सा लगता है।

26:21

ऊपरी तौर पर तो लगता है लेकिन इसके पीछे

26:24

का सिद्धांत बहुत गहरा है। दूसरी अनुसूची

26:27

जो है वो राष्ट्रपति, राज्यपाल, जजों और

26:31

सीएजी जैसे पदों के वेतन तय करती है।

26:34

हां। और ऐसा करके वह उनकी वित्तीय

26:37

स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। इसका मतलब

26:40

यह है कि उनका वेतन किसी की मर्जी पर

26:43

निर्भर नहीं है ताकि वे बिना किसी डर या

26:46

पक्षपात [संगीत]

26:47

के अपना काम कर सकें।

26:48

मतलब एक तरह की आर्थिक इम्युनिटी।

26:50

बिल्कुल आप ऐसा कह सकती हैं।

26:52

लेकिन एक सवाल उठता है क्या कभी इस पर बहस

26:54

नहीं होती कि [संगीत] इन पदों पर वेतन और

26:56

भत्ते जरूरत से ज्यादा हैं? बहस तो होती

26:58

है और यह सब संसद द्वारा कानून बनाकर ही

27:02

तय किए जाते हैं। लेकिन मूल विचार यही है

27:04

कि इन पदों की गरिमा और स्वतंत्रता बनी

27:07

रहे।

27:08

अच्छा।

27:08

और इसी से जुड़ती है तीसरी अनुसूची यानी

27:11

शपथ। यह सिर्फ एक रस्म नहीं है। यह एक

27:13

सार्वजनिक प्रतिज्ञा [संगीत] है कि पद पर

27:16

बैठा व्यक्ति संविधान के प्रति वफादार

27:18

रहेगा।

27:19

एक वचन। हां, जब कोई मंत्री या जज शपथ

27:23

लेता है तो वह लाखों लोगों के सामने देश

27:25

के कानून को बनाए रखने का वचन दे रहा होता

27:27

है। ये दोनों अनुसूचियां मिलकर अधिकार और

27:31

कर्तव्य दोनों का संतुलन बनाती है।

27:33

अधिकार और कर्तव्य का संतुलन बहुत खूब। अब

27:36

चौथी अनुसूची जो राज्यसभा में सीटों के

27:38

बंटवारे से जुड़ी है।

27:40

हां।

27:40

लोकसभा में तो आबादी के हिसाब से सीटें तय

27:42

होती हैं। तो यहां अलग से व्यवस्था क्यों

27:44

की गई?

27:45

क्योंकि भारत एक संघ [संगीत] है। एक

27:47

यूनियन ऑफ स्टेट्स। चौथी अनुसूची हमारे

27:50

संघीय ढांचे की आत्मा है।

27:52

आत्मा

27:52

कैसे?

27:53

देखिए लोकसभा लोगों का प्रतिनिधित्व करती

27:56

है। है ना? लेकिन राज्यसभा राज्यों का

27:58

करती है।

27:59

यह सुनिश्चित करता है कि उत्तर प्रदेश

28:01

जैसे बड़े राज्य अपनी आबादी के दम पर छोटे

28:05

राज्यों जैसे सिक्किम या गोवा की आवाज को

28:08

दबा ना दें।

28:09

अच्छा तो सबको बराबर का मौका मिले।

28:11

बिल्कुल। हर राज्य को यहां प्रतिनिधित्व

28:13

मिलता है जिससे केंद्र सरकार की शक्तियों

28:15

पर एक अंकुश लगता है। यह असल में राज्यों

28:18

की परिषद है।

28:19

तो यह तो हो गई देश की बाहरी रूपरेखा। अब

28:22

आगे बढ़ते हैं। भारत की असली खूबसूरती तो

28:25

इसकी विविधता में है। संविधान बनाने वालों

28:28

ने यह कैसे सुनिश्चित किया कि कुछ विशेष

28:30

आदिवासी क्षेत्रों की अपनी अलग पहचान बनी

28:33

रहे।

28:33

बिल्कुल सही सवाल। और यहीं पर पांचवी और

28:36

छठी अनुसूचियां तस्वीर में आती हैं।

28:38

अच्छा। आप इन्हें हमारे संविधान के विशेष

28:41

सॉफ्टवेयर ड्राइवर्स की तरह समझ सकती हैं

28:44

जो भारत की अनूठी विविधता को संभालने के

28:47

लिए ही बनाए गए हैं।

28:48

पांचवी अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और

28:50

जनजातियों के प्रशासन की बात करती है।

28:52

इसका ठीक-ठीक मतलब क्या है?

28:54

इसका मतलब है कि देश के [संगीत] कई

28:56

हिस्सों में जहां आदिवासी आबादी ज्यादा

28:58

है, वहां सामान्य प्रशासनिक कानून पूरी

29:01

तरह से लागू नहीं होते।

29:02

क्यों नहीं होते? क्योंकि इन क्षेत्रों की

29:04

अपनी विशिष्ट संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था

29:08

और पारंपरिक कानून होते हैं। पांचवी

29:11

अनुसूची राज्यपाल को विशेष शक्तियां देती

29:13

है ताकि वो इन क्षेत्रों की सुरक्षा कर

29:16

सके।

29:16

मतलब वो संसदीय राज्य के कानून को रोक

29:18

सकते हैं।

29:18

रोक सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं

29:22

ताकि उन समुदायों का शोषण ना हो और उनका

29:25

विकास उनकी अपनी शर्तों पर हो। और छठी

29:27

अनुसूची तो और भी खास है। इसमें सिर्फ चार

29:30

राज्यों का जिक्र है। असम, मेघालय,

29:32

त्रिपुरा और मिजोरम।

29:34

हां।

29:34

इन चारों में ऐसा क्या अलग है?

29:36

यहां की जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक

29:38

संदर्भ और भी ज्यादा विशिष्ट है। इसलिए

29:41

यहां एक कदम और आगे जाकर स्वायत्त जिला

29:44

परिषदों यानी ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट

29:47

काउंसिल्स का गठन किया गया है।

29:49

स्वायत्त जिला परिषदें।

29:51

हां, यह परिषदें एक तरह की मिनी सरकारें

29:54

हैं।

29:54

मिनी सरकारें।

29:55

बिल्कुल। इन्हें अपनी जमीन, जंगल, स्थानीय

29:58

रीति-रिवाज, शादी, तलाक और संपत्ति जैसे

30:02

मामलों पर कानून बनाने का अधिकार है। यह

30:04

अपनी अदालतें भी चला सकती हैं।

30:06

वाह, यह तो सच में जबरदस्त है।

30:08

यह दिखाता है कि हमारा संविधान कितना

30:11

लचीला है।

30:12

अब आते हैं उस हिस्से पर जो शायद सबसे

30:14

ज्यादा चर्चित और विवादास्पद है। सातवीं

30:17

अनुसूची

30:18

हम शक्तियों का बंटवारा।

30:20

केंद्र और राज्यों के बीच। इसे देखकर तो

30:23

ऐसा लगता है जैसे घर के बंटवारे का कागज

30:24

हो। संघ सूची, राज्य सूची, [संगीत]

30:26

समवर्ती सूची यह सब इतना साफ-साफ क्यों

30:29

लिखना पड़ा?

30:30

क्योंकि संविधान बनाने वाले किसी भी तरह

30:33

के भ्रम या टकराव की गुंजाइश नहीं छोड़ना

30:36

चाहते थे। सातवीं अनुसूची सिर्फ विषयों का

30:39

बंटवारा नहीं है। यह भारत के संघीय ढांचे

30:42

की सबसे बड़ी बहस का मैदान है।

30:45

अच्छा। यहीं केंद्र और राज्यों के बीच

30:47

शक्ति का असली संतुलन तय होता है। संघ

30:51

सूची में करीब 100 विषय हैं। जैसे रक्षा,

30:54

विदेश मामले, मुद्रा, रेलवे, जनगणना।

30:57

हां, यह सब वो मामले हैं जिन पर पूरे देश

30:58

में एक ही कानून होना चाहिए। ऐसा तो नहीं

31:00

हो सकता कि पंजाब की अपनी सेना हो और केरल

31:03

की अपनी करेंसी।

31:04

बिल्कुल। फिर आती है राज्य सूची जिसमें

31:06

करीब 61 विषय हैं। पुलिस, जन स्वास्थ्य,

31:10

कृषि, स्थानीय शासन। यह वो विषय हैं जो

31:13

सीधे तौर पर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी

31:15

से जुड़े हैं।

31:16

हां और हर राज्य की जरूरतें इनमें अलग-अलग

31:19

होती हैं। मुंबई की पुलिसिंग की चुनौतियां

31:21

छत्तीसगढ़ के किसी गांव से बहुत अलग

31:23

होंगी।

31:24

लेकिन मैंने पढ़ा कि इसमें पहले 66 विषय

31:27

थे। अब 61 रह गए। ये पांच विषय कहां गए?

31:30

यहीं पर कहानी दिलचस्प होती है। 1976 में

31:34

4 सेकंड संशोधन के जरिए पांच विषय राज्य

31:38

सूची से निकालकर समवर्ती सूची में डाल दिए

31:40

गए। और कौन से विषय थे ये?

31:42

इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे शिक्षा, वन और

31:45

नापतौल। यह एक बहुत बड़ा बदलाव था जिसने

31:48

शक्ति के संतुलन को केंद्र की तरफ झुका

31:50

दिया।

31:50

और यही हमें तीसरी सूची पर लाता है यानी

31:53

समवर्ती सूची जहां केंद्र और राज्य दोनों

31:56

कानून बना सकते हैं।

31:57

हां, इसे आप एक साझा रसोई की तरह समझिए।

32:00

जहां केंद्र और राज्य दोनों अपनी-अपनी

32:03

रेसिपी से खाना बना सकते हैं।

32:05

साझा रसोई अच्छा उदाहरण [संगीत] है।

32:07

इसमें शिक्षा, बिजली, शादी, तलाक, मजदूर

32:09

यूनियन जैसे करीब 52 विषय हैं। लेकिन एक

32:12

पेंच है।

32:13

पेंच? वो क्या? अगर इस साझा रसोई में किसी

32:17

एक डिश को लेके दोनों में असहमति हो जाए

32:20

मतलब दोनों के कानून में टकराव हो तो

32:23

ज्यादातर मामलों में केंद्र की रेसिपी को

32:25

ही प्राथमिकता दी जाती है। [संगीत]

32:27

तो मतलब केंद्र का पलड़ा भारी रहता है।

32:29

चलिए अब आठवीं अनुसूची पर चलते हैं जो

32:32

भारत की भाषाओं से जुड़ी है।

32:33

हां, यह हमारे देश की सांस्कृतिक समृद्धि

32:36

का आईना है।

32:37

इसमें 22 मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं।

32:40

लेकिन मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि जब

32:43

संविधान बना था तब इसमें सिर्फ 14 भाषाएं

32:45

थी।

32:46

हां और यह दिखाता है कि भाषा सिर्फ संवाद

32:48

का माध्यम नहीं बल्कि पहचान का प्रतीक है।

32:52

समय के साथ कई भाषा आंदोलनों के बाद और

32:55

भाषाओं को इसमें जोड़ा गया।

32:56

कब कब हुआ यह?

32:58

1967 में सिंधी को जोड़ा गया। फिर 1992

33:01

में एक [संगीत] साथ तीन भाषाओं कंकणी,

33:04

मणिपुरी और नेपाली को शामिल किया गया।

33:06

और फिर 2003 में भी कुछ भाषाएं जुड़ी।

33:09

हां। 2003 में बोडो, डोगरी, मैथिली और

33:12

संथाली को जोड़ा गया।

33:13

लेकिन किसी भाषा के आठवीं अनुसूची में

33:16

होने से फर्क क्या पड़ता है?

33:18

बहुत फर्क पड़ता है। इसे एक तरह का वीआईपी

33:20

स्टेटस समझिए। इन भाषाओं को सरकारी

33:24

प्रोत्साहन मिलता है। साहित्य अकादमी

33:26

इन्हें मान्यता देती है और अखिल भारतीय

33:29

सेवाओं की परीक्षा इन भाषाओं में दी जा

33:31

सकती है।

33:32

अच्छा इसीलिए दूसरी भाषाएं भी इसमें शामिल

33:35

होना चाहती हैं।

33:36

बिल्कुल यही वजह है कि आज भी भोजपुरी,

33:38

राजस्थानी, तुडु जैसी कई भाषाओं को इसमें

33:41

शामिल करने की जोरदार मांग होती रहती है।

33:44

बहुत दिलचस्प। अब हम उन अनुसूचियों पर आते

33:47

हैं जो संविधान के सिस्टम अपडेट्स की तरह

33:49

[संगीत] हैं।

33:49

या पैचेस कह सकते हैं।

33:51

हां पैचेस। यह मूल संविधान में नहीं थी।

33:55

नौवीं अनुसूची तो पहले ही संशोधन 1951 में

33:59

आ गई थी। भूमि सुधार से जुड़ी हुई।

34:01

इसके पीछे का संदर्भ समझना बहुत जरूरी है।

34:04

आजादी के बाद सरकार जमींदारी खत्म करके

34:07

जमीन का समान बंटवारा करना चाहती थी। हम्।

34:10

लेकिन जमींदार लोग संपत्ति के मौलिक

34:13

अधिकार का हवाला देकर इन कानूनों को कोर्ट

34:16

में चुनौती दे रहे थे।

34:17

तो सरकार ने क्या किया?

34:18

जादुई बक्से में डाल दिया ताकि [संगीत]

34:21

अदालतें इनकी समीक्षा ना कर सकें।

34:24

एक कानूनी कवच की तरह। लेकिन हमारे

34:26

स्रोतों में एक तारीख का जिक्र है। 24

34:29

अप्रैल 1973।

34:31

हां, बहुत महत्वपूर्ण तारीख है ये। कहा

34:33

गया है कि इस तारीख के बाद इस बक्से में

34:36

डाले गए कानूनों की समीक्षा हो सकती है।

34:38

यह तारीख इतनी खास क्यों है?

34:40

यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे

34:43

बड़ा दिन है। इसी दिन केशवानंद भारती

34:46

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के

34:49

मूल ढांचे का सिद्धांत दिया।

34:51

मूल ढांचा या बेसिक स्ट्रक्चर। हां कोर्ट

34:55

ने कहा कि संसद [संगीत]

34:56

संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन

34:59

उसकी नीव उसके मूल ढांचे को नहीं बदल सकती

35:03

और न्यायिक समीक्षा को मूल ढांचे का

35:06

हिस्सा माना गया।

35:07

तो इसका मतलब

35:08

इसका मतलब कि इस तारीख के बाद नौवीं

35:11

अनुसूची के कवच में भी एक छेद हो गया। अब

35:15

अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता

35:18

है तो चाहे वह नौवीं अनुसूची में ही क्यों

35:21

ना हो अदालत उसकी जांच कर सकती है।

35:24

कमाल है मतलब कोई भी कानून पूरी तरह से

35:27

न्यायिक जांच से परे नहीं है। अब दसवीं

35:29

अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून

35:32

हां राजनीति की दुनिया का एक बहुत ही

35:34

चर्चित विषय है।

35:35

आयाराम गया राम की कहानी भी तो इसी से

35:37

जुड़ी है। है ना?

35:38

हां बिल्कुल। यह कहानी हरियाणा के एक

35:41

विधायक गया लाल की है। जिन्होंने 1967 में

35:45

एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली थी।

35:48

एक ही दिन में तीन बार

35:49

हां 80 के दशक तक यह आयाराम गया राम की

35:53

राजनीति एक राष्ट्रीय समस्या बन गई थी।

35:56

चुने हुए विधायक और सांसद अपनी मर्जी से

35:59

या लालच में पार्टियां बदल लेते थे जिससे

36:02

सरकारें गिर जाती थी।

36:04

और लोगों के वोट का अपमान होता था।

36:06

[संगीत]

36:06

बिल्कुल। इसी को रोकने के लिए 1985 में

36:09

52वें संशोधन के जरिए 10वीं अनुसूची जोड़ी

36:13

गई।

36:13

तो क्या यह कानून पूरी तरह सफल रहा है? आज

36:15

भी तो हम दलबदल की खबरें सुनते हैं।

36:17

देखिए इसने व्यक्तिगत [संगीत] दलबदल पर तो

36:19

काफी हद तक रोक लगाई है लेकिन राजनीति ने

36:23

इसके भी तोड़ निकाल लिए हैं।

36:25

जैसे

36:25

जैसे एक साथ बड़ी संख्या में विधायकों का

36:29

इस्तीफा देना ताकि दलबदल कानून लागू ही ना

36:32

हो। तो लड़ाई अभी भी जारी है। लेकिन यह

36:35

अनुसूची एक बहुत महत्वपूर्ण कदम था।

36:38

और आखिर में 11वीं और 12वीं अनुसूचियां।

36:41

लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ

36:43

बिल्कुल। इन्हें 1993 में 73वें और 74वें

36:47

संशोधन से जोड़ा गया। यह पंचायत और नगर

36:50

पालिकाओं से जुड़ी हैं।

36:51

और यह दोनों अनुसूचियां सत्ता को दिल्ली

36:55

और राज्यों की राजधानियों [संगीत] से

36:57

निकालकर गांव और मोहल्ले तक ले जाने की एक

37:00

क्रांतिकारी कोशिश थी। 11वीं अनुसूची

37:03

पंचायतों को 29 विषय देती है। कृषि, पीने

37:06

का पानी, ग्रामीय सड़कें और 12वीं अनुसूची

37:09

नगरपालिकाओं को 18 विषय।

37:11

हां, जैसे शहरी योजना, साफ सफाई, सड़कें

37:15

और पुल।

37:16

तो इन्होंने सिर्फ विषय ही दिए हैं।

37:18

नहीं, सिर्फ विषय नहीं दिए बल्कि पंचायतों

37:21

और नगर पालिकाओं को एक संवैधानिक दर्जा

37:24

दिया। इससे पहले यह राज्य सरकारों की दया

37:28

पर निर्भर थी।

37:29

अच्छा। अब इनके चुनाव कराना और इन्हें फंड

37:33

देना एक संवैधानिक बाध्यता है। यह

37:35

लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की

37:38

दिशा में मील का पत्थर है।

37:40

तो आज इन 12 अनुसूचियों को समझने के बाद

37:43

यह साफ हो गया है कि यह सिर्फ एक परिशिष्ट

37:46

नहीं है।

37:46

नहीं बिल्कुल नहीं।

37:48

यह संविधान की कार्यप्रणाली का ब्लूप्रिंट

37:50

है। देश के नक्शे से लेकर सत्ता के

37:52

बंटवारे, भाषा की पहचान और गांव की पंचायत

37:56

तक सब कुछ इनमें विस्तार से लिखा है।

37:58

बिल्कुल। यह अनुसूचियां दिखाती हैं कि

38:01

हमारा संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं है।

38:04

खासकर वो अनुसूचियां जिन्हें बाद में

38:07

जोड़ा गया वो साबित करती हैं कि यह एक

38:10

जीवंत दस्तावेज है।

38:12

हां जो समय और समाज की जरूरतों के हिसाब

38:15

से खुद को ढालता है।

38:16

बिल्कुल विकसित होता है।

38:18

वाह आज तो संविधान का एक पूरा नया पहलू

38:21

समझ में आया। यह बातचीत वाकई बहुत शानदार

38:24

रही।

38:24

शुक्रिया।

38:25

और जाते-जाते सुनने वालों के लिए एक सवाल

38:27

छोड़ जाता हूं। जिस तरह जमींदारी, दलबदल

38:30

और पंचायती राज जैसी चुनौतियों से निपटने

38:32

के [संगीत] लिए नई अनुसूचियां जोड़ी गई,

38:34

हम्।

38:34

तो भविष्य की कौन सी नई सामाजिक, तकनीकी

38:38

या आर्थिक चुनौतियां [संगीत] हो सकती हैं

38:41

जिनके लिए हमें संविधान में इसी तरह के नए

38:43

ढांचे की जरूरत पड़े। क्या डाटा

38:46

प्राइवेसी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या

38:49

जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों के लिए

38:51

[संगीत] एक दिन 13वीं अनुसूची की जरूरत

38:53

होगी? सोचिएगा जरूर।

39:02

आज हम जिस स्रोत सामग्री [संगीत] की

39:04

पड़ताल कर रहे हैं वो भारत के राजनीतिक

39:07

नक्शे के बनने और बदलने की एक पूरी कहानी

39:10

[संगीत] है।

39:10

जी

39:11

हम देखेंगे कि आजादी के बाद से हमारे

39:14

राज्यों की सीमाएं और मतलब उनकी संख्या

39:16

क्यों और कैसे बदलती रही?

39:18

बिल्कुल। जी

39:18

संविधान भारत को राज्यों का संघ कहता है।

39:21

पर यह संघ यह हमेशा से वैसा नहीं था जैसा

39:24

आज दिखता है। चलिए इस दिलचस्प सफर को

39:27

समझते हैं।

39:28

हां। और इसकी बुनियाद हमें मिलती है

39:30

संविधान के पहले ही [संगीत] भाग में

39:32

अनुच्छेद एक से चार तक।

39:34

अच्छा।

39:34

अनुच्छेद एक तो साफ-साफ कहता है। इंडिया

39:37

यानी भारत राज्यों का एक संघ होगा। पर जो

39:41

असली ताकत है वो अनुच्छेद

39:42

[संगीत]

39:43

तीन में है।

39:43

हां यहीं से बात असल में दिलचस्प हो जाती

39:45

है। अनुच्छेद तीन संसद को इतनी शक्ति देता

39:49

है कि वो किसी भी राज्य की सहमति के बिना

39:52

उसकी सीमाएं बदल सकती है।

39:53

उसे तोड़ के नया राज्य बना सकती है या फिर

39:56

या उसका नाम तक बदल सकती है।

39:57

यस।

39:58

ये सोचना भी कमाल है कि संविधान बनाने

40:00

वालों ने कितनी दूर की सोची होगी।

40:01

और यह अधिकार बहुत जल्दी जरूरी भी साबित

40:04

हुआ। देखिए आजादी के बाद सैकड़ों रियासतों

40:07

और ब्रिटिश प्रांतों को जोड़कर एक देश तो

40:10

बना लिया गया था पर असली चुनौती थी

40:13

उन्हें एक तार्किक आधार पर संगठित करना

40:15

बिल्कुल और वो आधार बना भाषा

40:18

हां भाषाई राज्यों की मांग तो बहुत जोर

40:21

पकड़ रही थी उस वक्त और इसका पहला बड़ा

40:23

नतीजा था आंध्र प्रदेश का बनना

40:25

सही

40:26

और इसी के बाद शायद दिसंबर 1953 में फजल

40:29

अली आयोग का गठन हुआ था है ना

40:31

सही कहा और इसी आयोग की सिफारिशों पर 1956

40:34

56 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ और

40:37

इससे 14 राज्य और छह केंद्र शासित प्रदेश

40:41

बने। यह एक बहुत बड़ा मोड़ था।

40:43

मतलब सरकार ने एक तरह से मान लिया था कि

40:45

भारत की एकता सिर्फ प्रशासनिक नक्शे से

40:47

नहीं बल्कि लोगों की भाषा और संस्कृति को

40:49

सम्मान देने से मजबूत होगी।

40:51

जी।

40:51

तो 1956 के कानून ने कह सकते हैं एक

40:54

दरवाजा खोल दिया। इसके बाद तो जैसे

40:56

बदलावों की एक लहर सी आ गई। 1960 में

40:58

बॉम्बे राज्य का बंटवारा हुआ।

41:00

हां। मराठी बोलने वालों के लिए महाराष्ट्र

41:03

और गुजराती बोलने वालों के लिए गुजरात और

41:05

यह पैटर्न 60 के दशक में चलता रहा।

41:09

भाषा एक बड़ी राजनैतिक [संगीत]

41:10

ताकत बन चुकी थी।

41:11

बिल्कुल। 1963 में नागालैंड और फिर 1966

41:16

में पंजाब का बंटवारा होकर हरियाणा का

41:18

बनना यह सब इसी का नतीजा था।

41:20

मतलब आजादी के लगभग 20 साल बाद भी देश का

41:23

नक्शा लगातार बदल रहा था। लेकिन एक सवाल

41:26

है साल 2000 में जब छत्तीसगढ़, उत्तरांचल

41:29

और झारखंड बने तब तो वजह भाषा नहीं थी।

41:32

यह बहुत अच्छा सवाल है।

41:34

तो क्या यहां से राज्यों के बनने का कारण

41:36

बदलने लगा था?

41:37

हां, कह सकते हैं। [संगीत] साल 2000 के

41:40

पुनर्गठन ने दिखाया कि अब प्राथमिकता बदल

41:43

रही थी। अब वजह थी बेहतर प्रशासन,

41:46

क्षेत्रीय विकास

41:47

और स्थानीय आकांक्षाएं। हां, बड़े राज्यों

41:50

के कुछ पिछड़े इलाकों को लगा कि अलग राज्य

41:52

बनकर ही उनका विकास हो सकता है। और फिर

41:55

2014 में हमने इसी कड़ी में तेलंगाना को

41:58

बनते देखा।

41:59

और अब आते हैं सबसे हालिया और शायद सबसे

42:02

बड़े बदलाव पर। जम्मू कश्मीर। स्रोतों के

42:05

मुताबिक अनुच्छेद 370 इसे एक विशेष दर्जा

42:09

देता था।

42:09

हां। और 1957 से तो इसका अपना अलग संविधान

42:12

भी था। और इससे जुड़ा था अनुच्छेद 35 ए जो

42:15

स्थाई नागरिकों को कुछ खास अधिकार देता

42:18

था।

42:18

जी जमीन और नौकरियों में खास अधिकार देता

42:21

था और यह व्यवस्था दशकों तक चली।

42:24

लेकिन 5 अगस्त 2019 को सब कुछ बदल गया।

42:26

संसद में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक

42:29

लाया गया और राष्ट्रपति के आदेश से

42:30

अनुच्छेद [संगीत] 370 के ज्यादातर

42:32

प्रावधान और 35 ए को खत्म कर दिया गया। तो

42:35

इस बंटवारे का नतीजा यह निकला कि 31

42:37

अक्टूबर 2019 से जम्मू कश्मीर का राज्य का

42:40

दर्जा वो खत्म हो गया और इसे दो केंद्र

42:43

शासित प्रदेशों में बांट दिया गया।

42:45

कौन-कौन से?

42:46

पहला जम्मू और कश्मीर जहां अपनी विधानसभा

42:49

होगी और दूसरा लद्दाख जो बिना विधानसभा के

42:52

रहेगा और सीधे केंद्र के अधीन होगा।

42:54

तो आज की हमारी इस चर्चा से साफ है कि

42:56

भारत का राजनीतिक नक्शा कभी पत्थर की लकीर

42:59

नहीं रहा है।

43:00

नहीं बिल्कुल नहीं। संवैधानिक प्रावधानों,

43:02

भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक जरूरतों ने

43:05

इसे लगातार गाड़ा है।

43:06

सही कहा। श्रोत यही दिखाते हैं कि यह एक

43:09

जीवित, एक गतिशील प्रक्रिया है और यह हमें

43:13

सोचने पर मजबूर करता है जैसे-जैसे भारत की

43:16

आर्थिक और सामाजिक जरूरतें बदलेंगी, क्या

43:20

भविष्य में हमें देश के आंतरिक नक्शे में

43:23

और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं?

43:33

नागरिकता

43:35

ये शब्द सुनने में कितना सीधा लगता है ना।

43:38

पर जब हम इसकी कहानी में उतरते हैं तो पता

43:41

चलता है कि ये कितनी उलझी हुई है।

43:43

हां बिल्कुल। ये सिर्फ एक कानूनी शब्द

43:45

नहीं है। यह किसी की [संगीत] पहचान है।

43:48

उसके अधिकार हैं और इस देश के साथ उसका एक

43:51

रिश्ता है। और यह रिश्ता ये कहानी समय के

43:54

साथ लगातार बदली है।

43:55

तो आज हमारी यही कोशिश रहेगी कि हम इसी

43:58

कहानी की परतों को खोलें। हम भारतीय

44:00

संविधान और खासकर 1955 के नागरिकता

44:03

अधिनियम के आधार पर यह समझने की कोशिश

44:06

करेंगे कि भारत का नागरिक बनने के रास्ते

44:09

क्या थे और क्या है

44:11

और साथ ही किन वजहों से यह नागरिकता खत्म

44:15

भी हो सकती है और समय के साथ इन कानूनों

44:17

में इतने बड़े बदलाव क्यों और कैसे हुए?

44:19

तो चलिए इस गहरी पड़ताल को शुरू करते हैं।

44:23

तो सबसे पहले बुनियाद की बात करते हैं। जब

44:26

भारत का संविधान बना तो ये कैसे तय किया

44:29

गया कि कौन भारतीय है? इसकी रूपरेखा क्या

44:32

थी?

44:33

देखिए संविधान का भाग दो मतलब अनुच्छेद

44:36

पांच से 11 इसी पर है। पर दिलचस्प बात यह

44:39

है कि संविधान ने सिर्फ एक ढांचा दिया।

44:42

उसने हर नियम नहीं बनाया।

44:43

अच्छा।

44:44

हां, उसने एक नींव रखी और नियम बनाने का

44:47

काम संसद पर छोड़ दिया। लेकिन एक बहुत

44:49

बड़ी बात जो संविधान ने तय की वो थी एकल

44:52

नागरिकता।

44:53

एकल नागरिकता। इसका मतलब क्या हुआ? आसान

44:56

शब्दों में।

44:56

इसका सीधा सा मतलब है कि आप सिर्फ और

44:59

सिर्फ भारत के नागरिक हैं। आप किसी राज्य

45:01

के नागरिक नहीं हैं। जैसे आप पंजाबी या

45:04

बंगाली हो सकते हैं पर आप पंजाब [संगीत]

45:06

या बंगाल के नागरिक नहीं हैं।

45:08

जैसे कि अमेरिका में होता है जहां राज्य

45:10

और देश की दोहरी नागरिकता होती है।

45:12

बिल्कुल। भारत में आपकी पहचान [संगीत]

45:14

सिर्फ भारतीय है।

45:15

ओके। तो संविधान ने सिद्धांत दे दिए और

45:18

बाकी का काम संसद ने किया और यहीं से 1955

45:21

का नागरिकता अधिनियम आता है ना।

45:24

एकदम सही पकड़ा आपने। इसी अधिनियम ने वो

45:26

पांच रास्ते बताए [संगीत] जिनसे कोई भारत

45:28

का नागरिक बन सकता था। पहला और सबसे कह

45:32

सकते हैं स्वाभाविक तरीका है जन्म के आधार

45:34

पर।

45:35

जन्म से मतलब अगर कोई भारत में पैदा हुआ

45:37

हो।

45:38

हां। 1955 का कानून कहता था कि 26 जनवरी

45:42

1950 के बाद भारत की जमीन पर पैदा हुआ कोई

45:45

[संगीत] भी बच्चा जन्म से भारत का नागरिक

45:48

होगा। इसे जस सोली कहते हैं यानी धरती का

45:51

[संगीत] कानून।

45:52

यह तो बहुत सीधा साधा नियम लगता है।

45:54

था बस इसमें एक छोटा सा अपवाद था कि यह

45:58

विदेशी राजनायिकों या फिर दुश्मन देश के

46:00

नागरिकों के बच्चों पर लागू नहीं होता था।

46:02

ठीक है। और दूसरा तरीका था वंश का। वो

46:05

क्या था? वह उन बच्चों के लिए था जो भारत

46:08

के बाहर पैदा हुए। कानून के मुताबिक अगर

46:10

[संगीत] बच्चे का जन्म विदेश में हुआ है

46:12

लेकिन जन्म के समय उसका पिता भारत का

46:14

नागरिक है तो वो बच्चा भी भारतीय नागरिकता

46:17

का हकदार होगा।

46:18

एक मिनट सिर्फ पिता मां के भारतीय होने से

46:21

नागरिकता नहीं मिलती थी।

46:23

शुरुआती कानून में यही था जी। उस समय के

46:25

सामाजिक नजरिए में शायद पिता की नागरिकता

46:28

को ही आधार माना गया था।

46:30

हम्म।

46:30

हालांकि ये एक तरह का भेदभाव था जिसे बाद

46:33

में सुधारा गया। उस पर हम आगे बात करेंगे।

46:35

ठीक है। तो जन्म और वंश के अलावा और क्या

46:38

रास्ते थे?

46:39

दूसरा बड़ा रास्ता था पंजीकरण यानी

46:41

रजिस्ट्रेशन। [संगीत]

46:43

यह उन लोगों के लिए था जो भारतीय मूल के

46:45

थे। मतलब जिनका भारत से कोई नाता था पर वो

46:48

विदेश में बस गए थे।

46:49

तो उनके लिए वापसी का रास्ता आसान रखा गया

46:52

था।

46:52

बहुत आसान। शर्त बस इतनी थी कि आवेदन करने

46:55

से पहले सिर्फ 6 महीने भारत में रहना

46:57

जरूरी था।

46:58

क्या सिर्फ 6 महीने? आज के दौर में तो ये

47:03

यकीन करना मुश्किल है।

47:04

बिल्कुल। उस समय का विचार ही यही था कि जो

47:06

भी भारतीय मूल के लोग हैं उनके लिए रास्ते

47:09

खुले रखे जाएं। देश का मिजाज बहुत समावेशी

47:11

था। लेकिन जैसा हम देखेंगे यह सोच ज्यादा

47:14

दिन नहीं चली।

47:15

और एक और तरीका था देशीयकरण। यह किन लोगों

47:18

के लिए था?

47:19

देशीकरण या नेचुरलाइजेशन। उन लोगों के लिए

47:22

है जिनका भारत से कोई पारिवारिक नाता नहीं

47:25

है। पर वो भारत को अपना घर बनाना चाहते

47:27

हैं।

47:27

जैसे कोई विदेशी कलाकार या वैज्ञानिक

47:30

हां बिल्कुल। जो सालों भारत में रहे, यहां

47:32

की संस्कृति में रच बस गए और अब यहीं का

47:35

नागरिक बनना चाहते हैं। कानून उन्हें एक

47:37

रास्ता देता है पर कुछ शर्तों के साथ।

47:39

क्या शर्तें थी?

47:40

जैसे कि उन्हें अपने देश की नागरिकता

47:42

[संगीत] छोड़नी होगी और भारत में एक एक

47:45

निश्चित समय तक रहना होगा।

47:47

और एक पांचवा तरीका भी था। है ना?

47:49

जी। वो था किसी नए इलाके का भारत में

47:53

शामिल हो जाना। मतलब अगर भविष्य में कोई

47:55

नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है तो

47:58

सरकार तय करेगी कि वहां के लोगों को

48:00

नागरिकता कैसे दी जाएगी।

48:02

तो 1955 का कानून काफी खुला और एक तरह से

48:06

स्वागत करने वाला दस्तावेज लगता है।

48:09

लेकिन फिर कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है।

48:11

1986 का संशोधन। उसने क्या बदल दिया?

48:15

1986 का संशोधन सिर्फ एक कानूनी बदलाव

48:18

[संगीत] नहीं था। वो उस दौर की राजनीतिक

48:21

और सामाजिक चिंताओं को दिखाता है। खासकर

48:24

असम जैसे राज्यों में।

48:25

हां, वहां अवैध प्रवासन को लेकर बड़े

48:28

आंदोलन चल रहे थे।

48:29

बिल्कुल। लोगों में अपनी पहचान और

48:32

संसाधनों को लेकर एक डर था और उसी के जवाब

48:35

में सरकार ने नागरिकता [संगीत]

48:37

के नियमों को सख्त कर दिया।

48:39

कितना सख्त?

48:40

वो जो पंजीकरण वाली शर्त थी ना, सिर्फ 6

48:43

महीने रहने की,

48:44

हां।

48:44

उसे बढ़ाकर सीधा 5 साल कर दिया गया। 6

48:47

महीने से सीधा 5 साल यह तो जमीन आसमान का

48:51

फर्क है।

48:52

जी और ये सख्ती सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी।

48:55

देशकरण के लिए भी जो निवास की अवधि पहले 5

48:59

साल थी [संगीत] उसे बढ़ाकर 10 साल कर दिया

49:01

गया।

49:02

बाप रे मतलब साफ संकेत था कि अब भारत आसान

49:06

नागरिकता को लेकर बहुत सर्क हो गया है।

49:08

बिल्कुल।

49:08

और वो वंश वाले नियम में भी तो एक बड़ा

49:11

बदलाव आया था जहां पहले सिर्फ पिता की

49:13

नागरिकता गिनी जाती थी। हां वो एक बहुत

49:16

जरूरी और सकारात्मक बदलाव था। 1992 में

49:19

कानून बदला गया और ये कहा गया कि 10

49:21

दिसंबर 1992 के बाद विदेश में जन्मे किसी

49:25

बच्चे को नागरिकता तब मिलेगी जब उसके

49:27

माता-पिता में से कोई भी एक यानी माता या

49:31

पिता भारत का नागरिक हो।

49:33

इसने कानून को लैंगिक रूप से बराबर बनाया।

49:35

हां और यह बदलते हुए समाज की सोच को भी

49:37

दिखाता है।

49:38

तो हमने देखा कि कानून कैसे धीरे-धीरे

49:40

सख्त होता गया। लेकिन 2019 में जो बदलाव

49:43

आया नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए

49:47

उसने तो पूरी बहस का रुख ही मोड़ दिया।

49:49

सीएए हां सीधे तौर पर 1955 के कानून में

49:55

एक नया अध्याय जोड़ता है। इसका मुख्य

49:58

प्रावधान यह है कि यह तीन पड़ोसी देशों से

50:01

आए छह विशेष धार्मिक समुदायों के लोगों को

50:04

नागरिकता देने की प्रक्रिया को आसान बनाता

50:07

है।

50:07

वो तीन देश हैं अफगानिस्तान, बांग्लादेश

50:10

और पाकिस्तान और छह समुदाय

50:13

हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई।

50:17

तो कानून यह मानता है कि इन समुदायों के

50:20

लोग इन तीन देशों से धार्मिक उत्पीड़न की

50:23

वजह से भारत आए हैं।

50:24

जी और इसीलिए उन्हें अवैध प्रवासी नहीं

50:27

माना जाएगा बल्कि नागरिकता के लिए योग्य

50:30

समझा जाएगा।

50:31

इसमें एक कट ऑफ तारीख भी है जो बहुत

50:33

महत्वपूर्ण है। है ना?

50:34

हां। शर्त यह है कि इन लोगों ने 31 दिसंबर

50:37

2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश

50:40

किया हो। जो इस तारीख के बाद आए हैं वे इस

50:43

कानून के दायरे में नहीं आते। [संगीत] और

50:44

यह कानून नागरिकता पाने की प्रक्रिया को

50:47

आसान कैसे बनाता है?

50:48

यह देशकरण की शर्त को बहुत कम कर देता है।

50:52

जहां आमतौर पर भारत में 11 साल रहने की

50:54

शर्त होती है, इन छह समुदायों के लिए इस

50:57

अवधि को घटाकर सिर्फ 5 साल कर दिया गया

51:00

है।

51:01

लेकिन इसमें एक और दिलचस्प बात यह है कि

51:03

यह कानून पूरे देश पर एक जैसा लागू नहीं

51:06

होता।

51:06

यह एक बेहद जरूरी पहलू है। यह कानून

51:09

संविधान की छठी अनुसूची में शामिल आदिवासी

51:11

[संगीत] क्षेत्रों में लागू नहीं होता।

51:13

जैसे

51:14

असम, मेघालय और मिजोरम के बड़े हिस्से।

51:17

हां। और इसके अलावा यह इनर लाइन परमिट

51:20

वाले राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम

51:23

और नागालैंड में भी लागू नहीं होता।

51:25

ऐसा क्यों? [संगीत] ऐसा इन क्षेत्रों की

51:28

जो खास सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय पहचान

51:31

है उसे सुरक्षित रखने के लिए किया गया है।

51:33

तो नागरिकता मिलना एक बात है। पर क्या यह

51:36

छीनी भी जा सकती है? ये तो सुनने में बहुत

51:38

बड़ा कदम लगता है।

51:39

हां, यह बहुत बड़ा कदम है और इसके आधार

51:42

बहुत स्पष्ट और गंभीर हैं। ऐसा नहीं हो

51:45

सकता कि किसी छोटी-मोटी गलती पर किसी की

51:47

नागरिकता चली जाए।

51:48

तो क्या तरीके हैं इसके?

51:49

कानून में तीन मुख्य तरीके बताए गए हैं।

51:52

पहला है परित्याग। मतलब आप खुद ही अपनी

51:55

मर्जी से भारतीय नागरिकता छोड़ दें।

51:57

ठीक है। यह तो अपनी मर्जी की बात हुई।

51:59

दूसरा है पर्यावसान। यह एक सीधा साधा नियम

52:02

है। भारत दोहरी नागरिकता की इजाजत नहीं

52:05

देता।

52:06

मतलब एक मयान में दो तलवारें नहीं।

52:08

बिल्कुल। तो जिस पल आप किसी और देश के

52:11

नागरिक बने, उसी पल आपकी भारतीय नागरिकता

52:14

अपने आप खत्म हो जाती है।

52:15

ओके। ये दोनों तो व्यक्ति की अपनी मर्जी

52:18

से जुड़े हैं। लेकिन तीसरा तरीका ज्यादा

52:20

गंभीर लगता है। वंचित किया जाना। हां, यह

52:24

वो स्थिति है जब सरकार किसी व्यक्ति से

52:27

[संगीत] उसकी नागरिकता छीन सकती है और

52:29

इसके आधार भी उतने ही गंभीर हैं जैसे अगर

52:32

किसी ने धोखाधड़ी या झूठे दस्तावेजों के

52:34

आधार पर नागरिकता ली हो

52:35

या फिर देश के साथ गद्दारी की हो

52:38

जी यह तो समझ आता है लेकिन इसमें एक बहुत

52:41

ही अजीब शर्त है जो लोगों को चौंका सकती

52:43

है।

52:43

वो क्या है? अगर किसी व्यक्ति को पंजीकरण

52:45

[संगीत] या देशीयकरण से नागरिकता मिली है

52:48

और नागरिकता मिलने के 5 साल के अंदर ही

52:51

उसे किसी दूसरे देश में 2 साल या उससे

52:54

ज्यादा की जेल हो जाए

52:55

तो भारत सरकार उसकी नागरिकता रद्द कर सकती

52:57

है?

52:58

हां, कर सकती है।

52:59

और कुछ और भी असाधारण स्थितियां हैं।

53:01

हां, कानून के कुछ ऐसे कोने हैं जिनके

53:04

बारे में ज्यादा बात नहीं होते। जैसे किसी

53:07

भारतीय महिला या पुरुष द्वारा किसी विदेशी

53:09

से शादी करके वहां की नागरिकता ले लेना या

53:13

फिर कुछ बहुत ही निजी स्थितियां जैसे

53:16

पागलपन या सन्यास लेने पर भी नागरिकता

53:19

खत्म हो सकती है।

53:20

सन्यास लेने पर

53:21

जी यह कानूनी प्रावधान है। हालांकि इनका

53:24

इस्तेमाल न के बराबर होता है।

53:26

वाकई ये काफी पेचीदा है। अब एक और विषय पर

53:29

आते हैं जो लाखों भारतीयों से जुड़ा है।

53:31

एनआरआई, पीआईओ, ओसीआई यह शब्द हम अक्सर

53:34

सुनते हैं। लेकिन इनमें फर्क क्या है?

53:37

इन तीनों में अंतर समझना बहुत जरूरी है।

53:40

सबसे पहले बात करते हैं एनआरआई यानी

53:43

अनिवासी भारतीय की। यह भारतीय नागरिक ही

53:46

हैं।

53:46

मतलब उनके पास भारतीय पासपोर्ट है।

53:49

भारतीय पासपोर्ट है। भारत में वोट डालने

53:51

का हक है। वो बस काम, पढ़ाई या [संगीत]

53:54

किसी और वजह से एक तय समय से ज्यादा भारत

53:56

से बाहर रह रहे हैं। वो पूरी तरह से

53:59

भारतीय [संगीत] हैं।

54:00

ठीक है। तो एनआरआई भारतीय नागरिक हैं जो

54:03

विदेश में रहते हैं। फिर पीआईओ और ओसीआई

54:06

कौन है?

54:07

देखिए पीआईओ यानी पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन।

54:10

हम्म।

54:10

ये वो लोग थे जो भारत के नागरिक नहीं है।

54:12

[संगीत] लेकिन उनकी जड़े भारत से जुड़ी थी।

54:15

मतलब उनके माता-पिता या दादा-दादी कभी

54:17

भारत के [संगीत] नागरिक थे।

54:18

थे। मतलब अब ये नहीं है।

54:20

हां। अब पीआईओ कार्ड योजना को ओसीआई में

54:23

ही मिला दिया गया है।

54:24

तो अब सारा जोर ओसीआई पर है।

54:26

तो ये ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया क्या है?

54:29

[संगीत] क्या ये एक तरह की दोहरी नागरिकता

54:31

है?

54:31

ये सबसे बड़ा भ्रम है।

54:33

नहीं। ओसीआई दोहरी नागरिकता बिल्कुल नहीं

54:36

है।

54:36

इसे आप भारतीय मूल के लोगों के लिए एक यूं

54:39

समझिए एक लाइफ टाइम वीजा है।

54:42

अच्छा एक गोल्डन टिकट जैसा।

54:44

हां कह सकते हैं। ओसीआई कार्ड धारक भारत

54:47

में वोट नहीं दे सकते, [संगीत] चुनाव नहीं

54:48

लड़ सकते या सरकारी नौकरी नहीं कर सकते।

54:51

वो भारत के नागरिक नहीं है।

54:53

तो फिर इस ओसीआई कार्ड का फायदा क्या है?

54:55

इसके फायदे बहुत हैं। वो जीवन भर बिना

54:58

वीजा के भारत आ जा सकते हैं।

55:00

उन्हें यहां जमीन खरीदने, व्यापार करने और

55:02

पढ़ाई करने में लगभग वैसी ही सहूलियतें

55:04

मिलती है जैसी एनआरआई को मिलती हैं।

55:06

तो ओसीआई एक तरह से भारत का अपने प्रवासी

55:09

समुदाय को यह कहने का तरीका है कि आप

55:12

हमारे नागरिक नहीं हैं। पर आपके लिए

55:14

दरवाजे हमेशा खुले हैं।

55:16

बिल्कुल। तो कुल मिलाकर भारत की नागरिकता

55:18

की कहानी एक सीधी रेखा में तो बिल्कुल

55:21

नहीं चली है। 1955 में एक समावेशी और खुली

55:24

शुरुआत हुई।

55:25

हां। लेकिन फिर समय और चुनौतियों के साथ

55:28

नियम बदलते गए। ज्यादा परिभाषित और सख्त

55:31

होते गए। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे

55:34

एक देश अपनी सीमाओं और अपनी पहचान को

55:38

परिभाषित करता है। जन्म के सीधे साधे नियम

55:41

से लेकर 1986 में नियमों के सख्त होने तक

55:45

और फिर 2019 में कुछ खास समूहों के लिए

55:48

विशिष्ट प्रावधानों तक यह एक बहुत ही

55:50

गतिशील कानूनी ढांचा रहा है। हमने समझा कि

55:53

नागरिकता कैसे मिलती है, कैसे खत्म हो

55:56

सकती है और भारत अपने विशाल प्रवासी

55:58

समुदाय से ओसीआई जैसी योजनाओं के जरिए

56:01

कैसे जुड़ा रहता है? ये एक जटिल लेकिन

56:04

आकर्षक विषय है।

56:05

इन सभी कानूनी प्रावधानों, तारीखों और

56:08

शर्तों को समझने के बाद एक सवाल आगे की

56:10

सोच के लिए जरूर उठता है।

56:12

वो क्या है? हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे

56:14

हैं जहां डिजिटल पहचान, ऑनलाइन [संगीत]

56:16

समुदाय यह सब शायद राष्ट्रीय सीमाओं जितने

56:19

ही महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। हम

56:22

लोग एक देश में बैठकर दूसरे देश के लिए

56:24

काम करते हैं। [संगीत] उनकी पहचान के कई

56:26

स्तर हैं। ऐसे में सवाल यह है कि भविष्य

56:29

में कानूनी दस्तावेजों और पासपोर्ट से परे

56:32

एक नागरिक होने का असली मतलब क्या होगा?

56:35

क्या हमारी पहचान सिर्फ हमारे देश से

56:37

जुड़ी रहेगी या इसके और भी मायने होंगे?

56:40

यह एक विचार है जिस पर शायद हम सबको सोचना

56:42

चाहिए।

56:50

हमारा विषय है भारतीय संविधान का वो

56:53

हिस्सा जिससे अक्सर इसकी [संगीत] आत्मा

56:57

कहा जाता है। मौलिक अधिकार

56:59

बिल्कुल और हमारे पास जो स्रोत हैं वो इन

57:02

अधिकारों की नींव इनके मतलब और इनकी जो

57:06

ताकत है उस पे बहुत गहराई से रोशनी डालते

57:08

हैं।

57:09

और ये सिर्फ कानूनी बातें नहीं है। है ना?

57:11

यह वो गारंटी है जो संविधान हर भारतीय

57:14

नागरिक को देता है।

57:15

हां कि आप इज्जत और आजादी के साथ जी सकते

57:17

हैं और कोई भी सरकार मतलब कोई भी आपसे यह

57:21

छीन नहीं सकती।

57:22

बिल्कुल क्योंकि हमारी इस बातचीत का मकसद

57:24

यही समझना है कि ये अधिकार सिर्फ किताबों

57:26

में लिखे शब्द नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा

57:29

की जिंदगी का एक तरह से सुरक्षा कवच कैसे

57:31

हैं? चलिए शुरू करते हैं।

57:33

तो सबसे पहली और आकर्षक बात [संगीत] जो

57:35

हमारे स्रोत बताते हैं वो यह है कि इन

57:38

अधिकारों को संविधान का मैग्नाकार्टा कहा

57:41

जाता है। ये ये एक बहुत बड़ा तमगा है।

57:44

इसका असल में क्या मतलब है?

57:46

देखिए इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार अपनी

57:48

मनमानी नहीं कर सकती। ये अधिकार सरकार की

57:53

ताकत पर एक ब्रेक की तरह काम करते हैं।

57:55

संविधान के भाग तीन [संगीत] में अनुच्छेद

57:58

12 से 35 तक यह अधिकार दिए गए हैं और

58:01

इन्हें मौलिक या फंडामेंटल इसलिए कहते हैं

58:05

क्योंकि अगर सरकार इनका उल्लंघन करती है

58:08

तो कोई भी नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट जा

58:11

सकता है।

58:11

मतलब ये सरकार के खिलाफ नागरिकों को मिले

58:13

हैं।

58:13

एकदम सही।

58:14

ये जानना भी काफी दिलचस्प है कि क्या ये

58:16

अधिकार शुरू से ऐसे ही थे? श्रोत बताते

58:19

हैं कि पहले सात मौलिक अधिकार थे। अब छह

58:21

हैं।

58:21

हां, यह बहुत बड़ा और विवादास्पद बदलाव

58:24

था।

58:25

संपत्ति का अधिकार कभी मौलिक हुआ करता था।

58:27

जी। शुरुआत में अनुच्छेद 31 के तहत

58:30

संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था।

58:34

लेकिन आजादी के बाद सरकार को जमींदारी

58:37

खत्म करने और जमीन का सामान बंटवारा करने

58:40

जैसे बड़े सामाजिक सुधार करने थे।

58:42

और यह अधिकार आड़े आ रहा था।

58:44

हां। क्योंकि लोग अपनी जमीन देने से मना

58:46

कर देते थे। इसी टकराव के चलते 1978 में

58:50

44वें संविधान संशोधन के जरिए इसे मौलिक

58:54

अधिकारों की सूची से हटा दिया गया।

58:56

तो अब इसका क्या स्टेटस है? मतलब क्या अब

58:58

ये कोई अधिकार ही नहीं है?

59:00

नहीं अधिकार तो है लेकिन अब ये अनुच्छेद

59:03

300 के तहत सिर्फ एक कानूनी अधिकार है।

59:06

मौलिक नहीं। अच्छा मतलब

59:08

मतलब यह कि सरकार जनहित के लिए किसी की

59:11

संपत्ति ले तो सकती है लेकिन एक उचित

59:14

कानूनी प्रक्रिया के तहत और उचित मुआवजा

59:17

देकर आपकी संपत्ति आपसे यूं ही नहीं छीनी

59:20

जा सकती।

59:20

समझ गया और इन अधिकारों की मांग भी जैसा

59:23

कि श्रोत बताते हैं रातोंरात नहीं हुई थी।

59:26

इनकी जड़े तो हमारे स्वतंत्रता संग्राम

59:27

में है।

59:28

बिल्कुल। 1925 के एनी बेसेंट के बिल से

59:32

लेकर 1928 की नेहरू रिपोर्ट तक हर जगह

59:35

इनकी झलक मिलती है और 1931 का कराची

59:39

अधिवेशन तो इस मामले में एक मील का पत्थर

59:41

था

59:41

जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की थी।

59:44

हां उसमें कांग्रेस ने बाकायदा एक

59:46

घोषणापत्र में इन अधिकारों की मांग की

59:49

जिसका ड्राफ्ट जवाहरलाल नेहरू ने तैयार

59:51

किया था। इससे पता चलता है कि हमारे

59:54

स्वतंत्रता सेनानियों का विज़न कितना साफ

59:56

था

59:57

कि आजाद भारत की बुनियाद नागरिक अधिकारों

60:00

पर ही रखी जाएगी।

60:01

बिल्कुल। तो चलिए आज जो छह अधिकार हमें

60:04

मिले हैं उन पर आते हैं। पहला स्तंभ है

60:07

समता का अधिकार। हां, अनुच्छेद 14 से 18

60:11

तक। और यह सिर्फ एक लाइन नहीं है। यह

60:14

समानता का एक पूरा पैकेज है। सबसे पहले तो

60:17

अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के सामने सब

60:21

बराबर है।

60:22

कोई कितना भी अमीर हो या ताकतवर कानून

60:25

सबके लिए एक है।

60:26

फिर आती है सामाजिक बराबरी। अनुच्छेद 15

60:30

कहता है कि किसी भी नागरिक के साथ धर्म,

60:33

जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर

60:35

भेदभाव नहीं किया जा सकता। दुकानों,

60:38

होटलों, कुओं मतलब किसी भी सार्वजनिक जगह

60:42

पर जाने से किसी को रोका नहीं जा सकता।

60:44

और सरकारी नौकरियों में भी बराबरी का

60:45

मौका।

60:46

जी वो अनुच्छेद 16 है और अनुच्छेद 17 तो

60:50

छुआछू जैसी सामाजिक कुप्रथा को एक दंडनीय

60:54

अपराध घोषित करके जड़ से खत्म करता है।

60:57

इसमें एक और दिलचस्प बात है उपाधियों के

60:59

अंत की। अनुच्छेद 18 मतलब अब कोई राजा

61:02

साहब या राय बहादुर नहीं बन सकता।

61:04

हां। ताकि समाज में बनावटी भेदभाव पैदा ना

61:08

हो। तो एक बार जब संविधान ने यह तय कर

61:11

दिया कि सब नागरिक बराबर हैं तो अगला सवाल

61:14

था इस बराबरी का फायदा क्या? अगर नागरिक

61:18

आजादी ना हो।

61:19

और यहीं से आता है दूसरा सबसे मजबूत स्तंभ

61:21

स्वतंत्रता का अधिकार।

61:23

अनुच्छेद 19 से 22 तक। और अनुच्छेद 19 तो

61:26

अपने आप में एक मिनी संविधान जैसा लगता

61:28

है। इसमें छह तरह की आजादियां हैं।

61:30

यह आजादियां लोकतंत्र की धड़कन है। आपको

61:33

बोलने की, अपनी बात रखने की आजादी है। इसी

61:36

में प्रेस की आजादी और सूचना पाने का

61:39

अधिकार भी छिपा है।

61:40

और शांति से इकट्ठा होने की आजादी भी।

61:42

बिना हथियारों के आप संघ या संगठन बना

61:46

सकते हैं। आप देश में कहीं भी घूम सकते

61:48

हैं और कहीं भी बस सकते हैं। और आखिर में

61:51

आप अपनी मर्जी का कोई भी व्यापार या पेशा

61:54

चुन सकते हैं।

61:54

वाह और हमारे स्रोत में कमाल की बात यह भी

61:57

है कि आज जो हम इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं

61:59

वो अधिकार भी अनुच्छेद 19 में ही छिपा है।

62:01

बिल्कुल ये न्यायिक व्याख्या का एक

62:03

बेहतरीन उदाहरण है। समय के साथ संविधान

62:06

कैसे खुद को ढालता है। मतलब जब हम आज सोशल

62:09

मीडिया पर कुछ पोस्ट करते हैं तो हम असल

62:11

में उसी मौलिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे

62:13

हैं।

62:13

हां अब इसी में आगे है अनुच्छेद 20 जो

62:16

अपराधियों के अधिकारों की बात करता है।

62:18

सुनने में अजीब लगे लेकिन यह बहुत जरूरी

62:20

है।

62:21

क्या है वो अधिकार?

62:22

तीन बातें हैं। एक गुनाह की एक ही सजा

62:25

मिलेगी। सजा उसी कानून के हिसाब से मिलेगी

62:28

[संगीत] जो गुनाह के वक्त लागू था। और

62:31

किसी को भी खुद के खिलाफ गवाही देने के

62:33

लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। और फिर आता

62:36

है अनुच्छेद 21 [संगीत]

62:37

प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार। यह

62:40

शायद सबसे ज्यादा चर्चित और सबसे ताकतवर

62:43

अधिकार है।

62:44

यकीनन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्याख्या

62:46

करते हुए इसके दायरे को बहुत बड़ा कर दिया

62:49

है। इसका मतलब सिर्फ जिंदा रहना नहीं

62:52

बल्कि गरिमा के साथ सम्मान के साथ जीना

62:54

है।

62:55

और इसी में वो निजता का अधिकार भी आता है

62:57

ना। राइट टू प्राइवेसी। हां 2017 में जब

63:00

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार

63:03

एक मौलिक अधिकार है तो उसने एक झटके में

63:06

डिजिटल दुनिया में हमारी आजादी की परिभाषा

63:09

बदल दी।

63:10

इसका मतलब है कि अब सरकार या कोई कंपनी

63:12

हमारी निजी जानकारी के साथ मनमानी नहीं कर

63:15

सकती। बिल्कुल और सिर्फ यही नहीं स्वच्छ

63:18

पर्यावरण का अधिकार, सोने का अधिकार यह सब

63:21

इसी अनुच्छेद 21 की छत्रछाया में आते हैं।

63:24

और शिक्षा का अधिकार

63:25

वो भी बाद में अनुच्छेद 21 क जोड़ा गया जो

63:29

छ से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और

63:31

अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।

63:33

हम और इस स्वतंत्रता के अधिकार में आखिरी

63:36

चीज है अनुच्छेद 22 जो गिरफ्तारी से बचाता

63:38

है।

63:39

हां, यह मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगाता

63:41

है। अगर किसी को गिरफ्तार किया जाता है,

63:43

तो उसे वजह बतानी होगी। 24 घंटे के अंदर

63:46

मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा और

63:48

अपनी पसंद का वकील करने का हक देना होगा।

63:51

यहीं पर एक बहुत गंभीर और

63:55

उलझावा कांसेप्ट आता है निवारक निरोध यानी

63:59

प्रिवेंटिव डिटेंशन। यह सुनने में ही

64:01

विरोधाभासी लगता है कि किसी को अपराध करने

64:04

से पहले ही गिरफ्तार कर लिया जाए। यह एक

64:07

असाधारण शक्ति है जो सरकार को मिली है और

64:10

यह अनुच्छेद 22 का ही एक हिस्सा है। इसका

64:13

[संगीत] मकसद सजा देना नहीं है।

64:15

तो फिर क्या है?

64:16

इसका मकसद है देश की सुरक्षा या सार्वजनिक

64:19

व्यवस्था को खतरे से बचाने के लिए किसी को

64:21

अपराध करने से रोकना। लेकिन इसके दुरुपयोग

64:24

को रोकने के लिए सख्त नियम है।

64:26

जैसे

64:27

किसी को अनिश्चित काल के लिए तो नहीं रखा

64:30

जा सकता। नहीं बिल्कुल नहीं। सरकार किसी

64:33

को भी सिर्फ 3 महीने तक इस कानून के तहत

64:36

हिरासत में रख सकती है। अगर इससे ज्यादा

64:39

समय के लिए रखना है तो एक सलाहकार बोर्ड

64:42

से मंजूरी लेनी पड़ती है जिसमें हाई कोर्ट

64:45

के जज होते हैं।

64:46

अच्छा तो इस पे भी एक चेक और बैलेंस है।

64:48

बिल्कुल।

64:49

ठीक है। तो समानता और स्वतंत्रता के बाद

64:51

तीसरा अधिकार आता है शोषण के विरुद्ध

64:53

अधिकार। अनुच्छेद 23 और 24। यह मानवीय

64:56

गरिमा को पक्का करता है। अनुच्छेद 23

64:59

इंसानों की खरीदफरोख्त, बेगारी और जबरन

65:02

मजदूरी पर रोक लगाता है। और अनुच्छेद 24,

65:06

बाल मजदूरी पर।

65:07

खासकर 14 साल से कम उम्र के बच्चों को

65:09

खतरनाक जगहों पर काम करने से रोकता है।

65:11

जी, कारखानों या खदानों में

65:13

इसके बाद आता है भारत जैसे विविधता वाले

65:16

देश के लिए बेहद जरूरी अधिकार, धार्मिक

65:18

स्वतंत्रता का अधिकार। अनुच्छेद 25 से 28

65:22

तक [संगीत]

65:22

यह भारत के सेकुलर ताने-बाने की गारंटी

65:25

है। यह हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, उस

65:29

पर अमल करने और उसका प्रचार करने की आजादी

65:32

देता है।

65:33

और धार्मिक संस्थाएं बनाने का भी हक देता

65:35

है।

65:35

हां। और यह भी कहता है कि सरकार जनता के

65:38

टैक्स का पैसा किसी एक धर्म को बढ़ावा

65:41

देने पर खर्च नहीं कर सकती और सरकारी

65:44

स्कूलों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी

65:46

जाएगी।

65:47

सही। [संगीत] और फिर अल्पसंख्यकों के लिए

65:49

खास अधिकार हैं संस्कृति और शिक्षा संबंधी

65:52

अधिकार।

65:52

हां, अनुच्छेद 29 और 30 यह भारत की

65:56

विविधता को सहेजने के लिए है। यह कहता है

65:58

कि जिन नागरिकों की अपनी अलग भाषा, लिपि

66:01

या संस्कृति है, उन्हें उसे बचाने का पूरा

66:04

हक है।

66:05

और वे अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान भी खोल

66:07

सकते हैं

66:08

और उन्हें चला भी सकते हैं।

66:09

और अब हम आते हैं उस अधिकार पर जिसके बिना

66:13

यह सारे अधिकार शायद बेईमानी हो जाते।

66:16

जिसे डॉ. अंबेडकर ने संविधान की आत्मा और

66:18

हृदय कहा था।

66:19

संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32

66:23

डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि अगर कोई

66:25

मुझसे पूछे कि संविधान का सबसे महत्वपूर्ण

66:28

अनुच्छेद कौन सा है? तो मैं इसी का नाम

66:30

लूंगी क्योंकि यह वो चाबी है जो बाकी सारे

66:34

अधिकारों के दरवाजे खोलती है।

66:36

यह खुद एक मौलिक अधिकार है जो हमें अपने

66:38

दूसरे मौलिक अधिकारों को लागू करवाने का

66:40

अधिकार देता है।

66:41

बिल्कुल। अगर आपके किसी भी मौलिक अधिकार

66:45

का हनन होता है तो आप सीधे सुप्रीम कोर्ट

66:48

जा सकते हैं [संगीत]

66:48

और यहीं पर रिट की भूमिका आती है। ये पांच

66:52

तरह के हथियार हैं जो सुप्रीम कोर्ट और

66:54

हाई कोर्ट इस्तेमाल करते हैं। इन्हें अगर

66:56

आसान भाषा में समझना हो तो

66:57

इन्हें हम अदालत के ब्रह्मास्त्र कह सकते

67:00

हैं। पहला है बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी

67:04

हैवियस कॉरपस।

67:05

इसका क्या मतलब है? सोचिए पुलिस किसी को

67:08

उठा ले और बताए ही नहीं कि वो कहां है। यह

67:11

रिट कोर्ट का वो आदेश है जो कहता है जिस

67:15

व्यक्ति को आपने हिरासत में लिया है उसे

67:18

तुरंत मेरे सामने पेश करो।

67:20

यह [संगीत] तो बहुत जरूरी है।

67:21

हां यह किसी को गैरकानूनी तरीके से गायब

67:24

होने से बचाने की सबसे बड़ी गारंटी है।

67:26

और दूसरा

67:27

दूसरा है परमादेश मेंस। इसका मतलब है हम

67:32

आदेश देते हैं। यह कोर्ट का किसी सरकारी

67:35

अफसर को यह कहना है कि तुम अपना वो काम

67:38

करो जो तुम्हें कानूनन करना चाहिए और तुम

67:41

नहीं कर रहे हो। अच्छा और बाकी तीन

67:44

तीसरा है प्रतिषेध प्रोहिबिशन जो एक

67:48

सीनियर कोर्ट का जूनियर कोर्ट को आदेश है

67:50

कि रुको यह मामला तुम्हारे अधिकार क्षेत्र

67:54

से बाहर है।

67:55

चौथा है उत्प्रेषण सर शोरारी जो कहता है

67:59

यह मामला हमारे पास भेज दो।

68:01

और पांचवा

68:02

पांचवा है अधिकार प्रीक्षा को वारंटो मतलब

68:06

किस अधिकार से? जब कोई व्यक्ति गलत तरीके

68:09

से कोई सरकारी पद हासिल कर लेता है तो

68:11

कोर्ट उससे पूछती है कि तुम इस कुर्सी पर

68:14

किस हग से बैठे हो?

68:15

यह तो सच में बहुत ताकतवर उपकरण हैं।

68:18

लेकिन एक सवाल उठता है क्या यह अधिकार

68:21

हमेशा हर हाल में लागू रहते हैं या इन्हें

68:24

कभी निलंबित भी किया जा सकता है? नहीं यह

68:27

असीमित नहीं है। राष्ट्रीय आपातकाल जैसी

68:30

विशेष स्थिति में इन्हें निलंबित भी किया

68:32

जा सकता है। देश की सुरक्षा सर्वोपरि है।

68:35

लेकिन

68:35

एक बहुत बड़ा लेकिन है यहां।

68:37

हां, एक बहुत बड़ा लेकिन है। 1978 के

68:41

44वें संशोधन के बाद यह तय हो गया कि चाहे

68:44

कुछ भी हो जाए अनुच्छेद [संगीत]

68:45

20 और अनुच्छेद 21 को कभी निलंबित नहीं

68:49

किया जा सकता।

68:50

अपराधों में संरक्षण और जीवन का अधिकार।

68:53

यह [संगीत] यह नागरिक आजादी की एक बहुत

68:55

बड़ी जीत थी।

68:56

हमारे स्रोतों में कुछ बहुत जरूरी अदालती

68:58

मामलों का भी जिक्र है जिन्होंने इन

69:00

अधिकारों की कहानी को पूरी तरह बदल दिया।

69:02

खासकर संसद की शक्ति और मौलिक अधिकारों के

69:05

बीच का जो टकराव था।

69:07

यह समझना सबसे जरूरी है। आजादी के बाद एक

69:10

बड़ा सवाल था। क्या संसद मौलिक अधिकारों

69:12

को बदल सकती है?

69:13

हां।

69:14

पहले शंकरी प्रसाद केस में 1952 में

69:17

सुप्रीम कोर्ट ने कहा हां संसद संविधान

69:20

में कुछ भी बदल सकती है मौलिक अधिकार भी।

69:22

फिर,

69:22

फिर गोलकनाथ केस आया 1969 में। कोर्ट अपनी

69:26

ही बात से पलट गया और कहा, नहीं, मौलिक

69:29

अधिकार पवित्र है। संसद इन्हें छू भी नहीं

69:31

सकती।

69:32

तो ये तो एक सीधा टकराव हो गया संसद और

69:34

सुप्रीम कोर्ट के बीच। इसका हल कैसे

69:36

निकला?

69:37

इसका हल निकला 1973 के केशवानंद भारती केस

69:41

में, जो भारतीय न्यायपालिका का शायद सबसे

69:44

बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है।

69:46

इसमें क्या होना?

69:47

यहां सुप्रीम कोर्ट ने एक कमाल का संतुलन

69:49

बनाया। 13 जजों की बेंच ने कहा हां संसद

69:53

संविधान में संशोधन कर सकती है मौलिक

69:55

अधिकारों में भी

69:57

लेकिन

69:57

लेकिन वो इसकी आत्मा को नहीं बदल सकती।

70:01

[संगीत] इसी आत्मा को मूल ढांचा या बेसिक

70:04

स्ट्रक्चर कहा गया।

70:05

ये मूल ढांचा क्या है? इसे कहीं लिखा गया

70:07

है?

70:08

नहीं। कोर्ट ने इसे पूरी तरह परिभाषित

70:10

नहीं किया है। लेकिन समय-समय पर बताया है

70:14

कि इसमें क्या-क्या शामिल है। जैसे

70:16

लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता,

70:18

कानून का शासन, शक्तियों का बंटवारा और

70:21

हां नागरिकों के मौलिक अधिकार।

70:24

तो यह एक तरह की लक्ष्मण रेखा है।

70:26

बिल्कुल। जिसने यह तय कर दिया कि कोई भी

70:29

सरकार बहुमत के दम पर तानाशाही तरीके से

70:32

संविधान के इन मूल सिद्धांतों को खत्म

70:35

नहीं कर सकती। इस एक फैसले ने भारतीय

70:38

लोकतंत्र को बचाया है।

70:40

तो आज की इस गहरी बातचीत से यह साफ है कि

70:43

मौलिक अधिकार सिर्फ कुछ नियम नहीं है

70:45

बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की नींव के

70:47

पत्थर हैं और अनुच्छेद 32 के जरिए इन्हें

70:49

लागू कराने की जो शक्ति हमें मिली है वही

70:51

इन्हें असल में मौलिक बनाती है।

70:53

और केशवानंद भारती केस ने यह पक्का कर

70:56

दिया कि इन अधिकारों की आत्मा को कभी

70:59

मिटाया नहीं जा सकता। मूल ढांचे की

71:02

अवधारणा ने संसद की संशोधन शक्ति पर एक

71:05

ऐसी लगाम लगा दी है जो इन अधिकारों की

71:08

हमेशा रक्षा करती है।

71:10

यह पूरी चर्चा एक बहुत विचारणीय प्रश्न

71:12

छोड़ जाती है। जैसा कि हमने देखा कि 2017

71:16

में निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार बना

71:18

जो आज के डिजिटल युग में बेहद जरूरी है।

71:21

इसे देखते हुए भविष्य में और कौन सा

71:23

अधिकार मौलिक माना जा सकता है?

71:25

जिसके बारे में संविधान निर्माताओं ने

71:27

शायद सोचा भी ना हो। हां, क्या इंटरनेट से

71:30

ना जोड़े जाने का अधिकार यानी राइट टू बी

71:32

डिस्कनेक्टेड या शायद एक साफ और स्वस्थ

71:34

पर्यावरण का अधिकार को भी इतनी ही मजबूती

71:37

से मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाना

71:39

चाहिए? इस पर सोचना दिलचस्प होगा।

71:49

हम भारतीय नागरिक होने के एक ऐसे पहलू पर

71:51

बात करेंगे जो जो अक्सर सुर्खियों से दूर

71:55

रहता है। हमारे मौलिक कर्तव्य हमारे पास

71:58

जो स्रोत है वे इसी विषय पर एक विस्तृत

72:02

अध्याय है और हमारा मिशन यह समझना है कि

72:06

जब हम हमेशा अपने अधिकारों की बात करते

72:09

हैं तो इन कर्तव्यों की कहानी क्या है और

72:12

हमारी नागरिकता में इनकी जगह क्या है?

72:15

बिल्कुल ये एक तरह से सिक्के का दूसरा

72:17

पहलू है। हम सब मौलिक अधिकारों [संगीत] को

72:19

लेकर बहुत जागरूक हैं और और होना भी

72:21

चाहिए। लेकिन हमारे स्रोत बताते हैं कि

72:23

संविधान निर्माताओं ने या यूं कहें कि बाद

72:25

में [संगीत] संविधान में संशोधन करने

72:26

वालों ने महसूस किया कि अधिकारों और

72:28

जिम्मेदारियों के बीच एक संतुलन होना

72:30

चाहिए

72:31

और यही संतुलन हमारी चर्चा का केंद्र है

72:34

क्योंकि हमारे स्रोतों में पहली ही बात जो

72:36

मुझे चौंकाती है वो यह है कि यह कर्तव्य

72:39

यह हमेशा से संविधान का हिस्सा थे ही

72:42

नहीं। तो सवाल उठता है कि इन्हें क्यों और

72:45

कैसे जोड़ा गया? और सबसे बड़ा सवाल जिसका

72:48

जवाब हर कोई जानना चाहता है। अगर कोई इन

72:51

कर्तव्यों को नहीं मानता तो होता क्या है?

72:54

यह सभी बहुत जरूरी [संगीत] सवाल हैं और

72:56

इनके जवाब हमें सिर्फ एक नागरिक के तौर पर

72:59

नहीं बल्कि एक समाज के तौर पर भी अपनी

73:01

पहचान समझने [संगीत] में मदद करते हैं।

73:03

तो चलिए यहीं से शुरू करते हैं। ये मौलिक

73:06

कर्तव्य आए कहां से? अगर ये संविधान की

73:09

मूल किताब में नहीं थे तो ये ये अचानक

73:12

1976 में कैसे प्रकट हो गए? अचानक शब्द

73:15

यहां बिल्कुल [संगीत] सही बैठता है। जब

73:17

1950 में संविधान लागू हुआ तो उसमें केवल

73:20

मौलिक अधिकार थे। कर्तव्य [संगीत] नहीं।

73:23

हमारे श्रोत बताते हैं कि इसकी प्रेरणा

73:25

पूर्व सोवियत संघ यानी रूस के संविधान से

73:29

ली गई जहां नागरिक के अधिकारों के साथ-साथ

73:31

उनके कर्तव्यों पर बहुत जोर दिया जाता था।

73:34

यह विचार था कि नागरिकता सिर्फ लेने का

73:36

नाम नहीं बल्कि कुछ [संगीत] देने का भी

73:38

नाम है।

73:39

अच्छा तो यह एक बाहरी प्रेरणा थी। लेकिन

73:43

भारत में इसे लाने की जरूरत क्यों महसूस

73:45

हुई? क्या देश में ऐसा माहौल बन गया था कि

73:49

लोगों को उनकी जिम्मेदारियों की याद

73:50

दिलानी पड़ी?

73:51

आप कह सकती हैं इमरजेंसी के दौर के बाद

73:54

सरदार स्वर्ण सिंह समिति का गठन किया गया

73:57

था। उन्हें [संगीत] यह काम दिया गया कि वह

73:59

इस बात पर विचार करें कि क्या संविधान में

74:01

मौलिक कर्तव्यों को शामिल करना चाहिए।

74:04

समिति ने इसकी पुरजोर सिफारिश की और उनका

74:07

मानना था कि सिर्फ अधिकारों की बात करना

74:09

देश को एक तरह से असंतुलित कर रहा है।

74:12

और फिर 42वां संविधान संशोधन हुआ जिसे

74:16

मिनी कॉन्स्टिट्यूशन भी कहा जाता है।

74:18

1976 में इसी संशोधन के जरिए संविधान में

74:22

एक नया हिस्सा जोड़ा गया। भाग फोर ए और एक

74:26

नया अनुच्छेद 51 ए [संगीत] जिसमें इन 10

74:29

कर्तव्यों को रखा गया। 11वां बाद में

74:31

जोड़ा गया जिस पर हम आगे बात करेंगे।

74:34

ठीक है? तो अब सबसे बड़े सवाल पर आते हैं।

74:37

मान लीजिए कोई इन कर्तव्यों का पालन नहीं

74:39

करता तो क्या उस पर कोई कानूनी कारवाई हो

74:42

सकती है? क्या इन्हें अदालत में इनफोर्स

74:45

करवाया जा सकता है?

74:46

और यहीं पर कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता

74:49

है। स्रोत बिल्कुल साफ कहते हैं [संगीत]

74:51

कि यह गैर न्यायोचित हैं। यानी

74:54

नॉनजस्टिसिएबल। हां, नॉन जस्टिशबल। मतलब

74:57

इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू नहीं

74:59

किया जा सकता। [संगीत] आप किसी को अदालत

75:01

में सिर्फ इसलिए नहीं घसीट सकते कि उसने

75:03

किसी मौलिक कर्तव्य का उल्लंघन किया है।

75:05

तो फिर इनका फायदा क्या है? अगर यह सिर्फ

75:07

कागज पर लिखी अच्छी बातें हैं जिन्हें कोई

75:10

मानने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नहीं

75:13

है।

75:13

यहीं पर हमें कानूनी और संवैधानिक महत्व

75:15

[संगीत] के बीच का फर्क समझना होगा। श्रोत

75:17

इन्हें एक मूल्यवान दिशा दर्शन कहते हैं।

75:20

इसका मतलब है कि यह एक तरह का नैतिक कंपास

75:22

[संगीत] है। जब संसद कोई कानून बनाती है

75:24

या जब सुप्रीम कोर्ट किसी कानून की

75:27

व्याख्या करता है तो वह इन कर्तव्यों को

75:29

ध्यान [संगीत] में रख सकते हैं। यह बताते

75:31

हैं कि एक आदर्श भारतीय नागरिक को कैसा

75:33

होना चाहिए।

75:33

मतलब यह सीधे तौर पर कानून नहीं है। पर यह

75:36

कानून बनाने और उसे समझने की प्रक्रिया को

75:40

प्रभावित करते हैं। एक तरह से यह

75:42

राष्ट्रीय चरित्र की परिभाषा है।

75:44

आपने बिल्कुल सही समझा। यह एक नैतिक और

75:46

नागरिक संहिता है जो हमें याद दिलाती है

75:48

कि एक जिम्मेदार नागरिक से क्या उम्मीद की

75:51

जाती है।

75:51

यह तो बहुत दिलचस्प है। तो फिर इस नैतिक

75:54

कंपस में [संगीत] क्या-क्या शामिल है?

75:57

सबसे पहले कौन से कर्तव्य आते हैं? स्रोत

76:00

के हिसाब से पहला समूह सीधे राष्ट्र और

76:03

उसके आदर्शों से जुड़ा है।

76:06

हां, यह वो बुनियाद है जिस पर नागरिक और

76:09

राष्ट्र का रिश्ता खड़ा होता है। पहला

76:11

कर्तव्य कहता है कि संविधान का पालन करें

76:14

और उसके आदर्शों, संस्थाओं, [संगीत]

76:17

राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर

76:19

करें।

76:20

यह तो काफी सीधा और सरल लगता है। झंडे को

76:23

सलाम करना, राष्ट्रगान पर खड़े होना।

76:26

लेकिन क्या इसमें आदर्शों और संस्थाओं का

76:29

जिक्र इसे और गहरा नहीं बना देता?

76:31

बिल्कुल यही इसकी खूबसूरती है। यह सिर्फ

76:34

प्रतीकों के सम्मान की [संगीत] बात नहीं

76:36

है। जब हम संविधान के आदर्शों की बात करते

76:38

हैं तो इसका मतलब है लोकतंत्र,

76:41

धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय,

76:43

स्वतंत्रता।

76:44

स्वतंत्रता। वो सारे मूल्य जिन पर हमारा

76:47

देश बना है। और संस्थाओं का आदर यानी

76:50

संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग जैसी

76:53

संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना। तो यह सिर्फ

76:56

एक प्रतीकात्मक काम नहीं बल्कि [संगीत] एक

76:58

वैचारिक प्रतिबद्धता है।

76:59

अगला कर्तव्य देश की संप्रभुता, एकता और

77:03

अखंडता की रक्षा करने की बात करता है।

77:06

मुझे लगता है यह एक ऐसा कर्तव्य है जो हर

77:10

नागरिक से एक [संगीत] सिपाही होने की

77:12

उम्मीद करता है बिना वर्दी के। बहुत अच्छी

77:15

उपमा है। यह कर्तव्य हमें बताता है कि देश

77:18

की एकता सिर्फ सीमाओं पर सेना का काम नहीं

77:21

है। यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। इसका

77:23

मतलब है अलगाववादी विचारों का विरोध करना,

77:26

समाज को धर्म या जाति के नाम पर तोड़ने

77:28

वाली बातों से दूर रहना और देश की एकता को

77:31

मजबूत करना। तीसरा कर्तव्य थोड़ा

77:35

काव्यात्मक लगता है। स्वतंत्रता के लिए

77:38

हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने

77:41

वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए

77:44

रखना। मुझे लगता है कई लोग इसे सिर्फ

77:47

गांधी जी और अहिंसा से जोड़कर देखते

77:49

होंगे। पर क्या इसका दायरा उससे भी बड़ा

77:52

है? सपना यह सभी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन

77:55

के उच्च आदर्श हैं। यह कर्तव्य हमें अपने

77:58

इतिहास की उस वैचारिक [संगीत] समृद्धि को

78:00

याद रखने और उसे अपने जीवन में उतारने के

78:02

लिए कहता है।

78:03

और इसी से जुड़ा चौथा कर्तव्य है देश की

78:07

रक्षा करें और आवाहन किए जाने पर राष्ट्र

78:10

की सेवा के लिए तैयार रहें। क्या इसका

78:12

मतलब अनिवार्य सैन्य सेवा से है?

78:15

नहीं। हमारे स्रोत यह साफ करते हैं कि

78:18

इसका दायरा बहुत व्यापक है। आवाहन किए

78:21

जाने का मतलब किसी भी राष्ट्रीय संकट से

78:23

हो सकता है। जैसे किसी बाढ़ या भूकंप जैसी

78:26

प्राकृतिक आपदा [संगीत] के समय राहत

78:28

कार्यों में मदद करना या किसी महामारी के

78:30

दौरान एक जिम्मेदार नागरिक की तरह नियमों

78:33

[संगीत] का पालन करना और दूसरों की सहायता

78:35

करना। यह राष्ट्र सेवा का एक व्यापक रूप

78:38

है।

78:38

तो यह पहले चार कर्तव्य एक नागरिक के तौर

78:41

पर हमारी राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित

78:44

करते हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।

78:47

संविधान हमसे सिर्फ एक अच्छे नागरिक ही

78:50

नहीं बल्कि एक अच्छे इंसान और पड़ोसी होने

78:53

की भी उम्मीद करता है।

78:55

बिल्कुल। और यहीं पर संविधान एक सामाजिक

78:57

दस्तावेज के रूप में उभरता है जो सिर्फ

79:00

सरकार चलाने के नियम नहीं बताता बल्कि

79:02

समाज [संगीत] को दिशा भी दिखाता है।

79:03

पांचवा कर्तव्य शायद इसका सबसे बड़ा

79:06

उदाहरण है। यह कहता है कि धर्म, भाषा,

79:09

प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव

79:12

[संगीत] से परे भारत के सभी लोगों में

79:15

समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का

79:18

निर्माण करें। और इसी में एक और लाइन है

79:20

जो बहुत शक्तिशाली है। उन प्रथाओं का

79:23

त्याग करें जो [संगीत] स्त्रियों के

79:24

सम्मान के विरुद्ध है।

79:26

यह अनुच्छेद का दिल है ऐसा मैं मानता हूं।

79:28

भ्रात्व यानी भाईचारा यह शब्द हमारी

79:31

प्रस्तावना [संगीत] में भी है। यह कहता है

79:33

कि हमारी पहली पहचान भारतीय है और जो

79:36

दूसरा हिस्सा है स्त्रियों के सम्मान के

79:38

विरुद्ध प्रथाओं का त्याग। यह 1976 के

79:41

हिसाब से एक एक क्रांतिकारी कदम था। यह

79:44

बात शक्तिशाली तो है लेकिन शायद सबसे

79:47

मुश्किल भी क्योंकि स्त्रियों के सम्मान

79:49

के विरुद्ध प्रथाओं की परिभाषा को लेकर ही

79:52

समाज में अक्सर मतभेद होता है। संविधान

79:55

यहां नागरिक से एक बहुत बड़ी सामाजिक

79:57

जिम्मेदारी लेने को कह रहा है कि वह अपने

80:00

आसपास हो रहे गलत के खिलाफ आवाज उठाए।

80:03

सही कहा आपने। यह निष्क्रिय रहने की इजाजत

80:06

नहीं देता। यह हमसे एक सक्रिय सामाजिक

80:08

[संगीत] सुधारक बनने की अपेक्षा करता है।

80:10

यह कहता है कि आप दहेज प्रथा, बाल विवाह

80:13

या किसी भी ऐसी परंपरा को सिर्फ इसलिए

80:15

नहीं मान सकते कि वह सदियों से चली आ रही

80:18

है। अगर वह स्त्री के सम्मान के खिलाफ है

80:21

तो उसका त्याग करना आपका कर्तव्य है। और

80:23

इसी सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करता है

80:26

छठा कर्तव्य जो हमारी सामासिक संस्कृति

80:30

यानी कॉम्पोजिट कल्चर की गौरवशाली परंपरा

80:34

को समझने और उसे बचाने की बात करता है। यह

80:37

सामासिक संस्कृति क्या है?

80:38

सामासिक संस्कृति का मतलब है भारत की

80:40

मिलीजुली विरासत। वो संस्कृति जो [संगीत]

80:43

एक धारा से नहीं बल्कि हजारों धाराओं के

80:45

मिलने से बनी है। इसमें वेदों का ज्ञान भी

80:48

है और सूफी संतों की शायरी भी। इसमें

80:50

अजंता एलोरा की कला भी है और मुगल

80:53

वास्तुकला भी। यह कर्तव्य हमें याद दिलाता

80:55

है कि भारत की असली पहचान किसी एक रंग में

80:58

नहीं बल्कि इंद्रधनुष की तरह सभी रंगों के

81:01

मेल में है। यह कट्टरता और संकीर्ण सोच के

81:04

खिलाफ एक संवैधानिक [संगीत]

81:05

संदेश है।

81:06

अब कुछ ऐसे कर्तव्यों की बात करते हैं जो

81:08

हमें एक आधुनिक और प्रगतिशील समाज बनाने

81:11

की दिशा दिखाते हैं। इनमें से सातवां

81:14

कर्तव्य तो ऐसा है जो आज की तारीख में

81:16

शायद सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है।

81:19

आप पर्यावरण की बात कर रही हैं?

81:20

जी। यह कहता है कि प्राकृतिक पर्यावरण की

81:23

जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव

81:27

हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा

81:31

प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें। यह

81:34

सोचना [संगीत] भी कमाल है कि 1976 में जब

81:37

दुनिया में क्लाइमेट चेंज की इतनी बातें

81:39

नहीं होती थी, तब हमारे संविधान में इसे

81:42

एक मौलिक कर्तव्य बनाया गया।

81:44

यह वास्तव में बहुत दूरदर्शी था। इसने

81:47

पर्यावरण संरक्षण को हर नागरिक की

81:49

व्यक्तिगत जिम्मेदारी बना दिया। यह कहता

81:52

है कि सिर्फ सरकार नीतियां नहीं बनाएगी

81:54

बल्कि आप और [संगीत] मैं भी अपने ग्रह के

81:56

प्रति जवाबदेह हैं। आज जब हम वायु,

81:59

प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ

82:01

रहे हैं तो यह कर्तव्य हमें रास्ता दिखाता

82:04

है।

82:04

मुझे आठवां कर्तव्य हमेशा से बहुत आकर्षक

82:07

लगा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और

82:11

ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास

82:13

करना क्योंकि यह बाकी कर्तव्यों से अलग

82:16

[संगीत] है। यह किसी बाहरी चीज जैसे झंडे

82:18

या पर्यावरण के बारे में नहीं है बल्कि यह

82:21

हमारे सोचने के तरीके को बदलने की बात कर

82:24

रहा है। [संगीत] यह तो एक तरह से मानसिक

82:26

क्रांति का आह्वान है।

82:28

बिल्कुल और आज के दौर में जब WhatsApp और

82:30

सोशल मीडिया पर हर तरह की गलत जानकारी और

82:32

अफवाहएं फैल जाती हैं, यह कर्तव्य और भी

82:35

जरूरी हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का

82:37

मतलब सिर्फ लैब में काम करना नहीं है।

82:39

बल्कि यह सवाल पूछना है [संगीत] कि जो खबर

82:41

मेरे पास आई है, उसका सोर्स क्या है? क्या

82:44

इसका कोई सबूत है? यह हमें एक बेहतर

82:46

ज्यादा जागरूक डिजिटल [संगीत] सिटीजन

82:48

बनाता है। यह अंधविश्वास और रूढ़िवाद पर

82:50

तर्क और ज्ञान की जीत का आहान है।

82:53

और इसी सोच से जुड़ा है नोवा कर्तव्य।

82:56

सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और

82:58

हिंसा से दूर रहें। यह बहुत बुनियादी बात

83:02

लगती है। लेकिन हम अक्सर विरोध प्रदर्शनों

83:04

में बसों को जलते हुए या सरकारी इमारतों

83:07

को नुकसान पहुंचाते हुए देखते हैं।

83:09

यह बुनियादी है। लेकिन हम इसकी अहमियत भूल

83:12

जाते हैं। यह कर्तव्य हमें याद दिलाता है

83:15

कि वह बस, वो ट्रेन, वो पार्क किसी सरकार

83:18

का नहीं बल्कि हमारा है। हम अपने ही टैक्स

83:21

के पैसों से बनी संपत्ति को नुकसान पहुंचा

83:23

रहे होते हैं। और हिंसा से दूर रहना तो

83:26

हमारे स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र

83:28

था। यह गांधीवादी आदर्शों को संवैधानिक

83:30

[संगीत] कर्तव्य का रूप देता है।

83:32

और फिर आता है दवां कर्तव्य जो कहता है कि

83:35

व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी

83:37

क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का

83:40

निरंतर प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर

83:44

प्रगति की नई ऊंचाइयों को छू सके। इसकी

83:47

भाषा थोड़ी जटिल है।

83:48

हां, लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा और सुंदर

83:51

है। इसका सीधा सा मतलब है कि आप जो भी

83:54

करें अपना बेस्ट दें। चाहे आप एक छात्र

83:57

हो, एक किसान हो, [संगीत] एक वैज्ञानिक

83:59

हो, एक खिलाड़ी हो या एक कलाकार। क्योंकि

84:02

जब हर कोई अपना काम बेहतरीन तरीके से

84:04

करेगा तो देश अपने आप आगे बढ़ेगा। यह

84:07

व्यक्तिगत उत्कृष्टता को राष्ट्रीय प्रगति

84:10

से जोड़ता है।

84:11

इस पूरी सूची में एक कर्तव्य ऐसा है जो

84:14

मूल सूची में नहीं था। हम

84:16

इसे बाद में जोड़ा गया और आज यह शायद सबसे

84:19

महत्वपूर्ण [संगीत]

84:20

कर्तव्यों में से एक है।

84:21

जी हां, यह 11वां और सबसे नया मौलिक

84:25

कर्तव्य है जो शिक्षा से जुड़ा है।

84:27

यह कहता है कि माता-पिता या संरक्षक का यह

84:30

कर्तव्य होगा कि वे छ से 14 वर्ष तक की

84:33

आयु वाले अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को

84:36

शिक्षा के अवसर प्रदान करें।

84:38

इसे 86वें संविधान संशोधन 2002 के जरिए

84:42

जोड़ा गया था। यह वही संशोधन है जिसने

84:45

शिक्षा को छ से 14 साल के बच्चों के लिए

84:47

एक मौलिक अधिकार बनाया था। तो यहां पर

84:50

अधिकार और कर्तव्य का वह संतुलन जिसकी हम

84:53

बात कर रहे थे एकदम [संगीत] साफ दिखता है।

84:55

बच्चे का अधिकार और माता-पिता का कर्तव्य

84:59

दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते

85:01

हैं।

85:01

बिल्कुल यह एक शानदार उदाहरण है। एक तरफ

85:05

राज्य का यह दायित्व है कि वह बच्चों को

85:08

मुफ्त शिक्षा दें जो कि अनुच्छेद 21 क के

85:11

तहत उनका मौलिक अधिकार है। वहीं दूसरी तरफ

85:14

यह संशोधन माता-पिता या अभिभावकों पर यह

85:18

कर्तव्य डालता है कि वे यह सुनिश्चित

85:20

[संगीत] करें कि बच्चा स्कूल तक पहुंचे।

85:22

यह शिक्षा को एक साझा जिम्मेदारी बनाता

85:25

है। राज्य की भी और परिवार की भी।

85:28

तो इस पूरी चर्चा को समेटे तो हम [संगीत]

85:30

कह सकते हैं कि मौलिक कर्तव्य सिर्फ एक

85:33

सूची नहीं है बल्कि यह एक आईना है जो हमें

85:37

दिखाते हैं कि एक भारतीय नागरिक होने का

85:39

मतलब क्या है? यह हमें याद दिलाते हैं कि

85:42

अधिकार हमें शक्ति देते [संगीत] हैं लेकिन

85:44

कर्तव्य हमें दिशा देते हैं।

85:46

आपने बिल्कुल सही कहा और भले यह कानूनी

85:49

रूप से बाध्यकारी ना हो इनका [संगीत]

85:51

नैतिक और सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा है। यह

85:53

उस आदर्श नागरिक की तस्वीर पेश [संगीत]

85:55

करते हैं जिसकी हमारा संविधान कल्पना करता

85:57

है। एक ऐसा नागरिक जो जागरूक, जिम्मेदार,

86:00

तर्कसंगत, दयालु और राष्ट्र निर्माण में

86:03

एक सच्चा भागीदार हो। यह हमें सिर्फ

86:05

अधिकार मांगने वाला नहीं बल्कि

86:07

जिम्मेदारियां निभाने वाला नागरिक बनने के

86:09

[संगीत] लिए प्रेरित करते हैं।

86:10

इन कर्तव्यों पर इतनी गहराई से बात करने

86:12

के बाद एक सवाल मेरे मन में आ रहा है और

86:15

हम चाहेंगे कि हमारे श्रोता इस पर सोचें।

86:18

स्रोत हमें बताते हैं कि यह कर्तव्य

86:20

कानूनी तौर पर लागू नहीं किए जा सकते हैं।

86:23

पर सोचिए [संगीत] अगर भविष्य में इनमें से

86:26

किसी एक कर्तव्य को जैसे पर्यावरण की

86:30

रक्षा या वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा

86:32

देना कानूनी तौर पर लागू करने योग्य बना

86:35

दिया जाए और इसके उल्लंघन पर सजा का

86:38

प्रावधान कर दिया जाए तो हमारे समाज और

86:41

हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसका क्या

86:43

असर पड़ेगा? अधिकार और कर्तव्य के बीच का

86:46

यह नाजुक संतुलन कैसे बदलेगा?

86:56

किसी भी देश का संविधान उसकी एक तरह से

86:59

रूल बुक होता है। क्या कर सकते हैं? क्या

87:02

नहीं?

87:02

लेकिन सोचिए अगर संविधान में एक विश लिस्ट

87:05

भी हो। सरकार के लिए एक नैतिक कंपास जो

87:08

बताएं कि एक आदर्श देश [संगीत] कैसा दिखना

87:11

चाहिए। और भारतीय संविधान में ठीक यही चीज

87:14

है। इन्हें कहते हैं राज्य के नीति

87:17

निर्देशक तत्व या डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स

87:20

ऑफ स्टेट पॉलिसी। ये मतलब कानून नहीं है

87:24

बल्कि एक सपना है एक बेहतर भारत बनाने का

87:28

रोड मैप।

87:28

तो आज हम इसी रोड मैप को थोड़ा गहराई से

87:31

समझने की कोशिश करेंगे। हमारे पास जो

87:33

स्रोत हैं वो बताते हैं कि यह सिद्धांत

87:37

संविधान के भाग चार में है। अनुच्छेद 36

87:40

से 51 तक और एक दिलचस्प बात यह भी है कि

87:43

ये आईडिया आयरलैंड के संविधान से लिया गया

87:46

है।

87:46

हम्म लेकिन इसमें एक बड़ा पेच है।

87:48

बिल्कुल और वो पेच ये है कि आप इन

87:51

सिद्धांतों को लेकर अदालत नहीं जा सकते।

87:54

मतलब अगर सरकार इनमें से कोई वादा कह सकते

87:56

हैं, पूरा ना करें तो आप उस पर मुकदमा

87:59

नहीं कर सकते। जैसा कि आप मौलिक अधिकारों

88:01

के हनन पर कर सकते हैं।

88:03

हां बिल्कुल। तो फिर सवाल यही उठता है कि

88:05

इनका फायदा क्या है? अगर ये सिर्फ कागज पर

88:08

लिखी अच्छी बातें हैं जिन्हें लागू करने

88:10

की कोई कानूनी मजबूरी नहीं तो क्या ये एक

88:13

तरह के खोखले वादे नहीं है?

88:16

हम्म। एक बहुत जरूरी सवाल है।

88:18

चलिए इसी सवाल की तह तक जाते हैं और इन

88:21

सिद्धांतों का असली मतलब खोजते हैं। ठीक

88:23

है? है तो चलिए इसे खोल कर देखते हैं।

88:25

हमारे स्रोत बताते हैं कि इन सिद्धांतों

88:27

का सबसे बड़ा लक्ष्य है एक कल्याणकारी

88:30

राज्य बनाना। एक वेलफेयर स्टेट।

88:32

सही कहा।

88:33

अनुच्छेद 38 साफ-साफ कहता है कि राज्य का

88:35

काम है लोगों का कल्याण करना और सामाजिक,

88:38

आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करना।

88:41

यह सुनने में बहुत बड़ा और आदर्शवादी लगता

88:44

है।

88:44

लगता है पर इसे जमीन पर कैसे उतारा जाए यह

88:48

भी बताया गया है।

88:49

अनुच्छेद 39 इसी विज़न को हकीकत में बदलने

88:52

के लिए कुछ ठोस निर्देश देता है और इसमें

88:55

कुछ बहुत ही क्रांतिकारी विचार हैं।

88:58

जैसे कि [संगीत] जैसे समान कार्य के लिए

89:00

समान वेतन का सिद्धांत और यह सिर्फ

89:03

पुरुषों और महिलाओं के लिए नहीं है। यह हर

89:06

तरह की असमानता को खत्म करने की दिशा में

89:08

एक बहुत बड़ा कदम है। अच्छा।

89:11

स्रोत में अनुच्छेद 39 में एक और बात पर

89:13

बहुत जोर है कि देश के जो संसाधन है मतलब

89:16

धन और संपत्ति उनका बंटवारा ऐसा हो कि

89:20

फायदा कुछ ही लोगों के हाथ में ना रह जाए।

89:22

हां कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक

89:24

पहुंचे।

89:25

तो क्या यह उसी समाजवादी सोच को नहीं

89:27

दिखाता जिसके बारे में हम अक्सर सुनते

89:29

हैं?

89:30

बिल्कुल। यह उसी समाजवादी संकल्पना का एक

89:32

संवैधानिक आधार है। इसका मतलब यह नहीं है

89:34

कि सरकार सब की संपत्ति छीन लेगी जैसा कुछ

89:37

लोग समझते हैं। इसका मतलब है कि सरकार की

89:39

आर्थिक नीतियां ऐसी हों जो असमानता को कम

89:42

करें और इसी अनुच्छेद में मुफ्त कानूनी

89:45

सहायता की बात भी है।

89:46

हम यह बहुत गहरी बात है।

89:48

बहुत

89:49

इसका मतलब है कि न्याय सिर्फ अमीरों के

89:51

लिए नहीं होना चाहिए। अगर किसी के पास

89:54

वकील करने के पैसे नहीं है तो यह सरकार का

89:57

कर्तव्य है कि वह मदद दे। तो, एक तरफ तो

90:00

यह सिद्धांत बड़े आर्थिक विज़न [संगीत] की

90:03

बात करते हैं। लेकिन हमारे स्रोत यह भी

90:05

दिखाते हैं कि यह आम नागरिक की रोजमर्रा

90:08

की जिंदगी तक पहुंचते हैं।

90:09

हां, और यही तो इनकी खूबसूरती है।

90:12

अनुच्छेद 41, 42 और 43 को हमें एक साथ

90:15

देखना चाहिए। यह एक तरह से भारत के

90:18

कामगारों के लिए एक अधिकारों का घोषणापत्र

90:22

है।

90:22

अच्छा। अनुच्छेद 41 कहता है कि राज्य कुछ

90:26

विशेष परिस्थितियों में जैसे बुढ़ापा,

90:28

बीमारी या बेरोजगारी उसमें लोगों को काम,

90:32

शिक्षा और सरकारी सहायता पाने में मदद

90:35

करेगा।

90:35

एक मिनट, यहां काम पाने का अधिकार की बात

90:37

की गई है। लेकिन यह तो मौलिक अधिकार नहीं

90:40

है। तो क्या यह एक खाली वादा नहीं है। अगर

90:43

सरकार हर किसी को नौकरी नहीं दे सकती, तो

90:45

इस लाइन का असल मतलब क्या है? यह एक बहुत

90:48

जरूरी सवाल है और यहीं इन निदेशक तत्वों

90:51

का असली सार छिपा है। यह अधिकार की गारंटी

90:55

नहीं है। यह एक निर्देश है। संविधान सरकार

90:58

से यह नहीं कह रहा कि हर किसी को सरकारी

91:00

नौकरी दो। वो शायद संभव भी ना हो। हम

91:04

वो कह रहा है कि अपनी नीतियां ऐसी बनाओ

91:07

जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो। मनरेगा

91:10

जैसी योजनाएं [संगीत] इसी सिद्धांत की एक

91:13

मिसाल है।

91:14

अच्छा। जहां सरकार काम की गारंटी देने की

91:17

कोशिश करती है।

91:19

यह एक लक्ष्य है। कोई कानूनी वादा नहीं।

91:22

समझ गया? तो ये एक दिशा है। मंजिल की

91:24

गारंटी नहीं।

91:25

और अनुच्छेद 42 और 43 में क्या है?

91:28

अनुच्छेद 42 काम की मानवीय दशाओं की बात

91:32

करता है। मतलब काम करने की जगह सुरक्षित

91:35

और स्वस्थ हो और खासतौर पर महिलाओं के लिए

91:38

प्रसूति सहायता यानी मेटरनिटी रिलीफ का

91:42

प्रावधान करने का निर्देश देता है।

91:44

[संगीत] और इसी के आधार पर बाद में कानून

91:45

भी बने हैं।

91:46

हां, मेटरनिटी बेनिफिट एक्ट जैसे कानून

91:49

यहीं से आए और अनुच्छेद 43 सिर्फ न्यूनतम

91:52

मजदूरी की नहीं बल्कि निर्वाह मजदूरी की

91:55

बात [संगीत] करता है।

91:56

निर्वाह मजदूरी

91:57

यानी इतनी मजदूरी कि एक इंसान और उसका

92:00

परिवार सिर्फ जिंदा ना रहे बल्कि सम्मान

92:03

से जी सके।

92:04

तो यह तो हुई आर्थिक न्याय की बात,

92:06

[संगीत] कामगारों के सम्मान की बात। लेकिन

92:08

हमारे श्रोत बताते हैं कि संविधान बनाने

92:11

वाले यह भी जानते थे कि सिर्फ पैसे से

92:13

समाज नहीं बदलता। इसके लिए गहरे सामाजिक

92:15

सुधारों की भी जरूरत [संगीत] है।

92:17

बिल्कुल और यह इस रोड मैप का अगला और शायद

92:20

सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ाव है। अब जब आप

92:23

रोटी, कपड़ा और मकान की बात कर लेते हैं,

92:26

तो आपको समाज के ताने-बाने को भी देखना

92:29

पड़ता है। और यहीं पर अनुच्छेद 44 सामने

92:32

आता है।

92:32

यानी सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल

92:35

संहिता, यूनिफार्म सिविल कोड। यह तो हमारे

92:37

देश के सबसे ज्यादा बहस वाले मुद्दों में

92:40

से एक है।

92:40

हमेशा से रहा है। श्रोत बताते हैं कि

92:43

संविधान सभा में भी इस पर बहुत बहस हुई

92:45

थी।

92:45

तो इसे मौलिक अधिकारों की तरह अनिवार्य

92:48

क्यों नहीं बनाया गया? इसे निर्देशक

92:50

तत्वों में क्यों रखा गया?

92:51

यह एक बहुत ही कह सकते हैं समझदारी भरा

92:54

राजनीतिक कदम था। एक तरह का समझौता।

92:57

संविधान बनाने वालों में एक बड़ा वर्ग था

93:00

जो इसे एक आधुनिक और सेुलर देश की निशानी

93:03

मानता था। लेकिन साथ ही कई धार्मिक

93:06

समुदायों की तरफ से इसका कड़ा विरोध भी

93:08

था।

93:09

हम जो अपने पर्सनल लॉ को बनाए रखना चाहते

93:12

थे।

93:12

सही कहा। तो इसे निदेशक तत्वों में डालकर

93:16

संविधान निर्माताओं ने भविष्य के भारत के

93:19

लिए एक आदर्श तो तय कर दिया, लेकिन इसे

93:22

तुरंत लागू करके देश को बांटने का जोखिम

93:25

नहीं उठाया। उन्होंने यह फैसला आने वाली

93:27

पीढ़ियों पर छोड़ दिया। यह वाकई दिलचस्प

93:30

है। अच्छा सामाजिक सुधार की इस कड़ी में

93:32

शिक्षा की क्या भूमिका है?

93:34

शिक्षा को तो नींव माना गया है। अनुच्छेद

93:36

45 कहता है कि राज्य छ साल तक के सभी

93:39

बच्चों की देखभाल और मुफ्त और अनिवार्य

93:42

शिक्षा के लिए अवसर देगा। दिलचस्प बात यह

93:45

है कि पहले यह 14 साल तक के बच्चों के लिए

93:48

था।

93:49

हां, लेकिन फिर 86वें संशोधन के बाद

93:52

शिक्षा का अधिकार तो मौलिक अधिकार बन गया।

93:54

बिल्कुल। और इस अनुच्छेद का रूप बदल गया।

93:57

यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे एक

94:00

निदेशक तत्व समय के साथ एक शक्तिशाली

94:03

मौलिक अधिकार में बदल सकता है।

94:05

और क्या इन सिद्धांतों में समाज के उन

94:07

वर्गों के लिए कुछ खास है जिन्हें

94:09

ऐतिहासिक रूप से पीछे छोड़ दिया गया

94:11

कि वो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित

94:14

जनजातियों और दूसरे कमजोर वर्गों के

94:17

शैक्षिक और आर्थिक हितों का विशेष ध्यान

94:20

रखेगा

94:21

और उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से

94:23

बचाएगा। हां ये सिर्फ एक सामान्य निर्देश

94:26

नहीं है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि

94:29

हमारे समाज में ऐतिहासिक रूप से अन्याय

94:32

हुआ है और उसे ठीक करने के लिए विशेष

94:35

प्रयासों की जरूरत है। आरक्षण जैसी

94:37

नीतियां अपनी ताकत एक तरह से इसी अनुच्छेद

94:41

से पाती हैं।

94:41

तो हमने आर्थिक और सामाजिक न्याय [संगीत]

94:43

की बात कर ली। लेकिन एक अच्छे जीवन के लिए

94:45

और क्या जरूरी है? हमारे स्रोत बताते हैं

94:48

कि संविधान निर्माता स्वास्थ्य और

94:50

पर्यावरण जैसे मुद्दों को लेकर भी बहुत

94:53

सजग थे।

94:54

हां, उनका जो दृष्टिकोण था वो बहुत समग्र

94:56

था। अनुच्छेद 47 लोगों के पोषण स्तर, जीवन

95:00

स्तर और जन स्वास्थ्य को सुधारने को राज्य

95:03

का प्राथमिक कर्तव्य मानता है। इसी

95:05

अनुच्छेद में नशीले पेय और हानिकारक दवाओं

95:08

पर प्रतिबंध लगाने की बात भी कही गई है।

95:11

अच्छा तो देश के कई राज्यों में जो

95:13

शराबबंदी के कानून हैं, वह यहीं से

95:15

प्रेरणा लेते हैं।

95:16

बिल्कुल।

95:17

और पर्यावरण आज यह दुनिया का इतना बड़ा

95:19

मुद्दा है। लेकिन क्या दशकों पहले संविधान

95:22

में इसके बारे में सोचा गया था? यह

95:24

संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता का सबसे

95:27

बड़ा प्रमाण है। अनुच्छेद 48 में साफ तौर

95:31

पर पर्यावरण के संरक्षण और सुधार और वन

95:34

[संगीत] और वन्य जीवों की रक्षा करने की

95:37

बात कही गई है। यह सोचना कमाल का है कि

95:39

उन्होंने 1970 के [संगीत] दशक में ही इसे

95:42

संविधान में जोड़ दिया था।

95:44

जब दुनिया में पर्यावरण को लेकर आज ऐसी

95:46

चिंता नहीं थी।

95:48

बिल्कुल नहीं थी। इसी अनुच्छेद ने भारत

95:50

में पर्यावरण से जुड़े कानूनों की नींव

95:52

रखी। तो इसी से जुड़ा एक और अनुच्छेद है

95:54

अनुच्छेद 48 जिसमें कृषि और पशुपालन को

95:57

बढ़ावा देने और गोवध पर रोक की बात है। यह

96:00

भी काफी विवादित रहा है।

96:01

हां, यह अनुच्छेद आर्थिक और सामाजिक दोनों

96:05

पहलुओं को छूता है। एक [संगीत] तरफ यह

96:07

कृषि को आधुनिक बनाने की बात करता है तो

96:09

दूसरी तरफ गाय और दूसरे दुधारू पशुओं के

96:13

वध पर रोक लगाने का निर्देश देता है। यह

96:16

भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ से

96:18

जुड़ा एक संवेदनशील पहलू है। हम और इस पर

96:21

अक्सर बहस होती है कि यह एक आर्थिक

96:24

निर्देश है या धार्मिक

96:26

सही है।

96:26

इन सब के अलावा क्या हमारी ऐतिहासिक धरोहर

96:29

के बारे में भी कुछ कहा गया है?

96:31

जरूर अनुच्छेद 19 कहता है कि राष्ट्रीय

96:34

महत्व के सभी स्मारकों, जगहों और चीजों की

96:37

रक्षा करना राज्य का दायित्व है। तो यह

96:40

सिद्धांत सिर्फ भविष्य बनाने की बात नहीं

96:42

करते बल्कि हमारे अतीत को सहेजने का भी

96:45

निर्देश देते हैं।

96:46

ठीक है? तो यह सारे सिद्धांत सरकार को

96:48

बताते हैं कि उसे देश के अंदर क्या करना

96:50

है। लेकिन सरकार के कामकाज के तरीके और

96:53

दुनिया के साथ [संगीत] भारत के रिश्ते के

96:54

बारे में यह क्या कहते हैं?

96:56

यहां दो बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद हैं।

96:58

पहला है अनुच्छेद 50 जो कहता है कि

97:01

न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा

97:04

जाना चाहिए।

97:05

इसे सरल भाषा में समझाएंगी। [संगीत]

97:06

इन्हें अलग रखने की जरूरत क्यों है? इसका

97:09

मतलब है कि इंसाफ करने वाली संस्थाएं यानी

97:12

अदालतें और सरकार चलाने वाली संस्थाएं

97:15

यानी मंत्री और अधिकारी एक दूसरे से

97:17

स्वतंत्र हो। सोचिए अगर जज को अपना फैसला

97:20

सुनाने से पहले किसी मंत्री से पूछना पड़े

97:23

तो क्या कभी निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा?

97:25

नहीं कभी नहीं।

97:26

यह सिद्धांत लोकतंत्र की नींव है। यह

97:29

सुनिश्चित करता है कि कानून का राज चले

97:32

किसी व्यक्ति का नहीं। और दूसरा अनुच्छेद

97:35

वो है अनुच्छेद 51 जो भारत की विदेश नीति

97:39

का आधार है। यह कहता है कि राज्य

97:42

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा

97:44

देगा। राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और

97:47

सम्मानजनक संबंध बनाए रखेगा

97:50

और अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत से

97:52

सुलझाने की कोशिश करेगा। बिल्कुल वसुदेव

97:55

कुटुंबकम यानी पूरी दुनिया एक परिवार है

97:58

कि जो भारतीय भावना है यह उसका संवैधानिक

98:01

प्रतिबिंब है।

98:02

तो हमने देखा कि राज्य के नीति निर्देशक

98:04

तत्व असल में भारतीय संविधान की आत्मा

98:07

[संगीत] का एक बहुत अहम हिस्सा हैं। यह

98:09

समान वेतन से लेकर ग्राम पंचायतों,

98:12

पर्यावरण संरक्षण से लेकर अंतरराष्ट्रीय

98:15

शांति तक हर पहलू को छूते हैं। यह सरकार

98:18

के लिए एक नैतिक दिशा निर्देशक की तरह

98:20

हैं।

98:21

बिल्कुल। और अब हम उस सवाल पर वापस आते

98:23

हैं जो हमने शुरू में उठाया था कि अगर यह

98:26

कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है तो इनका

98:30

महत्व क्या है? इनका महत्व का नहीं बल्कि

98:34

राजनीतिक और नैतिक है। कोई भी सरकार इनकी

98:38

पूरी तरह से अनदेखी नहीं कर सकती। क्योंकि

98:40

चुनाव के समय जनता इन्हीं पैमानों पर उनके

98:43

काम को तौलती है। यह वो आईना है जिसमें हर

98:46

सरकार को अपनी शक्ल देखनी पड़ती है।

98:48

यह सिद्धांत हमें याद दिलाते हैं कि आजादी

98:51

का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से छुटकारा पाना

98:53

नहीं था। उसका असली मतलब था हर नागरिक के

98:57

लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित

99:00

करना।

99:00

सही कहा। यह वो वादे हैं जो संविधान ने

99:03

भारत के लोगों से किए हैं। कुछ पूरे हो गए

99:07

जैसे शिक्षा का अधिकार या पंचायती राज।

99:10

कुछ पर काम चल रहा है और कुछ अभी भी एक

99:13

दूर का सपना लगते हैं। लेकिन यह रोड मैप

99:16

हमारे पास है जो हमें हमेशा याद दिलाता है

99:19

कि हमें जाना कहां है।

99:21

इस पूरी चर्चा से एक विचार मन में आता है।

99:24

स्रोत यह साफ करते हैं कि यह सिद्धांत

99:26

कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है ताकि

99:28

सरकारें अपनी क्षमता, अपने संसाधन और उस

99:31

समय की जरूरतों के हिसाब से इन्हें लागू

99:33

कर सकें। तो क्या यही लचीलापन इनकी सबसे

99:36

बड़ी ताकत है? अगर इन्हें मौलिक अधिकारों

99:39

की तरह सख्त और बाध्यकारी बना दिया जाता

99:41

तो क्या हमारा देश इतने अलग-अलग विचारों

99:43

और प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ पाता? एक

99:46

मार्गदर्शक सिद्धांत की असली ताकत शायद

99:49

उसके लचीलेपन में ही है ना कि उसकी सख्ती

99:51

में। इस पर सोचना दिलचस्प होगा।

100:15

[संगीत]

100:21

[संगीत]

100:26

[संगीत]

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